भक्ति, आस्था और अंधश्रद्धा के बीच झूलता मन
कार्यालय का यज्ञ और सोमवार की शुरुआत
प्रियम्वदा !
इस समय पर सबसे ज्यादा बिकने वाली चीज क्या है पता है? भक्ति। लोग भक्ति के प्रति इतने ज्यादा जागरूक हो चले हैं, कि अब एक भक्त को दूसरे भक्त से ज्यादा भक्ति करनी पड़ रही है। और मैं तो मानता हूँ, करनी भी चाहिए। भला श्रेष्ठता का क्या होगा अगर कोई अपनी भक्ति की तुलना ही न करेगा किसी और से तो?
आज सवेरे अपने कार्यालय पहुंचा तो पाया कि श्री बिजली देवी जी आंशिक अवकाश पर है। और उनकी अनुपस्थिति में उनका एक उपासक जिन्हे इलेक्ट्रीशियन कहा जाता है, वह इलेक्ट्रिक रूम में गहन तप कर रहा था। कुछ देर बाद ही मुझे इंद्र की तरह उस तपस्वी की साधना खलने लगी, क्योंकि शनिवार को लिखा हुआ एक संवाद मैं पब्लिश नहीं कर पा रहा था। मुझमे इंद्र जितने सामर्थ्य के आभाव के चलते, गर्मी की शक्तियों से आहत होकर मन मारकर बैठे रहना पड़ा। उतने में सरदार का सन्देश मिला, "वित्तीय वर्ष २०२४-२५ में हुए कारनामों के अभिलेखों का नाश करना है।"
रोडट्रिप की उम्मीद और नींद बहादुर
एक सुरक्षित स्थान देखकर मैंने अग्नि देव का आह्वाहन किया। आहुतियों के रूप में एक-एक कागज़ मैं उन्हें सौंपता गया। पर पता नहीं शायद वे असंतुष्ट थे मेरे इस यज्ञ से। वायुदेव बार बार मेरे इस हवन से मेरी आहुतियों के अवशेष उड़ा देते। मुझे सचेत रहना था, क्योंकि अग्नि देव की आहुति उड़ते हुए आसपास कहीं भी दावानल को आमंत्रित कर सकती थी। खुली आँखों में लगातार धुंए को झेलते हुए, तथा आहुति के उड़ते अवशेषों को रोकने के प्रयासों में बार बार कुछ कण मेरी आँखों में जाते रहे। तभी नींद बहादुर प्रकट हुआ। "बापु ! इस बार की ट्रिप ऑन है न?" (नींद बहादुर इस कार्यक्षेत्र में कड़छी, चिमटे जैसे आयुधों का धारक है, तथा पाकशास्त्र का जानकार है। और इस नींद बहादुर की विशेष जानकारी के लिए हमारी महाराष्ट्र रोडट्रिप पढियेगा। यहाँ क्लिक कीजिए। - देशाटन)
"तेरी हाँ है, तो मामला सेट है।" जलती आँखों को मलते हुए मैंने कहा। और उसने हामी भर ली। शायद इस बार वह रोडट्रिप हो जाए। पिछली बार इसी नींद बहादुर के कुपोषित बजट के चलते, हमने उत्तर प्रदेश के बजाए महाराष्ट्र की रोडट्रिप की थी। मैं तो उस ट्रिप के लिए इतना ज्यादा उत्साहित था, कि मैंने तो नींद बहादुर को बगैर ब्याज के सरल हफ़्तों की emi तक का विकल्प दिया था। पर बहादुर अभी पढाई जैसे कर्मठ कार्य की साधना भी करता है। अतः हम पढाई निवृतों को उस क्षेत्र में दखल देने का अधिकार भी नहीं है।
"सीमाडे सरप चिराणो" की लोककथा
लगभग बारह बजे उस यज्ञ से निवृत होकर अपने चक्केवाले सिंहासन पर आरूढ़ हुआ, तब तक बिजली देवी को उस उपासक ने प्रसन्न कर लिया था। ब्लॉग पर शनिवार से अपने पब्लिश होने के इंतजार में बैठे संवाद को पब्लिश किया। उतने में फिर सरदार की और से एक सन्देश प्राप्त हुआ। 'समुद्र मार्ग से आयात होते कुछ संसाधन का उपयुक्त बंटवारा करना है।' अक्सर मुझे यह बंटवारा करते हुए 'सीमाडे सरप चिराणो' याद आ जाता है। (हो गयी न गड़बड़..! यहाँ तक परसो लिखा गया था। और आज बुधवार हो चूका।)
"सीमाडे सरप चिराणो" एक गुजराती लोक कथा है। जिस अनुसार दो गाँवों के बिच लम्बे समय से सीमा-विवाद चल रहा था। आए दिन सीमा को लेकर मुठभेड़ होती। और लोग घायल होते और मरते रहते। एक दिन दोनों गाँवों ने बैठकर मामला एक ही बार में निपटा लेने के सोची, सीमा पर लोग जमा हुए। लेकिन इस बात पर एकमत नहीं हो पा रहे थे, कि सिमा तय करेगा कौन? तभी एक सर्प वहां से जाता दिखा। गाँव के कुछ मसखरों ने लोगों से कहा, कि 'इस सांप को ही कहो, यह सीधा चलकर सीमा खिंच देगा।' सांप को यह सुनकर बुरा लगा, और उसने टेढ़े-मेढ़े चलने के बजाए एक सीधी रेख में चलने लगा। लोगों को आश्चर्य हुआ, श्रद्धा हुई। सांप सीधी रेखा में चलता गया। पीछे गाँव वाले खूंटा गाड़ते गए। सर्प आगे बढ़ रहा था, वहां बीचोबीच एक कांटेदार पेड़ का सूखा तना था, जो नुकीला था। अब सब लोग सोच में पड़ गए, सर्प उस तने के इस तरफ से चलेगा या इस तरफ से। क्योंकि जिस भी तरफ से जाएगा, दूसरे पक्ष को उतना हिस्सा ज्यादा मिलेगा। लेकिन सर्प तने के ठीक ऊपर से चला। ताकि वह निष्पक्षता से बंटवारा करे। और तने की नोंक पर चलने से उसका शरीर दो फाड़ में चीरा गया। तब से मुहावरा बन गया, सीमाडे सरप चिराणो = जो बंटवारा करवाएगा, उसकी जिम्मेदारी बड़ी है।
क्या भक्ति विज्ञान का विकल्प बन सकती है?
भक्ति पर लौटता हूँ। बात ऐसी है, मैं जिस क्षेत्र में बसा हूँ, वहां भक्ति अपरम्पार दिखती है मुझे। शायद मुझे दृष्टिदोष है। क्योंकि मैं वह देख रहा हूँ, जो लोग देखकर भी आँखे मींच लेते है। राम मंदिर बना, उससे करोडो रुपयों का योगदान होता है देश के अर्थतंत्र में। लेकिन वहीँ इस धार्मिकता से क्या देश को वैज्ञानिकी उन्नति प्राप्त होगी? कुछ दिनों पहले मेरे इंस्टाग्राम में 'राधे-राधे' करने वाले लोगों की बाढ़ आ गयी थी। युवा, जिन्हे तकनीक में, इंजिनयरिंग मार्वेल्स में, स्पेस में अपना योगदान देना चाहिए, वे लोग धोती पहनकर, गले में माला डालकर 'राधे-राधे' कर रहे है। और प्रचार भी कर रहे है। ज्ञानी बनो, लेकिन विज्ञानी पहले बनो।
टीवी का प्रचलन अब बहुत रहा नहीं है। पर मैंने फिर भी 'फ्री डिश' वाला कनेक्शन लगा रखा है। समाचारों की चेनल्स तो आती है उसमे। एक बड़ा न्यूज़ चैनल उसमे दिखा रहा था, कि कोई बाबा है, उसके वहां लोगों के असाध्य रोग भी ठीक हो जाते। लोगों को डॉक्टर के पास जाने के बजाए मीडिया खुद बाबाओं के पास भेज रहा है। इसी तरह वह एक बाबा बहुत फेमस हो चला है, पर्चे वाला बाबा।
इस रविवार को हुकुम का आदेश था। चौवन किलोमीटर दूर वाले हनुमान मंदिर जाना है। शायद वही हनुमानजी घर से महज पांचसौ मीटर दूर भी बिराजते है। लेकिन नहीं, जाना उसी वाले मंदिर पर है, जो आजकल श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है। मैं तो घूमने की इच्छा से ही तीर्थों की यात्रा करता हूँ। मुझे मंजिल से ज्यादा मंजिल तक पहुँचने का मार्ग आकर्षित करता है। शाम चार बजे सपरिवार निकल पड़े। मंदिर अभी निर्माणाधीन है। लेकिन लोगों की आस्था है, कि यह वाले हनुमान जी पर श्रीफल पर मनोकामना लिखी चिट्ठी बांधकर चढ़ाने से मनोकामना पूर्ण होती है।
शाम की आरती तक रुके। हवाएं लगभग चालीस-पचास किलोमीटर प्रति घंटे की गति से बहती थी। रात को एक बढ़िया से ओपन गार्डन रेस्टोरेंट में डिनर के लिए चल दिए। कुँवरुभा ने नींद में भी हाका नूडल्स थोड़े खाए। और एक मजेदार घटना यह हुई, जब वेटर ने राइस के लिए पूछा तो माताजी ने आइसक्रीम समझ कर हामी भर दी। राइस और आइस..! मैं फिर से मुद्दे से भटक गया। भक्ति.. भक्ति..
कुछ सालों पहले मेरे शहर के पास में ही एक प्रसिद्द हनुमान मंदिर था। लोगों की श्रद्धा थी, कि हनुमानजी की मूर्ती पाताल से निकली है। मजेदार बात यह है, कि लोग यह पाताल वाले हनुमान जी जाते हुए रस्ते में बीहड़ में तब्दील हो चुके एक अन्य हनुमान मंदिर की उपेक्षा करते थे। शायद समय के उस खंड में वे पाताल वाले हनुमान जी ज्यादा प्रभावशाली थे। अभी, यानी की एक-डेढ़ सालों में वे बीहड़ वाले हनुमान जी फिर से प्रभाव में आये है, और लोग पाताल वाले हनुमानजी के बजाए इस बीहड़ वाले हनुमानजी की ओर मुड गए। मैं भी हनुमानजी का उपासक हूँ, लेकिन इस तरीके से नहीं।
मंदिर, यात्रा और अर्थव्यवस्था
खैर, जैसी जिसकी श्रद्धा। या जैसी जिसकी अंधश्रद्धा। शायद हो सकता है, मैं भी अंधश्रद्धा वाला होऊं, और मुझे पता न हो। क्योंकि लोगों की श्रद्धा तो यही कहती है, जिसका जितना चमत्कार उतनी उसकी भक्ति। वैसे यूँ मंदिर मंदिर भटकने से भी अर्थतंत्र में योगदान होता है। ट्रेवलिंग करना पड़ता है। होटल में रुकना पड़ता है। रेस्टोरेंट्स में खाना पड़ता है। और मंदिर में चढ़ावे के लिए भी कुछ तो खर्च होगा ही। और फिर अंत में कुछ लोग गुप्तदान भी तो करते है, अपनी श्रद्धा को पोषने के लिए।
श्रद्धा और अंधश्रद्धा की पतली रेखा
यह सारा मैंने अभी पढ़ा। ऐसा दीखता है जैसे मैं नास्तिक हूँ। अब इसमें कुछ शब्दों और बातों को सुधारने में समय लगेगा। और वैसे भी क्या फर्क पड़ेगा तुम अगर मेरे बारे में कोई राय बाँध लो। पर मैं यदि अपनी ओर से स्पष्टीकरण देना चाहता हूँ, तो मैं तकवादी हूँ। मेरी आस्था या नास्तिकता सदैव झूलती रहती है। मैं प्रतिदिन सुबह मंदिर जाता हूँ, कपाल पर तिलक भी करता हूँ। इसे शायद आस्तिकता का दिखावा भी माना जा सकता है।
छोडो प्रियम्वदा ! इन सब में पड़ने से विवाद जन्मते है। और मैं तो सहस्त्रबुद्धियों के बिच भी वाद में नहीं उतरता, यह तो मेरे तुम्हारे बिच की बात है।
शुभरात्रि,
१३ तथा १५ जुलाई २०२६
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक,
प्रश्न (FAQ)
क्या आस्था और अंधश्रद्धा में अंतर होता है?
हाँ। आस्था व्यक्ति के विश्वास का विषय है, जबकि अंधश्रद्धा बिना तर्क, प्रमाण या वैज्ञानिक सोच के किसी बात को अंतिम सत्य मान लेने की प्रवृत्ति है।
क्या धार्मिक पर्यटन अर्थव्यवस्था को लाभ पहुँचाता है?
हाँ। धार्मिक पर्यटन से परिवहन, होटल, भोजन, स्थानीय व्यापार और छोटे व्यवसायों को लाभ मिलता है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति मिलती है।
क्या विज्ञान और भक्ति साथ-साथ चल सकते हैं?
कई लोगों के अनुसार विज्ञान और व्यक्तिगत आस्था एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। विज्ञान प्रमाण और तर्क पर आधारित होता है, जबकि भक्ति व्यक्ति की निजी आस्था का विषय है।
इस लेख का मुख्य विषय क्या है?
यह एक व्यक्तिगत हिंदी डायरी है जिसमें लेखक ने भक्ति, आस्था, अंधश्रद्धा, विज्ञान, मंदिर यात्राओं, धार्मिक पर्यटन और समाज से जुड़े अपने अनुभवों एवं विचार साझा किए हैं।
📖 थोड़ी देर और ठहरो प्रिय पाठक,
- 📚 किताबों की दुनिया – इन किताबों ने मुझे बदला, शायद आपको भी पसंद आएं।
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