महिला सुरक्षा या महिलाओं से सुरक्षा? — एक संवाद
प्रस्तावना
प्रियम्वदा !
किसी भी जगह जाने से पूर्व कुछ तैयारियां करनी पड़ती है। सबसे पहले तो वह मजबूत इच्छा, जो हमें वहां जाने के लिए प्रेरित करें। उसके पश्चात चाहिए थोड़ा बहुत दिशाज्ञान। उसके बाद वहां तक जाने का सामर्थ्य, और रस्ते में पड़ने वाली कठिनाइयों से लड़ने का हौंसला। थोड़ा बहुत दर्शन और विवेकबुद्धि। बस, फिर तो गंतव्य तक पहुँचने का श्रम भर ही करना है। पर इतना आसान है कहाँ। मुझे तो अक्सर कठिनतम काम भी सोचते हुए बड़े आसान लगते हैं। और जब काम करने की घड़ी आती है, तो आसान काम भी कठिनतम लगता है।
मुद्दा कहाँ से शुरू हुआ?
बात ऐसी है, अब मुझे yq वाले मोटाभाई तो विषय देते नहीं। ना अब स्नेही का साथ है। तो उस बंगाली गीत की तरह 'एकला चोलो' ही जाना है, तो फिर यहाँ वहां मुंह मारने पर जो दिखे उसे विषय बना लेना पड़ता है। तो मैं सच में यहाँ-वहाँ देख ही रहा था, कि व्हाट्सप्प की घंटी बजी। सहस्त्रबुद्धि सभा में पडकार फेंका गया था, इस छुट्टी के अवसर पर हम भाषणबाजी करेंगे। भाषणबाजी के लिए क्या चाहिए? बस तर्क का तरकश। और? और चाहिए केवल एक मुद्दा। जिसे हम खिंच-भींचकर तहस-नहस करेंगे।
प्रियम्वदा : "मुद्दा क्या है? आप से तो बात का बतंगड़ करवा ले कोई।"
मैं : "महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंता।"
प्रियम्वदा : "अरे वाह, बड़ा सही मुद्दा है यह तो। इस पर तो पूरी दुनिया को शामिल होना चाहिए।"
मैं : "ओहो, तुम्हे भी दुनियादारी आने लगी?"
प्रियम्वदा : "आपसे तो बात करनी बेकार है। आपने कितनी बार अपनी लेखनी से महिला सुरक्षा के बारे में लिखा?"
मैं : "अच्छा जी, मेरी बिल्ली मुझसे म्याऊं? तुम्हे तो बल्कि इस विषय को दूसरे दृष्टिकोण से देखना चाहिए।"
प्रियम्वदा : "क्या मतलब?"
मैं : "बहस होनी चाहिए, पर 'महिलाओं की सुरक्षा' पर नहीं, 'महिलाओं से सुरक्षा' पर।"
प्रियम्वदा : "मुझे नहीं पता था, आप इतने कायर है।"
मैं : "प्रिये, बात कायरता या भीरुता की नहीं है। समाचारों में देखो, लगातार वे खबरें ज्यादा हाइलाइट हो रही है, जिसमे स्त्री द्वारा रिवाज़ को तोड़कर पुरुषों को निपटा दिया गया है।"
प्रियम्वदा : "ख़बरों का क्या है, उनकी खुद की आयु एक दिन की है।"
मैं : "पर उनकी आयु से उनकी अहमियत नहीं बदल जाती।"
प्रियम्वदा : "आप तो अपने मत को डिफेंड करने लगे।"
मैं : "तो तुम कर लो मुझे डिफेंड, मैं तो तुम्हें वैसे भी पलकों पर बिठाने का ख्वाब बांधे बैठा हूँ।"
प्रियम्वदा : "आए बड़े पलकों पर बिठाने वाले। मुद्दे से मत भटकिये।"
मैं : "चलो तुम सहस्त्रबुद्धियों के पक्ष में, और मैं मेरे।"
प्रियम्वदा : "मंजूर है। तो बताइये, क्या स्त्रियों के पास उनकी बाल्यावस्था से लेकर वृद्धावस्था तक सम्पूर्ण अधिकार है?"
मैं : "तो क्या पुरुषों के पास है? पुरुषों को बचपन से एक चाबुक लेकर काबू किया गया है। बचपन में वह चाबुक माता के पास था। विवाह के पश्चात पत्नी के पास होता है।"
प्रियम्वदा : "पर पुरुष अधिकार जताते है, क्या कहीं सुना है किसी स्त्री ने पुरुष को लूट लिया। हमेशा से स्त्रियां ही लूटी गयी है। और लुटेरा पुरुष रहा है।"
मैं : "अच्छा, तो तुम चाहती हो स्त्री लुटेरी बने, लुटेरी दुल्हन सुना है तुमने?"
प्रियम्वदा : "स्त्रियां अकेली सड़क पर चल नहीं सकती। पुरुष का पहरा सदैव रहता है उस पर। और तो और सारे ही सामाजिक नियम कानून स्त्रियों के प्रति कड़े है।"
मैं : "हाँ ! वह तो सही कहा। तभी तो स्त्रियां हद के बाहर चली जाती है।"
प्रियम्वदा : "वह तो पुरुष भी जाते है।"
मैं : "तुम्हे नहीं लगता है यह जो स्त्रियाँ महिला अधिकार, महिला आरक्षण, महिला सुरक्षा की बातें करती है, वे अति कर रही है। तुम्हे क्या लगता है, महिला, महिला, महिला करते रहने से क्या होगा?"
प्रियम्वदा : "आपकी सोच बदलेगी।"
मैं : "यह तो हद्द है, मैंने क्या कर दिया?"
प्रियम्वदा : "आप पुरुष है, आप नहीं समझेंगे।"
मैं : "यह तो दावा है। तो क्या तुम पुरुषों को समझती हो?"
प्रियम्वदा : "मुझे जरुरत नहीं। पुरुष खुद मेरे पास आते है। कठोरता की अति से त्रस्त होकर कोमलता से सिंचित होने।"
मैं : "इसे त्रिया चरित कहते है"
प्रियम्वदा : "इसे भी आप नहीं समझेंगे, त्रिया चरित को।"
मैं : "फिर तो मैंने साबित कर दिया, 'महिलाओं को सुरक्षा' से ज्यादा, 'महिलाओं से सुरक्षा' की जरुरत है।"
प्रियम्वदा : "अरे नहीं.. नहीं.. मेरा वह मतलब नहीं था। आपने मुझे बातों में फंसाया है। क्या आपको वाकई नहीं लगता महिला सुरक्षा पर आप जैसे कलाकारों को विशेष ध्यान देना चाहिए।"
मैं : "मैं कोई कलाकार नहीं। मैं तो दर्शक हूँ। मैं तो बस तुमसे बात करता हूँ। मुझे दिखती कठोरता को तुम्हारे समक्ष रखकर, तुम्हारी कोमलता से सिंचित होता हूँ।"
प्रियम्वदा : "रहने दो, रहने दो ! सब समझ आ रहा है।"
मैं : "सच कहूं, तो मुझे लगता है, महिलाओं की सुरक्षा खतरे में तो है। उन्हें बचपन से नियंत्रण में रखा गया है। यह करो, वह मत करो। लेकिन यही नियंत्रण पुरुषों पर भी था ही। बस पुरुषों को घर से बहार जाने की ज्यादा अनुमति थी। पर मुझे यह भी लगता है, कि कहीं यही कारण तो नहीं, कि बचपन से नियमों के द्वारा नियंत्रित की जाती स्त्रियां विवाह के पश्चात मिली आंशिक स्वतंत्रता में, विवेकहीन होकर या तो पति निपटा देती है, या एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर चलाती है?
प्रियम्वदा : "इतना बड़ा आरोप? स्त्रियों को चरित्रहीन कह रहे आप।"
मैं : "अरे नहीं ! यह एक दृष्टिकोण है।"
प्रियम्वदा : "तो वही तो मुद्दा है, कलाकारों को इस बात में रस लेना चाहिए। महिला सुरक्षा सिर्फ उसकी शारीरिक सुरक्षा नहीं होता, उन पर लदे कड़े नियमों से भी कुछ स्वतंत्रता मिल जाए। और उन्हें खतरा है किनसे? पुरुषों से ही.."
मैं : "यह खतरे वाली बात तो तुम रहने ही दो। इस संसार में स्त्री की शत्रु एक स्त्री ही है। सास की बहु से नहीं बनती, ननद की भाभी से, और देवरानी की जेठानी से। अच्छे भले दो भाइयों में फुट यह स्त्रियां ही तो डालती आयी है।"
प्रियम्वदा : "पुरानी बातें है यह सब। शिक्षित स्त्रियां सभी को साथ लेकर चलती है। क्या आप इस बारे में सोच भी नहीं सकते, कि आप अपनी कला के माध्यम से महिलाओं की सुरक्षा और जागरूकता के लिए क्या योगदान दिया जा सकता है।"
मैं : "नहीं, मुझे लगता है। यह स्त्रियों की अपनी सोच पर निर्भर है, उन्हें क्या चाहिए, कैसे चाहिए, कैसे हांसिल करना है। फिर चाहे वह स्त्री किसी को नीले डिब्बे में भर दे, या पहाड़ से धक्का दे-दे। वह चाहे तो पुरे परिवार को संभाले, या फिर नौकरी करके घर चलाये। आज के दौर में जितनी स्वतंत्रता पुरुष के पास है, उतनी ही स्त्री के पास भी। स्त्री में आत्मविश्वास होगा, तो वह प्रत्येक कठिनाइयों को सरलता से पार कर लेगी, वरना बैठकर रोएगी, कि महिला सुरक्षा गंभीर मुद्दा है। बात करने से कुछ नहीं होता प्रियम्वदा ! इस देश में लोग बात ही करते हैं।"
प्रियम्वदा : "क्या मतलब? महिला सुरक्षा का मुद्दा जरुरी नहीं है?"
मैं : "अफ़ग़ानिस्तान जाओ, वहां ज्यादा जरूरत है।"
प्रियम्वदा : "आप तो सरकारी भाषा बोलने लगे, सरकार के चाटुकार कहते है, यहाँ चले जाओ, वहां चले जाओ।"
मैं : "अब छोड़ भी दो इस बहस को, तुम भी कभी-कभी स्वतंत्रता और सुरक्षा को लेकर बेहद हो जाती हो।"
प्रियम्वदा : "तो क्या आप हो इसमें जरा सी गंभीरता नहीं दिखती?"
मैं : "तो क्या तुम यह चाहती हो, कि मैं भी लिंगभेद करूँ? स्त्री की सुरक्षा सुरक्षा, और पुरुष बेचारा?"
प्रियम्वदा : "नहीं ! लेकिन स्त्रियों को ज्यादा आवश्यकता है। आपने कभी सुना है पुरुष को चार लड़कियों ने मिलकर छेड़ा हो।"
मैं : "हाँ ! आजकल तो यह खबरें भी आती है। देखो, मैंने पहले भी कहा था, सुरक्षा, या सामाजिक दूषण जैसे मामलों में स्त्री-पुरुष का लिंगभेद नहीं होता है। खतरा खतरा होता है, स्त्री हो या पुरुष। सुरक्षा का घेरा दोनों के लिए बराबर होता है।"
प्रियम्वदा : "संविधान तो समानता का अधिकार देता है। पर आपकी समाज व्यवस्था नहीं देती, उसका क्या?"
मैं : "यह बचकानी बातें मत किया करो प्रियम्वदा, समानता तो प्रकृति ने ही कहाँ दी है? समानता होती यदि स्त्री पुरुष में, तब तो पुरुष भी गर्भधारण करते।"
प्रियम्वदा : "तब तो आप यह भी कहेंगे, कि फिर स्त्री की जरूरत ही क्या है?"
मैं : "नहीं, मैं यह नहीं कहता। मैं कहता हूँ, प्रकृति ने जो काम स्वयं बाँट रखे हैं, वहां क्या हमें बस अपने अहम को पोषने के लिए नारिवादिता घुसानी चाहिए? कल को तो तुम कहोगी, कि सारी गालियां स्त्रियां सम्बंधित है.."
प्रियम्वदा : "वो तो है ही.. कौनसी गाली भाई-बाप के लिए बनी है।"
मैं : "गालियां देता कौन है? एक पुरुष दूसरे पुरुष को। और गालियां क्या है? एक सीमा रेखा। वह सीमा जिसका हम उल्लंघन नहीं करते, नहीं कर सकते। गाली क्यों दी जाती है? उस पुरुष को उस सीमारेखा तक धकेलकर चोट करने के लिए। बालक है, वे एक दूसरे को माँ की गाली देंगे, क्योंकि वह उस समय तक अपनी माँ को सर्वस्व मान रहा होता है। वयस्क पुरुष बहन की गालियां देते हैं, क्योंकि वहां बहन एक सीमा रेखा है उसकी। और विवाहित पुरुष को बेटी की.. क्यों? क्योंकि वहां उसे सबसे ज्यादा चोट लगती है। चोट क्यों लगती है, क्योंकि उसकी भावना गहन है वहां। बाप का, भाई का क्या है? पुरुष का पुरुष के प्रति आकर्षण उतना तीक्ष्ण नहीं होता।"
प्रियम्वदा : "अच्छा, तो मान ही लिया न आपने, कि महिला सुरक्षित नहीं है। महिला का उपयोग किया जाता है, गालियों में भी।"
मैं : "तो मैंने कब कहा था महिला सुरक्षा जरुरी नहीं है। मैं तो कह रहा हूँ, महिला को सुरक्षा दो, लेकिन पुरुष को भी दो। एक तरफ तुम्हे समानता का अधिकार भी चाहिए, और दूसरी तरफ महिला आरक्षित भी? इसे दोहरा मापदंड कहते है प्रिये।"
प्रियम्वदा : "दोहरा-दुहरा कुछ नहीं होता। महिला सुरक्षा एक नैतिक जिम्मेदारी की तरह लेना चाहिए सबको। न्यायलय भी कितनी देर लगाते है, एक बलात्कार के केस का निकाल करने में।"
मैं : "हाँ ! यह बात तो सही है। न्यायालय में देरी तो होती है। सोचो अगर कोई किसी पर झूठा बलात्कार का केस कर देता है, और यह न्याय प्रणाली त्वरित उसे सजा दे देगी तो?"
प्रियम्वदा : "हाँ ! झूठे केस तो होतें है।"
मैं : "इसी लिए तो मैं कह रहा था, महिलाओं से सुरक्षा पर बात करनी चाहिए।"
प्रियम्वदा : "क्या कर सकते हैं, जब आप जैसे लोग एक लघुताग्रंथि बांधकर चर्चा में उतरते है। मुझे बात ही नहीं करनी।"
शुभरात्रि।
११/०७/२०२६
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक,
आपकी क्या राय है?
क्या सुरक्षा का विषय केवल महिलाओं तक सीमित है, या समाज को स्त्री और पुरुष दोनों की सुरक्षा पर समान रूप से विचार करना चाहिए?
अपने विचार नीचे टिप्पणी में अवश्य लिखें।
Q1. महिला सुरक्षा क्यों महत्वपूर्ण है?
महिला सुरक्षा प्रत्येक व्यक्ति के सम्मान, स्वतंत्रता और समान अवसरों से जुड़ा सामाजिक विषय है।
Q2. क्या पुरुषों की सुरक्षा पर भी चर्चा होनी चाहिए?
हाँ। किसी भी प्रकार की हिंसा, उत्पीड़न या झूठे आरोप से सुरक्षा स्त्री और पुरुष दोनों का अधिकार है।
Q3. क्या समानता का अर्थ समान परिस्थितियाँ होता है?
नहीं। समानता का अर्थ समान अधिकार और न्याय है, जबकि परिस्थितियाँ व्यक्ति और समाज के अनुसार अलग हो सकती हैं।
Q4. क्या केवल कानून से महिला सुरक्षा सुनिश्चित हो सकती है?
नहीं। कानून के साथ सामाजिक जागरूकता, शिक्षा, संवेदनशीलता और त्वरित न्याय भी आवश्यक हैं।
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