प्रियम्वदा: मंदिर, मौसम, वेब सीरीज़ और मन की उलझनें

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मंदिर, मौसम, वेब सीरीज़ और मन की उलझनें


बारिश के मौसम में विचारों में खोया एक लेखक

मोबाइल डिस्चार्ज हुआ तो लिखने बैठ गया

    प्रियम्वदा !

    असल में तो मोबाइल चार्ज हो रहा है इस लिए यह लिखने आ गया हूँ। जब तक फोन की बैटरी चार्जड होती है, तब तक तुम्हारी जरुरत महसूस कहाँ होती है? वैसे तो और भी ज़रिये हैं तुम्हे इग्नोर करने के मेरे पास, मैं गूगल मैप्स में निकल पड़ता हूँ, अनजान रास्तों की तलाश में। वे रस्ते मुझे बहुत दूर ले जातें है। जैसे अभी इसी पन्ने की साइड टैब में प्रयागराज के अरैल घाट पर भी मैं मौजूद हूँ। 


डीकपल्ड देखकर मन में उठे सवाल

    मोबाइल के डिस्चार्ज हो जाने का एक मात्र कारण था डीकपल्ड। पता नहीं मैंने क्यों देखी यह वेब सीरीज़। पहेली बात यह पूरी की पूरी वेब सीरीज़ अंग्रेजी में हैं। और मैं ठहरा अनपढ़। अंगूठाछाप, फिर भी देखी मैंने। सच बताऊँ तो अच्छी है, लेकिन बहुत ज्यादा नहीं। सोच, समझ और समाज से परे है। और मैं इस व्यवस्था को अमीर और बड़े लोगों पर डालकर अपना पल्ला झाड़ लूंगा। 


क्या हम सचमुच अपनी बात कह पाते हैं?

    बात करना, बात कर पाना, या बात रख पाना, यह भी एक जरुरी लेकिन विचित्र काम है। मुझे यह तीनों नहीं आते। क्योंकि मैं तुरंत अगले के प्रति एक धारणा बाँध लेता हूँ, कि इसकी समझ यहाँ तक होगी। तो उससे आगे की बात बताऊंगा तो शायद वह समझ भी नहीं पाएगा, और वह इंटरेस्ट भी न लेगा। तो बस, मेरी आधी बातें तो यहीं समाप्त हो जाती है। अतः मेरे पास कोई बातें न होने का मैंने अच्छा कारण खोज निकाला है। आज तो खुद ही खुद को जज करते समय खुद ही खुद की वकालत कर लेते हैं.. सही कहा न प्रियम्वदा?


राम मंदिर और चंदे की राजनीति पर कुछ विचार

    पत्ता अभी अफ़सोस कर रहा था, राम मंदिर वाला कांड सुना? इतना तो बाहरी आक्रमणकारियों ने हमे नहीं लूटा होगा? वो उधर कब्र में सोया पड़ा गज़नवी जब सुनेगा तो कैसा फील करेगा? बेचारे की दहशत ही लूट पर निर्भर थी, यहाँ तो बगैर खून-खराबे के लूट मचा दी लोगों ने। कैसा नसीब है इस देश का.. इस देश के मंदिरों के भाग्य में है लूटा जाना। बहार से अब लूटेरा नहीं आ सकता है, तो अंदर वालों ने ही लूट लिया।


मंदिर केवल आस्था नहीं, अर्थव्यवस्था भी है

    पर प्रियम्वदा ! तुम सोचो, मंदिर बनाने का उद्देश्य क्या था? अर्थतंत्र में मंदिर का योगदान ही..? ईश्वर तो वैसे भी कण कण में मानने की परंपरा रही है हमारी। दूसरा उद्देश्य केवल बदला था, कि हमारे ईश्वर के स्थान पर और किसी का ईश्वर कैसे बैठ जाएगा? खैर, तुम सोचो तो सही प्रियम्वदा ! कितने ही लोगों का पेट भरता है यह मंदिर। लाखों लोगो के पेट, और हजारों लोगों की जेब भी भर दी। इकनोमिक बूस्ट तो दिया ही है मंदिर ने। मान लेते है लोगों ने मंदिर का चंदा चोरी किया। मान क्या, किया ही है। लेकिन यह भी तो है, वह चोरी किया हुआ पैसा लगना तो इसी देश में है। पैसा मरेगा थोड़े? भारतीय मीडिया जैसी बार कर दी न मैंने?


जिम्मेदारियों के बीच अपना समय कहाँ बचता है?

    आज रविवार है। जानता हूँ, इस पोस्ट में दो तीन दिन समा गए है, पर अब मैं लिखने में आलस करने लगा हूँ। आज प्लान तो था कि दोपहर बाद यहीं पास की पहाड़ियों में बाइक लेकर निकल पडूंगा। लेकिन घर गृहस्थी सँभालने वाले पुरुष के पास अपने लिए अपना समय कुछ नहीं होता। वैसे होना भी क्यों चाहिए? जब तुमने अपने स्वीकारे है, तो उन अपनों का भी तुम्हे ही संभालना होगा। आज सवेरे से मौसम शाम जैसा ही है, अँधेरे से सना हुआ। न घोर अँधेरा, न पूर्ण उजियारा। ग्रे.. मेरा पसंदीदा। बस एक तूफानी हवाओं की कमी है। 


बारिश का इंतज़ार और पश्चिम का मौसम

    सुदूर पश्चिम में बसने का एक यह गेरलाभ है, कि यहाँ पुरे भारत में वर्षा हो जाने के पश्चात बारिश आती है। और लाभ यह, कि सारे सोशल मीडिया के भीग जाने के बाद असल में होती बारिश में भीगते हुए, दोबारा भीगने की अनुभूति होती है। 


प्रीतम एंड पेड्रो: एक मजेदार साइबर क्राइम कॉमेडी

    कल रात अनिंद्रा के चलते एक और वेब सीरीज़ देख ली, प्रीतम एंड पेड्रो। अरे बड़ी जबरदस्त वेब सीरीज़ है। मुझे वैसे भी चैसिंग करने वाली फिल्मे और वेब सीरीज़ ज्यादा पसंद आती है। चोर-पुलिस वाली। जहाँ एक चोर सतत भागता रहता है, लगातार पुलिस को चकमा देता रहता है। और अंत में जब पुलिस जीतती है, तो बड़ा मजा आता है। यह भागमभाग शायद इस लिए भी पसंद आती है, क्योंकि बचपन में टॉम एंड जेरी बहुत देखा है। कितने ही विफल प्रयासों के उपरांत टॉम कभी भी जेरी को पकड़ ही न पाया। टॉम हर बार शायद इस लिए उसे पकड़ नहीं पाता था, क्योंकि उसे भी इसी भागमभाग में मजा आता था। 


    प्रीतम एंड पेड्रो एक साइबर क्राइम कॉमेडी सीरीज़ है। जिसमे प्रीतम एक साइबर जीनियस है, पेड्रो एक क्राइम ब्रांच का अफसर। एक साइबर क्रिमिनल भी है, जो प्रीतम से बदला लेना चाहता था। काफी मजेदार और रोमांचक सीरीज़ लगी मुझे तो। 


बारिश, प्रेम और अधूरी कविता

    खैर, मौसम भी इतना मजेदार है, कि इसमें कोई कविता लिखनी चाहिए। वैसी कविता जहाँ बस प्रेम हो, प्रेम की तड़प। वैसी कविता जिसे पढ़ने वाला अपने भूले बिसरे को याद करने लगे। ऐसी कविता जहाँ बादल और धरती के रूपक को सदा से कवियों ने प्रेमी की तरह लिखा है, उसी रस्ते पर एक कविता ऐसी जिसमे सौंदर्य का बखान हो। ऐसी कविता जिसमे ज़रा सा विरह हो, जो बस ह्रदय में एक अग्नि उठाए, लेकिन तुरंत ही प्रेम की वर्षा से वह अग्नि शांत हो जाए। ऐसी कविता, जहाँ आलिंगनबद्ध प्रेम में शरीर की ऊष्मा सचेत हो, और उस पर वर्षा के जलबूँदों से होती शीतलता। लेकिन फिर मुझे याद आ जाती है श्रीकांत वर्मा की वह पंक्ति,


बरस रहा है अंधकार !

मगर उल्लू के पट्ठे !

स्त्रियां रिझाऊ कविताएँ 

लिख रहे हैं।

- श्रीकांत वर्मा


    शुभरात्रि। 

    ०५/०७/२०२६

|| अस्तु ||


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