फैसले लेना इतना कठिन क्यों होता है?
प्रियम्वदा !
फैसला लेना कभी भी आसान नहीं रहा है। एक फैसले के साथ बहुत कुछ बदल जाता है। एक फैसला पैसा खर्च करवाता है, तो एक फैसला कंजूस बना देता है। एक फैसला युद्ध करवा सकता है, और एक फैसला संधि। एक फैसला समाज को सुधार सकता है, तो कभी एक फैसला मृत्युदंड भी देता है। एक फैसले के पास कितने सारे अधिकार है.. फैसला धारण करने वाले पर निर्भर करता है, वह आबाद होगा या बर्बाद। फैसला सिर्फ उस फैसले को लेने वाले को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि उस फैसले से जुड़ने वाले तमाम लोग भी प्रभावित होते है।
इंस्पेक्टर अविनाश और मामला लीगल है से मिली सीख
प्रियम्वदा ! जीवन में आयी लड़कियां हो या वेब सीरीज़, पहले वाली ही हमेशा ज्यादा आकर्षक लगती है। आजकल मैं फिल्मे और वेबसीरीज़ देखने में अपना समय व्यतीत करता हूँ। पहले इंस्पेक्टर अविनाश का सीजन 2 देख लिया, और आज मामला लीगल है का दूसरा सीजन। जहाँ एक तरह न्याय प्रक्रिया को आसान करने, और प्रदेश को भयमुक्त करने अविनाश मिश्रा सुपरकॉप बनकर धायें धायें करता रहा पूरी सीरीज़ में, वहीँ विश्वेश्वर दयाल त्यागी जजशिप के बाद फिर से एक बार वकील बन गया। अपनी बात करूँ तो दोनों ही वेब सीरीज के प्रथम अध्याय ही मुझे ज्यादा पसंद आए थे।
इंस्पेक्टर अविनाश तो एक एक्शन ड्रामा है, तो उसके तो क्या ही कहने। उस पूरी सीरीज़ में मुझे एक चीज सबसे ज्यादा आकर्षक लगी, तो वह थी जब भी अविनाश ड्रिंक लेता था, तो पहले कपाल पर छुआता था। चाहे लड़ाई हुई हो, या पार्टी, वह अपनी उस प्रथा को न चूका। पर मामला लीगल है में इस बार थोड़ा कम मज़ा आया। ऐसा लगा जैसे एक वह पहले वाला स्पार्क मिसिंग था। इस सीरीज़ का अंतिम भाग तो वाकई क़ाबिलेदाद था, पर तब भी जब विश्वेस्वर ने जजशिप छोड़ दी, तो सारा मजा किरकिरा हुआ सा लगा। जज के पॉइंट ऑफ़ व्यू को बड़ी ही शालीनता से दिखाया गया है।
मृत्युदंड या आजीवन कारावास: सबसे कठिन फैसला
वह क्षण मुझे ज्यादा रोमांचक लगा, जब जज के सामने दो विकल्प थे, एक आजीवन कारावास, और एक मृत्युदंड। वाकई यह चुनाव ज्यादा विचलित कर देने वाला है। कितना कठिन होगा, जब आपके पास सत्ता है, किसी का जीवन समाप्त कर देने की। लेकिन आपकी भावनाएं वहां कमजोर हो रही है, कि अपराधी केवल चौबीस वर्ष का है, और उसका अभी पूरा जीवन बाकी पड़ा है। उसके जीवन में यह सम्भावना भी है, कि वह चाहे तो सुधर भी सकता है। उसे सुधरने का मौका देना या नहीं?
अगर उसे सुधरने का मौका दिया, और वह न सुधरा, तो समाज के लिए वह फिर से एक बार नुकसानदेह होगा। जब उसे मौका ही न दिया, तब भी वह सम्भावना का क्या, कि वह सुधर सकता था.. यह तो कल्पना के आधार पर फैसला हुआ, कि आपने धारणा बाँध ली है, कि अब सुधार की कोई गुंजाईश नहीं? दोनों विकल्प भ्रमणा पैदा करते है, और किसी एक फैसले पर आना मुश्किल काम हो जाता है। हालाँकि जज को केवल साक्ष्य, और तथ्य पर फैसला करना होता है। पर जज भी तो इसी समाज का हिस्सा है, वह इसी समाज से निकला एक व्यक्ति है। बस उसके पास सत्ता है, अधिकार है।
मन फैसला लेने से पहले इतनी संभावनाएँ क्यों गिनाता है?
तुम्हे क्या लगता है प्रियम्वदा? चुनावपूर्ण फैसले इतने ज्यादा कठिन क्यों होते होंगे? क्या हमारा मन उस समय किसी एक फैसले का ही पक्ष क्यों नहीं दिखाता? वह दोनों पक्षों की अच्छाई बुराई क्यों गिनाने लग जाता है? फैसला करते समय मन बहुत सारी संभावनाएं दिखाने लग जाता है। उनमे से कितनी ही संभावनाएं बस कल्पना के बल पर जन्मी होती है, हकीकत में उतरना भी असंभव होता है। पर नहीं, मन के बहकावे में वे संभावनाएं ज्यादा हावी दिखती है। शायद यही कारण है, फैसला करने में देरी होती है। जितनी ज्यादा देरी, उतना ज्यादा मानसिक तनाव।
गलत फैसलों का पछतावा और आत्मविश्वास की कमी
मैं खुद कितने ही फैसले करते समय विफल रहा हूँ। और कईं बार मेरे फैसलों पर मैने भरपूर पश्चाताप किया है। पश्चाताप और ग्लानि, कि मैंने यह फैसला क्यों लिया। हमेशा ही अगली बार फैसला लेने से पहले ज्यादा समय पिछले फैसले से प्राप्त अनुभव को सोचने में लग जाता है। हर बार अनुभव भी कहाँ काम आता है कोई फैसला कर लेने में। कईं बार बस होगी वह देखी जाएगी सोचकर भी फैसला ले लिया जाता है।
मैं तो अब यह फैसला करने में भी समय लेने लगता हूँ, कि अगली फिल्म कौनसी देखी जाए, या फिर अगला उपन्यास कौनसा पढूं? जब आपके अपने फैसलों से आप बहुत ज्यादा ग्लानि में रहे हो, तब अविश्वास भी बहुत ज्यादा हावी हो जाता है। फिर वह टोकता है, हर फैसले को लिए जाने से पूर्व। हर लिए गए फैसले पर आपको किसी की सहमति चाहिए, हर फैसले के साथ आपका व्यवहार एक जैसा रहने लगता है। और फिर एक समय आता है, आप पशुवत व्यवहार करने लगते हो, सहनशीलता के धनी। जिसे परवाह होती है, बस मैं चरुं, और अपना समय पूर्ण करूँ।
क्या बेपरवाह और लापरवाह एक जैसे होते हैं?
बेपरवाह और लापरवाह में ज्यादा फर्क नहीं है.. कईं बार लापरवाही और बेपरवाही एक जैसी ही होती। दोनों को किसी भी फैसले की परवाह नहीं होती। तुम्हे क्या लगता है प्रियम्वदा? मैं बेपरवाह हूँ, या तुम लापरवाह?
शुभरात्रि,
०३/०७/२०२६
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक,
आपके अनुसार जीवन का सबसे कठिन फैसला कौन-सा रहा है? क्या कभी किसी निर्णय का पछतावा हुआ? अपने विचार कमेंट में अवश्य साझा करें।
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फैसले लेना इतना कठिन क्यों होता है?
गलत फैसलों का पछतावा क्यों होता है?
क्या हर फैसला सही या गलत होता है?
न्यायाधीश के लिए सबसे कठिन निर्णय कौन सा हो सकता है?
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