मैं खुद से मिलने निकला हूँ..!
Date - 31/12/2025Time & Mood - 23:59 || स्वार्थी..
मैं अपना हूँ..
प्रियम्वदा,
कोई कभी भी अपने आपे में रह सका है? उसका एक वाजिब कारण है, हमें अपने आप का संग करना अरुचिकर लगता है। कभी भीतर झांकते है, तो हमें अपने द्वारा किये गए कितने ही असफल प्रयासों का अंबार खड़ा दिखाई पड़ता है। अंबार के उस पार एक आयना होता है, वहां बड़े साफ़ अंदाज़ में हम अपने आप को खड़ा पाते है। लेकिन बशर्ते फुर्सत होनी चाहिए, अंबार के उस पार देख पाने की।
मैं अपना हूँ, यह सिर्फ कहने सुनने तक नहीं है, इसे अपनाना भी चाहिए होता है। कईं बार भावनाओं में बहते हुए, हम खुद की भी बेहद तबाही कर लेते है। समय रहते उस तबाही के बाद सम्भल जाना चाहिए। दुनिया तत्पर बैठी है, अस्थिरता को पागलपन घोषित करने में, धुनि को दुत्कारने को। क्योंकि अपनी धून को सिर्फ हम सुनते रहे, अपने आप के वश में रहें, और हर किसी से कटाव को अपना ले, तब भी वह अहितकारी ही है।
प्रियम्वदा, अपने आप को जिसने भी अपना लिया है, वह असफलता की नदी तो तैर ही गया है। नदी के उस पार नई मंजिले, नए लक्ष्य, नूतन अनुभव का अधूरा चित्र है, उसे पूरा करना है। असफल प्रयासों का अनुभव, और नवीन लक्ष्य का उत्साह, इन दोनों को बसा कर हवा की तरह बहते रहना ही जीवन है। अपनापन भी तो इसी में है। हम क्या थे, क्या हुए, और क्या होंगे.. इन तीन सवालों में ही एक तस्वीर उभरती है। काल्पनिक होती है, लेकिन उसे वास्तविक बनाया जा सकता है। कइयों ने उन तीन सवालों को आत्मसात करते, अपनेपन को निखारा है।
एक सवाल :
सबक :
मैं अपने आप को स्वीकार पाता हूँ, दुनिया के सामने अपनी कोई अलग तस्वीर नहीं उभरने देता हूँ, या अपने आप से जुड़े कितने ही दृष्टिकोणों से ऊपर हो जाता हूँ, तब जाकर मैं सार्थक अपना हूँ।
अंतर्यात्रा :
मेरे भीतर भी बहुत सारे दोष है, मुझे उन्हें ठीक कर लेना चाहिए, आत्मविश्वास की उंगली पकड़कर फिर से चलना सीख लेना चाहिए। एक बार गिर जाने के बाद ही ठीक से चलना सिख पातें है।
स्वार्पण :
कईं बार हमें दूसरों के दीखते दोष पर चिढ चढ़ती है, लेकिन भीतर की कालिख से मुँह मोड़ लेते है। क्योंकि कालेपन में परछाई नहीं होती। अपनी परछाई देखने पर ही अंदाज़ आता है, क्या से क्या हुआ हूँ।
गिर कर समय रहते उठ जाना चाहिए,
लोगो का क्या है, वे तो तुरंत गिरा हुआ कह देते है।
जिसने अपनेपन को अपनाने में देर की,
लेकिन अपना लिया..
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