अँधेरा, आदतें और न लिख पाने की विवशता
प्रियम्वदा !
वैसे तो आज यह चिट्ठी तुम्हे मिल जानी चाहिए थी.. लेकिन क्या करता, लिखी ही नहीं थी..! कुदरत ने अँधेरा बिखेर दिया है। और उन्हीं अंधेरों में मैंने भी अपना बसेरा बना लिया है। आजकल बस दिन बीत रहे है.. धड़ाधड़। जैसे कंचों की बरनी फूटी हो.. यूँही सरसराते हुए दिन पर दिन बीत रहे है। लिखने को न कोई विषय होता है, न ही मन। वैसे भी अब वह हररोज लिखने वाली आदत भी तो छोड़ दी है।
रविवार का अर्थ और आधा दफ़्तर जीवन
अभी.. कल ही रविवार था। मेरे लिए रविवार का तात्पर्य बहुत कम है। आधा दिन तो मैं ऑफिस में ही बिताता हूँ। दोपहर चार बजे के बाद बचे समय का करूँ क्या? वह समय तो वैसा ही होता है, जैसा लोन पर लिया आईफोन। कोई वैल्यू ही नहीं रह गयी है आईफोन की तो प्रियम्वदा। खेर, सोचा कुँवरुभा के साथ टहल आता हूँ। मैं हर बार नई नर्सरी में जाता हूँ। अब कुँवरुभा यूँ तो बातों बातों में कहते है, खेती करूँगा, बेल पालूंगा, गाय रखूँगा, लेकिन नर्सरी ले गया, तो साहबज़ादे ने पैर ही पटक लिए। बोले, यह भी कोई जगह है..? बगीचे ले चलो।
नर्सरी, गुलाब और कुँवरुभा की ज़िद
बगीचे से उनका मतलब, जहाँ जुले होतें है, स्लाइड्स होती है, सी-सो होता है। मेरा प्लान था, कि कुछ हार्डी प्लांट्स ले लूँ, और थोड़ा खाद भी। लेकिन इस भाईसाहब ने तो वहीँ खड़े-खिले गुलाब की गरदन मरोड़ दी। अब नर्सरी वाला देखे, उससे पहले हम दोनों खिसक लिए। भला, वैसे ही कुँवरुभा को पालना आसान नहीं है, गुलाब को कौन पाले? तो हम चल पड़े वापिस घर..! प्रियम्वदा ! यूँ तो मुझे वर्दीवालों से थोड़ी समस्या है, लेकिन अपने क़ायदे के अनुसार हेलमेट लेने ही घर गया था। घर से हेलमेट उठाया, फिर चल पड़े फिर से मार्किट।
गेम-जोन — जहाँ हार की कीमत पहले ली जाती है
सोचा था, कुँवरुभा से झूठ बोलकर फिर दूसरी नर्सरी ले जाऊंगा। लेकिन बिच रस्ते में पड़ गया गेमजोन। अब यह एक ऐसी बला है, जहाँ बच्चें ने एक बार होर्डिंग देख लिया, तो या तो डाट-डपट करनी पड़ेगी, या फिर आदेश का पालन करते हुए जेब ढीली। कुँवरुभा है तो समझदार, लेकिन मेरा भी मन हो गया, इस फन-जोन में जाने का। प्रियम्वदा, कुछ जगहें ऐसी होती है, जहाँ आप हारने के पैसे खुद सामने से चुकाते हो। यह गेम जोन भी इन्ही जगहों में से एक है। यहाँ बढ़िया बढ़िया विडिओ गेम्स होते है, कुछ ट्रम्पोलिन्स भी।
डिजिटल बाइक, कार और अनुभवहीन ड्राइविंग
पुरे एक हजार रूपये का कार्ड खरीदा। कुछ बारहसो रूपये के पॉइंट्स मिले। अब भीतर तरह तरह के गेम-स्टेशन्स बने होतें है। वहां लगे मीटर पर कार्ड स्वाइप करो, और गेम खेलो। अब एक तो यह साढ़े पाँच की आयुधारी घमंडी कुंवर। ऊपर से गेम स्टेशन में खेलने की अनुभवहीनता। पहले तो साहब ने एक डिजिटल बाइक राइड का आनंद लिया। प्लास्टिक की मोटरसायकल पर बैठो, सामने स्क्रीन पर रोड दौड़ती रहती है। उसके टर्निंग के अनुसार यह मोटरसायकल का मिनिएचर हिलता रहता है, बस आपको फील देता है, कि बाइक आप खुद चला रहें है। साहब ने एक्सेलरेटर दिए बिना ही पूरी बाइक रेस पूरी की।
बाइक चलायी है, तो कार भी तो चलानी चाहिए। एक स्क्रीन के सामने स्टेयरिंग व्हील लगा हुआ था। पैरों में अक्सेलरेटर पेडल भी था। साहब बैठ गए, मैंने कार्ड स्वाइप किया, कुँवरुभा इतने मगन हो गए खेलने में, कि मुझे कहना पड़ा, कि कार के एक्सेलरेटर पेडल पर खड़े हो जाने से कार नहीं चलती। स्टेयरिंग भी संभालना होता है। सामने स्क्रीन में गुज़रती रोड के साइड के सारे लाइट-पोल्स उड़ाते हुए कार दौड़े जा रही थी। खेर, उसके बाद उन्हें ट्रैम्पोलिन में चढ़ा दिया। काफी देर उन्होंने वहां उछलकूद की। मैं बस इधर उधर पब्लिक को पैसे बर्बाद करते देख रहा था। थोड़ी देर बाद वे खुद ही वहां से थककर लौटे। टाइम लिमिट से पहले ही लौट आए।
तीन सौ रुपये के तीन चिप्स
अरे हाँ.. एक और खेल बढ़िया हुआ। वो उस चीज का नाम मैं भूल गया हूँ। एक बड़ा सा बकेट टाइप होता है, वहां ढेर सारे चिप्स के पैकेट्स पड़े होते है। बच्चे को एक झोलेनुमा चीज में बांधकर उस बकेट में उतारा जाता है। वह उठा सके उतने चिप्स के पैकेट उठा सकता है। और फिर उसे बाहर खिंच लिया जाता है। कुँवरुभा बोले मैं जाऊँगा। मैंने मना किया, लेकिन फिर साहबज़ादे ने पैर पटक लिए। तो करीब तीनसौ रूपये थे उस खेल के। कुंवरुभा को रस्सी में बांधकर उस बकेट में उतारा गया। और क्या देखता हूँ मैं.. साहब इतने बड़े बकेट में सिलेक्शन करने लगे.. यह नहीं कि मैं बहुत सारी उठा लूँ.. बल्कि वे तो चुन-चुनकर तय करते दिखे, यह लूँ या न लू? आजुबाजु वाले लोग भी हँसने लगे, और चीयर-अप करने लगे, कि बांहभरकर उठा लो, एक एक नहीं। लेकिन साहब ने तीनसौ रूपये के तीन चिप्स के पैकेट लिए।
सौ रुपये की पाँच रुपये वाली चॉकलेट
खेर, उनके आनंद में मैं भी शरीक हो गया। वे जिस आनंद में थे, वहां चिप्स की क्या कीमत है। उनकी आँखों में अलग ही उत्साह था। एक और गेम थी, दरअसल एक मशीन में एक प्लेट घूमती है, वहां एक बटन दबाओ। सही समय पर बटन दबाया गया, तो चॉकलेट्स की भरमार होनी थी। लेकिन सौ रूपये के उस खेल में कुंवरूभा ने सिर्फ एक चॉकलेट निकाली। इस बार पैसे जाने का दर्द हुआ, मैं थोड़ा जोर से बोल पड़ा, "वाह सुल्तान मिर्ज़ा, आपने यह पांच रूपये की चॉकलेट को सौ रूपये में हांसिल किया है.. वाह।" वहां उस मशीन के पास खड़ी, उस गेमजोन की कर्मचारिणी भी हँस पड़ी, और उसके साथ वहां आसपास खड़े लोग भी।
टिकट, गिफ्ट्स और उपभोक्तावाद का भ्रम
हाँ ! कुछ लोग यहाँ बस अपने बच्चों को दूसरों को खेलता दिखाने ही ले आते है। दरअसल यह गेम-जोन सबके लिए सस्ता नहीं है। है तो मेरे लिए भी नहीं, लेकिन मुझे भी अपना बचपना याद आ गया था। कि कैसे मैंने एक बार ज़िद्द करके वो टीवी वाला गेम खरीदा था। उसे टीवी में कनेक्ट करने से सुपर-मारिओ जैसे बहुत सारे गेम खेलता था मैं। खेर, उसके बाद कार्ड में थोड़ा और अमाउंट शेष बचा था, उससे मछली-पकड़ गेम खेली हमने। वहां थोड़ी जीत हासिल की हमने। फिशिंग रोड जैसी उस मशीन के आगे इस बार हम बाप-बेटे दोनों खड़े हो गए। हमने बड़ी बड़ी मछलियां पकड़ी। और कुछ चालीस टिकेट्स जीते। कुँवरुभा जोश में थे, चालिश टिकेट्स उनके लिए बहुत ज्यादा थे, और मैं जानता था, इस गेम-जोन की मोनोपोली। चालीस टिकट्स में दो खाने वाले GEMS ही आने थे।
हज़ार रुपये में क्या-क्या आ सकता था?
यह बड़े बड़े गैमज़ोन्स आपको कईं तरह की लालच देते है। और खेलो, गिफ्ट्स पाओ.. गिफ्ट में ज्यादातर खिलौने थे, जिनसे कुछ हासिल नहीं होता। वो विलायती रुईभरे टेड्डी क्या काम आने है? न तो शिक्षा में, न ही किसी कला पूर्ण अनुभव में..? मैं सोच रहा था, कि इस एक हजार में, क्या क्या आ सकता था? सात-आठ पौधे आ सकते थे। कुँवरुभा के लिए स्कूल बैग, कम्पासबॉक्स, कुछ चित्रकला की बुक्स, या स्केच-पेन वगैरह। अरे हजार रूपये में दस दिनों का निभाव करते लोग मैंने अपनी मिल पर ही देखें है।
ट्रेड, डिजिटल मनी और शून्य का भरोसा
खेर, इंसान को बस रोटी-कपडा-मकान ही चाहिए होता, तो इतना विकास नहीं होता दुनिया का। दुनिया में कुछ महत्वकांक्षी लोग भी हुए.. जिन्होंने ट्रेड खोजा। ट्रेड ने दुनिया को युद्ध के द्वार भी दिखाए, लेकिन ट्रेड फिर भी सर्वोपरि रहा। तुम मुझे कुछ दो, मैं तुम्हे कुछ दूंगा। बार्टर के बाद, जब यह सिक्के और नॉट का दौर आया, वहां भी विकास रुका नहीं। किसी समय पर दुनिया ने एक इन करेंसी को जन्म दिया, डिजिटल मनी। जहाँ हाथ में कुछ नहीं होता, बस एक डिजिट दीखता है, वह भी एक डिजिटल स्क्रीन पर। हम मानते हैं, हमारे पास सब कुछ है, बस उस डिजिट, और उस डिजिट के पीछे जुड़ते जाते शून्य के भरोसे। जबकि हाथ में हकीकत में शून्य ही है.. क्या हो जब वह डिजिटल संस्था काम करते अटक जाती है?
छोडो प्रियम्वदा ! प्रेम के साथ साथ एक और चीज अटपटी सी लगने लगी है, वह है व्यवहार। व्यवहार भी पेचीदा होता जा रहा है। एक ट्रेड डील के लिए दो देश कुछ ही दिनों में एक पाले में हो जाते है, तो कुछ व्यवहार हमेशा यादगार रख लिए जाते है। दुनिया में सब कुछ अपने मतलब के आधीन है। पैसा, प्रेम, व्यवहार, और वाणी। वाणी भी मतलब की होती है, प्रियम्वदा ! मैं भी यहाँ तुम्हारे नाम पर जो-जो वाणी-विलास किया करता हूँ, वहां भी मेरा ही कोई छिपा मतलब होता है।
शुभरात्रि,
०९/०२/२०२६
|| अस्तु ||
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