बरोडा, पश्चिम भारत, गुजरात राज्य एजेंसी (Baroda Western India and Gujarat States Agency)

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बरोडा, पश्चिम भारत, गुजरात राज्य एजेंसी
(Baroda Western India and Gujarat States Agency)


Image Source : indiastatestory


Baroda, Western India and Gujarat Princely States Agency

    आज के गुजरात को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा। आज जिन जगहों को हम गुजरात के जिले या तहसील के नाम से जानते हैं, उनमें से कई कभी अलग-अलग रियासतें, जागीरें और ठकुराइयां हुआ करती थीं। अंग्रेजों के समय इन रियासतों को अलग-अलग एजेंसियों के अधीन रखा गया था।

    1937 में बड़ौदा एजेंसी के साथ रेवा कांठा, सूरत, नासिक, कैरा और ठाणा जैसी आसपास की एजेंसियों को मिलाकर Baroda and Gujarat States Agency बनाई गई। बाद में 5 नवंबर 1944 को इसका विलय Western India States Agency के साथ हुआ और इसका नाम Baroda, Western India and Gujarat States Agency हो गया।

    1947 में देश आजाद हुआ तो इन रियासतों के सामने भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का सवाल आया। अधिकांश रियासतों ने भारत के साथ विलय स्वीकार कर लिया। जूनागढ़ और मांगरोल जैसी कुछ रियासतों का मामला जरूर कुछ समय अलग रहा।

    विलय के बाद काठियावाड़ की रियासतों को मिलाकर सौराष्ट्र राज्य बनाया गया, जिसे शुरुआत में ‘यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ काठियावाड़’ कहा गया। पूर्व कच्छ रियासत से कच्छ राज्य बना, जबकि कुछ अन्य क्षेत्र बॉम्बे राज्य में शामिल हुए। 1956 में राज्यों के पुनर्गठन के बाद सौराष्ट्र और कच्छ को बॉम्बे राज्य में मिला दिया गया। 1960 में भाषाई आधार पर बॉम्बे राज्य के विभाजन के बाद इन क्षेत्रों का अधिकांश हिस्सा गुजरात और कुछ रियासतों के क्षेत्र महाराष्ट्र में चले गए।

    यह सब पढ़ने में शायद कुछ सूखा इतिहास लगे, लेकिन जब हम उस समय की छोटी-छोटी रियासतों के नाम और उनका इतिहास देखते हैं तो कहानी थोड़ी दिलचस्प हो जाती है। कई नाम ऐसे हैं जो आज लगभग भुला दिए गए हैं, जबकि कभी उनका अपना प्रशासन, शासक और अलग पहचान हुआ करती थी।

    इसी क्रम में आगे उन रियासतों की बात है, जो Baroda and Gujarat States Agency के अंतर्गत आती थीं।


जाडेजा राजपूत वंश के राज्य

कच्छ स्टेट

    कच्छ पर लंबे समय तक जाडेजा राजपूतों का शासन रहा। जाडेजा राजवंश को सम्मा राजपूतों की शाखा माना जाता है। माना जाता है कि इनके पूर्वज सिंध से होते हुए 12वीं शताब्दी के आखिर में कच्छ आए थे और यहीं अपना राज्य स्थापित किया। कच्छ रियासत का इतिहास 1147 से शुरू माना जाता है और 1948 तक यह एक स्वतंत्र देशी रियासत के रूप में बनी रही। ब्रिटिश काल में कच्छ के शासक को 17 तोपों की सलामी का सम्मान प्राप्त था।कच्छ सामंतशाही राज्य था, इस कारन यहाँ कईं जागीर हुआ करती थी, पर सत्ता कच्छ महाराओ की ही रही। 

    राजधानी भुज किलेबंद नगर था। पांच द्वारों में से महादेव, भीड़, सरपट, तथा पाटवाडी दरवाजा आज भी है, वाणियावाड दरवाजा नहीं है। उपरांत किले की दिवार में बस एक ही अवशेष बचा है। प्रागमहल, आइनामहल, शरदबाग पैलेस, हाथीस्थान, घोडार, जेल, रामकुंड, नई टंकशाळ, शाक मार्किट आदि स्थापत्य आज भी मौजूद है। इनके अलावा छतरडी (राजसी स्मशान) भी देखने लायक स्थापत्य है। मांडवी में विजय विलास पैलेस है। भुज नगर के किनारे भुजीयो पहाड़ी पर भुजीयो गढ़ आज भी भव्य इतिहास की याद दिलाता खड़ा है।  

कच्छ के प्रमुख जागीरदार :

अबड़ासा तथा पश्चिम प्रान्त

  1. तेरा जागीर : 41 से 50 गाँव की जागीर थी। दो तरफ की दीवारें आज भी है, और किलेबंद दरबारगढ़ भी यथावत है। यहाँ दरबारगढ़ के झरोखे कारीगरी की शोभा समान है। 
  2. कोठारा जागीर : भव्य किलेबंद दरबारगढ़ है। 
  3. रोहा जागीर : रोहा टेकड़ी पर जीर्ण और भग्न हालत में एक दुर्ग है। 
  4. सुथरी जागीर : किलेबंद दरबारगढ़ 
  5. विंझाण जागीर : दरबारगढ़, भग्न किले का एक बुर्ज है। 
  6. सांधाण जागीर : किलेबंद दरबारगढ़
  7. नागरेचा जागीर : किलेबंद दरबारगढ़ 
  8. मोथाळा जागीर : Location
  9. कोटड़ी जागीर : दरबारगढ़ 
  10. जडोदर जागीर : Location
  11. चिआसर जागीर : किला 
मध्य प्रान्त 
  1. केरा : अति प्राचीन स्थान है यह, पहले कपिलकोट नाम से भी पहचाना जाता था। आज भग्न किला है। 
  2. गजोड़ : किला
  3. मोटा आसंबिया : किला 
  4. रताडिया : दरबारगढ़ 
  5. मोटी मऊ : किलेबंद दरबारगढ़ 
  6. मोटी खाखर : Location
  7. पत्री : भग्न किला
  8. फरादी : Location 
वागड़ तथा पूर्व प्रान्त
  1. वांढिया : Location 
  2. चित्रोड़ : Location 
  3. लाकड़ीया : Location 
  4. पलांसवा : Location 
  5. आडेसर : Location 
  6. सणवा : Location 
  7. गेडी : Location 
  8. बेला : यहाँ तीन दरबारगढ़ है। किलेबंद दरबारगढ़, आलिया जी दरबारगढ़, दरबारगढ़
  9. चिरई : Location 
  10. कुम्भारडी : Location 
  11. लोद्राणी : Location 
  12. जाटावाड़ा : Location 
इनके उपरांत कुछ जागीर / गिरास धर्मादा में दिया गया था,
  1. माता ना मढ़ के कापड़ी राजा 
  2. धीणोधर के पीर
  3. मनफरा के कनफटा 
  4. नारायण सरोवर के ब्रह्मचारी
  5. मोटी पोशाळ - भुज के गोर जी 
  6. नानी पोशाळ - भुज के गोर जी 
  7. द्वारकानाथ मंदिर - भुज के अधिकारी 
  8. कोटेश्वर के पीर 
  9. बळधीया के अयस

नवानगर स्टेट (जामनगर)

    नवानगर, जिसे आज हम जामनगर के नाम से जानते हैं, काठियावाड़ के ऐतिहासिक हालार क्षेत्र की एक प्रमुख रियासत थी। यह कच्छ की खाड़ी के दक्षिणी किनारे पर स्थित थी। नवानगर पर जाडेजा  राजपूतों का शासन था और इसकी राजधानी नवानगर शहर ही थी, जो आगे चलकर जामनगर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। 1901 की जनगणना के समय रियासत का क्षेत्रफल लगभग 3,791 वर्ग मील था और इसकी आबादी करीब 3,36,779 बताई गई थी। यहां के शासक 'जाम साहेब' की उपाधि धारण करते थे। जाम साहेब और कच्छ के राव एक ही जाडेजा वंश से संबंधित माने जाते थे।

    ब्रिटिश शासन के दौरान नवानगर काठियावाड़ एजेंसी के अंतर्गत आता था, जो बॉम्बे प्रेसिडेंसी के गुजरात डिवीजन का हिस्सा थी। शासक को ब्रिटिश सरकार की ओर से 13 तोपों की सलामी का सम्मान प्राप्त था। नवानगर का अपना अलग राज्य-ध्वज भी था—लाल रंग के इस ध्वज पर सफेद हाथी बना हुआ था।

    नवानगर की एक तरफ की किले की दिवार आज भी खड़ी है। खंभाळीया गेट तथा तीन दरवाजा आज भी देखे जा सकते है। इसके अलावा भुजीयो कोठो, तथा रणमल तालाब के बिच लाखोटा किले को रेनोवेट किया गया है। दरबारगढ़ मार्किट, सुभाष मार्किट सर्किल तथा सजुबा गर्ल्स हाई स्कूल भी भव्य इमारतें है। प्रतापविलास पैलेस भव्य राजसी पैलेस है। 


मोरबी स्टेट

    मोरबी रियासत की शुरुआत लगभग 1698 के आसपास मानी जाती है। इसके संस्थापक कांयोजी थे। वे कच्छ के शासक बनने वाले उत्तराधिकारी थे, लेकिन उनके पिता रवाजी की हत्या के बाद उनके चाचा प्रागमलजी प्रथम ने कच्छ की गद्दी पर अधिकार कर लिया। इसके बाद कांयोजी अपनी मां के साथ भुज छोड़कर चले गए और आगे चलकर मोरबी को अपनी रियासत बनाया। 1807 में मोरबी ब्रिटिश संरक्षण में आ गई। ब्रिटिश शासन के दौरान यह काठियावाड़ एजेंसी के अधीन थी, जो बॉम्बे प्रेसिडेंसी का हिस्सा थी। शासक को ब्रिटिश सरकार की ओर से 11 तोपों की सलामी का सम्मान प्राप्त था।

    मोरबी रियासत के क्षेत्र में बाद के वर्षों में कुछ विस्तार भी हुआ। 1943 में लागू की गई 'Attachment Scheme' के तहत हडाला तालुका, कोटड़ा-नायणी थाना और छोटी रियासत मालिया को मोरबी में मिला दिया गया। इससे रियासत के क्षेत्रफल में लगभग 310 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि हुई और करीब 12,500 लोग इसके अधीन आ गए।

    किसी समय पर किलेबंद इस नगर की भव्यता के अवशेष रूप किले की उत्तर दिवार आज भी मौजूद है। नगर दरवाजा और वांकानेर दरवाजा तथा ग्रीन टावर भी है। दरबारगढ़ पैलेस है। लखधीरजी इंजीनियरिंग कॉलेज भी पैलेसनुमा ईमारत है। और शिल्पकला का उत्कृष्ट नमूना मणीमंदिर है। 


गोंडल स्टेट 

    गोंडल रियासत की शुरुआत 1634 ईस्वी में मानी जाती है। इसकी स्थापना जाडेजा राजपूत ठाकोर कुंभोजी प्रथम मेरामणजी ने की थी। उन्हें अपने पिता मेरामणजी से अरदोई और आसपास के कुछ गांव मिले थे, जिन्हें आधार बनाकर उन्होंने गोंडल रियासत की नींव रखी। समय के साथ गोंडल का क्षेत्र भी बढ़ता गया। कुंभोजी प्रथम के चौथी पीढ़ी के वंशज कुंभोजी चतुर्थ के समय धोराजी, उपलेटा, सराय और पाटनवाव जैसे परगने भी गोंडल राज्य में शामिल हो गए। इस तरह धीरे-धीरे गोंडल एक महत्वपूर्ण रियासत के रूप में उभरने लगा।

    गोंडल के शासक जाडेजा वंश के ठाकोर थे। ब्रिटिश शासन के दौरान उन्हें 11 तोपों की सलामी का सम्मान प्राप्त था। 1866 से शासकों ने 'ठाकोर साहेब' की उपाधि धारण की। आजादी के बाद गोंडल के अंतिम शासक महाराजा भोजराजजी भगवतसिंहजी ने 15 फरवरी 1948 को भारतीय संघ के साथ विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए। इसके साथ ही गोंडल रियासत का स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व समाप्त होकर वह नए भारत का हिस्सा बन गई। 

    गोंडल भी किलेबंद नगर था, जिसकी साक्षी में वेरी दरवाजा और एक बुर्ज आज भी खड़े है। गोंडल में कईं सारे पैलेस है। नौलखा पैलेस, हवामहल, ऑर्चर्ड पैलेस तथा रॉयल गेराज, रिवरसाइड पैलेस प्रमुख है। तालुका स्कूल, मोंघीबा कन्या शाला, तथा सग्रामजी हाई स्कूल भी महलनुमा इमारतें है। 


राजकोट स्टेट

    राजकोट भी ब्रिटिश शासन के समय काठियावाड़ की प्रमुख रियासतों में से एक था। यह 9 तोपों की सलामी वाली रियासत थी और ब्रिटिश प्रशासन में काठियावाड़ एजेंसी के अंतर्गत आती थी, जो बॉम्बे प्रेसिडेंसी का हिस्सा थी। रियासत की राजधानी राजकोट ही थी। यह ऐतिहासिक हालार क्षेत्र में आज़ी नदी के किनारे बसा हुआ था। उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यही छोटा-सा रियासती शहर आगे चलकर आधुनिक गुजरात के बड़े शहरों में गिना जाएगा। 1947 में देश की आजादी के बाद राजकोट भी बाकी देशी रियासतों की तरह भारतीय संघ में शामिल हो गया। आज वही राजकोट गुजरात का एक प्रमुख शहर है और राज्य के बड़े शहरों में इसका स्थान है।

    राजकोट महानगर आज विकास साध रहा है, और विकास हमेशा से विरासत को दरकिनार कर के ही आगे बढ़ता है। फिर भी राजकोट में कुछ इमारतें आज भी इतिहास की भव्यता को संभाले खड़ी है। किलेबंद राजकोट के बेडी नाका गेट तथा क्लॉक गेट बचे है। दरबारगढ़ की भव्यता आज भी देखे बनती है। रणजीत विलास पैलेस, तळाव (तालाब) बंगलो, तथा सरधार दरबारगढ़ राजसी वैभव से परिपूर्ण स्थापत्य है। इनके उपरांत उस समय बनाए गए अन्य स्थापत्य राजकुमार कॉलेज, बाईसाहेबबा गर्ल्स हाई स्कूल, जी.टी. हाई स्कूल, अल्फ्रेड हाई स्कूल, वाटसन म्यूजियम है। 


वीरपुर स्टेट

    वीरपुर के शासक परिवार की शुरुआत 16वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जडेजा सरदार भाणजी विभाजी से मानी जाती है। भाणजी ने इस इलाके में रहने वाले काठियों को अपने अधीन किया और वीरपुर राज्य की नींव रखी। भाणजी, नवानगर के शासक विभाजी रावलजी के पुत्र थे। विभाजी रावलजी नवानगर के दूसरे जाम साहेब थे और उन्होंने 1562 से 1569 तक शासन किया। वीरपुर के शासकों की उपाधि ठाकोर साहेब थी। भाणजी के आठवीं पीढ़ी के वंशज मोकाजी के समय एक महत्वपूर्ण बदलाव हुआ। उन्होंने राजधानी खारेड़ी से हटाकर वीरपुर कर दी और यहां पुराने किले की मरम्मत भी करवाई।

    इसके बाद मोकाजी के उत्तराधिकारी सुराजी प्रथम के समय 1813 में भयंकर अकाल पड़ा। राज्य की ओर से पर्याप्त राहत और आश्रय न मिलने के कारण कई भायतों ने नवानगर और गोंडल राज्यों की अधीनता स्वीकार कर ली। इसका परिणाम यह हुआ कि वीरपुर राज्य के अधिकार में केवल 13 गांव रह गए। खरेडी में दरबारगढ़ है। वीरपुर में भी एक पुरानी ईमारत है। 

भायात : माखाकरोड, काळमेघडा, फगास, भंगडा, हड़मतिया, गुंदा, मेतिया.


माळीया स्टेट

    माळीया, जिसे पुराने दस्तावेजों में माळीया-मियाणा भी कहा जाता था, ब्रिटिश काल में काठियावाड़ एजेंसी के अधीन आने वाली चौथे दर्जे की एक छोटी रियासत थी। यहां के शासक जाडेजा राजपूत थे और उनका वंश कच्छ तथा मोरबी के बड़े जाडेजा राजघरानों से जुड़ा हुआ था। मालिया रियासत की शुरुआत गुजरात के मच्छु कांठा क्षेत्र में जाडेजा प्रभाव के बढ़ने के साथ हुई। इस रियासत की नींव ठाकोर श्री मोडजी ने रखी थी। वे मोरबी रियासत के संस्थापक कांयोजी के छठे पुत्र थे।

    मोडजी को मच्छु कांठा क्षेत्र में माळीया के साथ तीन और गांव मिले थे। इसके अलावा पूर्वी कच्छ के वागड़ इलाके में वांधिया और कुछ अन्य गांव भी उन्हें जागीर के रूप में मिले थे। लेकिन मोडजी केवल इन गांवों के जागीरदार बनकर रहना नहीं चाहते थे। उनकी कोशिश थी कि मोरबी की अधीनता से अलग होकर अपना स्वतंत्र राज्य बनाया जाए।  माळीया में विशाल दरबारगढ़ है। 


कोटडा-सांगाणी स्टेट

    कोटड़ा सांगाणी का इतिहास सौराष्ट्र के जाडेजा राजपूतों से जुड़ा हुआ है। इस रियासत की शुरुआत 1654–55 के आसपास कुमार श्री सांगोजी ने की थी। वे गोंडल के ठाकोर साहेब कुंभोजी प्रथम के छोटे पुत्र थे। कुंभोजी प्रथम के निधन के बाद उनके बड़े पुत्र सग्रामजी गोंडल की गद्दी पर बैठे, जबकि सांगोजी को गुजारे के लिए अरदोई गांव मिला। उन्होंने आसपास के इलाकों में अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू किया और स्थानीय काठी तथा बाबरिया समुदायों से कुछ क्षेत्र जीतकर अपनी छोटी-सी जागीर को एक महत्वपूर्ण तालुका में बदल दिया। 

    सांगोजी की इसी शाखा को आगे चलकर 'सांगाणी' जडेजा के नाम से जाना जाने लगा। सांगोजी ने राजकोट के ठाकोर रणमलजी के साथ मिलकर कई सैन्य अभियानों में हिस्सा लिया। इनमें सरधार पर अधिकार करना एक महत्वपूर्ण घटना थी। बाद में शासकों ने अपना प्रशासनिक मुख्यालय अरदोई से हटाकर कोटड़ा कर दिया। इसी के बाद इस स्थान का नाम कोटड़ा सांगाणी रखा गया, ताकि गुजरात के दूसरे समान नाम वाले स्थानों से इसे अलग पहचाना जा सके। कोटड़ा सांगाणी किलेबंद दरबारगढ़ आज खंडहर में तब्दील होता जा रहा है। 


जाळीया-देवाणी स्टेट

    जाळीया देवाणी का इतिहास काठियावाड़ की जाडेजा राजपूत परंपरा से जुड़ा हुआ है। यह रियासत ध्रोल के राजघराने की एक शाखा से निकली थी और ध्रोल स्वयं नवानगर के जडेजा राजवंश से जुड़ा हुआ था। जाडेजा अपने वंश की कड़ी पौराणिक यदुवंश से जोड़ते हैं। जाळीया की शुरुआत 1612 में हुई मानी जाती है। उस समय ध्रोल के संस्थापक जाम हरधोलजी के पौत्र और बामणियोजी के पुत्र रावजी को दस गांव जागीर के रूप में मिले थे। यही दस गांव आगे चलकर जालिया रियासत का आधार बने।

    शुरुआत में यह राज्य केवल जाळीया के नाम से जाना जाता था। बाद में इसके संस्थापक रावजी से चौथी पीढ़ी में आए देवाजी के समय इसके नाम के साथ 'देवाणी' जुड़ गया और यह जाळीया देवाणी कहलाने लगा। देवाजी ने राज्य की सीमाओं को व्यवस्थित किया और परिवार की इस शाखा की अलग पहचान मजबूत की। यहां उत्तराधिकार की परंपरा भी स्पष्ट थी। शासक का सबसे बड़ा बेटा गद्दी संभालता था, जबकि छोटे भाइयों को गुजारे के लिए जमीन के छोटे हिस्से दिए जाते थे, जिन्हें 'जीवाई' कहा जाता था।


कोठारीया स्टेट

    कोठारिया तालुका का संबंध राजकोट रियासत के जडेजा राजवंश से था। इसकी शुरुआत 1733 में हुई, जब राजकोट के मेहरामणजी द्वितीय के दूसरे पुत्र दादाजी मेहरामणजी को छह गांव जागीर के रूप में मिले। यही गांव आगे चलकर कोठारिया तालुका का आधार बने। बाद में जब ठाकोर साहेब दादोजी कोठारिया के तालुकदार बने तो उन्होंने अपने बड़े भाई और राजकोट के युवराज रणमलजी प्रथम के जन्मदिन के अवसर पर कोठारिया में एक बड़ा आयोजन किया। इसी मौके पर राजकोट के ठाकोर साहेब ने दादोजी को दो और गांव प्रदान किए।

    कोठारिया तालुका में कुल छह गांव शामिल थे—कोठारिया, वावड़ी, वागुदड़, खोराणा, नागलपुर और पीपलिया। इसके अलावा वीरवा और वडाली इसके भायाती गांव थे। किसी समय रोणकी गांव भी कोठारिया के अधिकार में आया था, हालांकि पहले यह राजकोट के नियंत्रण में रहा था। उस समय का दरबारगढ़ भी यहां मौजूद था। अब वहां कोई बस्ती नहीं है और पुराना दरबारगढ़ भी खंडहर में बदल चुका है। कभी जिस जगह पर राजपरिवार और प्रशासन की हलचल रही होगी, आज वहां उस पुराने समय के कुछ अवशेष ही दिखाई देते हैं।


गवरिदड़  स्टेट

    गवरिदड़ तालुका की शुरुआत राजकोट रियासत से जुड़ी हुई थी। यह जडेजा राजपूतों की एक अलग शाखा के रूप में अस्तित्व में आया। जडेजा उस समय काठियावाड़ की कई रियासतों पर शासन करने वाला प्रमुख राजपूत वंश था। 18वीं शताब्दी के शुरुआती वर्षों में राजकोट के ठाकोर साहेब मेहरामणजी द्वितीय के दूसरे पुत्र मोडजी को गवरिदड़ के साथ आसपास के पांच गांव भी गिरास के रूप में मिले। इसी जागीर को आधार बनाकर आगे चलकर गवरिदड़ एक अलग तालुका के रूप में जाना जाने लगा।

    गवरिदड़ के ठाकोरों के राजकोट के शासक परिवार से संबंध बने रहे, लेकिन अपने हिस्से में मिले इलाके का प्रबंध वे अपने स्तर पर करते थे। इस तरह राजकोट से निकली यह छोटी-सी शाखा धीरे-धीरे अपनी अलग पहचान बनाने लगी। गवरीदड दरबारगढ़ की एक दीवार, दो बुर्ज, तथा एक प्रवेशद्वार आज उस पुरानी विरासत के मूक साक्षी बने खड़े है। 


पाळ तालुक

    पाळ काठियावाड़ के हालार प्रांत में स्थित एक छोटी-सी पांचवीं दर्जे की रियासत थी। इसका संबंध भी सीधे राजकोट रियासत से था। राजकोट के जाडेजा राजपूत परिवार से निकली यह एक अलग शाखा के रूप में सामने आई। पाळ तालुका की शुरुआत 18वीं शताब्दी के मध्य में हुई। राजकोट के ठाकोर साहेब मेहरामणजी द्वितीय के चौथे पुत्र हरभमजी को अपने गुजारे के लिए पांच गांवों की जागीर, जिसे स्थानीय तौर पर गिरास कहा जाता था, दी गई। इन्हीं गांवों को आधार बनाकर पाळ तालुका अस्तित्व में आया और पाळ गांव इसका मुख्यालय बना।

    पाळ न्यारी नदी के किनारे स्थित था। अपने मूल राज्य राजकोट से इसके पारिवारिक संबंध तो थे ही, साथ ही राजनीतिक और सैन्य संबंध भी बने रहे। छोटी रियासत होने के बावजूद अपने आसपास के इलाके में इसकी अपनी एक अलग पहचान थी। काठियावाड़ की कई दूसरी छोटी रियासतों की तरह पाळ की शुरुआत भी किसी बड़े राजघराने के छोटे पुत्र को मिली जागीर से हुई थी, जो आगे चलकर एक अलग तालुका के रूप में पहचानी जाने लगी। पाळ दरबारगढ़ आज भी अपनी भव्यता बनाए हुए है। 


लोधिका स्टेट (मूळवा जी एस्टेट)

    लोधिका सीनियर काठियावाड़ क्षेत्र में स्थित एक छोटी देशी रियासत और तालुका था। यहां के शासक जाडेजा राजपूत वंश से संबंधित थे। इसे तोपों की सलामी प्राप्त रियासतों में नहीं गिना जाता था। लोधिका तालुका की शुरुआत भी राजकोट रियासत से हुई एक शाखा के रूप में हुई थी। 18वीं शताब्दी में राजकोट के ठाकोर साहेब मेहरामणजी द्वितीय ने अपने छोटे पुत्रों को गुजारे के लिए अलग-अलग गांव और जमीनें जागीर के रूप में दी थीं।

    लोधिका शाखा की शुरुआत मेहरामणजी द्वितीय के छठे पुत्र से हुई। उन्हें भिचरी और उसके आसपास के कुछ गांव गिरास के रूप में मिले थे। समय के साथ इस शाखा का मुख्य ठिकाना लोधिका बना और यहीं से यह तालुका अपनी अलग पहचान के साथ जाना जाने लगा। लोधिका की जागीर को कई हिस्सों में बंटने से बचाने के लिए यहां उत्तराधिकार का नियम भी अलग तरह से रखा गया था। गद्दी पर शासक का सबसे बड़ा बेटा बैठता था। इस तरह पूरी संपत्ति एक ही उत्तराधिकारी के पास रहती थी और जागीर कई छोटे-छोटे हिस्सों में बंटने से बची रही।


लोधिका स्टेट (विजयसिंह जी एस्टेट)

    लोधिका जूनियर भी राजकोट रियासत से निकली एक शाखा थी। इस शाखा की शुरुआत 18वीं शताब्दी के शुरुआती दौर में हुई। राजकोट के ठाकोर साहेब मेहरामणजी द्वितीय के सातवें पुत्र कुमार श्री फुलाजी मेहरामणजी को खोखड़दड़ और उसके आसपास के कुछ गांव गिरास के रूप में मिले थे। यही जमीन आगे चलकर इस शाखा का आधार बनी।

    समय बीतने के साथ राजपूत परिवारों में जागीरों और जमीनों के छोटे-छोटे हिस्सों में बंटने की परंपरा के कारण इस मूल संपत्ति का भी विभाजन हुआ। इसी क्रम में लोधिका की शाखा आगे चलकर दो अलग तालुकों में बंट गई—लोधिका सीनियर दरबारगढ़ और लोधिका जूनियर दरबारगढ़


लोधिका थाणा के तालुका 

  1. सीसांग चांदली : एक बुर्ज खड़ा है। 
  2. विरवा : Location
  3. कांगसियाळी : दरबारगढ़
  4. मवा : Location
  5. कोटडा नायाणी : Location 
  6. कानपर ईश्वरीया - वाळा : Location
  7. बळधोई - वाळा : दरबारगढ़ 
  8. मुळीला डेरी - जाडेजा : डेरी कोठो, मुळीला 


ध्राफा थाणा के तालुका 

  1. ध्राफा - जाडेजा : किसी समय किलेबंद नगर के कुछ बुर्ज आज दीखते है। दरबारगढ़ भी खँडहर हो रहा है। 
  2. सातोदड - जाडेजा : Location 
  3. अमरापर - सत : गढ़कोठो 


गढका तालुका

    गढका तालुका भी राजकोट रियासत से निकली एक छोटी शाखा थी। यह काठियावाड़ क्षेत्र में स्थित था और यहां के शासक जडेजा राजपूत वंश से संबंधित थे। जडेजा अपने वंश की परंपरा को जाम लाखा जडेजा से जोड़ते हैं। गढका को अलग जागीर के रूप में पहचान राजकोट के ठाकोर साहेब रणमलजी मेहरामणजी के समय मिली। रणमलजी के चार पुत्र थे और उनके बीच अलग-अलग इलाके गुजारे के लिए गिरास के रूप में बांटे गए थे। इनमें दूसरे पुत्र वाजेराजी को गढका का हिस्सा मिला।

    लेकिन आगे चलकर गढका की गद्दी के उत्तराधिकार का मामला थोड़ा अलग हो गया। वाजेराजी के पुत्र की मृत्यु बिना किसी पुरुष उत्तराधिकारी के हुई। जडेजा परिवार की परंपरा के अनुसार इसके बाद गढका का अधिकार रणमलजी के तीसरे पुत्र अखेराजजी को मिला। गढका में किलेबंद दरबारगढ़ है। 


मेंगणी तालुका

    मेंगणी काठियावाड़ के हालार प्रांत में स्थित पांचवीं दर्जे की एक छोटी रियासत थी। इसके साथ आसपास के सात और गांव भी शामिल थे। पूरी रियासत का क्षेत्रफल लगभग 35 वर्ग मील था। मेंगणी पर जडेजा राजपूत सरदारों का शासन था। इसका संबंध गोंडल रियासत से था और इसे गोंडल से निकली एक शाखा माना जाता है।

    मेंगणी के शासक परिवार की शुरुआत जडेजा श्री नाथूजी से हुई थी। उन्हीं को इस घराने का संस्थापक माना जाता है। खँडहर होता जा रहा दरबारगढ़ प्रतीक्षा में है, कि लोकशाही का कोई नायक इसे पुनः गौरवमय बनाए।


शाहपुर (शापर) तालुका

    शाहपुर (शापर) तालुका भी राजकोट रियासत से निकली एक छोटी शाखा थी। इसकी शुरुआत 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुई। उस समय राजकोट पर जडेजा राजपूतों का शासन था और परिवार की अलग-अलग शाखाओं को गुजारे के लिए गांवों की जागीरें दी जाती थीं। लगभग 1771 ईस्वी में राजकोट के ठाकोर साहेब मेहरामणजी द्वितीय ने अपने तीसरे पुत्र जडेजा कल्याणजी को शाहपुर और उसके साथ पांच अन्य गांव जागीर के रूप में दिए। यही जागीर आगे चलकर शाहपुर तालुका के रूप में जानी गई।

    कल्याणजी राजकोट के शासक परिवार की ही एक शाखा से थे। इसलिए शाहपुर के शासकों के राजकोट के राजघराने से पारिवारिक संबंध बने रहे, लेकिन अपने हिस्से में मिले इलाके का स्थानीय प्रशासन वे अपने स्तर पर चलाते थे। शापर किलेबंद दरबारगढ़ आज भी इतिहास को अपने भीतर समाए हुए है। 


भाडवा तालुका

    भाडवा रियासत की शुरुआत लगभग 1726 ईस्वी में मानी जाती है। यह कोटड़ा सांगाणी रियासत से निकली एक शाखा थी। उस समय राजपूत घरानों में छोटे पुत्रों को गुजारे के लिए अलग-अलग गांवों की जागीर, जिसे गिरास कहा जाता था, देने की परंपरा थी। कोटड़ा सांगाणी के शासक सांगोजी के तीसरे पुत्र कुमार श्री हाकोजी को छह गांवों की जागीर मिली थी। हाकोजी ने भाडवा को अपना मुख्य ठिकाना बनाया और यहीं से इस नई शाखा की शुरुआत हुई।

    इन छह गांवों में से हड़मताळा और खरेरा बाद में तालुका की दूसरी शाखाओं को दे दिए गए। हडमताळा तमाचीजी को और खरेरा राघवभाई को मिला। भाडवा के इतिहास में काठियों के साथ हुए संघर्ष का भी उल्लेख मिलता है। कोटड़ा सांगाणी पर शेषाभाई सायला के आक्रमण में कुछ काठी सरदारों के शामिल होने के बाद भाडवा के प्रमुख खेंगारजी ने इसका बदला लेने के लिए काठी इलाकों की ओर अभियान किया। इस दौरान ओहोबरी और देराई समेत कुछ गांवों को नुकसान पहुंचाया गया। भाडवा का किलेबंद दरबारगढ़ आज भी शोभायमान है। भाडवा दरबार चन्द्रसिंहजी का अनन्य योगदान था जूनागढ़ का भारत संघ में विलय करवाने में। 


राजपरा तालुका

    राजपरा के शासक राजपूतों के जाडेजा वंश से थे। राजपारा रियासत मूल रूप से कोटड़ा-सांगाणी राज्य से अलग होकर बनी थी। 18वीं शताब्दी में कोटड़ा-सांगाणी के ठाकोर श्री सांगोजी के दूसरे पुत्र तोगुभाई (तोगाजी) को राजपरा और आसपास के कुछ गाँव जागीर के रूप में मिले। यहीं से राजपारा के स्वतंत्र राजघराने की शुरुआत हुई। आसपास के क्षेत्रों में सबसे बड़ा किल्ला यहीं था। हालाँकि अब तो बस गढ़ का प्रवेशद्वार, तथा कुछ दीवारें खड़ी है। दरबारगढ़ भी है। 


खीरसरा तालुका 

    खीरसरा राज्य की शुरुआत जाडेजा राजपूतों के शासन वाले ध्रोल राज्य से हुई थी। ध्रोल के शासक कलोजी के सात पुत्रों में सांगोजी सबसे बड़े, भीमजी दूसरे और जूनोजी तीसरे पुत्र थे। सांगोजी की युद्ध में मृत्यु हो गई और उनकी कोई संतान नहीं थी, इसलिए ध्रोल की गद्दी पर भीमजी का अधिकार बनता था। लेकिन भीमजी ने अपने छोटे भाई जूनोजी के पक्ष में गद्दी छोड़ दी और बदले में उन्हें खीरसरा तथा आसपास के 12 गाँव जागीर के रूप में मिले।

    भीमजी को खीरसरा राजघराने का संस्थापक माना जाता है। उन्होंने एक छोटे किले से अपना शासन शुरू किया, जिसे बाद में उनके वंशजों ने मजबूत करवाया। भीमजी के वंशज रणमलजी ने गोंडल के कुंभोजी की कई लड़ाइयों और विजय अभियानों में उनका साथ दिया और खीरसरा के पुराने किले का पुनर्निर्माण भी करवाया। राज्य में उत्तराधिकार के लिए ज्येष्ठ पुत्र को गद्दी देने की परंपरा का पालन किया जाता था। खीरसरा में कभी रक्षण हेतु बनाया गया किल्ला, आज एक प्रतिष्ठित होटल है। श्रृंगार में सराबोर खीरसरा गढ़ तथा पैलेस आज एक हेरिटेज रेस्टोरेंट है। 


मुस्लिम शासकों के राज्य..

जूनागढ़ राज्य

    जूनागढ़ पर मुस्लिम शासन आने से पहले यहाँ राजपूतों का शासन था। शुरुआत में चावड़ा राजपूतों का अधिकार था, जिनकी राजधानी वंथली (वामनस्थली) थी। बाद में चुडासमा राजपूतों ने सत्ता संभाली और लगभग 875 ईस्वी में अपनी राजधानी जूनागढ़ स्थानांतरित कर दी।

   चुडासमा शासक रा' मांडलिक तृतीय जूनागढ़ के अंतिम हिंदू शासक थे। गुजरात के सुल्तान महमूद शाह ने जूनागढ़ पर कई बार आक्रमण किया, लेकिन शुरुआत में उसे सफलता नहीं मिली। तीसरे आक्रमण के दौरान रा' मांडलिक युद्धभूमि में मारे गए। इसके बाद सुल्तान महमूद ने जूनागढ़ का नाम बदलकर मुस्तफाबाद रखा और शहर के चारों ओर किलेबंदी करवाई। 1476 ईस्वी के बाद जूनागढ़ पर मुस्लिम शासन स्थापित हो गया।

    गुजरात सल्तनत के समय जूनागढ़ का प्रशासन अहमदाबाद से नियुक्त अधिकारियों के हाथ में रहा। 1573 में अकबर द्वारा गुजरात पर अधिकार किए जाने के बाद यहाँ फौजदार नियुक्त किए जाने लगे। इसी व्यवस्था में शेरखान बाबी अंतिम फौजदार थे, जिन्होंने 1748 में स्वतंत्र होकर नवाब बहादुरखान की उपाधि धारण की और जूनागढ़ में बाबी वंश के स्वतंत्र शासन की नींव रखी।

    बाबी परिवार के पूर्वज बहादुरखान अफगानिस्तान से आए थे और मुगल बादशाह शाहजहाँ के समय प्रतिष्ठा प्राप्त की थी। उनके पुत्रों में जाफरखान के वंश से राधनपुर, जूनागढ़ और बालासिनोर के तीन प्रमुख बाबी घराने स्थापित हुए। जाफरखान के पुत्र सलाबत महमदखान को गुजरात में महत्वपूर्ण पद मिले और बाद में उनके पुत्र शेरखान को जूनागढ़ भेजा गया। कई उतार-चढ़ाव के बाद शेरखान ने जूनागढ़ को अपना प्रमुख केंद्र बनाया और यहीं से बाबी परिवार की सत्ता मजबूत हुई।


राधनपुर स्टेट 

    राधनपुर पहले पालनपुर एजेंसी में हुआ करता था, लेकिन 1937 में बरोडा, वेस्टर्न इंडिया एंड गुजरात प्रिंसली स्टेट्स का गठन होने से राधनपुर को इस एजेंसी में शामिल कर लिया गया। 


    राधनपुर राज्य पर बाबी वंश के शासकों का शासन था और ब्रिटिश काल में यह एक प्रमुख रियासत के रूप में जाना जाता था। इसकी राजधानी राधनपुर नगर थी, जो उत्तरी गुजरात में स्थित है। शहर के चारों ओर मजबूत दीवार बनी हुई थी और यह कभी सरसों, अनाज तथा कपास के व्यापार के लिए प्रसिद्ध था।

    मुस्लिम शासन से पहले राधनपुर को एक राजपूत रियासत माना जाता है। परंपरा के अनुसार इस नगर का इतिहास लगभग 600 ईस्वी पुराना है और इसका प्राचीन नाम राडनदेवपुर था, जो चावड़ा शासक राडनदेव के नाम पर पड़ा था। बाद में यहाँ चावड़ों के बाद वाघेला राजपूतों का शासन आया और वाघेला वंश के लूणाजी के नाम पर इसका नाम लूणावाड़ा पड़ने की बात कही जाती है।

    बाद के समय में राधनपुर बाबी शासकों के अधीन आया। अंतिम नवाब मुरतज़ा खान ने 10 जून 1948 को भारतीय संघ में विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए।


माणावदर स्टेट

    माणावदर के शासक परिवार की उत्पत्ति जूनागढ़ के नवाबों वाले उसी बाबी वंश से हुई थी। दोनों राजघरानों की वंशावली और मूल एक ही था। सलाबत महमद खान के तीन पुत्रों में से शेरखान, जिन्हें महमद बहादुरखान भी कहा जाता था, ने जूनागढ़ के राजघराने की स्थापना की। उनके दूसरे पुत्र दीलेरखान और तीसरे पुत्र शेरजैनखान को उनके पिता की पैतृक जागीर के रूप में बंटवा तालुका प्राप्त हुआ। स्थापत्य के विषय में यहाँ दो जगहें सुंदर है। टाउनहॉल, तथा बाबी कमालुद्दीन खान का मकबरा


बांटवा स्टेट

    बांटवा के शासक परिवार की उत्पत्ति भी जूनागढ़ के नवाबों वाले बाबी वंश से हुई थी। 1760 ईस्वी में बांटवा तालुका का बंटवारा दो भाइयों, दीलेरखान और शेर ज़मानखान, के बीच हुआ। दीलेरखान को 24 गाँव मिले और उन्होंने माणावदर को अपना केंद्र बनाया, जबकि शेर ज़मानखान को 24 गाँव मिले और वे बांटवा में बस गए। बांटवा नगर और दान में दिए गए कुछ गाँव इस बंटवारे में संयुक्त रखे गए।

    बाद में शेर ज़मानखान के दो पुत्रों, एदलखान और मुख्तियारखान, ने अपनी पैतृक संपत्ति बराबर बाँट ली। दोनों को 12-12 गाँव मिले। एदलखान बांटवा में रहे, जबकि मुख्तियारखान गीदड़ (वर्तमान सरदारगढ़) में जाकर बसे। एदलखान के हिस्से को बाद में खानश्री शेरबुलंदखानजी तालुका के नाम से जाना गया। यह संपत्ति अलग-अलग हिस्सों में बाँटी जा सकती थी, हालांकि पूरे तालुका की औपचारिक देखरेख और एजेंसी के साथ प्रतिनिधित्व का अधिकार वरिष्ठ शाखा के वरिष्ठ सदस्य के पास रहता था।


सरदारगढ़ स्टेट 

    सरदारगढ़ का शासक परिवार भी जूनागढ़ के नवाबों वाले बाबी वंश से संबंधित था। इसकी उत्पत्ति और वंशावली वही थी जो मनावदर के शासक परिवार की थी। किलेबंद सरदारगढ़ में आज तो कोई कोई दिवार तथा जेल दरवाजा और खड़की दरवाजा बचे है। खंडहर होता जा रहा पैलेस भी अभी तक खड़ा है। 


पालनपुर स्टेट (पालणपुर)

    पालनपुर के शासक परिवार की उत्पत्ति अफगानिस्तान के लोहानी पठान वंश से मानी जाती है। कहा जाता है कि यह परिवार 12वीं शताब्दी में बिहार में आकर बसा था। लगभग 1370 में परिवार के प्रमुख मलिक खुर्रम खान अपने रिश्तेदारों और साथियों के साथ बिहार से निकलकर नए ठिकाने की तलाश में गए और आगे चलकर इस वंश का संबंध पालनपुर क्षेत्र से जुड़ा।

    पालनपुर का पुराना इतिहास चंद्रावती नगर से जुड़ा है, जहाँ पहले परमारों का शासन था और बाद में लगभग 13वीं शताब्दी में चौहानों ने इसे बसाया और शासन किया। 17वीं शताब्दी की शुरुआत में पालनपुर पर पश्तून लोहानी वंश का अधिकार स्थापित हुआ। 18वीं शताब्दी में मुगल बादशाह औरंगजेब की मृत्यु के बाद पैदा हुई राजनीतिक अस्थिरता के दौर में इस वंश का प्रभाव बढ़ा। बाद में मराठों के दबाव के कारण लोहानी शासकों ने अंग्रेजों का सहारा लिया और 1817 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ सहायक संधि कर ली। इसके बाद पालनपुर ब्रिटिश संरक्षण में आ गया और पालनपुर एजेंसी के अधीन रहा।

    1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद पालनपुर रियासत समाप्त कर दी गई और 1949 में इसे भारत में मिला दिया गया। बाद में पालनपुर गुजरात के बनासकांठा जिले का मुख्यालय बना।


जाफराबाद स्टेट

    जाफराबाद बाबरियावाड़ का प्रमुख नगर था, जो समुद्र के पास एक खाड़ी के किनारे स्थित है। इसका नाम गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर द्वारा बनवाई गई किलेबंदी के कारण मुजफ्फराबाद से बदलकर जाफराबाद पड़ा। 18वीं शताब्दी में मुगल सत्ता कमजोर होने के बाद यहाँ स्थानीय थानेदारों का स्वतंत्र अधिकार था।

    1731 में सूरत के पास समुद्री लूट की घटना के बाद जंजीरा के सिद्दी हिल्लोल ने जाफराबाद पर अधिकार कर लिया। 1762 में उन्होंने इसे जंजीरा के शासक को बेच दिया और इसके बाद जाफराबाद जंजीरा राज्य का हिस्सा बन गया। बाद के शासकों ने आसपास के क्षेत्रों को अपने अधीन लेकर इसका विस्तार किया और अंततः जाफराबाद सहित 12 गाँव इस क्षेत्र में शामिल हो गए। जाफराबाद किले के भीतर आज सिविल हॉस्पिटल कार्यरत है। 


बजाणा स्टेट

    बजाणा के शासक जत मूल के मुस्लिम थे और उन्हें “मलीक” कहा जाता था। उनके पूर्वज बलूचिस्तान और मकरान से सिंध आए थे और बाद में सिंध से कच्छ होते हुए गुजरात और काठियावाड़ पहुँचे। सुल्तान महमूद बेगड़ा के समय जतों ने चांपानेर के किले की घेराबंदी में अपनी वीरता दिखाई, जिसके बाद उनके सरदार मलिक हेदोजी को बजाणा के अधीन 24 गाँव दिए गए। बाद में जतों ने सुल्तान की अनुमति से मांडल पर भी अधिकार कर लिया।


    बाद के समय में बजाणा की जागीर को अलग-अलग मलिकों के बीच बाँटा गया। बजाणा मलिक हेदोजी के हिस्से में आया और यह जत शासकों का प्रमुख केंद्र बना रहा। कर्नल वॉकर के बंदोबस्त के समय यहाँ सूरजमल तृतीय का शासन था। उनके निःसंतान निधन के बाद उनके भाई दरियाखान द्वितीय गद्दी पर बैठे, लेकिन 1841 में उनकी भी मृत्यु हो गई। इसके बाद उनके चचेरे भाई नसीबखान ने 23 अप्रैल 1841 को बजाना की गद्दी संभाली। बजाना दरबारगढ़ है। 


वाराही स्टेट (मलिक जोरावरखान एस्टेट)

    वाराही के शासक मुस्लिम जत समुदाय से थे, और उनकी उत्पत्ति वही थी जो बजाणा के जत शासकों की थी। मुगल सूबेदार के समय मूल जागीर का बंटवारा तीन भाइयों में हुआ, जिसमें मलिक हेदरखान को बजाणा, मलिक लखा को सीतापुर और वणोद तथा मलिक ईसा को वलीवाड़ा मिला। बाद में मलिक ईसा ने वाराही के अधिकार को लेकर हुए विवाद का फायदा उठाकर वहाँ के दोनों दावेदारों को हटाया और वाराही पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। ब्रिटिश शासन से पहले जत शासक आसपास के इलाकों से सुरक्षा के बदले ‘वोल’ नामक धनराशि भी वसूलते थे।

    वाराही का नाम स्थानीय देवी ‘वेराई’ के मंदिर से जुड़ा माना जाता है और इसे ‘मोटी जतवाड़’ कहा जाता था, जबकि बजाणा को ‘नानी जतवाड़’ कहा जाता था।


वाराही स्टेट (मलिक मुरीदखान एस्टेट)

    इस जागीर का प्राचीन इतिहास और उत्पत्ति मलिक श्री जोरावरखानजी की जागीर के समान ही थी।


वणोद स्टेट

    वणोद एक पाँचवीं श्रेणी की रियासत थी, जिसका क्षेत्रफल लगभग 57 वर्ग मील था। इसमें वणोद नगर के अलावा 12 गाँव शामिल थे। 1901 की जनगणना के अनुसार यहाँ की आबादी 409 थी।

    1903–04 में रियासत की वार्षिक आय लगभग 6,435 रुपये थी, जिसका अधिकांश हिस्सा भूमि-राजस्व से आता था। इस पर ब्रिटिश सरकार और जूनागढ़ राज्य को 324 रुपये का कर (tribute) देना पड़ता था। 


दसाडा स्टेट

    दसाड़ा के तालुकदार मुस्लिम मलिक समुदाय से थे और अपनी वंशावली सूफी संत ख्वाजा बहाउद्दीन ज़करिया, जिन्हें बहावल हक मलतान के नाम से भी जाना जाता है, से जोड़ते थे। 13वीं शताब्दी में उनके वंशज नसीरुद्दीन मक्का की यात्रा पर निकले थे। रास्ते में पाटड़ी के हिंदू शासक से हुए संघर्ष में नसीरुद्दीन की मृत्यु हो गई, जबकि उनकी पत्नी और पुत्र बच निकले। बाद में उनके पुत्र मलिक बखान ने पाटड़ी के शासक को युद्ध में हराया और अहमदाबाद के शासक की सेवा में आ गए। एक कुख्यात डाकू राव रतन को पकड़ने में सफलता के बाद उन्हें दसाड़ा की जागीर प्रदान की गई।

    दसाड़ा और इस तालुका की संपत्ति पहले संयुक्त थी, लेकिन उनके समय में यह एक अलग तालुका के रूप में स्थापित हुई।


गोहिल राजपूत वंश के राज्य

भावनगर स्टेट

    भावनगर ब्रिटिश काल में काठियावाड़ एजेंसी की एक प्रमुख रियासत थी, जिसे 13 तोपों की सलामी का दर्जा प्राप्त था। 1941 में इसका क्षेत्रफल लगभग 2,961 वर्ग मील था। भावनगर के शासक गोहिल वंश से थे, जो अपनी वंशावली शालिवाहन से जोड़ते थे। यह वंश मारवाड़ के खेरगढ़ से काठियावाड़ आया था और इसी के नाम पर गोहिलवाड़ क्षेत्र का नाम पड़ा।

    भावनगर के वर्तमान राजघराने के संस्थापक सेजकजी थे, जो शालिवाहन के वंशज माने जाते हैं। काठियावाड़ आने के बाद उन्होंने जूनागढ़ के रा' कंवाट से शाहपुर और 12 गाँवों की जागीर प्राप्त की। इसके बाद सेजकजी ने अपने नाम पर सेजकपुर नामक गाँव बसाया, उसे अपनी राजधानी बनाया और आसपास के कई गाँवों पर अपना अधिकार स्थापित किया। भावनगर राज्य की राजधानी बनने से पहले इस राजवंश की राजधानी कई स्थानों पर रही। सेजकपुर के बाद क्रमशः राणपुर (1254–1309), पिरम बेट, घोघा (1309–1445), फिर उमराळा (1445–1570) और शिहोर (1570–1723) राजधानी रहे। 1723 में राजधानी को भावनगर स्थानांतरित किया गया। भावनगर के शासक ने 15 फरवरी 1948 को भारतीय संघ में विलय स्वीकार किया। भावनगर का पुराना दरबारगढ़ शिल्प की दृष्टि में बड़ा ही सुन्दर है। 

    नीलमबाग़ पैलेस आज होटल्स व्यवसाय में है। भावविलास पैलेस बोरतालाब के किनारे खड़ा है। और भी कईं स्थापत्य आज भी जिवंत है। कृष्णकुमार सिंहजी टाउनहॉल, गंगा देरी, श्री नंदकुंवरबा स्कूल, अल्फ्रेड हाई स्कूल, माजीराज स्कूल, बार्टन लाइब्रेरी, तखतसिंहजी हॉस्पिटल, श्री नंदकुंवरबा बालाश्रम आज भी भावनगर राज्य की धरोहर समान है। इसके अलावा भावनगर शहर से दूर गोपनाथ बंगलो तथा चांच बंगलो समंदर किनारे पर स्थित है।


पालीताणा स्टेट

    पालिताणा के शासक गोहिल राजपूत वंश से थे। मारवाड़ में राठौड़ों के बढ़ते प्रभाव के बाद गोहिल वंश काठियावाड़ आया। 13वीं शताब्दी में सेजकजी गोहिल ने सेजकपुर में अपनी जागीरी स्थापित करने के बाद आसपास अपनी सत्ता का विस्तारण किया। सेजकजी के तीन पुत्रों में राणजी गोहिल जिन्होंने राणपुर बसाया, दूसरे पुत्र शाहजी को गारियाधार / पालीताणा मिला, और तीसरे पुत्र सारंगजी को अर्थिला (लाठी स्टेट) के चौबीस गाँव। 

    पालिताणा के ठाकोर साहब भावनगर और लाठी के शासक परिवारों से भी समान वंशावली रखते थे। सेजकजी की संपत्ति के बंटवारे के बाद शाहजी गोहिल के नेतृत्व में पालिताणा एक स्वतंत्र रियासत के रूप में उभरा।

    राजसी वैभव का प्रतिक हवामहल पैलेस पालीताणा राज्य की शान है। प्रकृति की गोद में बसाया विजय विलास पैलेस भी रम्य महल है। परन्तु पुराना किलेबंद दरबारगढ़ आज दयनीय हालत में है। पालीताणा नगर के अंतर्गत ही जैनों का बड़ा तीर्थ शत्रुंजय पर्वत होने से यहाँ बहुत सारे पुराने स्थापत्य आज भी बरक़रार है। विलिंग्डन वेजिटेबल मार्किट, सिल्वर जुबली लाइब्रेरी, नंदकुंवरबा अनाथाश्रम जैसी और भी कईं इमारतें है। 

    पालीताणा के भायात नानीमाळ में किलेबंद सरदारसिंहजी पैलेस है। 


वळा स्टेट

    वळा के शासक उसी गोहिल वंश से थे, जिससे भावनगर का राजघराना संबंधित था। वळा नगर प्राचीन वल्लभी के पास स्थित था। यहाँ वाळा राजपूतों का शासन रहा और बाद में 1260 में राणोजी गोहिल ने वळा का अधिकार प्राप्त किया। यह गोहिल शासन 1297–98 में मुस्लिम आक्रमण के बाद समाप्त हो गया और इसके बाद वळा पर मुगल अधिकारियों का शासन रहा। 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद वळा भावनगर के संस्थापक भावसिंहजी के अधिकार में आया। उन्होंने अपने पुत्र विसोजी को वळा और आसपास के कुछ गाँव जागीर में दिए। वळा आज वल्लभीपुर नाम से जाना जाता है। 

    दरबारगढ़ आज भी जिवंत है। एक दक्षिण प्रवेशद्वार भी उस कालखंड की जाँखी देता खड़ा है। 


लाठी स्टेट 

    लाठी के शासक गोहिल राजपूत वंश से थे और भावनगर के राजघराने के ही वंश से संबंधित थे। सेजकजी के पुत्र सारंगजी को जूनागढ़ के रा खेंगार से विवाहित उनकी बहन वालम कुंवरबा के प्रभाव से अर्थिला की 24 गाँवों वाली चोविशी मिली। सारंगजी के वंशजों में नोंघनजी ने लाठी पर अपने अधिकार के लिए युद्ध किया और उसे अपने अधीन कर लिया।

    नोंघनजी के पोते दूदोजी के मुगल क्षेत्रों में लगातार हमलों के कारण जूनागढ़ के रा मांडलिक को उनके खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ी। युद्ध में दूदोजी मारे गए और अर्थिला नष्ट हो गया। इसके बाद लिमशाहजी, जिन्हें जिजीबावा भी कहा जाता था, लाठी आकर बसे और इसे अपनी राजधानी बनाया। बाद में उन्हें उनकी सेवाओं के बदले भावनगर के सारंगजी से वाळुकड के 12 गाँव भी प्राप्त हुए। 

    लाठी के लिए कहा जाता था, "कोरमोर काठी, वचमां लाठी" - लाठी के आसपास काठी लोग बस्ते है। काठी लोगो के साथ अच्छा व्यवहार बनाए रखने के बावजूद लाठी में एक रक्षात्मक व्यूह का किला हुआ करता था। आज केवल खंडहर है। किलेबंद लाठी नगर के उत्तर में एक चावंड दरवाजा आज भी जिवंत है। दक्षिणद्वार रेनोवेट किया हुआ है। 


सोनगढ़ थाणा के तालुका

  1. सोनगढ़ - वाछाणी गोहिल : Location
  2. लिमडा - गोहिल : Location
  3. वावड़ी धरवडा - गोहिल : Location
  4. भोगावदर - गोहिल : Location
  5. समढीयाळा, चभाड़िया - गोहिल : Location
  6. खिजडिया डोसाजी - गोहिल : Location
  7. वांगध्रा - गोहिल : Location
  8. गढूला : Location
  9. कटोडीया : Location
  10. पांचवडा : Location
  11. टोडा : Location
  12. वावडी : Location
  13. चमारडी : Location
  14. पछेगाम : बुर्ज
  15. चित्रावाव : Location
  16. रामणका : Location
  17. वडोद : Location
  18. आलमपर : Location
  19. धोळा : Location
  20. गढाळी : Location
  21. रतनपुर-धमणका : Location
  22. समढीयाळा - चारण : Location


चोक थाणा के तालुका

  1. दाठा - सरवैया : Location
  2. चोक - सरवैया : Location
  3. अयावेज - सरवैया : Location
  4. राणीगाम - सरवैया : Location
  5. मोरचुपाणा - कामळीया अहीर : Location
  6. गंधोल - गोहिल : Location
  7. जाळिया अमराजी - सरवैया : Location
  8. रोहिशाळा - सरवैया : Location
  9. पा - सरवैया : Location
  10. बोडा नो नेस - कामळीया अहीर : Location
  11. शेवड़ीवदर - खसिया : Location
  12. सनाळा - सरवैया : Location
  13. समढीयाळा - सरवैया : Location
  14. राजपरा गंगासती - सरवैया : Location
  15. चिरोडा - सरवैया : Location
  16. विजानो नेस - खसिया : Location
  17. वदळ - कामळीया अहीर : Location
  18. देदरडा - सरवैया : गढ़ की एक दीवार है। 
  19. जाळिया मानाजी - सरवैया : Location
  20. कंझरडा - सरवैया : Location
  21. भंडारीया - कामळीया अहीर : Location 
  22. सतानो नेस - कामळीया अहीर : Location
  23. जुना पादर - खसिया : Location


जेठवा राजपूत वंश के राज्य

पोरबंदर स्टेट 

    पोरबंदर के शासक जेठवा राजपूत वंश से थे और अपनी वंशावली हनुमान से जोड़ते थे। परंपरा के अनुसार हनुमान के पुत्र मकरध्वज को श्रीनगर गाँव मिला था, जो पोरबंदर के पास स्थित था। उनके पुत्र मयूरध्वज ने मोरवी (मयूरपुरी) बसाई। आगे चलकर जेठजी के नाम से इस वंश को जेठवा कहा जाने लगा। बाद में संगजी के समय जेठवाओं ने थाला के पास युद्ध में वाघेलों को हराया। इसी के बाद संगजी को ‘राणा’ की उपाधि मिली और वाघेला परिवार से उनका वैवाहिक संबंध भी हुआ।

    जेठवा शासक शिवोजी के समय राजधानी श्रीनगर से घुमली स्थानांतरित की गई। पोरबंदर राजघराने का वास्तविक इतिहास राणा विकियोजी के समय से माना जाता है। उनके शासनकाल में बाहरी सेना ने मोरवी पर अधिकार कर जेठवाओं को वहाँ से हटा दिया। विकियोजी की मृत्यु 1220 ईस्वी के आसपास हुई। उनके उत्तराधिकारी वाजसीजी के समय जेठवा पश्चिम की ओर चले गए और बरड़ा की पहाड़ियों में अपना प्रभाव केंद्रित किया। समय के साथ राजधानी/शासन का केंद्र श्रीनगर, ढांक, छांया, घुमली, राणपुर और अंततः 1785 में राणा सरतानजी द्वितीय ने राजधानी समुद्र किनारे बसे पोरबंदर शहर में कर दी।

    पोरबंदर चौपाटी बीच पर बना हुज़ूर पैलेस, पोरबंदर के राजसी ठाठ का प्रतीक है। पुराने दरबारगढ़ के दोनों द्वार राजसी वैभव से परिपूर्ण है। सरतानजी नो चोरो,  माणेकचोक के तीनों द्वार, पुराना कोर्ट, स्टेट लाइब्रेरी, भावसिंहजी हाई स्कूल, दरियामहेल (जहाँ आज श्री रामबा ग्रेजुएट टीचर्स कॉलेज है), तथा छांया दरबारगढ़  आदि इमारतें आज भी इतिहास के उन पन्नों तक खिंच ले जाती है। 


झाला राजपूत वंश के राज्य

ध्रांगध्रा स्टेट

    ध्रांगध्रा के शासक झाला राजपूत वंश से थे, जो मूल रूप से मकवाणा परिवार की एक शाखा माने जाते थे। उनके पूर्वज कीरांति में शासन करते थे, लेकिन सिंध में एक साहसी अभियान के बाद मकवाणों पर हमला हुआ और केसरदेव मारे गए। उनके पुत्र हरपालदेव गुजरात के पाटन पहुँचे, जहाँ उन्होंने सोलंकी राजा करण की सेवा में अपनी वीरता दिखाई। इसके बदले उन्हें झालावाड़ और भाल क्षेत्र के कई गाँव प्रदान किए गए।

    ध्रांगध्रा काठियावाड़ की एक प्रमुख 13 तोपों की सलामी वाली रियासत थी। मुस्लिम आक्रमणों के बढ़ते दबाव के कारण 1488 ईस्वी में राजधानी पाटड़ी से कुवा स्थानांतरित की गई। उसी वर्ष गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा की सेना ने कुवा पर हमला कर उसे नष्ट कर दिया, जिसके बाद महाराणा राजोधरजी ने राजधानी हलवद में स्थापित की। हलवद दो शताब्दियों से अधिक समय तक सत्ता का केंद्र रहा।

    1735 ईस्वी में महाराणा रायसिंहजी द्वितीय ने ध्रांगध्रा नगर की स्थापना कर इसे राज्य की स्थायी राजधानी बनाया। ध्रांगध्रा नाम संस्कृत के ‘धारंग’ (पत्थर) और ‘धरा’ (धरती) शब्दों से बना माना जाता है, जो इस क्षेत्र की प्रसिद्ध पीले बलुआ पत्थर की खदानों से जुड़ा है।

    एक अन्य परंपरा के अनुसार हरपालदेव ने एक ही रात में 2,300 गाँवों के द्वार पर मालाएँ बाँधकर उन पर अपना अधिकार सिद्ध किया था। हरपालदेव पाटड़ी में रहने लगे। कहा जाता है कि एक हाथी से अपने बच्चों को बचाते समय उनकी सोलंकी रानी ने उन्हें झटके से उठा लिया, इसी घटना से ‘झाला’ नाम पड़ा। 1116 ईस्वी में रानी की मृत्यु के बाद हरपालदेव ने पाटड़ी छोड़कर धामा को अपनी राजधानी बनाया। लगभग 1130 ईस्वी में उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र सोढ़ोजी उत्तराधिकारी बने।

    वर्तमान ध्रांगध्रा नगर किसी समय किलेबंद नगर था। पूर्वी दरवाजा आज भी भव्य है। घाट दरवाजा रेनोवेट किया गया है। तथा सीता दरवाजे को रेनोवेशन की जरुरत है। नगर किले की उत्तर की आधी और पश्चिम की पूरी दिवार आज भी मजबूती से खड़ी है। नगर के केंद्र में मानमहलात पैलेस आज भी शोभायमान है। जहाँ आज हरपालदेव मकवाना की प्रतिमा लगी है वह चौक भी शानदार है। सर अजीतसिंहजी हाई स्कूल भी एक महलनुमा इमारत है। इसके अलावा नगर से बाहर बना राज पैलेस तथा पूर्व राजधानी हळवद में दरबारगढ़ है। 


वांकानेर स्टेट

    वांकानेर रियासत की स्थापना 1605 ईस्वी में हलवद के राज चंद्रसिंहजी के पोते राज सरतानजी ने की थी। हलवद राजघराने में उत्तराधिकार को लेकर हुए विवादों के बाद सरतानजी और उनके समर्थकों ने नया क्षेत्र लेकर स्वतंत्र राज्य स्थापित किया। उन्होंने मच्छू नदी के किनारे वांकानेर को अपनी राजधानी बनाया। ‘वांका’ यानी नदी का मोड़ और ‘नेर’ यानी पहाड़ियों से जुड़ा होने के कारण इस स्थान का नाम वांकानेर पड़ा।

    वांकानेर के शासक झाला राजपूत वंश से थे। यह वही झाला वंश था जिसका इतिहास ध्रांगध्रा रियासत से जुड़ा था। वांकानेर का राजघराना ध्रांगध्रा के झाला राजघराने की एक बड़ी शाखा से अपनी वंशावली जोड़ता था और काठियावाड़ के प्रमुख झाला राजघरानों में इसकी महत्वपूर्ण स्थिति थी। वांकानेर का दरबारगढ़ खंडहर हो चूका है, वहीँ रणजीतविलास पैलेस भव्यता से खड़ा है। वांकानेर किले की एक खिड़की ही आज देखने को मिलती है। 


लिंबडी स्टेट

    लिंबडी काठियावाड़ की एक प्रमुख द्वितीय श्रेणी की रियासत थी, जिस पर झाला राजपूतों का शासन था। इसकी स्थापना लगभग 1500 ईस्वी में हुई और इसका राजघराना ध्रांगध्रा के झाला वंश की शाखा था। लिंबडी की स्थापना हरपालदेवजी और शक्तिदेवी के दूसरे पुत्र मांगुजी ने की थी। उन्हें जांबु और कुंडणी की जागीर मिली, जबकि उनके भाई सोढ़ोजी को पाटड़ी और आसपास का क्षेत्र मिला, जो आगे चलकर ध्रांगध्रा राज्य बना। बाद में लिंबडी की राजधानी अलग-अलग स्थानों से होती हुई 16वीं शताब्दी की शुरुआत में भोगावो नदी के किनारे लिंबडी में स्थापित हुई।

    समय के साथ लिंबडी के झाला शासकों ने झालावाड़ क्षेत्र के कई गाँवों पर अपना अधिकार मजबूत किया। वढवाण, सायला, चूड़ा और वांकानेर जैसे पड़ोसी झाला राज्यों के साथ उनके मजबूत पारिवारिक संबंध थे और बाहरी हमलों से बचाव के लिए वे आपसी सहयोग करते थे। राज्य में गद्दी का उत्तराधिकार ज्येष्ठ पुत्र के अधिकार के अनुसार होता था। 1892 में लिंबडी के शासक के पास 35 घुड़सवार, 174 पैदल सैनिक और 28 तोपों की सैन्य शक्ति थी। 

    लिंबडी दरबारगढ़ श्री रामकृष्ण मिशन संस्था को दान में दे दिया गया है। दिग्भुवन पैलेस साबुत है। एक अन्य पैलेस का भी यही हाल है, तथा ITI भवन के पास बनी एक और ईमारत अपने भूतकाल की भव्यता को याद करती खड़ी है। सहयोग जनरल हॉस्पिटल कार्यरत होने से यह ईमारत खंडहर होने से बच गयी है। 


भोईका थाणा के तालुका

  1. भोईका : Location 
  2. खंभलाव : Location 
  3. गेड़ी : Location 
  4. कंथारिया : Location  
  5. दरोड : Location
  6. जाखण : Location 
  7. कमालपुर : Location 
  8. सौका : Location  
  9. भलगामडा : Location  
  10. कारोली : Location
  11. वनाळा : Location  
  12. ऊंटडी : Location  
  13. अंकेवाळीया : Location  गढ़ का बुर्ज है। 
  14. खांडिया : Location  
  15. समला : Location 
  16. चचाणा : Location 
  17. करमड : Location नक्काशीदार वाव (बावड़ी) है। 


वढवाण स्टेट

    वढवाण काठियावाड़ की एक प्रमुख रियासत थी, जिस पर झाला राजपूतों का शासन था। इसकी स्थापना 1630 ईस्वी में ध्रांगध्रा के राजघराने की शाखा के रूप में हुई। ध्रांगध्रा के महाराणा चंद्रसिंहजी के बड़े पुत्र पृथ्वीराजजी के पुत्र राजोजी (राजसिंहजी) ने वढवाण को अपने अधिकार में लेकर इसे स्वतंत्र रियासत बनाया। वढवाण भोगावो नदी के किनारे स्थित था और यहीं इसकी राजधानी स्थापित की गई। परंपरा के अनुसार इसका प्राचीन नाम वर्धमानपुर था, जो बाद में बदलकर वढवाण हो गया।

    राजोजी के भाई सरतानजी को हलवद की गद्दी नहीं मिली, इसलिए उन्होंने नवानगर के जाम की सहायता से वांकानेर रियासत स्थापित की। वहीं राजोजी ने अपने पिता को मिली वढवाण की जागीर को स्वतंत्र राज्य में बदल दिया। झाला राजपूतों के आने से पहले वढवाण पर वाळा, चावड़ा, वाघेला और बाद में मुगल अधिकारियों का अधिकार रहा था। इस तरह वढवाण ध्रांगध्रा के झाला राजघराने से निकली एक स्वतंत्र शाखा के रूप में स्थापित हुआ।

    लिविंग फोर्ट का तमगा यूँ तो राजस्थान के जैसलमेर के पास है। पर कोई आकर देखे वढवाण को.. चतुष्कोण आकार में किलेबंद नगर जिवंत है। दक्षिण में खारवणीपोळ दरवाजा, पूर्व में शियाणी पोळ दरवाजा, उत्तरपूर्व में नवा दरवाजा, उत्तर में धोळी पोळ दरवाजा, उत्तरी दीवार में ही गढ़बारी, पश्चिम में खांडी पोळ दरवाजा, दक्षिण-पश्चिम में लाखु पोळ दरवाजा भी है। वहीँ माधा वाव तथा लाखु वाव है। किले के भीतर दरबारगढ़ साबुत है। राजमहल नगर के बाहर है। इनके अलावा लाड़कीबाई प्राइमरी स्कूल, तथा जोरावरसिंहजी जनरल हॉस्पिटल उसी कालखंड में बने है। हवामहल आज भी अधूरा बना है। 


वढवाण थाणा के तालुका

  1. दुधरेज - झाला : Location 
  2. जांपोदड़ - झाला : Location
  3. तलसाणा - झाला : दरबारगढ़ 
  4. मुंजपुर - परमार : Location
  5. वणा - झाला : Location
  6. भडवाणा : Location
  7. तावी : Location
  8. केशरिया : Location
  9. देवळीया : Location
  10. भथाण : Location
  11. झम्मर : Location
  12. भालाळा : Location
  13. पळली: Location
  14. खेराळी : Location
  15. वडोड : Location
  16. गुंदियाळा : Location
  17. लालीयाद : Location


लखतर स्टेट

    लखतर रियासत का इतिहास झाला राजपूतों के झालावाड़ क्षेत्र से जुड़ा था। इसकी स्थापना 1604 ईस्वी में हुई, जब हलवद-ध्रांगध्रा के शासक राज चंद्रसिंहजी के चौथे पुत्र अभयसिंहजी को लखतर और आसपास के गाँव जागीर (गीरास) के रूप में मिले। अभयसिंहजी ने 1604 में बाबरियाओं से थान और आसपास के गाँव जीतकर अपने राज्य में मिला लिए और लखतर को एक स्वतंत्र रियासत के रूप में स्थापित किया। बाद में यहाँ मजबूत किला और सुरक्षा व्यवस्था विकसित की गई।

    अभयसिंहजी के बाद वजेराजजी शासक बने। वे रणछोड़जी के बड़े भक्त थे और डूंगरपुर से रणछोड़जी की मूर्ति लाकर लखतर में स्थापित की। इसी कारण कुछ समय के लिए लखतर को ‘रणछोड़पुरी’ भी कहा जाने लगा। उनके द्वारा स्थापित यह मूर्ति आज भी लखतर के राजमहल में मौजूद बताई जाती है।

    लखतर आज भी पूर्णतया किलेबंद नगर है, जिसके चारो दिशाओं में चार द्वार और एक गढ़बारी आज भी देखी जा सकते है। लखतर दरबारगढ़ आज भी सुव्यवस्थित है। 


सायला स्टेट

    सायला रियासत की स्थापना 1751 ईस्वी में झाला राजपूत शासक शेषाभाई (शेषमल जी) ने की थी। वे ध्रांगध्रा के राजघराने से थे और लिंबडी के शासक परिवार की शाखा से संबंधित थे। उस समय सायला पर करपडा और खवड़ काठी परिवारों का अधिकार था। शेषाभाई ने अभियान चलाकर उनसे सायला जीत लिया और यहीं अपनी राजधानी स्थापित कर मजबूत किलेबंदी और नगर की सुरक्षा के लिए बड़ी दीवार बनवाई।

    शेषाभाई हलवद के राज रायसिंहजी के छह पुत्रों में दूसरे पुत्र थे। राजसाहब द्वारा छोटी शाखाओं की जागीरें कम करने की नीति से नाराज होकर शेषाभाई ने विद्रोह का नेतृत्व किया। इसके बाद राजसाहब को अपनी नीति बदलनी पड़ी और प्रत्येक कुमार को अलग जागीर दी गई। शेषाभाई को नारीचणा की जागीर मिली, जिसे आगे चलकर उन्होंने सायला पर अपना अधिकार स्थापित करने के आधार के रूप में विकसित किया।

    किलेबंद सायला का अब तो दक्षिण द्वार दीखता है, उत्तर में थोड़ी सी दिवार बची है। सायला दरबारगढ़ के प्रवेशद्वार से ही सायला के शाशकों की निर्माण रूचि की भव्यता देखी जा सकती है। सायला बेल गेस्ट हाउस आज एक हेरिटेज होटल है। सायला के अंतर्गत हडाळा में दरबारगढ़ है। 


चुडा स्टेट

    चुडा रियासत के शासक झाला राजपूत थे और उन्हें ‘ठाकोर’ कहा जाता था। इसकी स्थापना 1706–07 ईस्वी के आसपास अभयसिंहजी ने की थी, जो वढवाण के राजघराने से थे। अभयसिंहजी के परिवार का संबंध ध्रांगध्रा के झाला राजवंश से था। वढवाण में उत्तराधिकार के संघर्ष के बाद अभयसिंहजी और उनके भाई अर्जुनसिंहजी ने अपने पैतृक अधिकार वापस लिए और राज्य का बंटवारा किया। अर्जुनसिंहजी ने वढवाण रखा, जबकि अभयसिंहजी को चुडा मिला और उन्होंने इसे स्वतंत्र रियासत के रूप में स्थापित किया।

    अभयसिंहजी के बाद उनके पुत्र रायसिंह शासक बने, लेकिन 1768 में पाळियाद के काठियों के हाथों मारे गए। उनके बाद उनके पुत्र गजसिंहजी गद्दी पर बैठे, लेकिन 1780 में उन्हीं काठियों ने उनकी भी हत्या कर दी। इस तरह चुडा के शुरुआती इतिहास में वढवाण के झाला राजघराने के उत्तराधिकार संघर्ष और स्थानीय काठी शक्तियों के साथ लगातार टकराव महत्वपूर्ण रहे। चुडा से एक राजकुमार को उत्तरप्रदेश में लाभोवा जागीर पर गोद लिया गया था। 

    

राजपुर तालुका

    राजपुर तालुका झाला राजपूतों से संबंधित था, जो काठियावाड़ के झालावाड़ क्षेत्र के प्रमुख राजवंशों में से एक थे। यह तालुका 1765 ईस्वी में वढवाण के ठाकोर साहब सबलसिंह के तीसरे पुत्र पताभाई को जागीर के रूप में मिला था। आगे चलकर राजपुर ने एक स्वतंत्र तालुका के रूप में अपनी अलग पहचान बनाई।

    1807 ईस्वी में कर्नल वॉकर के बंदोबस्त के समय राजपुर तालुका को आधिकारिक रूप से एक स्वतंत्र तालुका के रूप में मान्यता दी गई। इस प्रकार यह वढवाण के झाला राजघराने की एक अलग शाखा के रूप में स्थापित हुआ। राजपर में दरबारगढ़ है। 


काठी क्षत्रियों के राज्य

थाणा देवळी

    थाणा-देवळी के शासक काठी समुदाय की वाळा शाखा से थे। काठियावाड़ आने के बाद इस परिवार का शुरुआती ठिकाना मोटा-देवळीया था, फिर चितल राजधानी बना। बाद में परिवार की एक शाखा मेंदरडा में बसी और मूल शाखा ने जेतपुर को अपना स्थायी केंद्र बनाया। जेतपुर के वाळा परिवार की दो प्रमुख शाखाएँ—जैताणी और वीराणी—नाजा वाळा के पुत्र जैता वाळा और वीरा वाळा से मानी जाती थीं। थाना-देवली को लगभग 1890 ईस्वी में जेतपुर के मुख्य तालुका से अलग किया गया और दरबार श्री लक्ष्मण मेराम ने इसे अपनी प्रशासनिक राजधानी बनाया। थाणा-देवळी को अमरनगर के नाम से भी जाना जाता था।


वडिया स्टेट 

    वडिया के शासक काठी समुदाय की वाळा शाखा के वीराणी वंश से थे। शुरुआत में यह क्षेत्र जेतपुर तालुका का ही हिस्सा था। परिवार का शुरुआती ठिकाना चितल था, जहाँ से वे जेतपुर और बिलखा की ओर आए। वीराणी शाखा का नाम वीरा वाळा के नाम से जुड़ा माना जाता है। बाद में परिवार के बंटवारे और क्षेत्रीय व्यवस्थाओं के कारण वडिया एक अलग प्रशासनिक रियासत के रूप में विकसित हुआ। किलेबंद वडिया का प्रवेशद्वार अभी शेष है। 


बिलखा स्टेट (कांथड वाळा एस्टेट)

    बिलखा के शासक परिवार की उत्पत्ति वीरा वाळा से मानी जाती थी, जो वीराणी शाखा के पूर्वज थे। उनके तीन पुत्र—कंथड़, कुंपो और ओघड़—में से ओघड़ वाळा ने इस राजघराने की स्थापना की। बिलखा पर पहले खांटों का अधिकार था, लेकिन बाद में ओघड़ वाळा के समय यह काठी रियासत के रूप में स्थापित हुआ।

    बिलखा पाँचवीं श्रेणी की रियासत थी। शासक को आपराधिक मामलों में तीन वर्ष तक की कठोर कैद और 5,000 रुपये तक जुर्माने तथा दीवानी मामलों में 10,000 रुपये तक जुर्माना लगाने का अधिकार था। 21 मार्च 1923 को इस शाखा का वंश समाप्त हो गया और बिलखा की जागीर रावत राम वाळा की जागीर में मिला दी गई।


बिलखा स्टेट (रावत वाळा एस्टेट)

    बिलखा एक पाँचवीं श्रेणी का तालुका था, जिसे 1929 के बाद कांथड नाजा वाळा एस्टेट के विलय के कारण चौथी श्रेणी का तालुका बना दिया गया। इसके शासक परिवार की उत्पत्ति वीराणी शाखा से हुई थी।

    तालुका के शासक को आपराधिक मामलों में अधिकतम दो वर्ष की कठोर कैद और 2,000 रुपये तक जुर्माने तथा दीवानी मामलों में 5,000 रुपये तक जुर्माना लगाने का अधिकार था। बिलखा में किलेबंद दरबारगढ़ है। 


जेतपुर स्टेट (मुळू सरग एस्टेट - पिठडीया)

    जेतपुर के शासक काठी समुदाय की वाळा शाखा के जैताणी वंश से थे। इस परिवार के पूर्वज जेता वाळा के नाम पर ही जेतपुर का नाम पड़ा माना जाता है। बाद में परिवार के सदस्यों ने सलारका काठी समुदाय से मेंदरडा और आसपास के गाँव जीतकर अपने अधिकार में लिए। पिठडीया को चौथी श्रेणी की रियासत का दर्जा प्राप्त था। यहाँ के शासक को आपराधिक मामलों में अधिकतम तीन वर्ष की कठोर कैद और 5,000 रुपये तक जुर्माने तथा दीवानी मामलों में 10,000 रुपये तक जुर्माना लगाने का अधिकार था। बाद में जेतपुर का विलय थाना-गलोल के साथ कर दिया गया।


    जेतपुर नगर में आज धोराजी दरवाजा तथा एक अन्य नगर दरवाजा आज भी मौजूद है। चांपराजपुर में पैलेस तथा भग्न दरबारगढ़ है। 


जेतपुर स्टेट (भाभाभाई एस्टेट)

    यह छठी श्रेणी का तालुका था और यहाँ उत्तराधिकार में संपत्ति को बराबर बाँटने की परंपरा थी। इसके कारण समय के साथ कई छोटी-छोटी जागीरें बन गईं। 1921 में जेतपुर में 28 तालुकदार थे, जबकि 1940 तक इनकी संख्या 25 रह गई। शासक परिवार वीराणी शाखा से निकला था।

    तालुका के शासक को आपराधिक मामलों में अधिकतम दो वर्ष की कठोर कैद और 2,000 रुपये तक जुर्माने तथा दीवानी मामलों में 5,000 रुपये तक जुर्माना लगाने का अधिकार था।


जेतपुर स्टेट (पुंजा वाळा एस्टेट - अनीडा)

    इस राजघराने की उत्पत्ति वाला काठी समुदाय की मुख्य जैताणी शाखा से मानी जाती थी। लोमा वाळा के दो पुत्र—पुंजा वाळा और रुखड़ वाळा —थे, जिन्होंने काठी परंपरा के अनुसार पैतृक संपत्ति को बराबर बाँट लिया। पुंजा वाळा का 25 वर्ष की कम उम्र में निधन हो गया। उनके दो पुत्र, कुमार श्री जेठसुर वाळा और कुमार श्री माणसुर वाळा थे। रुखड़ वाळा की कोई पुरुष संतान नहीं थी, इसलिए उनकी जागीर भी पुंजा वाळा के नाबालिग पुत्रों के हिस्से में चली गई।

    यह रियासत पहले पाँचवीं श्रेणी की थी। वाळा श्री पुंजा लोमा की मृत्यु के बाद राज्य का विभाजन हुआ और सूर्यप्रतापगढ़ के साथ मिलकर यह छठी श्रेणी की रियासत बन गई।


जेतपुर स्टेट (चांपराज जसा एस्टेट)

    इस रियासत का शासक परिवार जेतपुर के वीरा वाला के वंशजों से संबंधित था। यह छठी श्रेणी की रियासत थी।


जेतपुर स्टेट (एभल वाजसूर एस्टेट)

    इस रियासत का शासक परिवार वीरो के वंशज मेराम वाला से संबंधित था। वीरो को विराणी शाखा का संस्थापक माना जाता था और मेराम वाला उनसे तीसरी पीढ़ी में थे। गाँवों के अलग-अलग होने के कारण रियासत की कोई निश्चित सीमा निर्धारित नहीं थी। तालुका का क्षेत्रफल लगभग 7 वर्ग मील था।

    तालुकदार के न्यायिक अधिकार सीमित थे। आपराधिक मामलों में अधिकतम तीन महीने की कठोर कैद और 200 रुपये तक जुर्माना, जबकि दीवानी मामलों में 500 रुपये तक के मामलों पर अधिकार प्राप्त था।


बगसरा स्टेट (राम मुळू एस्टेट)

    बगसरा काठियावाड़ की एक प्रमुख काठी रियासत थी, जहाँ वाळा वंश के शासकों का अधिकार था। इस राजघराने की उत्पत्ति देवगाम के भाया मंचा वाळा से मानी जाती है, जिन्होंने 16वीं शताब्दी में अपने समर्थकों के साथ बगसरा पर अधिकार किया। बाद में उनके वंशजों के शासन में बगसरा क्षेत्रीय व्यापार और राजनीति का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। शासक परिवार सामत वाळा के वंशजों से संबंधित था।

    बगसरा के काठी शासकों में ‘भागदार’ नामक उत्तराधिकार परंपरा प्रचलित थी, जिसके अनुसार राज्य की संपत्ति और आय पुरुष उत्तराधिकारियों में बराबर बाँटी जाती थी। इससे राज्य कई छोटी जागीरों में बंट गया और इनके प्रमुख ‘भागदार’ कहलाने लगे। हालांकि बगसरा नगर सभी हिस्सेदारों का साझा प्रशासनिक केंद्र बना रहा। नटवरनगर में नटवरनिवास पैलेस है। 


हडाळा-बगसरा तालुका

    बगसरा पर लगभग 1525 ईस्वी में देवगाम के वाळा भाया मंचा ने अधिकार किया था। उनके बाद उनके पुत्र भाया शासक बने और उनके वंशज ‘भायाणी’ कहलाए। इसी कारण बागसरा को ‘बगसरा भायाणी’ भी कहा जाता था। यहाँ के शासक काठी समुदाय की वाळा शाखा से थे और अन्य कई काठी रियासतों के विपरीत उत्तराधिकार में ज्येष्ठ पुत्र को गद्दी देने की परंपरा अपनाई गई थी।

    हडाळा-बगसरा ब्रिटिश काल में पाँचवीं श्रेणी की गैर-सलामी रियासत थी और सौराष्ट्र के सोरठ क्षेत्र में स्थित थी। शासक को आपराधिक मामलों में दो वर्ष तक की कठोर कैद और 2,000 रुपये तक जुर्माना तथा दीवानी मामलों में 5,000 रुपये तक के मामलों पर अधिकार था। ज्येष्ठाधिकार की परंपरा के कारण यह राज्य भाइयों में बराबर बंटने से बचा रहा और इसकी क्षेत्रीय एकता लंबे समय तक बनी रही।


खारी-बगसरा तालुका

    खारी-बगसरा के शासक परिवार की वरिष्ठ शाखा सामत वाळा के बड़े पुत्र हरसुर वाळा के वंशजों से मानी जाती थी। बगसरा राजघराने के संस्थापक मंचा वाळा देवगाम और देवळीया से आए थे, और उन्होंने 1626 ईस्वी में बगसरा के बाबरियाओं को हटाकर अपना शासन स्थापित किया। उनके वंशज डेसा वाळा ने 1708 में नवानगर के जाम तमाची की जूनागढ़ के नवाब के विरुद्ध संघर्ष में सहायता की। उनकी इस सेवा के बदले उन्हें ‘काठियो जाम’ की उपाधि तथा डंको, निशान और मियानो (पालकी) प्रदान किए गए।

    खारी-बगसरा को छठी श्रेणी की रियासत माना जाता था और यहाँ के तालुकदार की न्यायिक शक्तियाँ सीमित थीं।


बरवाळा (भाण डेसा एस्टेट)

    बरवाळा पाँचवीं श्रेणी (Fifth Class) की रियासत सौराष्ट्र (काठियावाड़) क्षेत्र में स्थित थी और यहाँ काठी समुदाय की वाळा शाखा का शासन था। वाळा राजपूत वंश अपनी उत्पत्ति प्राचीन मैत्रक वंश से जोड़ता था, जिसने 5वीं से 8वीं शताब्दी के बीच वल्लभी पर शासन किया था। (ध्यान रहें वाळा राजपूत तथा वाळा काठी दोनों अलग समुदाय है।) वल्लभी के पतन के बाद वाळा राजपूतों की एक शाखा काठियों के साथ मिल गई और इसी से वाळा काठी वंश का विकास हुआ।

    वाळा काठियों ने सौराष्ट्र में कई रियासतें और जागीरें स्थापित कीं, जिनमें जेतपुर, बिलखा, बगसरा और बरवाळा प्रमुख थीं। बरवाळा का शासक परिवार वीराणी शाखा से निकला हुआ माना जाता था। वाघणीया में दरबारगढ़ है। 


चितल तालुका

    चितल काठियावाड़ की एक रियासत थी, जहाँ वाळा काठी का शासन था। 18वीं शताब्दी में चितल इस वंश का एक प्रमुख केंद्र बना और इसका संबंध पड़ोसी जेतपुर रियासत से भी था। चितल के शासक परिवार की उत्पत्ति जैता वाळा के पुत्र भोका वाळा से मानी जाती थी।

    ब्रिटिश शासन के दौरान काठियावाड़ की रियासतों को उनके आकार, आय और राजनीतिक महत्व के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बाँटा गया था। चितल को छठी श्रेणी (Sixth Class) की रियासत का दर्जा दिया गया था।


सनाळा तालुका

    सनाळा सौराष्ट्र (काठियावाड़) की एक छोटी रियासत या तालुका थी। इसका विकास मध्यकाल में सौराष्ट्र में हुए काठी समुदायों के प्रवास तथा बड़ी जागीरों के विभाजन के दौरान हुआ। शासक परिवार की उत्पत्ति जैताणी शाखा के संस्थापक जैता वाळा से मानी जाती थी।

    ब्रिटिश शासन के दौरान सनाळा को चौथी श्रेणी (Fourth Class) की रियासत का दर्जा दिया गया था।


भायावदर तालुका

    भायावदर सौराष्ट्र (काठियावाड़) की एक छोटी रियासत या तालुका थी। इसके शासक परिवार की उत्पत्ति वाळा काठी समुदाय की मुख्य जैताणी शाखा से मानी जाती थी। ब्रिटिश शासन के दौरान यह काठियावाड़ एजेंसी के अधीन छठी श्रेणी (Sixth Class) की रियासत थी।

    यहाँ उत्तराधिकार में पुरुष सदस्यों के बीच संपत्ति के बराबर बंटवारे की परंपरा प्रचलित थी। सीमित न्यायिक अधिकारों और छोटी-छोटी जागीरों में विभाजित प्रशासन के कारण भायावदर उस समय की काठियावाड़ी सामंती व्यवस्था का एक उदाहरण था।


मेंदरडा तालुका (माणसिया नाग एस्टेट)

    इस रियासत का शासक परिवार वाळा काठी समुदाय की मुख्य जैताणी शाखा की एक उपशाखा से संबंधित था। उत्तराधिकार की व्यवस्था में पैतृक संपत्ति का पुरुष उत्तराधिकारियों के बीच बराबर बंटवारा किया जाता था। तालुका का क्षेत्रफल लगभग 9.5 वर्ग मील था।

    मेंदरडा तालुकदार को आपराधिक मामलों में अधिकतम तीन महीने की कठोर कैद और 200 रुपये तक जुर्माना तथा दीवानी मामलों में 500 रुपये तक के मामलों पर अधिकार प्राप्त था। 


मेंदरडा तालुका (डेसा नाग एस्टेट - मायापादर)

    इसका क्षेत्रफल लगभग 9.6 वर्ग मील और 1921 की जनगणना के अनुसार जनसंख्या 662 थी। इसकी औसत वार्षिक आय लगभग 20,000 रुपये थी। निकटतम रेलवे स्टेशन लुणीधर था, जो मायापादर से लगभग एक मील दूर था।

    मायापादर तालुका को ब्रिटिश सरकार को 666 रुपये 7 आना 3 पाई बतौर खिराज, गायकवाड़ को 23 रुपये 14 आना 6 पाई पेशकशी और जूनागढ़ को 109 रुपये 6 आना 4 पाई ज़ोरतलबी देनी पड़ती थी। काठियावाड़ की अन्य रियासतों की तरह इसके भी ब्रिटिश सरकार के साथ समझौते थे। शासक परिवार की वंशावली जैता वाळा से जुड़ी थी।


मेंदरडा तालुका (अमरा मोका एस्टेट - अलिध्रा)

    अलिध्रा, जिसे ऐतिहासिक रूप से मेंदरडा या अमरा मोका एस्टेट भी कहा जाता था, काठियावाड़ के सोरठ क्षेत्र की एक छोटी रियासत थी। इसका शासक परिवार वाळा काठी वंश से संबंधित था। अलिध्रा की स्थापना कुमार श्री मोका भीमा वाळा ने की थी, जो खिजड़िया रियासत के दूसरे दरबार साहब दरबार श्री भीमा वलेरा वाळा के छोटे पुत्र थे। काठी परंपरा के अनुसार पैतृक संपत्ति पुत्रों में बाँटे जाने के कारण अलीधरा एक अलग रियासत के रूप में स्थापित हुई।

    ब्रिटिश शासन में अलिध्रा एक गैर-सलामी रियासत थी और काठियावाड़ एजेंसी के सोरठ प्रांत के अधीन थी। गाँव अलग-अलग होने के कारण इसकी कोई निश्चित सीमा नहीं थी। इसका क्षेत्रफल लगभग 13.6 वर्ग मील था और 1921 की जनगणना के अनुसार आबादी 1,965 थी। अलिध्रा तालुकदार को आपराधिक मामलों में तीन महीने की कठोर कैद और 200 रुपये तक जुर्माने तथा दीवानी मामलों में 500 रुपये तक के मामलों पर अधिकार था; इससे बड़े मामलों की सुनवाई ब्रिटिश राजनीतिक एजेंट की अदालत में होती थी। 


खिजड़िया तालुका

    खिजड़िया, जिसे ऐतिहासिक रूप से वलेरा राणिंग एस्टेट भी कहा जाता था, काठियावाड़ की एक छोटी रियासत थी। यहाँ वाळा शाखा के काठी दरबारों का शासन था। इस रियासत का नाम वलेरा वाळा और राणिंग वाळा जैसे काठी हिस्सेदारों से जुड़ा था। शासक परिवार की उत्पत्ति काठी समुदाय की मुख्य जैताणी शाखा की एक उपशाखा से मानी जाती थी।

    ब्रिटिश शासन के दौरान खिजड़िया को छठी श्रेणी (Sixth Class) की रियासत माना गया था। तालुकदार के न्यायिक अधिकार सीमित थे—आपराधिक मामलों में अधिकतम तीन महीने की कठोर कैद और 200 रुपये तक जुर्माना, जबकि दीवानी मामलों में 500 रुपये तक के मामलों पर अधिकार था। 


नाना देवळीया 

    इस रियासत का शासक परिवार वीरा वाळा के वंशज मेराम वाळा से संबंधित था। मेराम वाळा, विराणी शाखा के संस्थापक वीरा वाळा से तीसरी पीढ़ी में थे। गाँवों के अलग-अलग होने के कारण तालुका की कोई निश्चित सीमा नहीं थी। इसका क्षेत्रफल लगभग 8.35 वर्ग मील था।

    तालुकदार के न्यायिक अधिकार सीमित थे। आपराधिक मामलों में अधिकतम तीन महीने की कठोर कैद और 200 रुपये तक जुर्माना, जबकि दीवानी मामलों में 600 रुपये तक के मामलों पर अधिकार प्राप्त था।


जसदण स्टेट

    जसदण सौराष्ट्र (काठियावाड़) की एक प्रमुख रियासत थी और ब्रिटिश शासन में इसे तीसरी श्रेणी (Third Class) का दर्जा प्राप्त था। यहाँ के शासक काठी समुदाय की खाचर शाखा से थे। काठी वंश की परंपरा के अनुसार धनक के राजपूत राजकुमार वीरावल ने काठी राजकुमारी रूपदे से विवाह किया, जो विशाल काठी की पुत्री थीं। उनके तीन पुत्र—वालो, खुमाण और खाचर—हुए और आगे चलकर इन्हीं के नाम पर काठी समुदाय की तीन प्रमुख शाखाएँ मानी गईं।

    गुजरात के चुनिंदा किलों में जसदण राज्य का हिंगोळगढ़ देखने लायक है। जसदण दरबारगढ़ आज भी सुदृढ़ है। 


चोटिला स्टेट 

    चोटिला और आसपास का क्षेत्र पहले परमार राजपूतों के अधिकार में था। संवत 1600 (लगभग 1544 ईस्वी) में काठी सरदार राम खाचर ने परमारों को हराकर चोटिला पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उनके वंशजों ने चोटिला थाना और आसपास के गाँवों पर अपना अधिकार बनाए रखा। ब्रिटिश शासन के दौरान चोटिला को पूर्वी काठियावाड़ एजेंसी के झालावाड़ प्रांत के अधीन एक छोटी रियासत के रूप में प्रशासित किया जाता था। इसका क्षेत्र विभिन्न काठी हिस्सेदारों, जिन्हें भायत या भागदार कहा जाता था, के बीच बँटा हुआ था। ब्रिटिश प्रशासन ने रियासतों के आकार और आय के आधार पर उनके शासकों को सीमित न्यायिक अधिकार दिए थे।

    औपनिवेशिक काल के अंतिम दौर में खाचर श्री सुरग सादुल को उनके जीवनकाल तक व्यक्तिगत दीवानी और फौजदारी अधिकार प्रदान किए गए थे। वे आपराधिक मामलों में अधिकतम तीन महीने की कठोर कैद और 200 रुपये तक जुर्माना तथा दीवानी मामलों में 500 रुपये तक के दावों पर निर्णय दे सकते थे। चोटिला का नवीन दरबारगढ़ है। 


चोटिला थाणा के तालुका

  1. मेवासा : गढ़ Location 
  2. भीमोरा : Location  
  3. चोबारी : Location यहाँ दो अति प्राचीन मंदिर है, पर संरक्षण के आभाव में नामशेष हो जाएंगे। 
  4. सणोसरा : Location 
  5. आनंदपुर : Location 
  6. बामणबोर : Location 
  7. रामपरडा - करपड़ा काठी : Location 


बाबरा थाणा के तालुका 

  1. भडली - खाचर : Location 
  2. बाबरा - वाळा : Location रक्षात्मक किल्ला तथा दरबारगढ़ आज भी मौजूद है। 
  3. करियाणा - खाचर : Location
  4. खाम्भाळा - खाचर : Location
  5. ईटारिया, गढळा - खाचर : Location
  6. रांढीया - सैयद : Location
  7. आंकडिया - : Location
  8. नीलवाला - खाचर : Location
  9. बिलड़ी - वहीवटदार : Location
  10. खीजडीया - वहीवटदार : Location
  11. कमढीया - मीर : Location
  12. जानबाई देरडी - गढ़वी : Location


आनंदपुर स्टेट (दादा जीवा एस्टेट)

    आनंदपुर गाँव की स्थापना चूडासमा अनंत ने संवत 1124 (1068 ईस्वी) में की थी। बाद में काठियों ने परमारों से चोटिला का पूरा क्षेत्र छीन लिया और तब से यह क्षेत्र काठी शासकों के अधिकार में रहा।

    मध्यकाल के बाद काठियावाड़ में काठी क्षत्रियों का प्रभाव तेजी से बढ़ा। खाचर शाखा के काठी सरदारों ने पंचाल क्षेत्र में अपना प्रभुत्व स्थापित किया और चूडासमा शक्ति के कमजोर होने के बाद आनंदपुर पर भी अधिकार कर लिया। आगे चलकर आनंदपुर खाचर काठियों की एक प्रमुख शाखा का केंद्र बन गया।


आनंदपुर स्टेट (डेसा भोज एस्टेट)

    इस तालुका में आनंदपुर गाँव में 13 सवांग गाँव और पाटियाँ शामिल थीं। इसकी सीमाएँ इस प्रकार थीं—उत्तर में चोटिला थाना के गाँव, दक्षिण में जसदण और नवानगर के क्षेत्र, पूर्व में जसदण और सणोसरा तथा पश्चिम में राजकोट और नवानगर की रियासतें।


डेडाण स्टेट

    इस तालुका की सीमाएँ बड़ौदा और जूनागढ़ रियासतों के क्षेत्रों से लगती थीं। इसका क्षेत्रफल लगभग 24 वर्ग मील था।

    डेडाण के प्रमुख शासक कोटिला काठी थे। दरबारगढ़ है। 


कोटड़ा पीठा स्टेट 

    कोटड़ा पीठा तालुका के गाँवों की सीमाएँ नवानगर और जसदण रियासतों तथा बाबरा थाना के क्षेत्रों से घिरी हुई थीं। तालुका का क्षेत्रफल लगभग 25 वर्ग मील था और यहाँ पाँच न्यायिक तालुकदार थे।

    कोटड़ा पीठा तालुका का शासक परिवार अपने को जेतपुर के वाळा काठियों के उसी मूल वंश से संबंधित मानता था।


पाळियाद थाणा के तालुका

  1. पाळियाद - खाचर : Location 
  2. मात्रा टिम्बा - खाचर : Location 
  3. भरेज : Location 
  4. सुदामडा तथा धांधलपुर - खवड : धांधलपुर में किला है। 
  5. सेजकपर - खवड : मारवाड़ से आए सेजक जी गोहिल को जूनागढ़ के चुडासमा शाशक रा' कंवाट ने जागीर थी, सेजक जी ने सेजकपुर बसाया था। सेजकपर में प्राचीन मंदिर है, जिसे नवलखा मंदिर कहते है। 


लाखापादर थाणा के तालुका

  1. विछावड - मजमुदार : Location
  2. कुबा - मजमुदार : Location
  3. झमका वेलाणी - वाळा : Location
  4. लाखापादर - वाळा : Location
  5. कणेर - वाळा : Location
  6. कथरोटा - वाळा : Location
  7. खिजडिया नाजाणी - वाळा : Location
  8. मोटी गरमली - वाळा : Location
  9. गरमली नानी - वाळा : Location
  10. गढिया - वाळा : Location
  11. चरखा - वाळा : Location
  12. ढोलरवा - वाळा : Location
  13. माणावाव - वाळा : Location
  14. मोणवेल - वाळा : Location गढ़ के दो बुर्ज आज देखे जा सकते है। 
  15. वेकरीया - वाळा : Location
  16. वाघावडी - वाळा : Location
  17. हालरिया - वाळा : Location
  18. सिलाणा - वाळा : Location
  19. दहिडा - वाळा : Location
  20. गीगासरण - कोटिला : Location 


वाघेला राजपूत वंश के राज्य

(पहले थराद, वाव, पालनपुर वगेरह उत्तर गुजरात के संस्थान पालनपुर एजेंसी में हुआ करते थे, बाद में इन्हे काठियावाड़ एजेंसी में शामिल कर दिया गया था। इन संस्थानों की सूचि देखने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

थराद स्टेट 

    थराद के शासक वाघेला राजपूत थे। वे अपनी वंशावली अर्णोराज सोलंकी से जोड़ते थे, जिन्हें कल्याणी के प्रसिद्ध राजा भुवड़ का वंशज माना जाता था। गुजरात के राजा कुमारपाल ने अर्णोराज को ‘वाघेल’ गाँव जागीर में दिया था और इसी गाँव के नाम से उनके वंशज वाघेला कहलाए।

    13वीं और 14वीं शताब्दी में सोलंकी-वाघेला सत्ता के पतन के बाद वाघेला राजपूतों की विभिन्न शाखाओं ने उत्तर गुजरात और कांकेरज क्षेत्र में अपनी छोटी रियासतें स्थापित कीं। थराद के वाघेलाओं ने यहाँ अपना मजबूत अधिकार कायम कर इसे एक सुरक्षित दुर्ग-रियासत बनाया और आसपास के मरुस्थलीय कबीलों तथा बाहरी आक्रमणों से इसकी रक्षा की। इस रियासत को आपराधिक मामलों में अधिकतम सात वर्ष की कठोर कैद और 10,000 रुपये तक जुर्माना लगाने का अधिकार था। दीवानी मामलों में शासक को 20,000 रुपये तक के मामलों पर निर्णय देने का अधिकार प्राप्त था।


दियोदर स्टेट

    दियोदर के शासक परिवार वाघेला राजपूतों से संबंधित था। 1297 ईस्वी में यह क्षेत्र वर्तमान शासक के पूर्वजों से छीनकर पालनपुर राज्य में मिला दिया गया, लेकिन कुछ वर्षों बाद वाघेलाओं ने इसे फिर प्राप्त कर लिया। 1786 के भीषण अकाल में राज्य का बड़ा हिस्सा उजड़ गया और शासक को बाहर जाकर जीवन-यापन करना पड़ा। उनकी अनुपस्थिति में पड़ोसी शासकों ने राज्य को आपस में बाँट लिया। बाद में वाघेला परिवार की कनिष्ठ शाखा के पुंजाजी ने राधनपुर के नवाब की सहायता से दियोदर को फिर अपने अधिकार में लिया। 1828 में वरिष्ठ शाखा के एक वंशज ने अपना दावा किया, लेकिन राजनीतिक अधिकारी कर्नल माइल्स ने उसे स्वीकार नहीं किया, क्योंकि कनिष्ठ शाखा का कब्जा ब्रिटिश सत्ता स्थापित होने से पहले का था।

    बाद में दियोदर राज्य वाघेला परिवार की दो शाखाओं में विभाजित रहा। वरिष्ठ शाखा के पास लगभग 91 गाँव और एक नगर था, जबकि कनिष्ठ शाखा के अधीन 16 सवांग और 3 साझा गाँव थे। 1941 के आसपास वरिष्ठ शाखा के क्षेत्र की आबादी लगभग 2,425 और कनिष्ठ शाखा की आबादी 3,612 थी।


चौहाण राजपूत वंश के राज्य

वाव स्टेट 

    वाव के शासक चौहान राजपूत थे और अपनी वंशावली दिल्ली के अंतिम हिंदू शासक पृथ्वीराज चौहान से जोड़ते थे। दिल्ली में चौहान सत्ता के पतन के बाद इस वंश की शाखाएँ राजस्थान और गुजरात की ओर आईं। चौहान सरदार राणा देधवराव नाडोल से निष्कासित होने के बाद थराद में बसे, लेकिन 1244 ईस्वी में मुल्तानी मुस्लिम आक्रमणकारियों से थराद हारने के बाद उत्तर गुजरात की ओर चले गए।

    राणा देधवराव ने एक विशाल बावड़ी के आसपास नया नगर बसाया, जिसके कारण इसका नाम वाव पड़ा और आगे चलकर यही एक छोटी रियासत के रूप में विकसित हुआ। ब्रिटिश शासन के दौरान वाव को पाँचवीं श्रेणी (Fifth Class) की अर्ध-न्यायिक रियासत के रूप में मान्यता प्राप्त थी।

    इस रियासत के अधीन बड़ी संख्या में जागीरदार थे। प्रमुख जागीरों में अछवा, वावड़ी, मेथावी, अर्जनपुरा, धराड़ा, चोटिल, कुंडालिया, धीमा, राछेणा, सापरेड़ा, जोरडियाली, बेनुप, मोतीपुरा, भाखरी, फांगड़ी, बुकना, बालूतरी, करेली, गोलगाम और धनाना शामिल थीं। 


परमार राजपूत वंश के राज्य

मुळी स्टेट

    मुळी सौराष्ट्र की एकमात्र सोढ़ा परमार रियासत मानी जाती थी। यहाँ के शासक अपनी वंशावली उज्जैन के प्रसिद्ध परमार शासकों राजा विक्रमादित्य, राजा भोज और राजा जगदेव परमार से जोड़ते थे। मूल रूप से परमार सिंध के थार-पारकर क्षेत्र में रहते थे। वहाँ की राजनीतिक परिस्थितियों के कारण लखधीरजी और उनके भाई मुंजाजी के नेतृत्व में वे 1470–1475 ईस्वी के बीच काठियावाड़ आए और भोगावो नदी के पास अपना ठिकाना बनाया। स्थानीय चाभड़ और सोलंकी शक्तियों से संघर्ष और समझौतों के बाद उन्होंने मुळी को अपनी राजधानी बनाया। मुळी का पुराना दरबारगढ़ भग्न हालत में है। वहीँ नवीन अम्बिका निवास पैलेस अब होटल बिज़नेस में जुड़ा है। 

    मुळी के इतिहास की सबसे प्रसिद्ध घटना ‘तेतर नो जंग’ (तितर का युद्ध) थी। एक घायल तितरी चाभड़ राजपूतों से बचकर परमार भाइयों की शरण में आ गई। शरणागत की रक्षा को अपना धर्म मानते हुए परमारों ने उसे वापस करने से इनकार कर दिया और युद्ध हुआ, जिसमें मुंजाजी सहित 140 से अधिक परमार मारे गए। ब्रिटिश शासन में मुली को चौथी श्रेणी की रियासत माना गया था। यहाँ उत्तराधिकार ज्येष्ठ पुत्र के अधिकार से होता था और ठाकोर साहब को दीवानी मामलों में 10,000 रुपये तक तथा फौजदारी मामलों में तीन वर्ष की कठोर कैद और 5,000 रुपये तक जुर्माने का अधिकार था।


अन्य वंश के राज्य

पाटड़ी स्टेट

    पाटड़ी का शासक परिवार कड़वा पाटीदारों के देसाई वंश से था। इसके पूर्वजों ने उंझा और कावर जैसे गाँव बसाए तथा इडर और चंपानेर क्षेत्र में भी अपना प्रभाव स्थापित किया।

    1484 ई. में वीरसिंहजी ने सुल्तान महमूद बेगड़ा के लिए वीरमगाम के वाघेला शासक वीरमदेव को पराजित किया, जिसके बदले उन्हें वीरमगाम का क्षेत्र मिला। बाद में जहाँगीर ने वेणीदास को “देसाई श्री” की उपाधि और झालावाड़ के राजस्व का 7½ प्रतिशत वसूलने का अधिकार दिया। पाटड़ी में किलेबंद शक्ति मंदिर है। 


राई-सांकळी एस्टेट

    राई-सांकळी तालुका में राई, सांकळी और ढसा गाँव शामिल थे। इसके मूल अधिकार को लेकर दो कथाएँ मिलती हैं। पहली कथा के अनुसार, विवाह के अवसर पर हुए संघर्ष के बाद लिंबडी और वढवाण के कुमारों की रक्षा के बदले काठी को कुछ गाँव मिले, जिनमें राई और सांकळी भी थे। बाद में ये गाँव वर्तमान तालुकेदार के पूर्वज देसाई को सौंप दिए गए।

    दूसरी और अधिक विश्वसनीय कथा के अनुसार, राई-सांकळी की भूमि पहले बंजर थी। देवधारी के काठी ने यहाँ बसावट शुरू की और चरवाहों से महसूली प्राप्त की। बाद में दीवान बापाजी की सहायता से गाँव देसाई को सौंपे गए। कर्नल वॉकर के बंदोबस्त में देसाई को तालुकेदार मान्यता मिली। 1919-20 के असहयोग आंदोलन में शामिल होने के कारण गोपालदास को पद से हटा दिया गया और उत्तराधिकार का प्रश्न लंबित रहा। तालुके को सीमित फौजदारी और दीवानी अधिकार प्राप्त थे।


वांसावड स्टेट

    वांसावड तालुका नागर ब्राह्मण परिवार की जागीर थी, जिसके पूर्वज देसाई मोंजी मदनजी थे। माना जाता है कि वांसावड गाँव की स्थापना वासो नामक भरवाड़ ने एक बड़े बरगद के पेड़ के पास की थी। बाद में जूनागढ़ के चूड़ासमा वंश के रा' विका को यह गाँव जागीर में मिला और उसके वंशजों ने गुजरात सुल्तानों द्वारा सोरठ विजय तक यहाँ शासन किया। मुगल काल में वांसावड 97 गाँवों वाले सरवैया राजपूतों के परगने का मुख्यालय था। बाद में यह देसाई परिवार के अधिकार में कैसे आया, यह स्पष्ट नहीं है; संभवतः उन्हें यह देसाईगिरी के रूप में मिला।

    कर्नल कीटिंग के समय वांसावड तालुके को पाँचवीं श्रेणी के न्यायिक अधिकार मिले। 1895 में सामुदायिक अशांति के कारण ये अधिकार अस्थायी रूप से एजेंसी ने वापस ले लिए, लेकिन 1900 में फिर बहाल कर दिए गए। इसके बाद तालुके का न्यायिक कार्य प्रतिनिधि तालुकेदारों द्वारा चुने गए और राजनीतिक एजेंट द्वारा अनुमोदित मजमू न्यायाधीश के माध्यम से चलाया जाने लगा।


विठलगढ स्टेट

    विठलगढ़ तालुका की स्थापना 1806 ई. में हुई और इसमें 10 गाँव थे, जिन्हें विठलगढ़, पीपलवा और हडाळा —इन तीन महालों में बाँटा गया था। यहाँ के शासक चंद्रसेनिया कायस्थ जाति की फणसे शाखा से संबंधित थे। विठलगढ़ का प्राचीन नाम वंतू था और पहले यह लखतर के अधिकार में था। 1806 में प्रसिद्ध गायकवाड़ सेनापति बाबाजी आपाजी ने इसे लखतर से प्राप्त किया।

    बाबाजी आपाजी ने लखतर को कर्ज से मुक्त कराया और लिम्बडी तथा वढवाण के बढ़ते हस्तक्षेप को रोका। उन्होंने मोरबी के ठाकोर की सहायता के बदले हडाळा प्राप्त किया तथा बाबरिया के काठियों की सहायता के बदले रसणाल और पीपळवा गाँव मिले। इन गाँवों को मिलाकर 1806 में विठलगढ़ तालुका बनाया गया। तालुके को फौजदारी मामलों में 2 वर्ष तक का कठोर कारावास व ₹2,000 तक जुर्माने तथा दीवानी मामलों में ₹6,000 तक के मामलों का अधिकार था।


झिंझुवाड़ा 

    झिंझुवाड़ा ब्रिटिश काल में सौराष्ट्र के झालावाड़ क्षेत्र का एक गैर-सलामी रियासत था। 1901 में इसका क्षेत्रफल लगभग 165 वर्ग मील था और इसमें 18 गाँव आते थे, जिनकी कुल आबादी 11,732 थी। यह गैर-न्यायिक रियासत थी। यह बड़ौदा एजेंसी और वेस्टर्न इंडिया स्टेट्स एजेंसी के अंतर्गत आती थी।

    झिंझुवाड़ा का ऐतिहासिक महत्व उसके प्रसिद्ध 11वीं शताब्दी के किले के कारण भी है, जिसका निर्माण सोलंकी काल में हुआ माना जाता है। यह किला मारू-गुर्जर स्थापत्य शैली के लिए प्रसिद्ध है और इसके चार प्रमुख द्वार—मदापोल, राक्षसपोल, हरिजन और धामापोल—विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। यह क्षेत्र लिटिल रण ऑफ कच्छ के दक्षिणी किनारे पर स्थित था।


गुजरात की देशी रियासतों और एजेंसियों के बारे में और जानें:

यदि आप गुजरात और आसपास के क्षेत्रों के ऐतिहासिक देशी रियासतों (Princely States) के बारे में विस्तार से पढ़ना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए लेख जरूर पढ़ें:

  1. रीवा कांठा एजेंसी: रीवा कांठा एजेंसी की सभी देशी रियासतों की सूची यहाँ देखें »

  2. मही कांठा एजेंसी: मही कांठा एजेंसी के अंतर्गत आने वाली रियासतें और उनका इतिहास »

  3. पालनपुर एजेंसी: पालनपुर एजेंसी की देशी रियासतों की पूरी सूची यहाँ पढ़ें »


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)

Q1. बड़ौदा, वेस्टर्न इंडिया और गुजरात स्टेट्स एजेंसी (BWIGSA) क्या थी?

उत्तर: बड़ौदा, वेस्टर्न इंडिया और गुजरात स्टेट्स एजेंसी ब्रिटिश भारत की एक राजनीतिक एजेंसी थी, जिसका गठन 1937 में हुआ था। इसके तहत बड़ौदा रियासत, काठियावाड़, कच्छ, मही कांठा, रीवा कांठा और पालनपुर जैसी एजेंसियों के देशी रजवाड़ों को ब्रिटिश रेजीडेंसी के प्रशासनिक नियंत्रण में एक साथ लाया गया था।

Q2. इस एजेंसी का मुख्यालय (Headquarters) कहाँ स्थित था?

उत्तर: इस एजेंसी का मुख्य प्रशासनिक केंद्र राजकोट में स्थित था, जहाँ 'रेजिडेंट' (Resident) बैठते थे जो सीधे भारत के वायसराय को रिपोर्ट करते थे।

Q3. इस एजेंसी के तहत कौन-कौन सी प्रमुख रियासतें आती थीं?

उत्तर: इसमें गुजरात और सौराष्ट्र क्षेत्र की कई प्रमुख और तोपों की सलामी (Salute States) पाने वाली रियासतें शामिल थीं, जैसे— बड़ौदा (गायकवाड़), जूनागढ़, नवानगर (जामनगर), भावनगर, कच्छ, ध्रांगध्रा, ईडर, और पालनपुर।

Q4. आजादी के बाद इन रियासतों का भारत में विलय कब और कैसे हुआ?

उत्तर: 1947 में भारत की आजादी के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल के प्रयासों से इन सभी रियासतों ने भारत संघ (Union of India) में विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए। 1948 में सौराष्ट्र राज्य और बाद में 1956/1960 में ये क्षेत्र वर्तमान गुजरात राज्य का हिस्सा बने।

Q5. वेस्टर्न इंडिया स्टेट्स एजेंसी (WISA) और गुजरात स्टेट्स एजेंसी में क्या अंतर था?

उत्तर: शुरुआत में वेस्टर्न इंडिया स्टेट्स एजेंसी (1924) मुख्य रूप से काठियावाड़, कच्छ और पालनपुर के रजवाड़ों के लिए थी। बाद में 1933-1937 में रीवा कांठा, मही कांठा और बड़ौदा जैसी पूर्वी/दक्षिणी गुजरात की रियासतों को मिलाकर एक एकीकृत 'Baroda, Western India and Gujarat States Agency' बनाई गई।

Q6. इस एजेंसी में कुल कितनी रियासतें (Princely States) और तालुके शामिल थे?

उत्तर: इस एजेंसी के अंतर्गत 80 से अधिक प्रमुख और मध्यम रियासतें तथा सैकड़ों छोटे तालुके व जागीरें शामिल थीं, जिन्हें उनकी श्रेणी और तोपों की सलामी के आधार पर वर्गीकृत किया गया था।




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