प्रियम्वदा !
बात ऐसी है, हकीकत में तो यह पत्र लिखने की जरा सी भी इच्छा है नहीं। लेकिन बस, अपनी नियमितता बरकरार रखने के लिए बैठा हूँ। समय हो रहा है रात के साढ़े ग्यारह। बाहर के वातावरण में बिल्कुल ही सन्नाटा पसर चुका है। कारण है, यह ठंडे शुष्क पवन..! हवाएं ऐसी चल रही है, जैसे हिमालय से आई है। धूप में अगर खड़ा रहा जाए, तो जैकेट में गर्मी होतीं है, लेकिन वहीं अगर छांव में खड़े है, तो जैकेट ऊपर अलग से चद्दर लपेटने की विवशता आन पड़े।
सर्दियों में सदैव से गुजरात का सबसे ठंडा शहर रहता है नलिया। इस बार चार डिग्री तापमान तक पहुंचा था। हाँ, माइनस में कभी नहीं जाता। सवेरे आज जब उठा, तब याद आया दिलबाग.. कितने दिनों से मैंने उन पौधों को अपने हालात पर ही छोड़ दिया था। शुकर है, घर मे से कोई न कोई कभी कभार पानी दे आता है। मेरे सारे शौक की ही तरह यह दिलबाग का भी नशा अब शायद उतर चुका है।
जगन्नाथ जाने वाला था, लेकिन सवेरे सवेरे माताजी ने कहा चीनी खत्म हो गयी है, ले आओ। बस यही कारण था, सवेरे जगन्नाथ के बजाए दुकानदार के द्वारे पहले पहुंचा। ऑफिस पहुंचकर काम तो आज काफी था। इतना ज्यादा काफी, कि दिनभर में इंस्टाग्राम बस खोलकर तुरंत बंद कर देने भर का समय मिला था। दोपहर को लंच करके, उस मेहमान को भी ऑफिस उठा लाया। वो बेचारा घर पड़ा-पड़ा क्या करता। हालांकि मेरे साथ ऑफिस आकर भी क्या ही करता।
रात के आठ बजे तक उसने बस क्रिकेट देखी, और मैंने.. बस काम.. काम.. काम..! सच मे, प्रियम्वदा, कभी कभी लगता है, मैं नौकरी नहीं मजदूरी ही कर रहा हूँ। कईं बार लगता है, जैसे यह ऑफिस मुझे घर जाने देने से पूर्व पूर्णतः निचोड़ लेती है। और ऊर्जाहीन शरीर बस घर तक पहुंच जाता है। लेकिन एक बात यह भी है, कि दिनभर में कितना ही थका होऊं, वॉलीबॉल खेलना होता है, तो सारी थकान उतर जाती है। नई ऊर्जा से भर जाता हूँ।
दोपहर बाद अगर व्यस्तता ज्यादा हुई, तो बस फिर दिलायरी में कुछ नहीं आता। चलो फिर इसे यहीं अस्तु करता हूँ।
शुभरात्रि।
१०/०१/२०२६

