सरकारी बस, सत्ता का भाषण और टूटा हुआ सफर || दिलायरी : 11/01/2026

0

भूलने की आदत और समय का उपचार

    प्रियम्वदा !

    बात तो आज भी कल वाली ही है। लिखने का तो जरा सा भी मन है नहीं.. लेकिन इस बेमनपने की आदत तो नहीं डाल सकता हूँ न..? हररोज इसी तरह टालता रहूंगा, तो प्रियम्वदा, तुम्हे भी भूल जाऊंगा मैं। मैं बहुत कुछ भूल चुका हूँ, और बहुत कुछ भूल जाने की कोशिश में भी हूँ। समय रहते भूल जाना बहुत बड़ा उपचार है, अपने अंतर्मन के लिए। भूल जाने से बहुत सारी दुविधाएं सताती नहीं। कुछ बातें भूली नहीं भुलाती, लेकिन उसका हल समय है। समय सब कुछ ठीक कर देता है, यह बात मात्र कहने-सुनने की नहीं है, हकीकत है। समय सब कुछ भुला देता है। 


ठंडी सुबह में बस डिपो पर खड़ा एक आम आदमी, रद्द हुई सरकारी बस और अधूरा सफर दर्शाती कार्टून छवि



सवेरे की ठंड और एक रद्द हुई बस

    आज सवेरे उस मेहमान को वापिस लौटना था, अपने गांव.. अपने घर। कल ही बुकिंग तो मैंने कर दी थी। और आज सवेरे हम निर्धारित समय, यानी कि पौने सात बजे ही बस डिपो पहुंच गए थे। प्रियम्वदा ! मैं जो सर्दियां चाहता हूँ, वह ठंड है। लेकिन कुदरत ने ठंडे पवन की बौछार लगा रखी है। मैं केवल जैकेट पहनकर डिपो गया था, सोचा था, नियत समय पर बस आएगी, मेहमान को बिठा दूंगा, और फिर घर लौट आऊंगा.. कार में कहां ठंड लगनी है। अफसोस, यह अंदाजा गलत निकला। समुद्री खाड़ी होने के कारण यहां हवाएं काफी चलती है, और बिल्कुल मानों हिमालय से आई हो.. न तो टोपी थी, न ही अजरख.. सवेरे सवेरे कानों को सुन्न कर देने वाली यह हवाओं ने मेरा ठंड के प्रति आकर्षण ही बिगाड़ कर रख दिया। सवा सात बजने को आए, मेहमान को द्वारिका के तरफ जाना था, लेकिन बस का कोई अतापता ही नहीं।


जब भाषण भारी पड़ गया एक सफर पर

    मैंने फोन में सरकारी बस की एप्लीकेशन चेक की, बुकिंग तो दिखा रही थी, लेकिन लाइव लोकेशन में बस कहीं नही दिखा रही थी। पाँचेक मिनिट और इन्तेजार करने के बाद इन्क्वायरी काउंटर का रूख किया। स्टेशन मास्टर ने कहा कि वह बस तो कल आयी ही नहीं, तो आज जाएगी कहाँ से? यह भी समस्या जायज है। दो स्टेशनों के बीच सतत चलने वाली बस बीच मे से ही लौट गई हो, तो मेरे यहाँ से तो उस बस का गुजरना असंभव ही है। बस कैंसिल होने का कारण मालूम चला, "साहब आए थे गुजरात में।" उनकी सेवा में, उनकी भीड़ इकट्ठी करने के लिए, यह सारी बसें निर्धारित रूट से बदलकर साहब के भाषण को सुनने वालों को जमा करने के लिए उपयोग में ली गयी।


ज़िद, रास्ते और अनिश्चित यात्रा

    प्रियम्वदा, मैं यह सोच रहा था, कि मेरा वह मेहमान, जिसे जामनगर जाना था, जिसकी मैंने बुकिंग की थी, वह अपनी बस केवल इस कारण से चूक गया, क्योंकि माननीय साहब को भाषण देना था। तो क्या इस बात पर साहब को कसूरवार नहीं कहा जा सकता, कि उनकी भाषणबाजी के लिए सामान्य नागरिक को असुविधा हुई? एक तो हम लोग वंश-परंपरा से थोड़े ज़िद्दी होतें है। मेहमान को लाख समझाया, कि वापिस घर चलते है। रात वाली बस में चले जाना। सवेरे जामनगर पहुंचा देगी। लेकिन नहीं, जीव छोड़ सकते है, जिद्द नहीं। एक बार ठान लिया कि सफर करना है, तो बस करना है। कच्छ से जामनगर जाने के लिए तीन रास्ते है। एक तो माळीया से आमरण वाला। दूसरा मोरबी से लतीपर वाला। तीसरा राजकोट से पडधरी होकर ध्रोल। तीसरा सबसे लंबा रास्ता है। लेकिन राजकोट से जामनगर का वाहन जल्दी मिल जाता है। 


    मैं उसे समझा रहा था, कि वाया राजकोट जाना बहुत लंबा पड़ेगा। घर चलो। उतने में भावनगर के लिए बस आ गयी। वह राजकोट होकर चलती है। तो मेहमान को उसमे बिठा दिया। उसके सद्भाग्य अच्छे थे, कि बिना बुकिंग के भी सीट तो मिल गयी। और अच्छी बात यह हुई, कि वह बस मोरबी से राजकोट सीधा जाने के बजाए पडधरी होकर निकली। मेहमान पडधरी उतर गया.. उसे तो बस में बिठाकर मैं घर आकर ऑफिस चल दिया था। रविवार होने के बावजूद मैं नौ बजे ऑफिस पर था। बीते कल की दिलायरी लिखी नही थी, तो दो पेरेग्राफ़स में लीपापोती करके नोइंडेक्स में पब्लिश कर दी। और फिर वेनोम का पार्ट 2 देख लिया। काम तो काफी थे, लेकिन करने की इच्छा नहीं थी। दो मुख्य कारण थे, एक तो सवेरे वो बस कैंसिल हो जाने का क्रोध था। दूसरा सवेरे की ठंडी हवाओं ने सरदर्द कर दिया था। मजा इतना था, कि वेनोम देख पा रहा था। एक बज गया था। मेहमान पडधरी से जामनगर के लिए किसी वाहन की तलाश में खड़ा था। उसने मेरी बात न मानकर यूँ अनिर्धारित सफर करने का फैंसला लिया था, इसी कारण से मैं बार बार उसके अपडेट्स ले रहा था।


चौदह घंटे का सफर, तीन सौ सैंतालीस किलोमीटर

    खेर, दो बजे उस मेहमान का फोन आया, वह ध्रोल पीछे छोड़, वांकिया नामक गाँव के पास उतर गया था। क्योंकि वह जिस टेम्पो में चढा था, वह टेम्पो वाला अपना टेम्पो बेफिक्री से चला रहा था। शायद पिया हुआ होगा। सेफ्टी के चलते वह बीच रास्ते मे उतर गया था। मुश्किल से उसे जामनगर के लिए वाहन मिला, और साढ़े तीन बजे जब मैं घर पहुंच रहा था, तब वह जामनगर आखिरकार पहुंच गया। यहां से सौ - सवा सौ किलोमीटर का सफर और बाकी था। सद्भाग्य से एक आखरी बस वह पकड़ पाया, जो उसके गांव से 4 किलोमीटर दूर उसे छोड़ सकती थी। मैं घर पहुंचकर, पौने चार बजे लंच करके, थोड़ी देर के लिए बिस्तर में पसरा। विक्स एक्शन 500 की आधी गोली ली हुई थी मैंने। और नींद ने अपनी आगोश में ले लिया मुझे। आंख खुली थी, तब घड़ी शाम के छह बजने का संकेत कर रही थी। बड़ी तेज ठंड लग रही थी। शरीर से कपकपाहट छूटने जैसा लग रहा था।


    कुछ देर बाहर टहलने जाने का विचार किया। बाहर और ठंडी हवाएं चल रही थी। दुकान पर गया, एकाध मावा से चेतना को वापिस लाने की, और ठंड भगाने का निरर्थक प्रयास किया। दुकानदार खुद बता रहा था, कि वह भी सोकर उठा है, उसे भी बहुत ज्यादा ठंड लग रही है। गरबीचौक पहुंचा। नया वॉलीबॉल आ चुका था। पांचवा बॉलीबॉल है। सात बजने को थे, शाखा होनी थी, मैं घर पर कपड़े बदलने लौटा। और मेहमान की अपडेट ली। वह अभी तक बस में ही था। और अब वह अपनी सवेरे की किसी भी कीमत पर मुसाफिरी करने की जिद्द पर थोड़ा पश्चाताप भी करने लगा था। और मैं ठहाके लगा रहा था, कि लोग कहने पर नहीं समझते, अनुभव से समझते है। मैंने भी इस तरह सफर किया है, बगैर बुकिंग, बगैर समय देखे, बगैर सोचे समझे। खेर, वापिस गरबीचौक लौटा, तबतक आधी शाखा हो चुकी थी। और हमने वॉलीबॉल खेलना शुरू किया। नए बॉल का मुहूर्त अच्छा नहीं होगा शायद, कोई भी ठीक से खेला नहीं। साढ़े आठ बजे तक खेलना बंद करके घर लौट आया था।


जापान के सपने और ज़मीनी हकीकत

    मेहमान अब घर से चार किलोमीटर दूर था। और आखिरकार चौदह घंटे में उसने तीनसौ सैंतालीस किलोमीटर का सफर पूरा किया। बताओ, यह भी कोई बात हुई भला? प्रधानमंत्री जी को अपनी भीड़ इकट्ठी करने के लिए इस तरह सरकारी बसों का उपयोग करना चाहिए? क्या यह उनकी सत्ता का दुरुपयोग न हुआ? सोमनाथ में हो रहे उनके किसी कार्यक्रम के लिए, कच्छ की बसों को इस तरह डी-रूट करना कितना योग्य है? अभी कुछ देर पहले उनके वक्तव्य की एक रील देखी, कह रहे थे, "मोरबी - राजकोट - जामनगर का त्रिकोण भविष्य में जापान जैसा बन जाएगा।" अरे मुरब्बि, पहले बसों को तो अपने रूट पर चल लेने दो। जापान में तो एक सेकंड की देरी से चलने वाली ट्रेन का स्टाफ क्षमा याचना करता है। यहां तो मुझे अभी कुछ देर पहले बुकिंग की हुई टिकट का, रिफंड मांगने के लिए फोन करना पड़ा। अगर फोन नहीं करता, कंप्लेन नहीं करता, तो टिकट के पैसे भी कहाँ वापिस आने थे? बात करते है जापान की।


आम आदमी, व्यवस्था और झंझावात

    सीधा सफर करने के बजाए, किसी को यूं टुकड़े टुकड़े भारी भरखम सामान के साथ बार बार वाहन बदलना पड़े, और अगर एक स्टेशन पर लेट पहुंचने पर, अगले स्टेशन का वाहन चूक जाने का भय भी जिस सफर में हो, वहां माननीय प्रधानमंत्री जी जापान बनाने की कह रहे है। मेरा तो मन कर रहा था, कि काश मैं पंगे लेने जितना सक्षम होता, तो प्रधानमंत्री जी पर ही इस असुविधापूर्ण सफर के लिए केस कर देता। फिर याद आया, अपनी तो न्याय प्रणाली भी बड़ी लंबी और ख़र्चपूर्ण है। सालों साल चलते केस में चप्पलें घिस जाती है, न्याय को पाने में। प्रधानमंत्री जी तो अपना संभाषण सुनाकर चल दिए होंगे, किसी अगले वक्तव्य की खोज में। भीड़ भी मुफ्त की बस मुसाफिरी का लुत्फ उठाकर तितरबितर हो गयी होगी। लेकिन उनका क्या? जो आज के दिन में बुकिंग होने के बावजूद सफर नहीं कर पाए? उनका क्या, जो पांच बजे घर पहुंचने वाले थे, लेकिन एक भाषणबाजी के कारण रात के नौ बजे घर पहुंचे हो।


    खेर, यही जीवन है, झंझावातों से लड़ते हुए जीना ही जीवन है। 

    शुभरात्रि।

    ११/०१/२०२६

|| अस्तु ||


प्रिय पाठक !

अगर आपने भी कभी व्यवस्था के कारण अनचाहा लंबा सफर झेला है, तो इस दिलायरी को पढ़िए, महसूस कीजिए— और अपनी बात टिप्पणियों में लिखिए। शब्द मिलते हैं, तभी आवाज़ बनते हैं।

Dilayari पढ़ते रहिए, नए पत्र सीधे आपके Inbox में आएंगे:
मेरे लिखे भावनात्मक ई-बुक्स पढ़ना चाहें तो यहाँ देखिए:
और Instagram पर जुड़िए उन पलों से जो पोस्ट में नहीं आते:

आपसे साझा करने को बहुत कुछ है…!!!

और भी पढ़ें :

लिखने की जरा सी भी इच्छा है नहीं.. || दिलायरी : 10/01/2026
नाम, समय और शहर की उलझनें | एक व्यस्त दिन || दिलायरी : 09/01/2026
नैतिक दुविधा : जब विवेक फैसला करता है || दिलायरी : 08/01/2026
सोच का भटकाव, रास्तों का सपना और शाम का क्रोध | दिलायरी : 07/01/2026
सर्दियाँ जो आई ही नहीं | मन के मोड़, आकर्षण और ठहराव की दिलायरी : 06/01/2026


#दिलायरी #आमआदमी #सरकारीबस #सत्ता_और_सिस्टम #यात्रा_वृत्तांत #भारतीय_व्यवस्था #राजनीति_और_जीवन #ग्राउंड_रियलिटी #हिंदी_ब्लॉग #Dilayari

Post a Comment

0Comments
Post a Comment (0)