नाम, समय और शहर की उलझनें | एक व्यस्त दिन || दिलायरी : 09/01/2026

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समय की कमी और वॉलीबॉल की प्राथमिकता

    प्रियम्वदा !

    पुरे दिन में ज़रा सा भी समय ही नहीं मिला। रात को भी नहीं। दरअसल ऐसा व्यस्त दिन बहुत कम बार जीवन में आता है। वैसे तो रात को समय था, लेकिन मुझे दिलायरी से ज्यादा वॉलीबॉल को प्रिऑरिटी देनी थी। रात को दो मन थे, पहले मन में आया कि दिलायरी लिख लूँ.. और यही सोचते, गरबीचौक पहुँचते हुए रास्ते से ही वापिस लौट रहा था। लेकिन एक लड़के ने पकड़ लिया, और उसकी ज़िद्द पर गरबीचौक जाना पड़ा। साढ़े दस तक वॉलीबॉल कूटने के बाद घर आया तो ज्यादा नींद आ रही थी। और मैं ग्यारह बजे ही सो गया था। 


एक थका हुआ युवक, पास में वॉलीबॉल, पीछे बस अड्डा और रेलवे स्टेशन की हल्की रेखाएँ—व्यस्त दिन, पहचान और शहर की उलझनों को दर्शाती कार्टून इमेज

ठंड, सफ़र और सवेरे की बस

    जल्दी सो जाने का एकमात्र कारन था, सवेरे जल्दी उठ जाना। हुआ यूँ था, कि एक मेहमान है घर पर। उसे माता के मढ़ जाना था। मेरे शहर से सवेरे सात बजे बस निकलती है। तो साढ़े छह बजे मैं उसे लेकर बस डेपो के लिए निकल रहा था। अनुभव हुआ, कड़ाके की ठण्ड तो अपने शहर में भी है, बस फर्क इतना है, कि अपने यहाँ दिनभर धूप रहती है, तो ठण्ड का अनुभव नहीं होता। बस सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद ही ठण्ड का अनुभव किया जा सकता है। कड़ाके की ठण्ड में बाइक से भला कौन जाए? कार लेकर गया। उसे बस में बिठाकर घर आकर तैयार होकर ऑफिस चल पड़ा। 


दो फ़िल्में और शहर का बदलता ढांचा

    वाकई, दोपहर से पूर्व इतना खाली समय मिला था, कि मैंने दो फिल्मे पूरी की। विजय सेतुपति की "महाराजा".. इस मूवी का बस एंडिंग देखना बाकी था। पूरी कर ली। काफी बढ़िया मूवी है। और क्या गजब का सस्पेंस था आखिर तक। उसके बाद मार्वल की वेनोम देखी। वह भी काफी मजेदार थी। अच्छा, लंच टाइम में मार्किट चला गया था। अपने शहर में महानगरपालिका लागु होने के बाद नया बस अड्डा भी बन रहा है। और नया रेलवे स्टेशन भी। फ़िलहाल जो रेलवे स्टेशन है, वहां हर ट्रैन को अपना इंजन बदलना पड़ता है। और बस अड्डा तो इतना पुराना है, कि कोई देखकर यही सोचेगा कि यह बिल्डिंग अभी तक खड़ी कैसे रही है। 


नया बस डिपो, पुराना स्टेशन और सरकारी व्यवस्था

    यूँ तो अपने शहर में हर लक्जरियस ब्रांड और आइटम मिल सकती है। लेकिन फिर भी रेलवे स्टेशन और बस अड्डा बड़ा बेकार सा है। अभी जो नया बस डिपो बन रहा है, वह तो बस-पोर्ट ही बनाया जाएगा। सरकारी बस सेवा बहुत ज्यादा अद्यतन होने लगी है। बस डेपो बिलकुल एयरपोर्ट की तर्ज़ पर बनाया जाएगा। गुजरात में लगभग बड़े शहरों में सरकारी बस डेपो बहुत शानदार बनाए जा रहे है। खेर, लंच के बाद तो थोथे का निष्कर्ष निकालना था। मैं और सरदार तीन बजे बैठे थे, सीधे सात बजे थोथों से मुँह निकाल पाएं थे। इस दरमियान आए तमाम कॉल्स मैंने साइलेंट किये थे। लड़के बार-बार नया वॉलीबॉल खरीदने के लिए मत ले रहे थे। ग्रुप कॉल की बार बार घंटिया बजे जा रही थी। 


नाम की भूल, पहचान की टीस

    आठ बजने वाले थे, वह मेहमान माता के मढ़ से लौट रहा था। तो उसे लेने बस-अड्डे जाना था। उतने में एक अपरिचित व्यापारी आ धमका। अरे हाँ ! यह साल में एकाध बार लौटने वाला व्यापारी मुझे दिलावरसिंहजी नाम से पुकारता है। पहली बार जब इसने मुझे दिलावरसिंहजी कहके बुलाया, तो मैं चौंक गया था। मुझे लगा इसने दिलायरियाँ पढ़ ली है क्या? या फिर इंस्टाग्राम पर है क्या? लेकिन इसने गलत अंदाज़ा लगाया था मेरे नाम का। इसने मेरा नाम ही गलत याद रख लिया है। वैसे भी मैं जहाँ काम करता हूँ, वहां सब बाहरी राज्यों के लोग है। और इन लोगो से मेरा असली नाम बोला नहीं जाता। 


नामकरण, पीढ़ियाँ और एक चिट्ठी

    खासकर हरयाणा-पंजाब के लोग तो आधे अक्षर बोलते ही नहीं। आधे अक्षर को पूरा बोलते है। मेरा नाम यहाँ नहीं लिखूंगा.. लेकिन नाम में आधा अक्षर तो है। ऊपर से इन लोगो ने यह नाम कहीं सुना भी नहीं होगा। तो इनके लिए  मैंने अपना अलग नाम रखा है। कितने सारे लोग अलग-अलग नामों से पुकारते है। और अब तो मुझे आदत हो गयी है। कईं बार क्या होता है, कोई हिंदी भाषी मेरा नाम पूछता है, मैं अपना नाम बताता हूँ, तो वह "हैं" बोल पड़ता है। फिर मैं उसे मेरा अन्य आसान नाम बता देता हूँ। तो वह उल्टा पूछता है, पहले क्या बताया था। उस समय मेरे मनमें एक तीव्र टीस उठती है। कि पहले जो बताया था, वह तुझसे हज़म हुआ नहीं, अब आसान कर दिया है, तो पहले वाला नाम सुनना है इसे। 


    है, वैसे हकीकत में हमारे नाम काफी अलग होते है। कईं लोगो को दोबारा बताना पड़ता है। आमतौर पर थोड़े लम्बे नाम होतें है, उदहारण के लिए, "विरादित्यसिंह", "पृथ्वीराजसिंह", "शिवभद्रसिंह", "छत्रपालसिंह".. बस यह नाम ही कभी कभी लोगों को समझ नहीं आते.. दो-तीन बार बताने के बाद, हमे खुद ही अपना कोई आसान नाम बताना पड़ता है। वरना तब तक वह हैं हैं ही करते रहते है। आज़ादी के बाद वाली पीढ़ियों ने तो अपने आसान नाम चुन लिए थे। यह हमारी वाली पीढ़ी पता नहीं फिर से कैसे यह पुराने नाम धारण करने लगी थी। नामकरण संस्कार होता है, तो भूदेव कुछ नामों की सूची देते थे.. मेरे पास वो चिट्ठी आज भी पड़ी है.. मीन राशि से कईं नाम लिखे हुए थे। उनमे से एक तय हुआ था। 


    चलो फिर, बीते दिन की यह दिलायरी आज लिखकर यहीं पूरी करता हूँ। 

    शुभरात्रि। 

    ०९/०१/२०२६ 

|| अस्तु ||


प्रिय पाठक !

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