मैं खुद से मिलने निकला हूँ..!
Date -24/12/2025Time & Mood -11:29 || आशापूर्ण..
दर्द से दोस्ती..
प्रियम्वदा ! इस संसार के कठिनतम कामों में से एक है दर्द से दोस्ती कर लेना। किसी के रूठ जाने से लेकर बिछड़ जाने तक.. या किसी के झूठ कह देने से लेकर विश्वासघात तक.. सबसे पहली जो भावना रूबरू होती है, वह होती है, दुःख, पीड़ा, दर्द। एक धक्का सा लग जाता है। और फिर हमारी चेतना उस दर्द को संभालते हुए उस स्थिति से बाहर निकलने के लिए प्रेरित करती है। लेकिन कुछ दर्द ऐसे होतें है, भीतर की वह चोट कभी पूरी तरह से ठीक होने नहीं देती। उस पीड़ा से, उस दर्द से हमें एक समाधान कर लेना होता है। मैत्री बाँध लेनी होती है, तभी तो हम उस पीड़ा के बोझ से बच पाते है।
हाँ ! जानता हूँ, और समझता हूँ। तुमसे बिछड़ना किसी वज्रपात से कम कहाँ था.. पूरी रात बेचैनी में गुज़री थी वह। दिमाग सुन्न हो था। मेरी बची-कुछ निर्णय शक्तियों ने मेरा त्याग कर दिया था। उस रात के पास कितने सारे फैंसलों के विकल्प उपस्थित थे। सामने आयने में मुझे उन विकल्पों के उपयोग के पश्चात के मेरे जितने संभावित रूप हो सकते थे, वह सारे दिखाई पड रहे थे। मैं अपने उन तमाम विकल्पों में अपनी हालत देखकर तय नहीं कर पाया था। तब मैंने अपनी उस पीड़ा से आजीवन की संधि कर ली थी। जो स्थिति पूर्व की थी, वही स्थिति को स्थिर रखने के लिए दर्द से दोस्ती कर ली। उसका मेरे भीतर एक बसेरा ही बसा दिया। मैंने अपने व्यवहार में वह पहले वाली स्थिति को पुनः प्राप्त कर ली।
एक सवाल :
सबक :
सबसे बड़ी राहत ही तब अनुभव होती है, जब पीड़ा से परिचय हो जाता है। जब दर्द से दोस्ती हो जाए। वह दर्द किसी समय पर हमारे लिए शक्ति बन जाता है। सहनशक्ति।
अंतर्यात्रा :
मैं अपनी सहनशक्ति की क्षमता जानता हूँ। कोई भी धक्का मुझे इतना हताहत नहीं कर सकता, कि मैं वापिस खड़ा न हो पाऊं। पीड़ा से प्रशिक्षण पाकर अपनी क्षमताओं का विस्तार किया जा सकता है।
स्वार्पण :
दर्द से दोस्ती कर लेना, अपनी मंजिल तक पहुँचने का मार्ग सुगम कर देता है।
जिसके भीतर तुम हो, तुम्हारा दिया दर्द है..
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