मैं खुद से मिलने निकला हूँ..!
Date -24/12/2025
Time & Mood -12:19 || वक़्त की नज़ाक़त को देखते हुए..
वक़्त ने क्या बदला..
प्रियम्वदा ! वक़्त ने क्या नहीं बदला है.. मुझे बदला है, तुम्हे बदला है, हमारे मध्य की स्थिति को बदला है। वे वियोग के जख्म अब गीत बन चुके है। शब्दों ने पत्रों में अपना स्थान पाया है। भावनाओं ने लेखनी को एक दिशा दी है। अनंत दिशा। पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मुझे अपनी ही भूल दिखाई पड़ती है। मैंने पाया है कि कुछ तथ्यों को ज्यादा स्वतंत्रता नहीं देनी चाहिए। एक मर्यादापूर्ण नियंत्रण होना चाहिए। तुम्हारा मुझ पर, मेरा तुम पर। यदि हम दोनों में से कोई एक भी इस नियंत्रणरेखा का उल्लंघन करता है, तो वह भूकंप ही होगा। धराशायी। सर्वनाश। संबंध का सर्वनाश।
आज हालात अलग है। मैं अलग हूँ, तुम भी। दोनों के रस्ते अलग है। लेकिन तुम्हे पता है प्रियम्वदा, मेरा वह स्वप्न आज भी कहीं से मुझे पुकारता है, मेरा और तुम्हारा एक पथ पर एक राही बनकर साथ चलने के लिए। प्रियंवदा, तुम्हारे पथ पर मैंने चलने की कोशिश की, मैं अपना बचाखुचा अपनापन भी तुम्हे सौंपने को तैयार हूँ, लेकिन, अब.. अब परिस्थतियाँ मेरे पक्ष में कहाँ है? नीति, मेरी निति मुझे कुछ और कहती है, और हालात कुछ और.. मुझे चाहिए कुछ और है, मिला कुछ और.. नीति भविष्य के वर्तमान को बदल सकती है, लेकिन भूतकाल के किटक को काटने से नहीं रोक सकती।
एक सवाल :
तुम्हे क्या लगता है प्रियम्वदा, मुझे नियति को स्वीकार लेना चाहिए, या नियति को बदलने को प्रयासरत होना चाहिए। मुझे वह चाहिए, जो असंभव है, कईं दृष्टियों में अनीति है। यहाँ विभाग बंट चूका है, संभावना और असंभावना का.. मैं किस पक्ष में रहूं?
सबक :
जब भी कभी मैं पलटकर देखता हूँ, मुझे नियंत्रणरेखा पर एक प्रज्वलित अग्नि दिखती है। मैं उस अग्नि की लपटों को निगल जाना चाहता हूँ।
अंतर्यात्रा :
अपने भीतर उस अग्नि की भभक को बसाकर शीत की कामना करने वाला मैं, वक़्त के साथ तब तक नहीं बदल पाऊंगा... जब तक बदलाव को आत्मसात नहीं कर लेता।
स्वार्पण :
समय सब कुछ बदल देता है, हल और हालात..! शांति और समर्पण भी समय पर निर्भर है। तो बदलाव भी कभी न कभी मुझे अपना लेंगे, या मैं उन्हें अपना लूंगा.. यही नियति का आदेश होगा।
वक़्त ने बदला सभी को है सदा,
नाग भी तो केंचुली को बदलता।
वही,
जो बेवक़्त तुम्हे याद करता है..
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