एकतरफ़ा प्रेम की आदत और शब्दों का सहारा
प्रियम्वदा !
फिर से हाजिर हूँ, यह कोरा ई-कागज़ लिए, कुछ बकैती करूँगा, तुम्हारा कोई प्रत्युत्तर आना नहीं है.. फिर भी अपनी ओर से वन साइडेड लवरिये की तरह लिखता रहूँगा.. कि मेरे दिल में तुम हो, तुम्हारी यादें है, थोड़ा विरह है, वियोग का अफ़सोस है, तुम्हारे बिना खस्ता हालत है मेरी.. वगेरे वगेरे.. क्योंकि यही बातें करने की आदत जो पाल ली है मैंने..! इसी में मुझे आनंद अनुभव होता है। बिलकुल बेवफा सनम वाली शायरियां टाइप लिखने में एक आनंद तो है प्रियम्वदा। तुम्हे तो पता है, मैं सिर्फ सच छिपाता हूँ, झूठ नहीं बोल पाता। पता नहीं क्यों, लेकिन जब भी झूठ बोला है, पकड़ा गया हूँ। मेरा चेहरा सच बोल जाता है।
वेनोम से ब्रह्मांड तक – जीवन की खोज
खेर, आज के खत का मुद्दा अभी तक कुछ सोचा नहीं है.. क्योंकि सवेरे से बस रील्स देख रहा था, और मोबाइल ही चला रहा था। तो रील्स में से कोई मुद्दा मिला नहीं। हाँ ! वेनोम, धी लास्ट डांस देख ली। लंच में कुछ काम था नहीं। तो बस पूरी फिल्म ख़त्म कर ली। अच्छी मूवी है। मार्वल की मूवीज वैसे भी आउट ऑफ़ सिलेबस, आउट ऑफ़ यूनिवर्स ही चलती रहती है, इस कारण ज्यादा मजा आता है। बाकी मार्वल मूवीज की ही तरह यह वेनोम भी काफी धांसू मूवी है। एलियन वाला कांसेप्ट है, लेकिन एलियन और मानव का मेलजोल मजेदार है।
ईश्वर, धर्म और मानवता का साझा सूत्र
क्या वास्तव में बाहर कहीं कोई भी प्रकार का जीवन विद्यमान होगा? अगर यह सारे निर्माण किसी ईश्वर ने किए है, तो सिर्फ पृथ्वी पर जीवन है, बाकी ग्रहों को बंजर क्यों छोड़ा? और कोई काम आ गया होगा? या फिर यहाँ मनुष्यलोक में हो रहे उत्पातों को देखकर उस ईश्वर को यहीं अपनी व्यस्तता जाहिर करनी पड़ी होगी..? सवाल तो खूब सारे है, लेकिन तुम्हे तो पता है प्रियम्वदा ! ऐसे सवालों में एक भीति बस्ती है, ब्लासफेमी की। ईशनिंदा की। अपने धर्म में चलता है, लेकिन कोई बाहरी अपना समझकर बूरा मान जाए तो? या फिर कोई ईश्वर यह पढ़ ले, और मानहानि का दावा करके, साढ़े साती लगा दे तो?
कितने सारे धर्म है, कितने सारे ईश्वर है। त्रिदेव से लेकर तेत्तिस कोटि ईश्वर तक तो सिर्फ अपनी परंपरा में है। अन्य धर्मों में पैगम्बर से लेकर ईश्वर तक। शूली पर चढ़ जाने वाले देव से लेकर गॉड तक। गुरु से लेकर एक ओंकार तक। कितने सारे ईश्वर, कितनी सारी परंपरा, कितनी सारी मान्यता। इन सब में एक बात कॉमन है, तो वह है मानवता। प्रत्येक धर्मों में मानवता को सर्वश्रेष्ठ चुना है। बस उन परम्पराओं का अर्थ निकालने वाले चुना लगाते है। अपने यहाँ कितने सारे धर्म गुरु है। आजकल वह भी तो है, धर्मगुरु अलग, प्रचारक अलग, पाठक अलग.. मुझे पाठक बड़े अच्छे लगते हैं। बोलते कुछ और है, करते कुछ और..!
अच्छा, आज यह सीधी बात नो बकवास का कारण एक यह भी है, कि सवेरे से दो खत वो रोने-धोने वाले लिख चूका हूँ। सवेरे कुछ काम नहीं था, और जल्दी भी आ गया था, तो सवेरे सवेरे वो बहती भावना में दो खत लिख डाले.. दोनों ही गम, दर्द, पीड़ा, वेदना वाले थे, वो वे सारी बातें वहीँ खर्च हो गयी। तो यहाँ दिलायरी के लिए बातें कम पड़ी। और सच कहूं तो अब सोच रहा हूँ, कि आगे कुछ लिखने के लिए सूझ नहीं रहा।
रोज़ लिखने की मजबूरी नहीं, ज़रूरत
मैं सोच रहा था, कि मैं प्रतिदिन लिखता क्यों हूँ? शायद न लिखूं तो बिखर जाऊंगा..? मेरे मन में चल रहा उत्पात थमेगा नहीं? जैसे कोई हररोज दवाई लेता है, मैं शायद शब्द लेता हूँ। अगर कोई दिन लिखने को मना करता है, तब भी मैं एकाध अनुच्छेद तो लिख ही देता हूँ। वही, शुरुआती पेरेग्राफ.. वह मैं हमेशा उसी दिन लिख लेता हूँ। अगर समय न मिल पाया, तो बाकी की दिलायरी मैं दूसरे दिन पूरी कर लेता हूँ। शब्दों से जो दोस्ती की है, तो प्रतिदिन उसे निभाना खाली जिम्मेदारी नहीं, लेकिन दिनचर्या ही बन जाती है। वैसे इन शब्दों का साथ पाकर, मैं जो मुँह से किसी को नहीं कह पाता, वह बातें यहाँ जरूर से लिख पाता हूँ। वैसे एक बात यह भी है, कि अगर मैं कुछ ठीक कर पाता तब भी लिख नहीं पाता। यह दिलायरियाँ एक तरह का स्वीकार भी है। मेरी असमर्थता का, मेरी अपूर्णता का। समाधान नहीं, स्वीकारोक्ति है।
उत्तरायण, धोळावीरा और मन का द्वंद्व
और क्या लिखूं तुम्हे.. पिछले एक साल से सतत लिख तो रहा हूँ। शुरुआत तो ठीक हो गयी थी, लेकिन फ़िलहाल मन में एक चुप्पी छा गयी है। क्योंकि मन बार बार डाइवर्ट हो रहा है। बात यह है, कि कल ही मिल पर भंडारे का आयोजन कर दिया है। चौदह तारीख को कुछ तिथि-वीथी होगी, तो रसोइये ने चावल बनाने से मना कर दिया। अब ज्यादातर लेबर चावल खाने वाली है। तो उनकी सुविधा के लिए कल तेरह तारीख को ही भंडारे का आयोजन कर दिया। शाम को ही मैं पुष्पा से कह रहा था, कि धोळावीरा जाना है, छुट्टी का बंदोबस्त नहीं हो पा रहा है। तो अब अगर कल ही भंडारा हो जाए, तो चौदह तारीख को तो छुट्टी ही है।
यात्रा का जोखिम और इच्छा की जिद
तो पुष्पा कह रहा है, कि चौदह को धोळावीरा चल पड़ते है। अब मैं इस असमंजस में हूँ, कि चौदह तारीख को तो गुजरात में कहीं भी बाइक से सफर करना, मतलब खुद ही चलकर गला रेतवाने जाना। उत्तरायण पर हर जगह पतंगे चगाई जाती है। और पतंग के मांजे इतने तेज करवाए जातें है कि पतंग चगाते हुए हाथ की अंगुलिया कट जाती है। हर साल कितने ही लोग अपना गला कटवा लेते है, पंछी मांजे में फंसकर मारे जाते है। लेकिन लोग त्यौहार के साथ साथ यह ख्याल भी रखते है। अब मैं सोच रहा हूँ, मेरे पास मौका इसी दिन का है। कार से जा सकते है, लेकिन जाने का मन तो बाइक से है। करें तो करें क्या..?
गले पर अजरख लपेटकर जाऊं, और फुल फेस हेलमेट पहनकर निकलू.. तो यह सफर हकीकत में उतर सकता है। उससे भी पहले घर पर तो बताना पड़ेगा। वह भी कुँवरुभा की परमिशन मिले तब जाकर कुछ बात बनें। मन तो मना भी कर रहा है। मन चाहता है, कुँवरुभा के साथ उत्तरायण मनाई जाए। लेकिन मन यह भी चाहता है, कि कच्छ का वह भूभाग बाद में कब जाकर देखने मिलेगा.. जहाँ इतिहास और भूगोल एकाकार होतें है।
चलो फिर, जो भी प्लान तय होता है, तुम्हे तो बताऊंगा ही।
फ़िलहाल विदा दो।
शुभरात्रि।
१२/०१/२०२६
|| अस्तु ||
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