मैं खुद से मिलने निकला हूँ..!
Date - 15/12/2025Time & Mood -12:58 || आनंदित..
तुम अब भी खास हो..
हाँ तुम अभी ख़ास हो, प्रियम्वदा। आज मैं और किसी बंधनों में हूँ, तुम कहीं ओर। फिर भी इतना जानता हूँ, तुम आज भी खास हो। उतनी ही ख़ास, जितना पुष्पमाला को ख़ास होता है वह डोर। उतनी ही ख़ास, जितना घड़ी के अंकों को होती है सुइयां। उतनी ही ख़ास, जितना समुद्रजल को होता है क्षार। उतनी ही ख़ास, जितना यंत्र को आदेश। मैं कहीं भी, कैसी भी दशा में हूँ, तुम्हारी खासियतों से विमुख कैसे होऊं?
प्रियम्वदा ! तुम अब भी ख़ास हो, उसके साक्ष्य है मेरे यह शब्द.. जो तुम्हे ठीक वैसे ही पुकारते है, जैसे ब्रह्माण्ड में होते निनाद.. सुनाई नहीं देते, लेकिन वजूद उनका भी मौजूद है। तुम्हारा मेरे लिए खास होना कोई घटना या परिस्थिति मात्र नहीं है, यह एक जीवन का अभिन्न अंग है। मेरी दिनचर्या, मेरी लेखनी, या मेरे भाव, कहीं न कहीं तुम्हारे आसपास इस कारण से भी पहुँचते है, कि तुमने इन सब का निर्माण किया है, अपनी खासियत से। तुम्हारा यूँ अनकहे भाव को पहचान लेना, तुम्हारा पास होकर भी बहुत दूर होना.. यह सब मेरे शब्दों में तुम ही तो पहचानती हो।
एक सवाल :
लेकिन तुम कभी मुझे अपना ख़ास मानोगी? मेरे भीतर की कठोरता पर अपने कोमल हाथ की मरहम फेरोगी? मेरे इन पत्रों में से कभी किसी का प्रत्युत्तर दोगी?
सबक :
प्रियम्वदा, मेरी कलम की स्याही तब तक तो ख़त्म नहीं होनी, जब तक तुम्हारी खासियत मेरे भीतर अस्तित्वमान है। और मैं यह भी जानता हूँ, कि उस अस्तित्व कोई मिटा नहीं सकता।
अंतर्यात्रा :
मेरे भीतर की कठोरता, या वह अलिप्तता को मैंने नष्ट होते देखा है, तुम्हारे समीप आने से।
स्वार्पण :
मैं धीरे धीरे ही सही, अपनी इस परिस्थिति के प्रवाह को स्वीकारने लगा हूँ।
जहाँ मेरे शब्द रूक जाते सदा,
बखानों में खासियत कैसे भरूँ?
वही,
जिसके लिए एक तुम ही खास हो..
जिसके लिए एक तुम ही खास हो..
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