मन, पैसा और निराशा की गाँठ | इच्छाओं का बोझ और संतोष का भ्रम || दिलायरी : 03/01/2026

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मन की कामनाएँ और पीड़ा का गणित

    प्रियम्वदा !

    कितना सही होता अगर, मन कोई कामनाएं ही न पालता। कितना सरल होता जीवन.. बस यंत्रवत अपना जीवन जिओ, और समय आने पर निकल लो..! न किसी से कोई बंधन, न किसी की मोहमाया.. न पीड़ा.. बस गधे जैसी ज़िन्दगी। जीवनभर अपना काम पूरा करो, और किसी गड्ढे में दफ़न हो जाओ। मन है, तो कितनी सारी पीड़ा है। वैसे यह तो वही उपचार हुआ, कि न होगा बांस, न बजेगी बांसुरी। बजाए नियंत्रण के, मैं तो निकंदन की फिलोसोफी में बह गया। दुनिया में कितनी सारी बेमतलब की बातें है.. कभी कहते है, कि बोलेगा उसका सामान बिकेगा। और कभी कहते है, नहीं बोलने में नौ गुण होते है। 


एक ही स्थिर किरदार के साथ भावनात्मक कार्टून—कपड़े और भाव बदले हुए, पर चेहरा और पहचान वही

स्वतंत्रता, व्यवस्था और मन का विद्रोह

    बड़ी ज़ालिम है, यह दुनिया, और बड़ी ज़ालिम है यह व्यवस्था। दुनिया ऐसी होनी चाहिए, कि कमाने की कोई चिंता ही न हो। अपना मन हो वहां घूमो, अपना मन हो वह खाओ, अपना मन हो वह पियो, और अपना मन हो वहां बसो.. जब मन भर जाए, तो आगे बढ़ जाओ.. किसी कि कोई बाध्यता ही नहीं। लेकिन इसमें एक समस्या है। मान लिया जाए कि मेरा तो मन किसी के साथ रहने का है, लेकिन उसका मन किसी और के साथ रहने में है, तो यह त्रिकोण निभ नहीं पाएगा। शायद इसी कारण से पुराने ज़माने से हर कोई अपने मन पर नियंत्रण लादना चाहता है। प्रियम्वदा! लेकिन मन है, कि मानता नहीं..


अभिव्यक्ति की आज़ादी और उसकी सीमाएँ

    छोडो, आज फिर से यामाहा से मैंने आर्थिक चोट खायी है। आज फिर छह हज़ार छीन लिए उन्होंने मुझसे। दोपहर को ऐसी जाळ उठी थी मन में, कि क्या बयां करू.. कुछ लिख-विख दिया, और बुरा मान गए, तो मेरे लिए समस्या बढ़ जाएगी। यही है, प्रियम्वदा, अभिव्यक्ति की आज़ादी। आप सब कुछ बोल सकते है, लेकिन बस अगले को बुरा नहीं लगना चाहिए। वरना वह मानहानि का दावा ठोक सकता है। कितनी विचित्र बात है न प्रियम्वदा, कोई लड़ाई में अगर तलवार से नहीं जीत सकता, वह एक कलम और कागज़ के दम पर जीत जाता है। 


पैसा, UPI और अचानक आई फ़क़ीरी

    आज का शनिवार ठीकठाक रहा है। वैसे बुरा बस दो बातों का लग रहा है मुझे आज। एक तो मैं अपने मन की नहीं कर पा रहा हूँ। और दूसरा, यार पैसे ख़त्म हो गए.. आज अभी तीन ही तारीख है। पगार आयी, और चली भी गयी.. बताओ.. थोड़े दिन तो रूक जाती.. यह तो प्रियम्वदा से भी तेज़ निकली..!  मिलखासिंहजी से भी तेज़ भागी है। मैं तो  सोच रहा था, कि हरिद्वार-ऋषिकेश, या प्रयाग-वयाग मस्त अपना घूम आऊंगा। लेकिन अभी बैंक अकाउंट में झांका तो पाया, कि यह तो काण्ड हो गया.. खर्च करते करते कुछ ख्याल ही न रहा। अचानक से जैसे मैं गरीबी रेखा के भार तले दब गया। 


    यह ऊपर जो मन की करनी, और नहीं करनी वाला सब जो भी लिखा है न प्रियम्वदा, वो यहीं से आया है। जब अचानक से पता चले, कि लो, अपन तो ठन-ठन गोपाल हो गए हैं.. तो आदमी अपने मन को नियंत्रित न करें तो और क्या करे? प्रियम्वदा ! ऐसे बहुत से लोग है, जिन्होंने अपने जीवन में कभी भी, अपने शहर के बाहर की दुनिया देखी ही नहीं होगी। अरे बिच में एक मस्त बात याद आ गयी, वो पहले लिख देता हूँ.. यह पैसों वाला दुःखियापा उसके बाद लिख दूंगा। 


परिवार, हँसी और जीवन के छोटे ठहाके

    कल क्या हुआ, मैं अपने फॅमिली के साथ बाहर रेस्टोरेंट में खाना खाने गया था। मेरे माताजी थोड़े रूढ़िवादी है। उनका मानना है, भोजन घर पर ही करना चाहिए। लेकिन मैंने उन्हें भी मना लिया था। तो हम चल पड़े। बढ़िया अपना खाना-वाना निपटाकर बैठे थे। एक तो कुँवरुभा ने वहां भी अपना पुरे मन के साथ आतंक मचा दिया था। पहले बोले पिज़्ज़ा खाना है, और पिज़्ज़ा आया, तो बोले यह नहीं खाऊंगा.. तीखा है। फिर बोले केक खाऊंगा.. केक अवेलेबल नहीं थी, तो गिलास पटक दिया। आजुबाजु वाले भी हंसने लगे थे। तो खानापीना हो जाने के बाद रेस्टोरेंट में वे लोग एक गर्म पानी में नींबू की स्लाइस वाला बाउल देते है, हाथ धोने के लिए। 


    तो मैंने माताजी से कहा, "माजी ! नींबू सरबत बढ़िया आया है।" उन्होंने मेरी और घूरते हुए कहा, "अच्छा ! जरा चखकर बता तो पहले चीनी बराबर है?" मैंने मुँह तक बाउल उठाया, जैसे मैं अभी पीने वाला हूँ। तो उन्होंने कहा, "रूक क्यों गया? पी..?" मैंने बाउल वापिस टेबल पर रख दिया। तो वे बोल पड़े, "बेटमजी, हमने तुमसे ज्यादा दुनिया देखी है।" और मैं बस हँसता हुआ उन्हें देखता रह गया।


    खेर, जीवन में ऐसे कुछ लम्हे मिले तो ठहाके लगा लेने चाहिए। बाकी तो पूरा जीवन बस खर्चा संभालने में निकल जाता है। जैसे कल और आज में यही अंतर आ गया है, कि कल तक राजा था, आज फ़क़ीर.. अरे मजाक कर रहा हूँ। दरअसल मुद्दा यह है, कि आज जबसे यह UPI द्वारा ऑनलाइन पैसे भेजने वाली सहूलियत हुई है न, तब से वह पैसे कितने बचे वाली बात भी कहीं जा चुकी है। वैसे मन को मारना भी कईं बार मजबूरी बन जाता है। क्योंकि मन हमारी क्षमता के अनुसार चलने के बजाए, किसी और को देखकर तुलना करता है। उसे देख.. वह कितनी रॉयल लाइफ बीता रहा है। यह सब संतोष की कमी के कारण होता है। 


संतोष — क्षमता या अक्षमता की ओट?

    संतोषी नर सदा सुखी कहा गया है। वैसे यह भी एक अक्षमता है। अगर हम कुछ करना नहीं चाहते, या कुछ करने के लिए अक्षम है, तो वहां संतोष नामक चादर के तले अपनी अक्षमता को छिपाया जा सकता है। हाँ ! असली संतोष तो वह है, कि हमारी क्षमता है, लेकिन हम वह कर नहीं रहे। जीवनभर में ऐसी कितनी ही अक्षमताओं को हम संतोष के तमगे में छिपा लेते है। मैं खुद कईं बार अपने मन को मारकर संतोषी होने का घमंड धारण कर लेता हूँ। वैसे मैं तो आलस और अकर्मण्य होने का आडम्बर छिपाने के लिए भी संतोष का सहारा लेता हूँ। 


असंभव प्रेम, निरंतर संघर्ष और आशा की किरण

    मैं तो हूँ ही अलग प्रियम्वदा। मैंने सदैव उसी की कामना की है, जो असंभव होता है। जैसे तुम। जैसे हम। मैंने सदैव अपने निर्णयों पर, अपने द्वारा हांसिल किए परिणाम पर पश्चाताप किया है। इन सब का कारण नहीं होता, यह सब मेरे साथ घटित होता है। मैं एक संघर्ष से दूसरे संघर्ष में कुछ यूँ ही सरकता हूँ, जैसे रेतघड़ी में रेत.. गुरुत्वाकर्षण के माफिक ही, एक के बाद एक घटनाएं मुझे आकर्षित करती है। मैं लड़ता हूँ, बिना थके.. एक समस्या सुलझायी ही होती है, कि दूसरी अपना मुँह फाड़े समक्ष खड़ी पाता हूँ। फिर मैं उससे उलझता हूँ, उतने में पता चलता है, पहले वाली समस्या अभी पूरी तरह से सुलझी नहीं है। 


    बस, यह अविरत चलती श्रृंखला से मैं कभी बाहर की ओर मुँह मोड़ने की कोशिश भी करता हूँ, तो वहां सिवा मन मारने के कुछ शेष नहीं होता। जैसे पीलिये के रोगी को हरजगह पीला दीखता है। मुझे भी निराशा के सिवा और कुछ भी नहीं दिखता। प्रसंगोचित व्यवहार भी मैं भूलने लगा हूँ। कहाँ, कब, कैसे.. यह सब अक्सर मेरे मन मे घूमते है। तुम्हे पता है प्रियम्वदा, जब भी मन इस तरह निराशा से ग्रस्त होता है, मैं अपने मन को सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे ख्यालों में व्यस्त कर देता हूँ। वहां मुझे बस एक नन्ही सी किरण दिखाई पड़ती है। वह किरण शायद आशा की है.. निराशा से बाहर निकलने का एकमात्र आधार। 


प्रियम्वदा — निराशा में उजली रेखा

    प्रियम्वदा, मुझे नहीं पता है, मैं क्या सोच रहा हूँ, और क्या लिख रहा हूँ। मैं जितना तुमसे नजदीक आना चाहता हूँ, उतनी ही तुम दूर खड़ी दिखती हो। लगता है जैसे मैं तुम्हे हाथ से छू सकता हूँ। लेकिन अगले ही पल वहां घने अंधकार में मेरा हाथ भी दृश्यमान नही रहता। मैं जितना आगे बढ़ता हूँ, उतना यह अंधेरे का कोहरा मुझे निगलता जाता है। दिशाहीन होकर इस अंधेरे में भटकते हुए, जैसे जैसे उस किरण के नजदीक पहुंचता हूँ, अंधेरे का आदी उस किरण की रोशनी को झेल नहीं पाता। यूँ अपने लड़खड़ाते कदम कभी जिम्मेदारियों के भार से, तो कभी आकर्षण के आधार से कहीं तो पड़ते है। पूरब में कुछ दिखता है, पश्चिम से कुछ सुनाई पड़ता है। मैं वहां भी खींचा चला जाता हूँ, जहां कोई धुंधली परछाई दिख रही है। मैं वहां भी जाना चाहता हूँ, जहां से कोई पुकार सुनाई पड़ती है। जैसे कोई हसरत का गीत गा रहा है..


"ये ऐसी गाँठ हैं उल्फ़त की, जिसको ना कोई भी खोल सका

तुम आन बसे जब इस दिल में, दिल फिर तो कहीं ना डोल सका

ओ प्यार के सागर हम तेरी लहरों में नाव डुबो बैठे

तुम कहते हो कि ऐसे प्यार को भूल जाओ, भूल जाओ...


हम तेरे प्यार में सारा आलम खो बैठे हैं

तुम कहते हो कि ऐसे प्यार को भूल जाओ, भूल जाओ

हम तेरे प्यार में सारा आलम..."


शुभरात्रि,
०३/०१/२०२६ 

|| अस्तु ||


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