युद्ध के समय कलाकार की भूमिका : मानवता से पहले राष्ट्रवाद?
इंकसंघ की ई-सभा और एक असहज प्रश्न
प्रियम्वदा !
कला मानव में मानवता को जागृत करती है। कला मानवमन की वह भावना है, जो इस सृष्टि में मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ साबित करती है। कला के द्वारा सामाजिक बदलाव होतें है, और कला के द्वारा समाज का पतन भी। कल रात्रि इंकसंघ की इ-सभा में हर कोई चर्चा कर रहा था, कि अगर कल विश्वयुद्ध शुरू हो जाता है, तो आपका एक कलाकार के तौर पर क्या भूमिका रहेगी। मैं अक्सर इन चर्चाओं को मौन रहकर सुनता हूँ, मैं बोलता नहीं। क्योंकि शायद मैं लिखता हूँ।
वहां लगभग सारे ही नवयुवक, नवयुवतियां है। Genz.. यह पीढ़ी पहचानी जाती है, अपनी अलग सोच, अलग दृष्टिकोण और अलग प्रस्तुतीकरण के लिए। जैसे हम कहते थे, मैं फलानि चीज 'सुना' करता हूँ, पर यह Genz लोग वही चीज 'consume' करते है। खैर, सभी लोगों ने अच्छे मत दिए, अच्छे फैक्ट्स प्रस्तुत किए, और अपना मत रखा। मैं अपने वही ग्राउंड में कुछ देर टहलने के बाद बैठे हुए, सुने जा रहा था।
बहसों में सिक्के का तीसरा पहलू
मैं हमेशा ही अपना मत, अपना विचार प्रस्तुत करने से पूर्व कहता हूँ, कि सबकी अपनी सोच है, सबका अपना दृष्टिकोण है। कारण है, बहस से बचना। क्योंकि मैं जब भी कभी बहस में उतरा हूँ, मैं हमेशा दिशाहीन हो जाता हूँ। मुझे लगता है, अगले का भी तर्क भी बिलकुल ही नकारने योग्य नहीं है। और बस, हो गया काम। फिर मेरे तर्क कमजोर होते जाते है, और मैं मुँह की खा लेता हूँ।
किसी भी चीज का जब क्षेत्रफल निकालना होता है, तो उसकी लम्बाई, ऊंचाई और चौड़ाई नापनी पड़ती है। अक्सर वाद-विवाद, तर्क-वितर्क में कोई भी मुद्दे के दो पहलु ही चर्चा के केंद्र रहते है। जैसे हर कोई सिक्के के दो पहलु ही देखता है, सिक्का उछाला जाता है, तो या तो चित अनुमानित किया जाता है, या पट। सिक्के का अपना तीसरा पहलु भी होता है, सिक्के की मोटाई।
युद्ध की स्थिति में कलाकार का प्रथम दायित्व
मुद्दे पर लौटता हूँ, अपना तीसरा पहलु लेकर.. क्योंकि कल जब वे लोग इस मुद्दे पर चर्चा कर रहे थे, तो सारे ही शांतिदूत बनकर, मानवता बचाने को आतुर दीखते थे। लगभग सभी का तात्पर्य यही था, कि कला के सहारे से युद्ध को रुकवा दिया जाए, या मानवता की दुहाई देकर टाल दिया जाए। पर मैं सोचता हूँ, अगर युद्ध की स्थिति बनती है, तो प्रत्येक कलाकार का प्रथम दायित्व होना चाहिए राष्ट्रवाद की स्थापना करना।
इतिहास में कवि और युद्धभूमि का संबंध
यह भूमि है, तो मैं हूँ। मैं हूँ, तो समाज है। और समाज है, तब मानवता भी होगी। तो पहला पायदान भूमि है, भूमि न होगी, तो मेरा अस्तित्व कहाँ? युद्ध में सबसे पहली हानि भूमि की होती है। कवि को राष्ट्रभक्ति के लिखने होंगे, लेखकों को इतिहास से उदहारण देते हुए सोई चेतना को जगाना होगा, चित्रकारों को अपने रंगों से लाल लहू को पवित्र दिखाना होगा। जो बहेगा, बहता है, और बहता रहेगा, इस मातृभूमि की रक्षा के हेतु। भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में कवियों ने राष्ट्र भावना को जागृत करते गीत लिखे ही थे..!
रा' दियास, बिजल और भूमि के प्रति निष्ठा
कवि की बात आयी है, तो याद आती है इतिहास की कुछ कहानिया। आठवीं-नवीं शताब्दी में चौलुक्य और चुडासमाओं के बहुत युद्ध हुए है। उन युद्धों में कवि भी सम्मिलित होतें थे। वे युद्ध भूमि में वीररस का संचार करते थे। और जब जरुरत पड़े तब वे ही संधिविग्रहिक का भी कार्य सँभालते थे। चौलुक्यों की राजधानी पाटण थी, चुडासमा वंश में राजा थे रा' दियास। जब चौलुक्य दुर्लभसेन ने उपरकोट पर चढ़ाई की थी, और उपरकोट दुर्ग पर विजयपताका लहराना मुश्किल हुआ, तब उनके द्वारा बिजल नामक कवि को भेजा गया, जो बहुत अच्छी जंतर (बीन) बजाता था। कवियों को युद्ध काल में भी दुश्मन डेरे में जाने की अनुमति होती थी। संक्षेप में कहूं तो, कवि ने बिन बजाया। रा' डियास अति प्रसन्न हुए, कुछ भी मांग लेने को कहा। कवि ने रा' दियास का मस्तक मांग लिया। रा'दियास ने अपनी तलवार से मस्तक उतारकर दे दिया। कवि शत्रु का मस्तक लेकर राजाज्ञा निभाकर अपने खेमे में दुर्लभसेन के पास लौट आया। दुर्लभसेन प्रसन्न हुए, और उन्होंने भी कुछ मांग लेने को कहा, तब कवि ने कहा, "रा'दियास से ज्यादा आप क्या ही दे पाएंगे?".. कहानी तो और आगे भी है। इस ऐतिहासिक प्रसंग को मशहूर सिंधी कलमकार शाह अब्दुल लतीफ़ भित्ति ने अपने ग्रन्थ 'शाह जो रिसालो' में भी सिंधी बोली में लिखा था। खैर, मैं इस कहानी के द्वारा यह स्थापित करना चाहता हूँ, कि कवि ने प्राथमिकता दी थी अपनी भूमि को। उसने अपने राज्य के हितों का पहले संरक्षण किया। फिर शत्रु को भी उतना ही सम्मान दिया।
कृष्ण, महाभारत और अपक्ष रहने का प्रश्न
कलाकार पहले अपने हितों की रक्षा करेगा, अपने देश, अपने समाज, अपनी भूमि की। फिर वह मानवता के बारे में सोचेगा। यही उसका दायित्व है। कुरुक्षेत्र में कृष्ण भी अपक्ष नहीं रहे थे। जबकि वे सबसे बड़े कलाकार माने जातें है। चौसठ कलाओं में सिद्धहस्त थे वे। मानवता तो शत्रु पक्ष में कम कहाँ थी? पर मानवता, शांति के लिए सर्वप्रथम युद्ध को स्वीकारा, और संहार, लाशें, रक्तप्रवाह होने दिया था।
क्या युद्ध वास्तव में टाले जा सकते हैं?
युद्ध भला कौन टाल पाया है? स्वयं कृष्ण, राम, परशुराम ने भी महायुद्ध खेले है। युद्ध, युद्ध का परिणाम, और युद्ध में हमारा योगदान, यह हमें तय करना अनिवार्य है। हम इससे पीछे हठ नहीं कर सकते। कलाप्रेमी हो, पशुप्रेमी हो, या दया का सागर भी कोई क्यों न हो? युद्ध एक अकाट्य घटना है। प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सभी के हिस्से आता ही है। इस घटना में मानवता का उपयोग किया जाता है, संरक्षण नहीं। मानवता को बन्दिया मजदूर दिखाकर कलाकार अपनी कला के द्वारा अपने राष्ट्रवाद को प्रखर कर सकता है। और उसे वही करना चाहिए।
फिर बात आती है, मूल्यों के संरक्षण की। नैतिक मूल्य, या फिर से एक बार मानवता ही कहकर सम्बोधित करूँ। जब यह युद्ध मेरा नहीं है, लेकिन मुझ पर थोपा गया है, शत्रु के द्वारा। तो मैं हाय.. मानवता, हाय.. मानवता कहते बैठ नहीं सकता। शत्रु के आगे नतमस्तक होने से वह दया नहीं दिखाता। वह तो चाहेगा, न हो बांस, न बजे बांसुरी। ठीक है, यह बात भी सही है, कि कलाकार को किसी भी महासमर के पश्चात पुनः स्थापना के लिए अपनी कला का योग्य उपयोग करना चाहिए, लेकिन शुरुआत से शांति की कामना लिए कलाकार क्या वीरता, धीरता, जैसे मूल्यों को पुनः स्थापित कर पाएगा?
लोग जब इस मुद्दे पर चर्चा करते है, तो बहुत सारी पूर्व लिखित थियरी की शैली में बात करते है। फलां वह कहकर गया है, फलां वह बताता था। जब हम बहुत सारी संभावनाओं को एक साथ किसी एक विषय के साथ जोड़कर देखते है, तो निर्णय करना बहुत मुश्किल हो जाता है। क्योंकि वहां उपस्थित प्रत्येक सम्भावना किसी न किसी को आहात कर रही होती है। चैस खेलते हुए मन कईं बार हाथी को बचाने के लिए घोड़े की बलि दे देना स्वीकारता है। लेकिन फिर घोड़े के लिए के पश्चाताप भी होता है। हम लाख चाहे थियरी पढ़कर उसे संभावित घटना में सम्मिलित कर ले, वास्तविकता नहीं बदलेगी। कलाकार को रक्षा की जिम्मेदारी लेनी ही होती है।
कलाकार समाज का आईना है — या यह भी एक भ्रम?
एक बात यह भी तो कही तो जाती रही है, कि 'कलाकार समाज का आइना है।' सरासर झूठ है। कलाकार भी बिकता है। बस उसे एक मूल्य चाहिए। कला बिकती है, कलाकार बिकता है। कलाकार का भी अपना पेट है भाई। उसे भी भूख लगती है। भोजन की, मान-सम्मान की, रुपयों की, सामाजिक कद्द की। और यह भी तो किसी कलाकार ने ही कहा होगा, "भूखे पेट भजन न होए.." तो बस, लगाओ दाम, खरीदो कला को, कलाकार को। क्षुधा का मूल्य चुकाओ, और करो इस्तेमाल कला का अपना उल्लू सीधा करने में।
क्या युद्ध से मानवता समाप्त होती है या निखरती है?
अरे कलाकारों, मानवता की दुहाई मत दो। शांति शांति मत पुकारो। हमारे ही देश के शांति के साधनारत लोग एक तर्क देते हैं, पाकिस्तान से क्यों घृणा करें? जबकि आम पाकिस्तानी बुरा नहीं है।' इस वाक्य का आधार क्या है पता है? एक विश्वास। जबकि विश्वास बार बार टूटता रहता है। उनका दृढ विश्वास होगा अपनी व्यवस्था में तभी तो आज भी हमारे लिए रस्ते का रोड़ा है वो.. छोडो.. शांति शांति शांति हमें तभी करनी चाहिए, जब हम शांति की स्थापना करने को सक्षम हो। अशोक ने भी शांति का पथ कलिंग के बाद लिया था। और उसने हर जगह लिखवाया था, कि मैंने किस तरह शांति को स्थापित किया है। तो हे कलाकारों, युद्ध से घृणा मत करो, युद्ध होने दो। युद्ध से मानवता नहीं मरती। युद्ध से मानवता निखरती है। पहले से नई और ज्यादा सधी हुई, सक्षम मानवता।
शुभरात्रि।
०८/०६/२०२६
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