अगर : उम्मीद और भ्रम के बीच का शब्द
प्रिय अगर..
आशा करता हूँ, तुम अभी किसी को इतना ऊंचा उड़ा रहे होंगे, जहाँ से वह वापिस लौटेगा तो निराश ही होगा। क्योंकि तुम अपनी काबिलियत से लोगों को बरगलाते हो। तुम एक ही समय पर भविष्य की आशा देते हो, तो दूसरे ही क्षण अतीत के दर्पण-भूलभुलैया (mirror maze) में भटका देते हो।
जब अगर सपनों को पंख देता है
वैसे दम तो है तुम में, क्योंकि लोग तुम्हारे भरोसे कुछ भी कर गुज़रते है। 'अगर मैं महेनत करूँगा तो जरूर सफल होऊंगा।' या फिर 'मैं अगर सही निर्णय लूंगा, तो जीवन बेहतर बना सकूंगा..' मतलब, हर बड़ी उपलब्धि तुम से ही शुरू होती है। तुम्हारे बिना कोई साहस न करेगा। तुम शायद एक तस्वीर दिखाते हो, धुंधली तस्वीर.. जिसमे विकल्प का अनुसरण करने से उपजता परिणाम दीखता है, और किसी एक निर्णय को बल मिलता है।
पर तुम उतने भी काबिल-ए-दाद नहीं। तुम कईं बार फ़ालतू में दिमाग को दौड़ा देते हो। 'अगर मैं उड़ सकता..' है कोई तुक इस बात का? लेकिन नहीं, फिर भी लोग आँख बंद करके उड़ते है, गिरिश्रृंगों से ऊँचे, वनों से परे, बादलों के साथ.. पृथ्वी को एक छोटा सा गोला सोचते हुए। और यह कल्पना सृष्टि वहां रूकती नही.. जब मुफ्त में ही उड़ना है, और कोई शारीरिक ऊर्जा भी खर्च नहीं हो रही होती है, तो आदमी उड़ता है, ब्रह्माण्ड से भी ऊँचे.. उसे कौन रोकेगा?
पछतावे वाला अगर सबसे भारी होता है
अगर मैं भविष्य में जा सकता.. इस वाले अगर के साथ तो आदमी सबसे पहले अपना मृत्यु, और उसके कारण तक ही पहुंचेगा। न जाने क्यों, इस वास्तविकता को आदमी स्वीकारना ही नहीं चाहता है, कि कहीं से भी कभी भी आ सकती है। खैर, एक और अगर होगा है.. पछतावे का अगर..! इस पछतावे वाले अगर के पंख लगाकर आदमी निराशा की गर्त को गले लगाता है। 'अगर मैंने पढ़ लिया होता..' यह वाला अगर तो मैं भी पालता हूँ, जब किसी का पांच आंकड़ों वाला महीना सुनता हूँ। अगर मैंने उस दिन वह प्लाट खरीद लिया होता तो चार लाख सस्ता पड़ता था.. यह पछतावे वाला अगर जो है न, वह या तो पैसे से जुड़ा रहता है, या फिर किसी प्रेम के चोंचले से। अगर वह मुझे छोड़ न जाती/जाता।
समाज और राजनीति का अगर
इन सब के बाद आदमी रहता तो किसी समाज और देश में ही है.. तो तुम लपकते हो उस सन्दर्भ में, कि अगर सारे लोग ईमानदार होते.. या फिर कैसा होता अगर भ्रष्टाचार ही न होता। मैं तो सोचता हूँ, वे राजनेता कैसे जीवनयापन करते? नेता बेचारे होते, और इस नेतागिरी के धंधे को गृह उद्योग या लघु उद्योग की श्रेणी में रखा जाता। क्योंकि फिर रेंजरोवर जनता के पास होती, और नेता जी ढीली चैन वाली सायकल से मूवमेंट करते।
अगर और प्रयास का गठबंधन
हाँ ! एक तरह से तुम उम्मीद हो। बेहतर भविष्य बनाने की उम्मीद। तुम्हारी दी हुई कल्पनाओं से ही किसी ने विमान बनाया होगा। तुम्हारी दी हुई उम्मीद से ही किसी ने इंजन बनाया होगा। सिर्फ तुम्हे पालने से कहाँ काम चलता है, तुम्हारे साथ अगर प्रयास का गठबंधन हो जाए, तो अविष्कार जन्म लेगा ही। सपना देखने के लिए कईं बार आँखे बंद नहीं करनी पड़ती। वे खुली आँखों से भी दीखते है, तुम दिखाते हो वे स्वप्न। जिन्हे वास्तविक बनाने के लिए परिश्रम से मैत्री करनी पड़ती है।
मेरे सपने अब भी अगर के पास गिरवी हैं
मैं अपनी बात करूँ, तो मेरे तो बहुत सारे स्वप्न तुम्हारे पास गिरवी पड़े है। मैं थोड़ा सा आलसी हूँ न.. इस लिए। मुझे पसंद है तुम्हे अपनी पीठ पर लादकर उड़ते रहना। फिर कभी कभी तुम मेरी पीठ से उतरते हो, तो वे स्वप्नों की झांकी याद आती है, पर बस थोड़ी ही देर के लिए। उतनी कम देर में तो कोई प्रेरणा मुझे खोजे, उससे पहले मैं तुम्हारे साथ किसी नए पन्ने पर पहुँच जाता हूँ।
चलो फिर, नए पन्ने पर चलो..
शुभरात्रि,
०१/०६/२०२६
|| अस्तु ||
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