बहस, सत्य और आंदोलन : लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना
रविवार आखिर बहस का दिन क्यों बन जाता है?
प्रियम्वदा !
रविवार आलस के साथ एक और चीज ले आता है। बहस का मौका। क्या है कि दोपहर बाद कुछ काम तो होता नहीं है, तो खाली आदमी बहस ही कर सकता है। समाचारों में पक्ष-विपक्ष के लोग बहस करते है। सोसायटियों में कुर्सी डालकर निवृत बूढ़े बहस करते है। अँधेरा होने से पूर्व चिड़ियाएं बहस करती है। दारू के साथ चकना क्या होगा इस बात से लेकर, अमेरिका को अब रुक जाना चाहिए, यह बात भी बहस का मुद्दा हो सकती है। इंटरनेट पर दो अवसरवादी लोग बहस करते है, और मुझ जैसे इन बहसों पर बहस कर लेते है।
ढलती शाम से सिर्फ अँधेरे के घनत्व में वृद्धि होती है, क्योंकि एक सप्ताह से तो बादलों ने सूर्यप्रकाश को स्थायी होने का अवसर ही कहाँ दिया है? वर्षा की आशा में अतृप्त धरती के निःश्वास सी भांप भी बादलों को कारण नहीं दे पाती है बरसने का। या फिर सुपर अलनीनो आड़े उतरता है, ग्रहण का केतु बनकर। जो भी हो, बादल का काम है बरसना, लेकिन उसे भी शायद जनता की तरह कोई शिकायत होगी, और वह भी हड़ताल पर बैठा होगा। ऋतु की ३ प्रतिशत से भी कम हुई बारिश से शायद उनके आंदोलन को कोई गंभीरता से लेगा।
आंदोलन और लोकतंत्र का रिश्ता
यही सब रूपकों को जोड़-तोड़ कर कुछ लिखने का प्रयास कर रहा था, तभी रुगे ने बिच में टोकते कहा, "अरे पत्ता आ रहा है क्या उड़ता हुआ?" रघुरायमल उर्फ़ रुगा, हमारी तिकड़ी लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है। अतः आज हम तिकड़ी नहीं, चौकड़ी है। रुगा एक महान व्यक्तित्व है, पर अभिव्यक्ति में थोड़ा कच्चा है। उसकी अपनी अप्रकाशित एवं अलिखित जेल-डायरी भी है। कभी कभार उसके अजीबोगरीब विचार हमारी तिकड़ी को उससे दूर करवा लेते है। वह सामान्य से उच्चतम श्रेणी के धूम्र का शौक़ीन भी है। एक दिन धूम्र का सेवन करके उसने विचार किया, एक कलर प्रिंटर यदि फोटो की प्रिंट निकाल सकता है, तो रुपियों के भी प्रिंट निकलते होंगे? और जैसे ही उसने यह विचार प्रकट किया, मैं, गजा और पत्ता नीची मुंडी करके उस सभा को वही बर्खाश्त करके भाग निकले थे।
पत्ते ने आकर रुगे के बाजू में स्थान लिया। "ले गजा भी आ गया।"
रुगा : "तुम जैसे परप्रांतीय आ सकते है, तो गजा तो आएगा ही।"
पत्ता रुगे की ओर तीखा दृष्टिपात कर बोला, "तू बंद था वही ठीक था, प्रशासन भूलचूक जैसे को उठा लेता है, और तुझ जैसे को कैसे खुला छोड़ देता है?"
मैं : "अरे धीरे भाइयों, प्रशासन सब सुनता है।"
गजा अपनी कड़वी जुबान लहलहाते बोला, "ख़बरदार अगर किसी ने युगपुरुष को कुछ कहा भी है तो।"
पत्ता : "तेरी ही कमी थी, आ जा प्रशासन के चाटुकार।"
मैं : "तुम लोगों में कुछ संस्कार-वनस्कार है या बेच खाये? कैसी भाषा हो चली है तुम लोगों की।"
पत्ता : "हाँ ! भाषा तो बिगड़ैल है ही। और तुम्ही लोगों ने तो ठेका ले रखा है भाषा का।"
मैं : "अरे ! मैंने क्या किया? मैंने कब तुझसे कह दिया, कि गुजरात में रहना है तो गुजराती बोलना पड़ेगा। उल्टा मैं ही अपने महापुरुष की तरह हिन्दीभाषी हो चला हूँ।"
गजा ने मेरी और विषबाण फेंकते कहा : "जो खुद की भाषा का न हुआ, वह इस भूमि का क्या होगा?"
रुगा : "वो 'भूलचूक' को भूख हड़ताल नहीं करनी चाहिए थी।"
पत्ता : "इसकी आदत कभी नहीं बदलेगी, चलती बात में और ही मुद्दा घसीटने की।"
गजा : "लो, कह भी कौन रहा है? जिसे खुद मृग और मुर्ग में भेद करना नहीं आता, वह भाषा और चलती बात की बात करता है। खैर मना पत्ते, वरना ऐसी फूंक मारूंगा की सूख जाएगा।"
मैं : "तेरे पास कोई आईडिया है तो बता, अपन भूलचूक को बताएंगे।"
पत्ता : "मैं तो कहता हूँ हमें भी जंतर-मंतर चलना चाहिए। कोई भी सरकार इस तरह तानाशाही नहीं चला सकती। लोकतंत्र जब हमें हटाकर खुद बैठा था, तब उसका प्रमुख मुद्दा तो राजशाही को तानाशाही साबित करना ही था, आज सरकार खुद भी तानाशाही करेगी?"
गजा : "हाँ! तेरे जाने से सरकार तुरंत हरकत में आ जाएगी। आखिरकार पत्ते में भी वजन तो होता ही है। चलो सरकार के अलावा कोई तो अपने आप को मजबूत समझता है।"
रुगा : "सत्य क्या है?"
मैं : "भाई रुगा, आंदोलन से सत्य पर कहाँ आ पहुंचा तू?"
रुगा : "सत्य हर जगह होता है। जंतर-मंतर के उस आंदोलन में होता अगर, तो उन्हें विशाल जनसमर्थन क्यों नहीं मिल पा रहा?"
पत्ता : "क्योंकि तुम जैसे अंधभक्तों को यह बात ही समझ नहीं आ रही है। वो चिपके फॉरेन रिटर्न है। अपने से भिन्न जलवायु का है, फिर भी आंदोलन कर रहा है।"
गजा : "अच्छा, मतलब अब आंदोलनकारी भी बाहर से आएँगे। डूब मरना चाहिए तुम्हे, अगर तुम्हे लगता है कि वह बाहर से आया है, इस लिए उसका समर्थन करना चाहिए तो।"
पत्ता : "अबे वो देश की भलाई के लिए आंदोलन कर रहा है।"
गजा : "चुनाव लड़ना चाहिए भलाई करनी है तो।"
मैं : "रुको रुको रुको। क्या मतलब चुनाव लड़ना चाहिए। अगर मेरे सामने कोई हलवाई लड्डू में खसखस नहीं डाल रहा है, तो क्या मैं खुद हलवाई की जगह बैठकर लड्डू बनाऊं?"
पत्ता : "अब आया न भाई मेरे पक्ष में।"
गजा : "रुक जा पत्ते, वो तो अपनी मातृभाषा का नहीं हुआ है, तेरे पक्ष में क्या होगा। और रही बात लड्डू और हलवाई की, तो सीधी बात तो यही है, कि लड्डू अगर अभी खाना है, तो बिना खसखस का ही खाना पड़ेगा। तुम उसकी दुकान पर गए ही क्यों अगर तुम्हे खसखस वाला खाना था।"
मैं : "क्योंकि इसने वादा किया था, कि यह सारी मिठाइयां बढ़िया बनाएगा।"
गजा : "हाँ ! तो बाकी मिठाइयां क्या बुरी बनायीं है?"
मैं : "अरे, इसका मतलब यह थोड़ी होता है, कि मैं लड्डू को नज़रअंदाज़ कर दूँ? लोकतंत्र है यार, मेरा सींग, मेरी मर्ज़ी, मैं जिधर भिड़ाऊं।"
पत्ता : "तभी तो कहता हूँ, चलो दिल्ली, चिपके ने बढ़िया बंदोबस्त कर रखा है। तीन टाइम लोग बढ़िया खाना खाते है। बाकी नाच-गाना चलता है।"
गजा : "अच्छा, अब समझा। इसको अनारकलियों में रस है, चिपके में नहीं।"
मैं : "तभी मैं सोचु, यह क्यों बार-बार चलो दिल्ली, चलो दिल्ली की रट लिए बैठा है।"
रुगा : "तुम लोगों को पता है, सत्य एक ऐसी चीज है, जो समय समय पर विकसित होता है, और उसकी परछाई झूठ कहलाती है।"
पत्ता : "गाडी दिल्ली पहुंचे उससे पहले ही यह रुगा मोड़ लेता है। क्या है? क्या कब से सत्य सत्य सत्य लगा रखा है। देश में इतना बड़ा असत्य हुआ है, लोगो के पेपर लीक हो गए है। और तू कब से सत्य क्या है, क्यों है कि पटरी पर जा चढ़ा है। टाइम क्या हुआ है वैसे?"
गजा : "कौनसा टाइम पता करना है? भारत का, चीन का, अमरीका का, रूस का? या पृथ्वी का? या ब्रह्माण्ड का? हर जगह अभी कुछ और ही समय चल रहा है। समय कोई स्थिर चीज थोड़े है? सोच अगर मनुष्य ही न होता पृथ्वी पर, तो क्या समय होता? समय हमने ही बनाया है, घटनाचक्र को एक स्थायी कड़ी में बाँधने के लिए। स्थायी क्या है? सिर्फ अँधेरा। उस अँधेरे को थोड़ी देर के लिए छांटकर सूर्यप्रकाश हमें मिलता है, हम उसी को केंद्र मानकर क्षण, पल, घड़ी, प्रहर, दिवस, सप्ताह, मास, वर्ष वगैरह नापते है। अगर हमने समय न बनाया होता, तो यह तय कर पाना मुश्किल हो जाता, कि डायनोसोर इस पृथ्वी पर कब थे?"
मैं : "ऐ तुम लोग दिल्ली से डायनोसोर तक कैसे पहुँच गए? और बाबा गजानंद जी, कृपया अपनी वाणी को जरा सी समेट लो, आठ बजने वाले है पत्ता।"
पत्ता : "ठीक है ना, ज्ञान की बातें भी होनी चाहिए। पर सोचने वाली बात है, चिपके अगर सच्चा निकला तो? महापुरुष झूठा?"
गजा : "अपनी जुबान को लगाम दे पत्ते, महापुरुष कभी गलत नहीं हो सकते। उन्होंने इस देश की उन्नति के लिए जितने योगदान दिए है, आज से पूर्व किसी ने भी इतना नहीं किया है। तुम इस देश के नागरिक हो, तुमने क्या किया है इस देश के लिए?"
रुगा : "सिंह का आतंक बढ़ गया है न?"
मैं : "हाँ ! इस बात पर बहस होनी चाहिए। पिछले पंद्रह दिनों में सिंहों ने अपनी सीमा से बाहर आकर दो मानव पर हमला कर दिया। जिसमे एक तो बच्चा था।"
पत्ता : "सिंह है वह। जंगल का राजा। और राजा तो तानाशाह होता है न?"
गजा : "कितने स्वार्थी हो तुम लोग। कल तक तुम लोग दूसरों के सामने रुआब जाड़ते थे, कि हमारे यहाँ सिंह है। और आज सिंह ने थोड़ी सी हाथापाई क्या कर ली, तुमने अपना रंग बदल लिया। पहले वाले आदमी को सिंह ने मारा नहीं था। बस उसे कुछ देर पकड़ कर बैठा रहा था। सिंह चाहता तो नाश्ता कर लेता। लेकिन उसने बक्श दिया। दूसरी घटना में सिंह की कोई गलती नहीं है। गिरनार पर्वत में वह सिंह का रास्ता है। और सवेरे सवेरे सिंह वहां से गुजरते ही है। यह एक अकस्मात् मात्र है। इतने वर्षों में कितनी बार ऐसी घटनाएं हुई? सिंह बहुत ही गर्वीला पशु है। एक ही रस्ते पर जब सिंह और मानव आमने-सामने आ जाते है, तो सिंह खुद एकतरफ होकर मानव को जाने का रास्ता दे देता है। लेकिन इतनी समझ तुम्हे भी तो होनी चाहिए कि कब तुम्हे उसके लिए रास्ता छोड़ना है। तुम उसके रस्ते पर अपनी यात्रा करोगे, तो वह अपने क्षेत्र में तुम्हारा अतिक्रमण मानेगा और हमला कर देगा।"
मैं : "ओ विषवाहक ! ठहर जा। यह सीधी सीधी प्रशासन की चूक है। प्रशासन को, वन-विभाग को वहां सजग रहना चाहिए था। तीर्थ से यदि प्रशासन आय करता है, तो सुरक्षा की जिम्मेदारी भी प्रशासन की होती है।"
गजा : "तो क्या सरकार अब देश चलाने के बजाए तुम्हारी चौकीदारी करें?"
पत्ता : "हाँ ! यूँ तो सदी के महापुरुष चौकीदार का तमगा लेने से चूकते नहीं, फिर यहाँ क्या हुआ?"
रुगा : "एक बात बताओ, अगर मैं कहूं, कि मैं सच्चा, बाकी सब झूठे, और मेरी बात कोई टाल नहीं सकता है, तो क्या वाकई सब झूठे हो जाएंगे?"
गजा : "ऐसे तो तू नीम का नाम गुलाबजामुन रख देगा।"
पत्ता : "पर बात सोचने वाली है, अगर दो लोगों ने आधे भरे गिलास को आधा भरा हुआ, और आधा खाली कहा है, तो दोनों ही सच्चे है। और दोनों ही झूठे भी। क्योंकि आधा गिलास भरा या खाली कहने से आधा खाली और भरा वाली दोनों संभावनाएं उठ खड़ी होती है। तो बात तो यह भी है, कि सत्य सम्पूर्ण नहीं है।"
गजा : "अच्छा एक बात बता, अगर कोई झूठ बोल रहा है, तुम जानते हो कि वह झूठ बोल रहा है, लेकिन तुम साबित नहीं कर पाते हो कि वह झूठ है, तो क्या वह सच हो जाएगा? दलीलें, नैतिकता और परिस्थिति के अनुसार सत्य ऊपर-निचे जरूर होता है, लेकिन सत्य तक पहुँच गया है, उसने तो जान ही लिया है कि सत्य क्या है। मैंने अगर कह दिया कि 'फलाने के साथ ऐसा हुआ था', तो सत्य है। लेकिन तुम उसमे अपनी और से बात जोड़कर कहोगे कि 'फलाने के साथ इस तरह ऐसा हुआ था' तब भी वहां सत्य तो था, बस विकसित हो गया वह।"
मैं : "अच्छा, मतलब अब सत्य भी प्रेम की तरह बहरूपिया है।"
पत्ता : "प्रेम को क्यों घुसाया इधर?"
गजा : "रुक जा, चिपके को घुसाते है। देख, चिपके को एक दिन किसी ने झापड़ मारा। रूगा वहां मौजूद था.."
रुगा : "मैं नहीं था वहां। मैंने तो व्हाट्सप्प पर देखा था।"
गजा : "अरे उदहारण के लिए कह रहा हूँ, कि रुगा वहां मौजूद था, लेकिन रुगे ने हमसे आकर कहा कि किसी ने चिपके को ढोल की तरह पीटा। तो अब बता, रुगा सत्य बोल रहा है या नहीं?"
पत्ता : "अरे पर चिपके पर तो शाही फेंकी गयी थी।"
गजा : "चलो उदहारण बदल लेते है। मान लो कि अपना यह पत्ता, किसी लड़की के साथ भाग गया। ऐसी खबरें उडी। और हकीकत में पत्ता तो किसी मेरेथॉन में भाग रहा था। तो यहाँ सत्य कितने अलग अलग तरीके से प्रस्तुत हो सकता है? पत्ता लड़की के साथ भागा। पत्ता लड़की के पीछे पड़ा था। लड़की पत्ते को दौड़ा रही थी। पत्ता और लड़की साथ साथ दौड़ रहे थे.."
पत्ता : "बस कर बे चतुरसेन के चचेरे भाई, क्यों मेरी आबरू ले रहा।"
गजा : "आबरू का भी सत्य का पालन करने में एक महत्वपूर्ण योगदान रहा है। लोग सत्य को नापतोल कर किसी की आबरू करते है।"
मैं : "आबरू का क्या है? पैसे कमाओं, दुनिया होलसेल में इज्जत करेगी।"
रुगा : "मैं क्या सोच रहा था, कि गिर के सिंहों को गांधीनगर में बाँध देते है। वैसे भी वो गांधीनगर वाले काम क्या करते हैं?"
गजा : "यूँ तो तू भी दिनभर क्या करता है हमें नहीं पता, तो एकाध सिंह तेरे घर के बाहर भी बाँध दें?"
रुगा : "चलो दिल्ली ले चलते है सिंहो को। जंतर मंतर पर छोड़ देंगे। वे भी आंदोलन में हिस्सा लेंगे।"
पत्ता : "वो क्यों हिस्सा लेंगे?"
रुगा : "आंदोलन वाले क्या मांग रहे हैं?"
पत्ता : "परधानजी का इस्तीफा।"
रुगा : "क्यों?"
पत्ता : "क्योंकि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था कमजोर है।"
रुगा : "हाँ ! शिक्षा व्यवस्था कमजोर तो है ही। वरना कोई सवेरे चार बजे सिंह के गुजरने के मार्ग पर से गिरनार क्यों चढ़ेगा?"
गजा : "अब तू इधर की उधर कर रहा है।"
रुगा : "इधर की उधर से याद आया, एक बिज़नेस आईडिया है मेरे पास.."
मैं : "अरे तुम लोगों को नहीं लगता है कि यह सरकार बहरी है।"
गजा : "फिर सरकार? सरकार सबसे बढ़िया है।"
मैं : "नहीं, कम से कम शिक्षा विभाग के किसी अधिकारी को आकर भूलचूक की बातें सुन लेनी चाहिए थी कम से कम। इतने दिनों से उसे भूखा, और अनसुना रखा हुआ है।"
गजा : "सरकार बहुत सहनशील है, जो ऐसे उत्पाती आंदोलनकारियों को शालीनता से सुन रही है।"
मैं : "तो तुम्हारे हिसाब से तो इस देश में आंदोलन के लिए भी अनुमति नहीं होनी चाहिए?"
पत्ता : "मुझे भी लगता है नहीं होनी चाहिए। जब अठारहसौ करोड़ रूपये सिर्फ एक पक्ष ने चुनाव में खर्च दिए है, इसका सीधा अर्थ यही है कि उसने लोकतंत्र को खरीद लिया है। तो अब उसकी मर्जी वह चाहे जो करे। अठारहसौ करोड़ रूपये डायरेक्ट बेनिफिट की तरह वोटरों को मिले होंगे न? अब यह मत कहना वोट खरीदे नहीं जाते।"
मैं : "यह कैसा लोकतंत्र है? अठारहसौ करोड़ खर्च किए जाते है सिर्फ चुनाव में।"
गजा : "जिसके पास जितना सामर्थ्य होगा, उतना खरचेगा युद्ध करने के लिए। राजशाही में भी तो एक राजा दूसरे पर विजय पाने के लिए पैसा खर्चता था। तो बस यूँही समझ लो, हर पांच साल में लोकशाही का राजा एक युद्ध लड़ता है।"
मैं : "मुझे लगता है, इस बात को यहीं बंद कर देनी चाहिए।"
रुगा : "हाँ ! और नहीं तो क्या, न तो तुम लोगों ने आंदोलन के बारे में कुछ कहा, न ही सत्य की शोध की। न ही कोई उपाय-उपचार बताया। निरर्थक चर्चा इसे ही कहते है।"
|| अस्तु ||
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