धरना, भूख हड़ताल और आंदोलन : क्या विरोध का यही सबसे प्रभावी तरीका है?
धरने पर बैठे लोग आखिर चाहते क्या हैं?
प्रियम्वदा !
धरने पर बैठे लोग क्या चाहते है, मुझे तो यही नहीं समझ आ रहा है। कोई भूख हड़ताल पर बैठा है, कोई नाच रहा है, कोई गा रहा है। कोई भाषणबाजी कर रहा है। अब मुझे लग रहा है, यह लोग सच में तिलचट्टों वाली हरकत पर उतर आए है। तिलचट्टे सर्वाहारी होते है। वे कुछ भी खा सकते है। और देखकर लगता है, फ़िलहाल वे लोग सारी की सारी सरकार खा जाना चाहते है। मान लेते है धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दे दे, तो क्या हो जाएगा? अगला पेपर लीक नहीं होगा इस बात की क्या गेरंटी है? क्या यह बात साबित हो गयी की वह पेपर धर्मेंद्र प्रधान ने ही लीक किया था?
भूख हड़ताल या सामाजिक सेवा?
लोग बातें कर रहे है, सोनम वांगचुक, सोनम वांगचुक कर रहे है। प्रियम्वदा ! लोगों के पास समय नहीं है। कौन है जो धरने के लिए समय निकालेगा? मैं खुद सोचता हूँ, कि कुछ खाली समय मिले तो मैं अपने मनोरंजन का कुछ करूँ, या फिर कुछ ऐसा करूँ जिससे मेरी अधिक उन्नति हो, या कुछ ऐसा जिससे और पैसा कमा लूँ। मैं नहीं जानता हूँ, कि उस धरने में कितने लोग है। पर मैं इतना जानता हूँ, कि उस धरने के द्वारा वे लोग कोई भी ऐसा कार्य तो नहीं ही कर रहे है, जिससे जनकल्याण हो रहा हो, या देश का विकास हो रहा हो।
तुम्हे धरना देना है, तो भूख हड़ताल के बजाए कोई एक शहर में स्वच्छता अभियान चलाओ। शहर को ऐसा चमकाओ, कि नगर पालिका को अपने अस्तित्व पर जोखिम लगे। तुम्हे धरना देना है, तो एक दिन किसी महानगर के ट्रैफिक को सम्भालो। जितने लोग आंदोलन के नाम पर अकर्मण्य होकर बैठे है, वे चाहते तो पूरी यमुना साफ़ कर देते। वे चाहते तो रोड में बने गढ्ढों को भरकर साबित कर देते कि वे देश की भलाई चाहते है।
गांधी जी के समय का आंदोलन और आज का आंदोलन
मो. क. गाँधी ने सिखाया था, सविनय अवज्ञा का पालन करना। तब भारत अंग्रेजो का गुलाम था। विरोध प्रदर्शन और हड़ताल करने से उस समय जो भी नुकसान होता, वह अंग्रेजो का होता। अंग्रेज सतत भारत को लूट रहे थे। उन दिनों विरोध के नाम पर काम बंद कर देने से अंग्रेजो का नुकसान होता था। आज विरोध तथा आंदोलन के नाम पर जो नुकसान होता है, वह भारत का होता है। भारत की प्रगति के लिए यह स्पीड बम्प्स का काम करते है आंदोलन। सोचिये, अगर यह आंदोलनकारी चाहते तो, गंगा, यमुना जैसी नदियां साफ़ कर देते, तो पुरे भारत से इनको समर्थन मिलता।
आज वो वांगचुक 19-20 दिनों से भूखे बैठे है, और मुझ जैसा एक व्यक्ति जिसे न सरकार की पड़ी है, न ही आंदोलन की, वह भी इतना तो समझ ही सकता है, कि यह आंदोलन जानबूझकर खिंच कर लंबा किया जा रहा है। कॉकरोच कह देने से उठी यह लहर अब बारिश के बाद रोड पर हुए जलभराव में फेंके पथ्थर की लहर जैसी लग रही है। आंदोलन चल रहा है, मध्य प्रदेश में। आदिवासी लोग कर रहे है। उनकी क्रिएटिविटी देखी? जिन्दा लाश बनकर वे लोग आंदोलन कर रहे है। ऐसी कुछ क्रिएटिविटी दिखानी पड़ती है। वहां बात उनके अस्तित्व पर बन आयी है, और मैं उनका पक्ष ले सकता हूँ। पर यह जंतर मंतर वालों का नहीं।
सरकार, जनता और जवाबदेही
सरकार क्या चाहती है? अपनी सरकार को बनाए रखना। सरकार का सबसे बड़ा डर क्या होता है? उनका वोट नहीं टूटना चाहिए। वोट जनता करती है। जनता सब देखती है, कौन कितने पानी में है। लेकिन साथ ही जनता के पास यह बड़ी समस्या है, कि उसे अपना पेट भी भरना है। तो जनता को जवाबदेही की नहीं पड़ी है। जवाबदेही के लिए यह आंदोलनकारी लोग है। आंदोलनकारी लोग क्या करते है? भूख हड़ताल, भाषणबाजी। अरे तुम्हे सरकार से जो कान नहीं हो पा रहे है, वे करो.. अपनी बाजू पर या अपने पीठ पर तुम किस बात के लिए आंदोलन कर रहे हो, वह बैनर चिपकाओ, और नदी-नाले साफ करो। जैसे शुरुआत में कॉकरोच ने किया था।
तुम रोड के गड्ढे भरो, नगर पालिका का, सड़क मंत्रालय का काम खा जाओ। पर नहीं, तुम्हे जंतर मंतर पर बैठे रहना है। तुम्हारी निष्क्रियता बताती है, तुम्हारा क्या योगदान है इस समाज में। मैं नहीं चाहता सोनम वांगचुक को कुछ हो जाए। और मेरा कारण यह है कि इस देश में भूख से कोई न मरे। भूख से जितने मरने थे वे अंग्रेज कालीन भारत में मर लिए। अब भूख जैसी प्राथमिक चीज के कारण किसी का मर जाना मुझे ठीक नहीं लगता। लोकशाही की सबसे बड़ी समस्या यही है, कि यहाँ हर बात के लिए आप आंदोलन कर सकते है, और करते भी है।
मेरा व्यक्तिगत निष्कर्ष
वैसे मैं यह सब सलाहें क्यों बाँट रहा हूँ? जबकि मैं खुद कईं बार कईं नियमों को दरकिनार कर डायरेक्ट निकल जाना चाहता हूँ। मुझे खुद को कईं मामलों में आपत्ति है सरकार से। जैसे कि जमीन खरीदते समय स्टाम्प ड्यूटी नाम का लिफाफा सरकार बिच में लेती है। या फिर जैसे न्याय की प्रक्रिया.. A और B का झगड़ा हुआ तो बिच में वकील कमायेगा। पुलिसबल का दुरूपयोग। मैं रस्ते पर जाते हुए यदि कोई पुलिस कर्मचारी मुझे रोकता है, तो मैं उससे नहीं उलझता। क्यों? क्योंकि केस हो जाने के बाद तारीखे कितनी ज्यादा भरनी पड़ती है। वो मांगे उतना दे देना चाहिए, सस्ता पड़ता है। अनुभव से कहता हूँ। पैसे देकर पीछा छुड़वा लेने से जो समय बचा है, उसमे आप और महेनत करके नए पैसे बना लोगे। हताशा और निरुत्साहपूर्ण लगा न? यही कड़वी सच्चाई है। दुनिया के किसी भी कोने में किसी भी तरह के ड्रेस धारी से नहीं उलझना चाहिए।
अब मैंने एक यह गन्दी आदत भी अपना ली, अधूरे ड्राफ्ट छोड़ देना। चार दिन पहले का लिखा हुआ है, और आज इसे पब्लिश करूँगा। न ही अपडेट करूँगा।
शुभरात्रि,
२०/०७/२०२६
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक,
आपकी नज़र में प्रभावी आंदोलन कैसा होना चाहिए?
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प्रश्न (FAQ)
धरना और भूख हड़ताल में क्या अंतर है?
धरना एक शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन है, जबकि भूख हड़ताल में अपनी मांगों के समर्थन में स्वेच्छा से भोजन का त्याग किया जाता है।
लोकतंत्र में आंदोलन का क्या महत्व है?
लोकतंत्र में आंदोलन नागरिकों को अपनी मांगें और असहमति शांतिपूर्ण तरीके से सरकार तक पहुँचाने का संवैधानिक माध्यम प्रदान करते हैं।
क्या केवल विरोध प्रदर्शन से समस्याओं का समाधान हो सकता है?
विरोध प्रदर्शन जनमत बनाने और सरकार का ध्यान आकर्षित करने का एक माध्यम हो सकता है, लेकिन स्थायी समाधान अक्सर संवाद, नीतिगत बदलाव और सामाजिक सहभागिता से आते हैं।
महात्मा गांधी की सविनय अवज्ञा क्या थी?
सविनय अवज्ञा गांधी जी द्वारा अपनाई गई एक अहिंसक रणनीति थी, जिसमें अन्यायपूर्ण कानूनों का शांतिपूर्ण ढंग से उल्लंघन कर विरोध दर्ज कराया जाता था।
क्या सामाजिक सेवा और आंदोलन साथ-साथ चल सकते हैं?
हाँ। कई लोग मानते हैं कि विरोध के साथ-साथ स्वच्छता, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण या अन्य जनहित कार्य भी समाज में सकारात्मक संदेश और प्रभाव पैदा कर सकते हैं।
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