भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर मेरा मत | कलाकार की सामाजिक जिम्मेदारी

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भारत की शिक्षा व्यवस्था पर मेरा मत : क्या सच में शिक्षा खराब है?


भारत की शिक्षा व्यवस्था और कलाकार की सामाजिक जिम्मेदारी पर विचार करता एक व्यक्ति


कलाकार की समाज के प्रति जिम्मेदारी कहाँ तक है?


    प्रियम्वदा ! बुद्धूजीवियों की सभा मे मैं महामूर्ख हूँ.. 

    बात ऐसी है, मैंने तुमसे कहा था न, कि रविवार की दोपहर बाद छुट्टी होने के बावजूद मुझे बाइक लेकर कहीं भी घूमने निकल पड़ना था, लेकिन नहीं जा पाया। क्यों? क्योंकि आलस फिर से एक बार हावी हो चली थी मुझ पर। यूँ तो सारा दोष केवल आलस का ही न था, जब आदमी अपने कार्यालय से निवृति ही तीन बजे पाएगा, तो कहाँ जाएगा? पर जहाँ चाह वहां राह भी तो होती है.. लेकिन फिर इस राह को आलस ने अपने पीछे छिपा लिया था। 


    कुछ चुनिंदा बूंदो की बरसात होती रही। मैं ग्राउंड में लगभग दो किलोमीटर के चक्कर काटकर अंदाजित स्टेप्स पुरे कर लेने के पश्चात दो सीमेंट ब्लॉक को एक के ऊपर एक रखकर, बिराजित हुआ। एक कान में ब्लूटूथ, एक हाथ में फोन, और फोन की डिस्प्ले पर नौजवान चेहरे। सारे ही अच्छे पढ़े-लिखे लोग। और बुद्धिजीवी भी। कोई भी आदमी जब सोचता है, तो अपने आप को बड़ा विचारक मानता है। और कोशिश करता है अपना मत तीक्ष्णता पूर्वक रखे। मैं भी आ गया उन लोगों में। बस मैं बोलता नहीं हूँ, फोन की नोटबुक में अपना विचार लिख लेता हूँ। 


क्या भारत की शिक्षा व्यवस्था वास्तव में कमजोर है?

    महाबुद्धु लोग चर्चा कर रहे थे। सॉरी, सहस्त्रबुद्धि लोग अपना विचार प्रकट कर रहे थे। मैं अपने स्टेप्स पुरे करने के उपरांत हाँफते हुए इस चर्चा को ध्यान से सुन रहा था। फिर भी भूल गया, मुद्दा क्या था जिसपर यह मुर्गा-लड़ाई जारी थी। रुको देखकर बताता हूँ। "इस बार हम अपनी चर्चा को और गहराई में ले जा रहे हैं। हम केवल कला की बात नहीं करेंगे, बल्कि यह भी समझेंगे कि एक कलाकार की समाज के प्रति क्या जिम्मेदारी होती है। हमारा मानना है कि कलाकारों की समाज के प्रति जिम्मेदारी होती है, और हर बदलाव की शुरुआत शिक्षा से होती है। भारत की शिक्षा व्यवस्था में कई कमियाँ (loopholes) हैं, जो धीरे-धीरे युवाओं के भविष्य और भारत के भविष्य को नुकसान पहुँचा रही हैं।" यह था मुद्दा। अब इस पर चल रही बहस के दौरान मैंने जो जो बातें नोट की थी, वे तो इस पोस्ट के अंत भाग में मिलेगी। उससे पहले मैं यानी की महामूर्खाधिपति अपना मत प्रस्तुत करूँगा। जिसे तुम्हे पढ़कर भूल जाना है। याद रहें, भूल जाना है। 


सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति

    तो यहाँ तीन-चार वस्तुएं मुख्य है। कलाकार, समाज, शिक्षा व्यवस्था, और भारत। हर देश की आकांक्षाएं अलग होती है। हर देश की संस्कृति अलग होती है, और समाज भी। तो सबसे पहली बात, हम किसी दूसरे देश से तुलना कैसे करेंगे? जब उस देश की संस्कृति और भविष्य की दिशा ही हमसे अलग है। तो अब अपने पास मुद्दा स्पष्ट है, हमें अपने हिसाब से अपना रास्ता तय करना है, और अपने देश की उन्नति करनी है। देश की उन्नति शिक्षा से होती है, और शिक्षा के लिए चाहिए शिक्षा पाने की इच्छा। 


    हमारी शिक्षा व्यवस्था अभी क्या है? सबसे पहले आँगनबाड़ी। या शिशुमंदिर। मैं गुजरात से हूँ, तो मेरे यहाँ की बता सकता हूँ। शिशुमंदिर के बाद बालक सात वर्ष का होते ही प्रथम कक्षा एड्मिसन लेगा, और सातवीं कक्षा तक प्राथमिक शिक्षा कहा जाता है। मेरे कुँवरुभा अभी शिशुमंदिर में है, LKG/UKG समझ लो। सामान्य शैक्षणिक संस्थान है। और वार्षिक सात हजार रूपये फी है। मेरे ही शहर में ऊँचे से ऊँची फी पचीस हजार भी है। इसके अलावा 1300 रूपये की बुक्स का खर्चा लगता है। और रह गया विद्यार्थी का ट्रांसपोर्टेशन। घर से एकाध किलोमीटर के भीतर ही यह स्कूल है। इसके अलावा दसवीं कक्षा तक सरकारी स्कूल भी है। वह भी मुश्किल से एकाध किलोमीटर दूर होगा। इसका अर्थ है, शिक्षा पाना आसान है, और प्रत्येक सुविधा उपलब्ध है। 


बच्चों पर पढ़ाई का बढ़ता दबाव

    शिक्षा का स्तर, यह एक जरुरी मुद्दा है। मैं ऐसा मानता हूँ, कि सात वर्षों तक बालकों को किसी भी तरह का अक्षरज्ञान देने के बजाए बस उन्हें कलम पकड़ना सीखाना चाहिए। लेकिन हमारे कुँवरुभा abcd तथा क-ख-ग वगैरह सब कुछ क्रम से लिखने-बोलने लगे है। जबकि अभी से यह ज्ञान की जरुरत नहीं है। छह वर्ष के बालक को बस खेलने-कूदने के लिए पर्याप्त मैदान देना चाहिए, और ढेर सारे खिलौने। जिन्हे खेलते-खेलते वे सीखेंगे। चोट खाएंगे, रोएंगे, फिर उठ खड़े होएंगे। बस यही, ज्यादा से ज्यादा बुद्धि विकास के खेल मात्र। 


    लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक रेस लग गयी है, बच्चे के पास पढ़ाई के अलावा ढेर सारी और क्लासेज करवाई जाती है। और यह दबाव सरकारी नहीं है। यह दबाव डाल रहे है माता-पिता। बच्चा पैदा किया है या मशीन? जो इतना सारा आउटपुट चाहते है? मेरा बच्चा स्कूल में भी पढ़ेगा, स्कूल के बाद भी पढ़ेगा, खेलते हुए भी पढ़ेगा, और पढ़ते हुए भी पढ़ेगा। कुछ वाली तो बहुत ज्यादा कोमलता से बात करते है अपने ही बच्चे से..? वह बच्चा आगे कठोरता को झेल पाएगा? 


प्राइवेट स्कूल बनाम सरकारी स्कूल

    सरकार शिक्षा पर करोड़ों रूपये खर्च कर रही है। अगर 100 रूपये खर्च होने है, तो 60 सरकारी स्कूलों, शिक्षकों और स्कूली योजनाओं पर और 40 कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, IIT, NIT, शोध और छात्रवृत्तियों पर खर्च होता है। हमारे आसपास के सरकारी स्कूल है, वहां पर साइंस लैब से लेकर कंप्यूटर लैब भी अध्यतन बन चुके है। हालाँकि मैं तो प्राइवेट स्कूल में पढ़ा हुआ हूँ, वह भी संघ वाली। लेकिन एक महीने के लिए मुझे दसवीं कक्षा के बाद सरकारी स्कूल में दाखिला लेना पड़ा था, तब मैंने देखी थी, वह सरकारी स्कूल प्राइवेट के मुकाबले कतई कम न थी। मैं प्राइवेट स्कूल में होने के बावजूद गणित का टूशन सरकारी शिक्षक से ले रहा था। 


    सरकारी शिक्षण पद्धति में कोई कमी नहीं है। हाँ ! एक कमी है, तो वह केवल एग्जामिनेशन की प्रोसेस में है। बस यही पेपर लीक वाली। वह भी सरकारी नौकरी के लिए होती एग्जाम के पेपर लीक्स। आज के समय में तो शिक्षा के अलावा कितने सारे अलग से स्किल डेवलपिंग क्लासेज चलते है। हमारे समय में तो बस दो ही क्लास अलग से होते थे, एक होता था स्पोकन इंग्लिश, और एक होता था कंप्यूटर। वैसे संगीत, चित्रकला वगेरे के क्लास भी होतें थे, लेकिन हमारे समय मानसिकता यह थी कि वे सब शौकिया विषय है, जीवन में कहीं काम नहीं आते। गाने-बजाने से बस पेट भरता है। लेकिन आज देखो, गाने-बजाने वाले मिलियंस में फॉलोवर लिए बैठे है, और ऐड करके लाखों कमा भी रहे हैं। 


    हमारे समय में अंग्रेजी के प्रति इतनी जागरूकता न थी। माध्यम वर्गीय परिवारों में यह ख्याल भी न हुआ करता था, कि आगे जाकर अंग्रेजी में ही सबकुछ होना है। मेरा डिप्लोमा अधूरा छूट जाने के पीछे एक प्रमुख कारण अंग्रेजी था। खैर, आज के समय में भी पहले वाली ही हालत है। हमारे समय दुशमन अंग्रेजी थी, आज के समय में टेक्नोलॉजी है। लोगों को टेक्नोलॉजी में रस लेना चाहिए। दुनिया CHATGPT बना रही है, और हम ऍप्स के आगे नहीं बढ़ रहे। शिक्षा में कमीं नहीं है, मार्गदर्शन की कमी है। सरकारें तो जागरूक कर रही है, लेकिन पेरेंट्स भी क्या जागरूक हो रहें है?


    अभी कुछ दिन पहले ही सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ था। एक सरकारी शिक्षक के प्रिंसिपल को इस बात पर एक व्यक्ति धमका रहा था, कि उस प्रिंसिपल ने लेट आने वाले बच्चों को स्कूल में प्रवेश न होने दिया। स्कूल का नियम होता है, हमारे समय भी था, आज भी होता ही होगा, कि प्रार्थना समय से पूर्व स्कूल में पहुँच जाना। मैं तो पांच किलोमीटर साइकिल चलाकर जाता था, फिर भी प्रार्थना समय से पूर्व ही पहुँच जाता था। तो उस वीडियो में कुछ बच्चे देरी से आए, स्कूल का मुख्य गेट बंद हो चूका था, और प्रार्थना चल रही थी। कुछ बच्चों के पिता इस लिए विरोध में उतर आए, कि स्कूल का प्रिंसिपल अपनी मनमानी कर रहा है। जबकि उस वीडियो में भी प्रिंसिपल यही कह रहे थे, कि "समय की कदर करो, तो समय तुम्हारी कदर करेगा।" 


सरकारी शिक्षकों की चुनौतियाँ

    मेरे एक रिश्तेदार सरकारी शिक्षक है। मैंने एक दिन यूँही पूछ लिया, आपके मजे है, दोपहर बाद छुट्टी, जितने दिन सरकारी छुट्टी हो, उतने दिन छुट्टी, ऊपर से साल में दो बार वेकेशन भी। और पगार पूरी। तो उन्होंने भी अपना दुखड़ा सुना दिया, "कैसे मजे.. सरकार तरह तरह के डाटा मांगती रहती है। कितने बच्चे आए थे, और कितने नहीं, यह भी हमें रिकॉर्ड रखकर सरकार को बताना पड़ता है। पारदर्शिता के नाम पर हमसे पढ़ाने के अलावा जो काम बढ़ा दिए है, आपको क्या पता। ऊपर से जनगणना करनी है, तो शिक्षक करेंगे। चुनाव है, तो शिक्षक ओवर-ड्यूटी करेंगे। प्राइवेट टूशन क्लास हम लें नहीं सकते। हररोज बच्चे अपना सर न फुड़वा ले इस बात का तनाव। और तो और, अपनी स्कूल का जिले में श्रेष्ठ प्रदर्शन करवाने की चिंता। 


    बात तो सही थी, सरकारी शिक्षकों पर दबाव तो है। फिर भी बहुत सारी सरकारी शालाएं बहुत अच्छा प्रदर्शन कर भी रही है, खासकर गाँवों में। स्थानीय बात करूँ, तो कच्छ के छोटे रन में एक सरकारी बस घूमती है। आम बसों से यह बस अलग है, इसपर रंगरोगन अलग तरह का है। यह चलती फिरती स्कूल है। इस बस में शिक्षक आतें है। रन में नमक की खेती करते किसानों के बच्चो तक राइट टू एजुकेशन पहुंचाते है। विचरती जनजाति के लिए वन्यशालाओं का भी निर्माण किया गया है, और कार्यरत भी है वैसी शालाएं। तो प्राथमिक शिक्षण तो सरकार मुहैया करवा ही रही है। 


माता-पिता की जिम्मेदारी शिक्षा में कितनी महत्वपूर्ण है?

    रही बात प्रजा की, तो प्रजा स्वयं ही यदि अपने संतान को शाला नहीं भेज रही। कहीं कहीं पर तो ऐसा भी है, कि सरकारी शिक्षकों को बच्चों को उनके घर पर लेने जाना पड़ता है। और शिक्षक जातें भी है। दूसरी बात, राइट टू एजुकेशन, इस निति के तहत दसवीं कक्षा तक विद्यार्थी की शाला फी सरकार भुगतान करती है। हालाँकि इस निति में अच्छे भले संपन्न लोग भी लाभ उठाते हैं। मैंने स्वयं अपने कुँवरुभा के लिए अप्लाई किया था। क्योंकि मेरे शहर की श्रेष्ठतम निजी शाला की फी कुछ ज्यादा ही ऊँची है। पर फिर यह ख्याल भी आया, कि सरकारी शाला में क्या समस्या है? शिक्षा तो बालक की बुद्धि पर निर्भर करती है। बालक तीक्ष्ण बुद्धि होगा, तो वह सरकारी स्कूल में भी पढ़कर रिकार्ड्स तोड़ सकता है। अन्यथा प्राइवेट स्कूलों की फीस पर भी पानी फिरता है। 


    हम यह भी तो सोचतें है, कि सब कुछ ही स्कूल सिखाएगा। कुछ चीजें स्कूल के अलावा माता-पिता को भी सिखानी होती है। स्कूल है, वह केवल दिशा दिखायेगा। चलना बच्चे को है, और सहारा देना है माता-पिता को। लेकिन हम सोचते है, स्कूल में पढाई अच्छी नहीं हो रही। हमारे यहाँ कहा जाता है, "भणतर अने गणतर बेय जरुरी छे।" मतलब केवल शिक्षा नहीं, विवेकबुद्धि भी जरुरी है। परिस्थिति के अनुसार ढलना जिसे कहते है, वह हुआ गणतर। गणतर शब्द बना तो गणतरी से है, गणतरी का मतलब होता गणित करना।


आज के समय में स्किल डेवलपमेंट क्यों जरूरी है?

    इंजीनियर और डॉक्टर तो बहुत बन लिए। अब दौर है, विविध स्किल्स डेवलप करने का। कौशल में माहिर होगा, वह सबसे आगे होगा। आज तो कितनी ही तरह के एजुकेशन मार्किट में अवेलेबल है। हमारे समय पर दसवीं के बाद आईटीआई, या फिर डिप्लोमा-डिग्री। या तो बारहवीं के बाद ग्रेजुएशन, और MBA, BCA वगैरह ज्यादा प्रचलन में था। ज्यादातर लोग एक दूसरे को देखकर फेकल्टी चुनते थे। दोस्त MBA कर रहा है, तो मैं भी वही करूँगा। क्योंकि पता कहाँ था, कि डिप्लोमा डिग्री करने के बाद आदमी बनता क्या है? काम क्या करता है..!


    हमारे समय पर दिशाहीनता थी, इस लिए हम रुक गए। आज दिशाओं के विकल्प देखकर सर चकरा जाता है। सरकारें आयी गयी, शिक्षण व्यवस्था में कोई सुधार मुझे नहीं लगता जिसकी अपने यहाँ जरुरत है। हाँ ! बस एक सिविक सेन्स वाला मुद्दा है जिसे मैं पढाई के अंत तक सिखाया जाए वह चाहूंगा। कचरा यहाँ वहां न फेंकना हमें स्कूल से सिखाया जाता था, लेकिन हम उसका पालन नहीं कर रहें हैं, इसमें दोष शिक्षा का नहीं है, हमारी मानसिकता और आलस का है। 


    चलो छोडो प्रियम्वदा, आज बहुत ज्यादा बातें हो गयी। बाकी हाँ, उन सहस्त्रबुद्धियों की सभा में मैं महामूर्ख क्यों मौन रहता हूँ, वह पॉइंट्स मैंने निचे लिखें हैं। 


  • पर्सनालिटी डेवलोपमेन्ट बचपन से क्यों नहीं सीखाते? = "सोचने वाली बात है, बच्चा ABCD सीखेगा, गणित के प्रमेय सीखेगा, या फिर चरित्रनिर्माण पर ध्यान देगा?"
  • "अरे जापान में क्या सीखा रहे है उससे हमें क्या? जापान की व्यवस्था, और अपनी जीवन व्यवस्था अलग है.."
  • अब यह लोग "भणतर अने गणतर" में लग गए है..
  • "लिटरेट और educated का रूपक चिप्स का पैकेट फेंक देने से नही होता.."
  • नीट प्रोटेस्ट का सपोर्ट.. = "नहीं, मैं स्टूडेंट हूँ तो क्यों करूँ? यह काम देश के प्रौढ़ों को करना है, या फिर विद्यार्थी के माता-पिता को। इस देश का बच्चा पढाई करेगा या आंदोलन करते फिरेगा?"
  • यह व्यक्ति हमेशा जातिवाद की बात लेकर बैठता है। इसी ने कहा है कि भारत सरकार के बजेट में शिक्षा से ज्यादा बजेट दूसरे विभागों का है। इस ने कहा टीचर्स में पढ़ाने की इच्छा नहीं है.. = "मैं कहता हूँ, टीचर्स को इलेक्शन और जनगणना की ओवरड्यूटी मत करवाओ।" नकारात्मक व्यक्ति है यह तो, कहतें है देश कभी आगे नहीं बढ़ेगा, गलगोटिया वाला उदाहरण देकर। यह व्यक्ति भूल जाते है, क्रिटिसाइज करना अलग बात है, और अपमान अलग..
  • "लोग आरक्षण का लाभ लेकर भी आलोचना करतें हैं।"
  • तीन भाषा सीखने का कोई नियम है.. "हमने तो बचपन से गुजराती, हिंदी और इंग्लिश सीखी है। भाषा सीखना? भाषा का काम है संवाद को स्थान देना, उतना ही उपयोग है भाषा का।"
  • गवर्नमेंट टीचर्स पढ़ाते ही नहीं है.. "मैं कहता हूँ, सरकारी शिक्षकों के पास पढ़ाने के अलावा भी कईं काम होतें है, कईं बार शिक्षकों की संख्या भी कम होती है।"
  • "इसीका इन्तेजार था मुझे, इस व्यक्ति के मुद्दे वही होते है, जो मैं लिख रहा हूँ। हाँ फ्रीबीस, साईकल बांटती है सरकार, टेबलेट बांटे थे। यह भाईसाहब मेरे पॉइंट्स बोलने लगे हैं.. जो मैं लिखता जा रहा था..."
  • "मैं अपनी बात करूँ तो हमें तो यह भी नही पता होता था, कि दसवीं कक्षा में हिंदी भाषा लें या संस्कृत? मैंने संस्कृत इस कारण से ली थी, क्योंकि हिंदी के मुकाबले संस्कृत की टेक्स्टबुक दुबली थी।" 
  • फ्रीबीस.. मुफ्त की रेवड़ियां.. "हमारे यहां साईकल बांटी गई थी। बच्चे को मिली साईकल पर बाप अपने खेत जाता है।"
  • मिड डे मील.. "इस चीज का कोई अनुभव नहीं है मुझे। पर सुना है, मध्याह्न भोजन कहतें है। पर ज्यादातर बच्चे गाँव में घर पर चले जातें हैं। इस लिए कईं बार मध्याह्न भोजन को गंभीरता से नहीं लिया जाता है।"


    बस बहुत हो गया, प्यास लग रही है.. मैं बंद कर रहा हूँ। जब भी यह मैदा के पाऊं खाता हूँ भाजी के साथ, बहुत तीव्र प्यास लगती है।


    शुभरात्रि,

    ०६/०७/२०२६

|| अस्तु ||


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आपके अनुसार भारत की शिक्षा व्यवस्था में सबसे पहले कौन-सा बदलाव होना चाहिए? अपनी राय नीचे कमेंट में अवश्य साझा करें।


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