परवाह से बेपरवाही तक का सफर
प्रियम्वदा !
एक दौर आता है, जब परवाह करना छोड़ देता है मन। बेफिक्र हो जातें है, किसी भी बात का, चीज का मूल्य पैसों से तोलने लगते है, और लगता है भावनाएं तो बस मन को निर्बल बनाने को ही होतीं है। मेरा वही दौर चल रहा है। इस दौर में शरीर चारोओर से फैलने लगता है। तोंद और कमर तो मानों फ़्लैश फ्लड की तरह अचानक से आ गयी। दिमाग में बस उड़ते पैसे दीखते है, जिन्हे भर सकें उतने भर लेने के ही ख्याल रहते है।
एक शर्ट, एक मॉल और आधुनिक बाज़ार की चालाकियाँ
कल दोपहर को मार्किट गया था, तो एक शर्ट ले आया। आजकल के यह मॉल.. मॉल नहीं, चूइंगगम है। एक कंपनी है, उसका यह मॉल है। पूरा मॉल छान लेने के उपरांत एक शर्ट मुझे मेरे नाप की मिली। थी तो और भी, लेकिन यहाँ मेरे अपने चोंचले है पसंदगी के। ज्यादा रंगीन नहीं होना चाहिए, प्रिंटेड पैटर्न न हो, कलर भी बहुत भड़काऊ न हो पुरे कॉटन हो.. वगैरह वगैरह। खैर, बिलिंग काउंटर पर पहुंचा, वहां खड़ी मनोहर कन्या ने मोबाइल नंबर माँगा। मैंने मना किया, क्योंकि बाद में यह लोग तरह तरह की स्कीम्स के मैसेजिस करते रहतें है।
उम्र बढ़ने के साथ क्यों बदलती है सोच?
देखो प्रियम्वदा ! कैसे मैने अपनी टंगड़ी ऊँची रखी। चाहता तो वह मोबाइल नंबर वाला संवाद स्किप कर सकता था। पर नहीं, लड़की ने नंबर माँगा और मैने मना किया। अपनी सख्ती दिखाने की कोशिश है मेरी। खैर, बिल जनरेट करने से पहले उसने दस रूपये और मांगे, कागज़ के कैर्री बैग के नाम पर। सोचने वाली बात है, प्लास्टिक से होते पर्यावरण प्रदूषण को रोकने के नाम पर, यह कागज़ के कैर्री बैग का चलन चालू करने पर होते दस-दस रूपये की बर्बादी पर सब मौन है। फिर वह मनोहारी कन्या एक स्किम या ऑफर बताने लगी, और उसके हिसाब से मुझे दो और शर्ट खरीदने थे, फिर मुझे बम्पर डिस्काउंट मिलना था। दोसौ-तीनसौ रूपये के डिस्काउंट के लिए दो से तीन हजार खर्चो। खैर, मैंने दो हाथ जोड़े, कि "मेरी माँ मुझे तू बस यह वाली शर्ट ही दे दे।" लेकिन उसने शर्ट देते देते भी कहा, "सेकंड फ्लोर पर और अच्छा कलेक्शन है।"
आज सवेरे जब यह शर्ट चढ़ाई, तो तुरंत माताजी ने टोका, "यह तू आजकल शर्ट पर शर्ट लाए जा रहा है, ऊपर से सारी ही आधी बाजू की, चक्कर क्या है? और नापकर लाया है न? कहीं पता चले अलमारी में जगह रोकने ही लाया हो?" हँसते हुए मैंने हाँ कहा, "नापकर लाया हूँ।" दरअसल इससे पहले मैंने अलग अलग दो ऍप्लिकेशन्स से ऑनलाइन शर्ट आर्डर की थी। एक शर्ट छोटी पड़ गयी। तो दूसरी मुझ जैसे दो जने पहन लें उतनी बड़ी आ गयी। और दोनों ही शर्ट को मैंने समय रहते चेक नहीं किया, तो रिटर्न कर देने का भी ऑप्शन न बचा। पर माताजी तब भी बोले, "यह आधी बाजू वाली शर्ट में हाथ काले हो जाएंगे।" और फिर से मैंने हँसते हुए कहा, "अब क्या फर्क पड़ता है, मुझे अब कौनसे स्वयंवर में उपस्थित होना है?"
क्या हर इंसान एक दिन खड़ूस अंकल बन जाता है?
ऑफिस आते हुए रस्ते भर यही ख्याल दिमाग में घूमते रहे। कि अब मुझे क्यों फर्क नहीं पड़ता है, कि मेरा श्याम वर्ण घनश्याम हो जाए तब भी। या फिर अब मुझे क्यों परवाह नहीं होती बढ़ते मोटापे की? क्या कारण है, जो मन में हर समय अर्थ उपार्जन के ख्याल ज्यादा विचरते है। क्यों भावनाओं से ऊपर उठती अर्थतंत्र की कठोरता आकर्षित करती है। क्यों अब प्रेम मुझे बच्चों का खेल लगता है, और क्यों अब मुझे नूतन साहस करने को मन नहीं करता। किसी प्रेमिका के प्रेम में गलाडूब आशिक मुझे पागल लगता है। खड़ूस अंकलों की श्रेणी में आ चूका हूँ मैं।
दोस्त वही रहते हैं, बस मज़ाक बदल जाते हैं
यह सब सोचता हुआ बैठा था ग्राउंड में, और गजा आ धमका। आते ही स्प्लेंडर को डबल स्टैंड पर चढ़ाई, और अपनी विषाक्त वाणी को उगलने लगा। "और सरकार, दर्शन दुर्लभ है आपके तो। रविवारीय शाखा से भी अदृश्य रहतें हैं आप?"
"हाँ ! मैं तो आसमान से गिरा हूँ, और खजूर में ही लटका हूँ। ज्यादा भेद नहीं है, तुम में, और इन सहस्त्रबुद्धियों में।"
"कौन से सहस्त्रबुद्धि भाई? जरा हमें भी बताओ, पता तो चले, आखिरकार वे कौन लोग है, जो हमसे हमारा मूकपशु छीन ले गए।" गजे ने विष उगला।
"अबे.." बात पूरी हो उससे पूर्व पत्ते को आता देख, मैंने अपनी तरफ प्रवाहित होते गजविष को मुझसे बेहतर विकल्प पत्ते के रूप में प्रस्तुत किया। "वो देख, पत्ता भी आ गया। पार्टीचोर।"
पत्ता हमारी तिकड़ी का ऐसा सभ्य है, जो बैठे बिठाये लोगों को उठाकर खुद बैठने में मानता है। और आवारा आशिक है। बेपरवाह आशिक, और वह आशिकी तब चरम पर होती है, जब यह थोड़ा बहुत सूरा के सुरूर में रहता है। आते ही नजरें घुमाकर बोला, "जरा हट जा, बैठने की जगह तो दे।" खुले मैदान में सीमेंट के एक छोटे से ब्लॉक पर मैं अपनी विशाल काया टीकाकार बैठा था। गजा अपनी ही बाइक पर बैठा था। और एक और सीमेंट का ब्लॉक बस पांच फिट दूर था। जिसे उठाकर पास लाकर बैठा जा सकता था, पर नहीं, पत्ता अकड़ू है। उससे झुका नहीं जाता। झुक तो सकता है, लेकिन झुककर कुछ उठा नहीं पाता। निचे कुछ गिर गया हो, तो उसे उठाने के लिए वह उकडू बैठेगा, और फिर हाथ को जमीन तक ले जाकर टटोलेगा, और वस्तु हाथ में आ जाने पर धीरे धीरे वापिस उठेगा। चेसिस में कोई फाल्ट आ गया है। पहले तो नहीं हुआ करता था। पर शायद जिम करने आती रमणियों के सामने कुछ ज्यादा वजन उठा लेने से हुआ होगा।
तो मैंने अपनी जगह उसे दे दी, और दूसरा ब्लॉक उठाकर पास लाया, और बैठते हुए कहा, "देख भाई, यह आजकल के डॉक्टर उतने दमदार नहीं रहें। तू किसी अच्छे गधे के पास जा। उससे दुलत्ती का कोर्स पूरा कर। ठीक हो जाएगा।"
इस पर प्रत्युत्तर देने के बजाए, पत्ते ने अपनी जेब से धुम्रदण्डिका का पैकेट निकाला। एक उसने सुलगाई, एक मैंने ली, और एक गजे ने लेते हुए कहा, "तुम लोगों को पता है? हम लोग तो मूर्ख बनने के लिए भी पांच साल इन्तेजार करते हैं।"
मैं और पत्ता दोनों ही समझ गए थे, बात किस दिशा में जाएगी। और हम दोनों ही एक साथ बोल पड़े, "हाँ ! पता है।"
इस पर गजे ने कुछ निरुत्साही नजरों से हमे घूरा, और मौन रह गया। पत्ते ने धुआं छोड़ते हुए कहा, "इस भूतपूर्व बेवड़े ने जब से छोड़ी है, इसके पास यही सब बातें होती है।"
बस हो गया काम अपना। हमारी तिकड़ी में एक ही नियम है, दो जने मिलकर किसी एक को इतना बेइज्जत करते है, कि उसकी कोई हद्द नहीं है। अब पत्ते ने अपना खुला मैदान दे दिया था। और फिर गजे के विष को तो बस खुला मैदान चाहिए होता है। बोल उठा, "मैं तो बेवड़ा था बे, तू तो आज भी है।" फिर मेरी और देखकर बोला, "इसने एक दिन पिने के बाद फ़ोन उठाया, और दे धनाधन खूब उल्टा-सीधा बोलने लगा किसी को। होश तो रहता नहीं है, सामने कौन है, कौन नहीं। घरवाली को बाहरवाली समझ कर बातें कर रहा था।"
मुझे अब जो भी बातें होती, उसमे ठहाके मार-मारकर हंसना ही होता, वरना यह विषबाण अपनी दिशा बदलकर मेरी ओर भी मूड सकते थे। मुझे हँसता देख, पत्ते ने उछलकर कहा, "जो भी हो, लेकिन मैं कभी भी रोड पर गिरा हुआ नहीं मिला था। यह गजा, इसे इतना होश नहीं रहता था, कि कहाँ पड़ा हुआ है।"
मैंने अब इसके पक्ष में ठहाका मारा। गजे ने कातर नजरों से मेरी और देखकर कहा, "हां ! क्योंकि मैं कोई भी चीज नाप-तोलकर नहीं करता। इसे देख, पांच महीने का गर्भवता नहीं लगता यह?"
मेरी सारी हँसी उसने एक ही बाण में छीन ली। और अब पत्ता और गजा मुझ पर हँस रहे थे। पत्ता बोला, "इसी लिए कहता हूँ, जिम चला कर मेरे साथ। सारा शरीर चुस्त रहता है, आँखे भी।"
"हट वासना के वसीम अक्रम ! तुझसे एक ब्लॉक तो हटता नहीं, डंबल्स क्या ख़ाक उठाता होगा तू?" पत्ते को सुनाकर गजे की बारी थी, "और बड़बोले विषाणु, तू जज की गाडी चला। जुबान नहीं।"
इसपर गजा बोला, "ज्यादा मत बोलिये, मेरा जज फेमिली कोर्ट का जज है। उसे बोलकर तुम लोगों का तलाक़ करवा दूंगा। फिर भरते रहना भरण-पोषण।" और हम तीनों ही हँस पड़े।
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक,
यदि आपकी सोच भी समय के साथ बदली है, तो नीचे टिप्पणी में ज़रूर बताइए—क्या आपके लिए भी एक समय ऐसा आया, जब भावनाओं से अधिक व्यवहारिकता महत्वपूर्ण लगने लगी?
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
क्या उम्र बढ़ने के साथ इंसान भावनात्मक रूप से बदल जाता है?
हाँ। जिम्मेदारियाँ, अनुभव और जीवन की परिस्थितियाँ इंसान की प्राथमिकताओं और भावनात्मक सोच को बदल सकती हैं।
क्या पैसा बढ़ने के साथ भावनाएँ कम हो जाती हैं?
जरूरी नहीं। लेकिन कई बार आर्थिक जिम्मेदारियाँ और व्यावहारिक जीवन भावनाओं पर भारी पड़ने लगते हैं।
क्या पुराने दोस्तों के साथ मज़ाक और नोकझोंक दोस्ती की पहचान होती है?
अक्सर गहरी दोस्ती में खुलकर मज़ाक और एक-दूसरे की खिंचाई अपनापन दिखाती है, बशर्ते उसमें सम्मान बना रहे।
यह लेख किस विषय पर आधारित है?
यह एक व्यक्तिगत डायरी शैली का लेख है जिसमें उम्र, जिम्मेदारियाँ, बदलती सोच और दोस्ती पर आत्मचिंतन किया गया है।
📖 थोड़ी देर और ठहरो प्रिय पाठक,
- 📚 किताबों की दुनिया – इन किताबों ने मुझे बदला, शायद आपको भी पसंद आएं।
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