सतलुज फिल्म रिव्यू : जसवंत सिंह खालड़ा, पंजाब और मानवाधिकार पर मेरे विचार

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सतलुज फिल्म रिव्यू : जसवंत सिंह खालड़ा, पंजाब पुलिस और मानवाधिकार पर मेरे विचार


सतलुज फिल्म रिव्यू हिंदी में, जसवंत सिंह खालड़ा और पंजाब पुलिस पर आधारित लेख

कार्यवाही क्या है? एक शब्द से निकले कई प्रश्न

    प्रियम्वदा !

    किसी मामले में होती जांच, निर्णय और दंड के सारे प्रावधान के साथ होती तमाम घटनाएं मिलकर एक कार्यवाही बनती है। शिकायत से शुरू हुई यह प्रक्रिया आदेशपालन तक कितने विभिन्न घटकों से गुज़रती है। कार्यवाही क्या है? कार्य को वहन करना। कार्य तो कुछ भी हो सकता है। तो क्या सींग-चने बेचने वाले को विक्रय के समय पर होते विनिमय को कार्यवाही कह सकतें है? अगर कार्य का वहन कार्यवाही है, तो प्रेम का वहन प्रेमवाही हुआ? फिर वाहवाही में किस बात का वहन हो रहा है? और गवाही में?


राख वेब सीरीज़ : अली फ़ज़ल की दमदार वापसी

    खैर, इन दो दिनों में दो चलचित्र देखें। एक तो वेब सीरीज़ थी, "राख" वही अपने मिर्ज़ापुर वाले गुड्डू पंडित। बहुत कम पात्र होतें है, जो हमेशा के लिए याद रह जाते है। जैसे मोगेम्बो, या ठाकुर और जय-वीरू। जैसे वेलकम के उदय-शेट्टी। वैसे ही मिर्ज़ापुर के गुड्डू पंडित और मुन्ना त्रिपाठी। गुड्डू पंडित माने अली फ़ज़ल की हालिया वेब सीरीज़ राख देखने लायक तो है। यह भी एक चोर-पुलिस वाली सीरीज़ है। जहाँ पुलिस वाला जयप्रकाश रज्जो और बाबू नामक खूंखार अपराधी के पीछे-पीछे पकड़ने के लिए एक शहर से दूसरे शहर फिरता रहता है। इस दौरान बहुत बार उसे पीछेहठ करने के कारण भी मिलते है, लेकिन वह डटा रहता है। और आखिरकार अपराधियों को पकड़ लेता है। अभिनय से लेकर कहानी तक, सब कुछ मजेदार है। 


सतलुज फिल्म क्यों विवादों में रही?

    एक फिल्म भी देखी, सतलुज। विवादों में है, पर इंटरनेट पर उपलब्ध है। सरकार ने फिल्म रिलीज़ पर पाबंदी लगाई थी, पर फिर भी रिलीज़ कर दी गयी। रिलीज़ होते ही प्लेटफार्म से हटा ली गयी, लेकिन तब तक इंटरनेट पर पहुँच गयी थी। और विवाद बढ़ने पर चर्चा में भी आ गयी। वही अपने सहस्त्रबुद्धियों के बहकावे में आकर मैंने भी यह फिल्म देख ली। पहली बात, अब यहाँ से आगे जो भी मैं लिखूंगा, हमेशा की तरह आपको पढ़कर भूल जाना है। 


क्या यह फिल्म सिर्फ एक पक्ष दिखाती है?

    फिल्म अच्छी है। लेकिन एक तरफा है। पूरी की पूरी फिल्म चीख-चीखकर एक ही बात दोहराती है, पुलिस और प्रशासन आततायी है, आक्रांता है, क्रूर है। रक्षक नहीं भक्षक है। फिल्म का मुख्य पात्र है दलजीत दोसांज। यह कलाकार जब पब्लिक प्रोग्राम करता है, तो इसके प्रोग्राम के बिच आकर कोई खालिस्तानी झंडा लहरा जाता है। और फिर यह अपनी देशभक्ति साबित करता है। पंजाब एक अच्छा और समृद्ध राज्य है। लेकिन इस राज्य के साथ समस्या यह हो गयी, कि आधा पंजाब पाकियों के पास चला गया है। और पाकिये आज भी वहां से कईं बार डोर खींचते है, और यहाँ कुछ कठपुतलियां नाचती है। 


    पंजाब का इस देश की प्रगति में खूब योगदान रहा है। लेकिन मुझे यह भी कहना पड़ेगा कि पंजाब की अपनी समस्याएं भी खूब है, जो कईं बार इस देश की प्रगति में रोड़ा बनती है। आतंकवाद और अलगाववाद पंजाब में बहुत शुरू से पनप गया था, और वहां की लोकल पॉलिटिक्स ने उसे खूब हवा भी दी थी ऐसा मुझे लगता है। धर्म के आधार पर अलग राज्य की मांग के बाद अलग देश ही मांग लेना? अन्य राज्यों में इससे पंजाब के प्रति थोड़ी हीनभावना जागेगी ही। ऑपरेशन ब्लू स्टार, जिसमे आर्मी को अकाल तख़्त और सुवर्ण मंदिर तक कब्जे में लेना पड़ा था.. क्यों? क्योंकि एक भिंडरांवाला सशस्त्र था। अभी कुछ दिनों पहले ही उत्तराखंड में कुछ इसी तरह सशस्त्र निहंग एक गुरूद्वारे में चढ़ गए थे। 


फिल्म की कहानी क्या कहती है?

    फिल्म की पटकथा कुछ यूँ है, कि आतंकवाद और अलगाववाद के दमन के नाम पर पुलिस को खुली छूट दी गयी थी। कईं अपहरण हुए, कईं हत्याएं हुई, और कईं लोगों की लाश को परिवार को सौपने के बजाए लावारिश के नाम पर अंतिम संस्कार कर दिए गए। इस फिल्म की कहानी भी यही है, कि कहानी का नायक जसवंत सिंह मानवाधिकार के नाम पर पुलिस द्वारा होते नियमभंग के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाता है। और एक दिन जसवंत सिंह का अपहरण पुलिस कर लेती है। उसे टॉर्चर किया जाता है। और मारकर नदी में फेंक दिया जाता है। CBI जांच होती है। पुलिस का अपराध साबित होता है। और कुछ अफसरों को सस्पेंड कर दिया जाता है। 


    यह एक असली कहानी है। 1995 के समय काल में पंजाब पुलिस ने बड़ी कार्यवाही की थी, खालिस्तान की मांग करते अलगाववादियों पर। लेकिन इस खुली छूट में बहुत सारे लोग गायब होने लगे। कईं लोगों का पता स्मशान के रिकार्ड्स में मिला। फिल्म और जसवंतसिंघ के दावे के अनुसार गायब होने वाले लोगों की संख्या 25000 थी। पुलिस का कर्तव्य होता है, अपराधी को पकड़ना और न्यायलय में प्रस्तुत करना। लेकिन पुलिस खुद ही न्यायालय बनकर अपराधियों का खुद ही फैसला करने लगी थी। आज भी उत्तर प्रदेश में कईं बार पुलिस के फैसले की खबरें आती है। और लोग उन फैसलों से संतुष्ट भी रहते है। जसवंतसिंह की पत्नी आज भी अपने लापता पति के मुहीम को जीवित रखे हुए हैं। जसवंतसिंह खालड़ा के खुद के गायब हो जाने के केस में न्याय मिलने में बारह वर्ष लग गए थे यह भी याद रखने लायक बात है। 


पंजाब में आतंकवाद, पुलिस और मानवाधिकार की बहस

    अब मेरा मत, प्रकृति का नियम है, दो सांड लड़ रहे होतें है न.. तब सबसे ज्यादा नुकसान उस घास का होता है, जिस मैदान में यह सांड लड़ रहे होतें है। जब तुम्हारी भूमि पर अलगाववाद और आतंकवाद पनप रहा है, तो तुम भी उतने ही दोषी हो। और मैं तो इस विचार से ही असहमत हूँ, कि आतंकवादियों के भी मानवाधिकार होतें हैं। अबे वो मानवों को ही मार रहा है, उसके पास एक मक़सद है, तुम उसके लिए भी मानवाधिकार की बात करोगे। अगर मेरा पड़ोसी मेरी ही जाति धर्म का है, और वह अलगाववादी सोच रखता है, या फिर आतंकवाद को सपोर्ट कर रहा है, तो मैं उसे पुलिस को खुद जाकर बताऊंगा। या राह देखता बैठूंगा, कि इसे पुलिस खुद ढूंढते हुए आएगी। पंजाब में पुलिस को ढूँढना पड़ा है ऐसे लोगों को। 


    यूँ तो मानवाधिकार वालों का भी दबाव रहना चाहिए व्यवस्था पर। अन्यथा एक अकॉउंटेबिलिटी नहीं रहेगी। पर यह महाशय केवल और केवल पुलिस कार्यवाहियों पर ही अड़े रहे थे। खालिस्तान की मांग करते आतंकवादियों पर भी तो कोड़े बरसने चाहिए। अगर दो अपराधियों के पकड़ने में एकाध निर्दोष आहत होता है, तो उसे निर्दोष द्वारा दिया गया बलिदान माना जाएगा। मैं अपराध करता हूँ, तो मेरे परिवार को भी भुगतना होगा। अगर मेरे आपराधिक पैसों से मेरा घर चला है तो घर भी दोषी है। जैसे बाप की संपत्ति पर पुत्र का अधिकार है, तो बाप के ऋण को भी पुत्र को ही चुकाना होगा। 


मेरा व्यक्तिगत मत

    इस फिल्म में अगर दोनों पक्षों को रखा जाता, तब तो मैं इस फिल्म को उचित ठहराता। लेकिन इस फिल्म में सारी ही कहानी एकतरफा चलती है। किसी ने यह सोचा है, कि एक अपराधी को पकड़ने के लिए पुलिस को कितने सारे निरपराधियों से बहस में उतरना पड़ता है। नहीं समझ सकते। क्योंकि वह हमारा काम नहीं है। हमें अपने कम्फर्ट की परवाह है बस। हमारे अधिकार हमारे तब तक ही है, जब तक हमारे आसपास कोई अपराध नहीं होता। जब हमारे आसपास कोई अपराध होता है, हम वह मैदान है, जहाँ अब पुलिस और अपराधी जैसे सांड की लड़ाई होगी। 


निष्कर्ष

    जसवंतसिंह खालड़ा के साथ बुरा हुआ। आज तक उनका शव भी नहीं मिला है शायद। लेकिन खालड़ा जी कनाडा पहुँच गए थे। घर की बात बाहर ले गए थे। जैसे हम समाज हर देश में अच्छे बुरे लोग दोनों होते है, वैसे ही एक ही व्यक्ति के पक्ष भी दो होते है, अच्छे और बुरे। हो सकता है, मैं दूर से देख रहा हूँ, तो मुझे धुंध में दीखते कुछ चित्रों में स्याह ज्यादा दिखाई पड़ता हो। लेकिन जो दिख रहा है, उस पर से कह सकता हूँ, इस फिल्म में एक प्रोपेगंडा है। जो उस भावना को पुनः जागृत करती है, जो '84 के बाद पंजाब में आहत हुई थी। 


    शुभरात्रि, 

    ०९/०७/२०२६

|| अस्तु ||


प्रिय पाठक,

क्या आपने सतलुज फिल्म देखी है?

आपकी राय क्या है? क्या यह फिल्म संतुलित लगी या एकतरफ़ा? अपने विचार टिप्पणी में अवश्य साझा करें। 


सतलुज फिल्म किस विषय पर आधारित है?

सतलुज फिल्म पंजाब में आतंकवाद के दौर, पुलिस कार्रवाई और मानवाधिकार से जुड़े विवादों की पृष्ठभूमि पर आधारित कहानी प्रस्तुत करती है।

क्या सतलुज फिल्म वास्तविक घटनाओं से प्रेरित है?

फिल्म को वास्तविक घटनाओं से प्रेरित बताया जाता है और इसमें मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा से जुड़े प्रसंगों का संदर्भ मिलता है।

क्या यह लेख फिल्म की आधिकारिक समीक्षा है?

नहीं। यह लेखक की व्यक्तिगत राय और अनुभव पर आधारित ब्लॉग पोस्ट है।

📖 थोड़ी देर और ठहरो प्रिय पाठक,


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