डिंगळ, त्रोटक छंद और चारणी साहित्य: एक अधूरी बातचीत | प्रियम्वदा

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डिंगळ, त्रोटक छंद और चारणी साहित्य: एक अधूरी बातचीत


डिंगळ साहित्य, त्रोटक छंद और चारणी साहित्य पर चिंतन करते लेखक

जाति, श्रेष्ठता और राजपूती परंपरा की एक बात

    क्या ही कहर ढा रहा है यह अगस्त प्रियम्वदा !

    दस दिनों में तुमसे कहने जैसा कुछ भी तो न हुआ। हाँ ! आजकल क्या सुन रहा हूँ वह तुम्हे बता सकता हूँ। मैं जो बताऊंगा, उसके लिए हमेशा की तरह एक लॉन्ग टर्न लेकर आऊंगा, तुम्हे तो पता ही है। अभी कुछ दिनों पहले जयपुर में आरक्षण और ugc बिल के विरुद्ध आंदोलन हुआ। हमेशा की तरह चुनिंदा राजपूतों ने इस आंदोलन में हिस्सा लिया, और हमेशा की ही तरह यह आंदोलन भी कुछ खास झंडा नहीं गाड़ पाया। 


    मैं थोड़ा सा जातिवादी हूँ। क्योंकि मैं मानता हूँ, कि जातिवाद में कोई बुराई नहीं। हाँ ! जातिवाद के नाम पर दूसरी-तीसरी जाति को भला-बुरा कहना गलत मानता हूँ। जातिवाद क्या है? अपनी जाति को श्रेष्ठ बताना। अब जब अपनी जाति को श्रेष्ठ बताते हो, तो दूसरी जातियां अपने आप श्रेष्ठता के मापदंड में पीछे हो जाती है। यही एक समस्या है। खैर, राजपूतों के विवाह में आज भी ढोल पूजने की एक रस्म है.. मतलब ढोल बजाने वाले का भी आदर तो करते ही होंगे। 


जैसलमेर, मांगणियार और प्रशस्ति गीत

    राजस्थान के जैसलमेर के आसपास 'मांगणियार' लोग बहुत है। और उनके नाम के पीछे खान लगता है। महफिलों में सुरों का रंग यही लोग चढ़ाते आए है। जैसलमेर को जैसाण भी कहा जाता रहा है, तथा जैसलमेर के भाटी शासकों की प्रसस्ति में एक प्रसिद्द लोकगीत है, "अमर रहो जैसाण राज गिरधर के प्यारे लाल.." ऐसा ही एक और प्रसिद्द गीत है, "जुग जुग में जियो जैसाण धणी.." यह एक प्रशस्ति गीत है, राजा को रिझाने का गीत। जैसे जोधपुर राज्य का राजगीत हुआ करता था, "धूंसौ बाजे.." 


चारण कवि और डिंगळ साहित्य की परंपरा

    काफी लोगों ने यह "जुग जुग में जियो जैसाण धणी.." गीत गाया है, पर आजकल सायरखान द्वारा गाया गीत ज्यादा प्रसिद्द है। और इस गीत का प्रसिद्द होने का कारण मुझे लगता है त्रोटक छंद है। चारणकवि अळशीदान रतनू द्वारा त्रोटक छंद में रचित 'वरसाळे रा छंद' डिंगळ साहित्य की मनमोहक रचना है। कच्छ-सौराष्ट्र और राजस्थान में चारण जाति को बहुत ज्यादा सम्मान दिया गया है। ज्यादातर राज्यों में राजकवि चारण जाति के ही लोग हुआ करते थे। बहुत बड़े बड़े कवि चारण जाति से आए है। 


    मुग़ल बादशाह अकबर के दरबार में भी एक चारण कवि थे, दुरसा आढा। और अकबर की सभा में उन्होंने ने 'विरद छिहतरी' सुनाई थी। 76 सोरठे थे, जिसमे महाराणा प्रताप को अकबर से श्रेष्ठ कहा गया था, 

        "अकबर पथर अनेक, भूपत कैं भेळा किया,
        हाथ न आवे हेक, पारस राण प्रतापसी"..


    ...अब बात ऐसी है, मैं भूल चूका हूँ, मैं कहना क्या चाहता था। अजीब सोमवार था आज, सुबह से रात हो गयी, लेकिन सवेरे मिले कुछ समय में लिखी इन बातों को पूरा करने का समय नहीं मिला। अब इसे कल अपडेट करूँगा। 

*****


    हालाँकि समय तो आज भी नहीं मिल पाया है। फ़िलहाल आठ बजने में पंद्रह-सोलह मिनिट बाकी है। तो सोच रहा हूँ, फिर से कल पर टाल देता हूँ। 


त्रोटक छंद क्या है?

    बात शायद त्रोटक छंद की थी, त्रोटक छंद मतलब चार सगण। एक पंक्ति में बारह वर्ण। तो लगभग सारा ही चारणी साहित्य डिंगळ में है। मैं अभी तक तय नहीं कर पाया हूँ, कि डिंगळ को भाषा के तरह गिनु, बोली की तरह, या बस साहित्य की एक शैली के रूप में। 


        कितरा अवनीपत रूप किया,
        कठठी लस कांठळ काजळिया,
        प्रथमी चित पूरण आस पिया,
        लपट्यो शुच बारह मैघ लियां,
        ब्रखभाण जैसाण निवांण भरो,
        मतवाळ घुरै मुधरो, मुधरो।।


    यह अळशीदान रतनू रचित वरसाळे रा छंद की पंक्तियाँ है। अवनीपत माने अवनि का पति, मेघ। प्रथमी यानि पृथ्वी। शुच माने पवित्र। जैसाण अर्थात जैसलमेर। निवांण माने नीची जमीन, या तालाब। ब्रख का सन्दर्भ बरखा, वर्षा से है। मतवाळ मतवाला, मुधरो - मधुर। डिंगळ के शब्दों में एक बल होता है, और बलपूर्वक ही बोले जाते है। 


    चलो, अभी आगे की बातें फिर कल..

*****


उलटी बात और त्रोटक छंद

    माफ़ करना प्रियम्वदा ! बात ऐसी है, कि यह अधूरी लेखनी भी इसी लिए पूरी कर रहा हूँ, क्योंकि फ़िलहाल फ़ोन चार्ज पर रखा है। दरअसल मैं 'अवतार - द लास्ट एयरबेंडर' सीरीज़ देख रहा हूँ। और मुझे बड़ी पसंद भी है। अवतार द लास्ट एयरबेंडर मूवी भी मैं काफी बार देख चूका हूँ। दूसरे सीजन का तीसरा अध्याय देख रहा था, और फ़ोन ने दम तोड़ दिया। 


    खैर.. इसी बिच त्रोटक छंद में मैंने भी गुजराती में कुछ पंक्तियाँ लिखी। जिसका भावार्थ था, मैं हमेशा उलटी बातें ज्यादा करता हूँ। जैसे कि शोषण करने में कोई आरक्षण आड़े नहीं आता, इस लिए हर राजनेता कर सकता है। उसके शोषण से अगर कोई नाराज होता है, तो दूसरे-तीसरे मत (वोट्स) की ढाल है उसके पास। इस लिए उसे भरपूर शोषण करना चाहिए। 


    मैं चाह तो रहा था, कि उन पंक्तियों का मैं हिंदी अनुवाद करूँ, और मैंने त्रोटक में एक पंक्ति बाँध भी ली थी, "उलटी मत बात अनंत करै.." पर फिर मैं ठहरा आलसी जिव। जो तुमसे यह सारी बातें बताने में भी इतने दिनों का समय ले रहा हो, वह छंद में बाँधने जैसा श्रम पूर्ण कार्य क्यों ही करे..?


    शुभरात्रि,

    १२/०८/२०२६

|| अस्तु ||


प्रिय पाठक, 

इतिहास, साहित्य और मेरी अधूरी बातों का यह सिलसिला पसंद आया हो, तो अगली चिट्ठी के लिए फिर लौटकर आइए।


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

त्रोटक छंद क्या है?

त्रोटक छंद चार सगणों से बना छंद है। इसकी प्रत्येक पंक्ति में सामान्यतः बारह वर्ण होते हैं।

डिंगळ साहित्य क्या है?

डिंगळ राजस्थान और पश्चिम भारत की चारणी साहित्य परंपरा से जुड़ी साहित्यिक भाषा और शैली है, जिसमें वीर, श्रृंगार, प्रशस्ति और प्रकृति से जुड़े काव्य की समृद्ध परंपरा रही है।

चारणी साहित्य क्या है?

चारणी साहित्य चारण कवियों की समृद्ध काव्य परंपरा है। इसमें वीरगाथा, प्रशस्ति, इतिहास, भक्ति और लोकजीवन से जुड़े अनेक प्रकार के काव्य मिलते हैं।

अळशीदान रतनू कौन थे?

अळशीदान रतनू चारण कवि थे। उनकी रचना 'वरसाळे रा छंद' डिंगळ साहित्य की उल्लेखनीय रचनाओं में गिनी जाती है।

मांगणियार कौन हैं?

मांगणियार राजस्थान की प्रसिद्ध लोकसंगीत परंपरा से जुड़े समुदाय हैं। जैसलमेर और पश्चिमी राजस्थान में इनके लोकगीत और गायन की विशेष पहचान रही है।



📖 थोड़ी देर और ठहरो प्रिय पाठक,


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