कच्छ की ओर एक छोटी-सी यात्रा
प्रियम्वदा !
गजब का समय चल रहा है.. कुछ भी लिखने को जरा भी मन नहीं करता है अब। दिन भी तो बड़ी तेजी के साथ पसार हो रहे है। कब सवेरा हुआ, कब शाम ढली, कब व्यस्त हुए, कब थके, और कब झुकाम से हुई बंद नाक ने कुछ देर के लिए रोक लिया, कुछ भी तो नहीं पता चल रहा।
बीते शनिवार को ममेरे भाई आए थे। इस बार उनके वहां जरा भी बारिश न हुई। खेत में मूंगफली का बालमरण हो जाने से, इस वर्ष अब और कोई काम रहा नहीं। तो सोचे घूम आते है, यूँ तो किसानी में फुर्सत मिलती नहीं, ऊपर से यह अकाल, तो इष्ट आराधना से उत्तम क्या ही हो? शारदीय नवरात्री में कच्छ की देशदेवी आशापुरा का माहात्म्य अनन्य है।
शनिवार रात को जब ऑफिस का हिसाब किताब मिला रहा था, तो रात के साढ़े नौ बज गए। सरदार भी घूमने गया था, तो जिम्मेदारियों का बोझ उठाने के लिए, मेरे अलावा ओफ्फिसिया मजदूर उपलब्ध भी तो नहीं होता कोई। साढ़े नौ बजे भी जब चार अंकों में हिसाब का फर्क बाकी रहा, तो सर खुजाना छोड़, जो होगा वह देखा जाएगा सोच घर के लिए निकल पड़ा। सवेरे जल्दी करते करते भी साढ़े नौ बजे ही माता के मढ के लिए निकलना हुआ। तकरीबन साढ़े तीन घंटे का रास्ता, उसमे भी भुज तक तो फोर लेन हाईवे.. और क्या ही चाहिए?
मानकुवा की कुल्फी और देशलपर के गांठिया
भुज के बाद सिंगल सड़क है, और बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है ओवरटेकिंग में। भुज से निकलते ही मानकुवा की कुल्फी बड़ी प्रसिद्द है। उस हाईवे से गुजरते लगभग यात्री वहां रुकते ही रुकते है। मैंने भी रोक ली। केशरपिस्ता की ज्याफत उड़ाकर फिर निकले, तो दोपहर साढ़े बारह माता के मढ।
अभी तो छह दिन पड़े थे नवरात्री शुरू होने में, इसी कारणवश काफी कम भीड़ थी। एक बजे मंदिर बंद हो जाए उससे पूर्व ही दर्शन भी हो गए। दोपहर की गर्मी तेज थी, लेकिन कच्छ की समंदर में सानी हवाएं उस गर्मी पर मरहम भी लगाती है। थोड़ी देर बाजार घूमे, और हमेशा की तरह कुँवरुभा ने एक और JCB मशीन का खिलौना खरीद ही लिया। हालाँकि पिछले दो सप्ताह में टम्बल टावर, MAGMATES, जिगसॉ पजल जैसी कईं गेम्स मैंने लाकर दी है। फिर भी JCB का मोह उन सब पर भारी पड़ता है।
खैर, थोड़ी देर बाद ही घर के लिए निकल पड़े। रस्ते में देशलपर गाँव पड़ता है। देशलपर के लसणीया गांठिया और पेडा बड़ा मशहूर है। हुकुम का सख्त आदेश था, कि गांठिया बिना भूले लाना है। पिछले कईं दिनों की कठिन चर्या के पश्चात मुश्किल से उनका शुगर लेवल कण्ट्रोल में आया है। पर गुजराती आदमी बेसन का मोह कैसे ही छोड़े? गांठिया के लिए तीसरी बार जब उनका फोन आया, तो मैंने सहज विनोद में कह दिया कि देशलपर तो पीछे छूट गया, हम तो आगे बढ़ चुके है। तब उन्होंने फ़ोन पर जो लताड़ लगाई थी, एक बार को लगा था, कि कहीं वे फ़ोन में से ही चाटा न जड़ दें।
चाड़वा रखाल और श्री शक्ति स्थल
घरवापसी में भुज से पहले सामत्रा गाँव आता है। सामत्रा और वाडासर के बिच स्थित है चाड़वा रखाल। रखाल कच्छी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ वन / बीहड़ से है। इस बीहड़ में तेंदुए है, पानी के स्त्रोत में मगर भी है। पहले यह क्षेत्र कच्छ महाराओ की निजी संपत्ति थी, बाद में वन विभाग ने अपने अधिकार में ले लिया। कच्छ महाराओ श्री प्रागमलजी तृतीय ने अपनी पत्नी प्रीतिदेवी जी - जो त्रिपुरा राजघराने की राजकुमारी है - उनके लिए श्री शक्ति स्थल का निर्माण इसी रखाल में करवाया है। यहाँ मुख्यतः पांच देवियां विराजित है, हिंगलाज, रुद्राणी, मोमाई, महाकाली तथा त्रिपुरा सुंदरी। उपरांत यहाँ बावन शक्तिपीठों की प्रतिकृति स्थापित की गयी है।
वन तथा छोटी टेकड़ीयों के बिच यह रमणीय स्थान शांत और प्रकृति के मोहपाश में जकड़ लेने वाला है। लाल और पिले पत्थरों से निर्मित यह स्थापत्य से थोड़े ही दूर प्रागसर जलाशय है, और वहां वन और गहरा है। खँडहर हो चुकी इमारतों के अवशेष खड़े है। थोड़ी ही दूरी पर पश्चिमेश्वर महादेव की गुफा है।
अंजार : इतिहास, अजेपाळ और जैसल तोरल
यहाँ तो मैं पहले भी दो-तीन बार आ चूका हूँ। वहां से निकले, तो कुछ ही देर में अंजार। अंजार ऐतिहासिक नगर है। अंजार के लिए कहा जाता है, कि अंजार नाम अजमेर के शाशक अजयपाल चौहान के नाम पर से आया है। यहाँ अजेपाळ मंदिर भी है। मैं जब भी यहाँ आता हूँ, तब तब सोचता हूँ, कहाँ अजमेर, कहाँ यह कच्छ, कोई लिंक ही स्थापित नहीं हो पाती। न इतिहास की दृष्टि से, न ही किसी तर्क से। पर कईं लोगों ने लिखा है, तो मैं भी स्वीकार लेता हूँ, कि हाँ ! अंजार यानी अजेपाळ का अंजार। वैसे भी लोकोक्ति है, "अंजार नगरी ने अजेपार धणी, वस्ती थोड़ी ने अदेखाई घणी" अर्थात अजेपार के अंजार में बस्ती कम है, पर ईर्ष्या ज्यादा है। वर्तमान में अंजार प्रख्यात है जैसल तोरल की समाधि के लिए।
यहीं अंजार में ब्रिटिश पोलिटिकल एजेंट मैकमर्डो का बंगलो था, जो आज खँडहर हो चूका है। यह बंगलो रामायण पण आधारित भिंतचित्रों (WALL PAINTINGS) के लिए मशहूर था। अंजार गढ़ का नामोनिशान मिटने की कगार पर है। खैर, रात्रि का अँधेरा छाते ही घर पहुँच चुके थे।
नवरात्रि चौक की तैयारी
पर बात यहीं ख़त्म कैसे करूँ प्रियम्वदा ! कईं दिनों के बाद जो यह सब लिखने लगा हूँ, तो रुकने का भी तो मन नहीं करता। बीती रात एक बजे तक हमने नवरात्री चौक में काम किया है। प्रियम्वदा ! कमाल की बात है, पहले हम लोग तो एक सप्ताह पूर्व से गड्ढे खोदने में लग जाते थे, क्योंकि वर्तुलाकार मंडप के पोल खड़े करने होते थे। इस बार महेनत करने वालों की गैरहाजरी के चलते सीधे ही मंडप डेकोरेशन वाले को भाड़े पर काम दे दिया गया। उसने दो घंटे में पूरा मंडप खड़ा कर दिया। और कल रात हमने डेकोरेटिव लाइट्स और साउंड सिस्टम वगैरह काम निपटा दिए। अब तो केवल दो फोकस लाइट्स लगाने बाकी है..
इस बार दिवाली वाली ट्रिप भी कैंसिल हो चुकी। मन तो खूब है, कि बाइक लेकर निकल पडू, लेकिन कहाँ? मुझे नहीं लगता है कि अब मैं कहीं भी निकल सकता हूँ, अपनी मन मर्जी के तले..
शुभरात्रि,
०७/१०/२०२६
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक,
कच्छ की इस छोटी-सी यात्रा में आपको सबसे दिलचस्प क्या लगा — आशापुरा माता, चाड़वा रखाल या अंजार? अपनी बात नीचे कमेंट में जरूर बताइए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
आशापुरा माता मंदिर कच्छ में कहाँ स्थित है?
आशापुरा माता का प्रसिद्ध मंदिर कच्छ के माता नो मढ में स्थित है। यह कच्छ की प्रमुख धार्मिक आस्थाओं में से एक है और नवरात्रि के दौरान यहाँ विशेष महत्व रहता है।
माता नो मढ क्यों प्रसिद्ध है?
माता नो मढ कच्छ की आराध्य देवी आशापुरा माता के प्रमुख धाम के रूप में प्रसिद्ध है। देशभर से श्रद्धालु यहाँ माता के दर्शन और आराधना के लिए आते हैं।
चाड़वा रखाल कहाँ स्थित है?
चाड़वा रखाल कच्छ में सामत्रा और वाडासर के बीच स्थित वन क्षेत्र है। यह अपने प्राकृतिक वातावरण, छोटी पहाड़ियों और धार्मिक स्थलों के कारण विशेष आकर्षण रखता है।
अंजार किस लिए प्रसिद्ध है?
अंजार कच्छ का एक ऐतिहासिक नगर है। यह जैसल तोरल की समाधि, अजेपाळ मंदिर और ब्रिटिश काल के राजनीतिक एजेंट मैकमर्डो के बंगले जैसे ऐतिहासिक संदर्भों के लिए जाना जाता है।
कच्छ की यात्रा में कौन-कौन से स्थान देखे जा सकते हैं?
कच्छ की यात्रा में आशापुरा माता का माता नो मढ, भुज, मानकुवा, चाड़वा रखाल, अंजार और आसपास के कई ऐतिहासिक एवं प्राकृतिक स्थल देखे जा सकते हैं।
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