वही झरोखे, वही स्थापत्य: हिन्दू-मुस्लिम महलों की एकजैसी छाया
आज तो दिनभर मैप्स में ही पड़ा रहा हूँ प्रियंवदा.. गांव के नाम पढ़ते ही कुछ कुछ याद आता, कुछ रिवीजन हो जाता। वैसे आज दो मुद्दे अभी मेरे दिमाग मे चल रहे है। दोनो ही विचारणीय है। सुबह आज ऑफिस पहुँचा, तो महावीर जयन्ती के कारण सरकारी काम सारे बन्द थे। तो गाड़ियां तो भर जाए लेकिन बिलिंग न हो पाए। इस कारण से बस छुट्टी भी थी और नही भी। तो लग गया अपने कंप्यूटर पर, एक टैब में वही गूगल मैप्स, और दूसरी टैब में ब्लॉगर का मेरा ड्राफ्ट।
पिछले कुछ दिनों में मैंने बरडा प्रांत, ओखा मंडल, तथा खंभालिया से जामनगर तक के गांव खंगाल लिए थे। यूँ समजिये की सुदूर पश्चिम सौराष्ट्र नाप लिया मैंने। कुछ कुछ गांवों में गूगल मैप्स का ग्लिच है, तथा स्ट्रीट व्यू पहुंच नही पाया है। आज जामनगर से जूनागढ़ के मध्य के गांव देख रहा था। उनमे से दो तीन जगहें दिमाग मे रह गयी, एक तो गणोद गांव का दरबारगढ़, दूसरा सरदारगढ़ का पैलेस। सरदारगढ़ तो बाबी पठानों का था, जूनागढ़ बाबी पठानों के पास था। वही जूनागढ़ जिसने पाकिस्तान में मिलने के लिए दस्तखत किए थे। जूनागढ़ नवाब के एक पुत्र को बांटवा की जागीर मिली थी, उसने सरदारगढ़ में अपना पैलेस वगेरह निर्माण करवाया था।
स्थापत्य में मैंने एक बात नोटिस की है, पैलेस में हिन्दू मुस्लिम नही हुआ करता था, पैलेस एक जैसे ही लगते है। या फिर कारीगरों की मेहरबानी है। वही झरोखे एक राजपूती महल में होते है, वैसे ही मुस्लिम पैलेस में भी..! गढ़ की डिज़ाइन भी एक सी ही होती है। ज्यादातर गांवों में गढ़ नही, मात्र बुर्ज है। बुर्ज मतलब वह गोलाकार दीवार..! जिसपर चढ़कर शत्रुओं का सामना किया जाता था।
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Dharohar ki Chintaa Karte Dilawarsinh..! |
उपलेटा, धोराजी और खोती हुई भव्यता
फिर मेप में धीरे धीरे मैं मध्य सौराष्ट्र की और बढ़ रहा था और उपलेटा पहुंचा। एक समय पर उपलेटा तथा धोराजी जूनागढ़ नवाब के आधिपत्य में हुआ करते थे। लेकिन नवाब साहब अंदरूनी राजनैतिक खतरे में पड़े और गोंडल के भा'कुंभाजी ने जूनागढ़ की इस डामाडोल अव्यवस्था का लाभ उठाते हुए, जूनागढ़ नवाब की सुरक्षा की जिम्मेदारी ली। और बदले में उपलेटा और धोराजी अपने राज्य गोंडल में मिला लिए।
उपलेटा का दरबारगढ़ आज अपनी वह पुरानी भव्यता खो चुका है। कई जगह मरम्मत की जरूरत है लेकिन वही बात, सरकार या नगरपालिका इसमें इन्वेस्टमेंट क्यों करे भला? वैसा ही हाल धोराजी के दरबारगढ़ का है। धोराजी के दरबारगढ़ की डेली (एंट्रेंस गेट) तो अति भव्य है। झरोखे, जालीदार खिड़कियां और सुंदर मूर्तियां.. लेकिन अंदर अब तहसीलदार की ऑफिस है। सरकार ने इन ऐतिहासिक धरोहर को अपने कब्जे में तो ले लिया, लेकिन इनके रखरखाव पर कोई ध्यान नही देता..!
भाषा जोड़ती है, तोड़ने का काम क्यों कर रही है?
दोपहर को आज ऑफिस पर ही पड़े रहे। मेरी लिस्ट का आंकड़ा पचास को पार कर चुका था, इस लिए विराम ले लिया और रिल्स चलाने लगा। उपराउपरि दो-तीन रिल्स महाराष्ट्र की आयी.. उद्धव वाली शिवसेना आजकल अति-प्रांतवादी हो चुकी है। महाराष्ट्र में रहना है तो मराठी बोलो। यहां मैं थोड़ा कन्फ्यूज़ हूँ। मैं सहमत भी हूँ और असहमत भी। सहमत इस लिए हूँ कि यह हमारी अपनी जिम्मेदारी बनती है कि हम जिस क्षेत्र को अपनी कर्मभूमि बना रहे है वहां की भाषा का हमे ज्ञान होना आवश्यक है।
अगर हमें अमेरिका जाना है तो इंग्लिश बोलनी पड़ेगी। फ्रांस जाना है तो फ्रेंच सीखनी पड़ेगी। फिर अपने ही देश मे अन्य राज्य में जाते है तो उनकी भाषा उनके कल्चर को उतना महत्व नही देते है.. क्यों? इस मामले में मैं शिवसेना की बात से सहमत हूँ। लेकिन असहमत इस कारण से हूँ कि उद्धव वालो का तरीका गलत है। गुंडागर्दी करते है। मारपीट करते है। क्षमायाचना करवाते है और उसका वीडियो बनाते है। इस तरह जोरजबरजस्ती करने से सामने वाला और चिढ़ता है। और बात भाषाकीय अपमान तक पहुंच जाती है। यूँ तो हमारे यहां गिरनार पर कई सारे मराठी लोग भगवान दत्तात्रेय के दर्शन को आते है। तो क्या हम लोग उनसे यह कहने लगे कि 'पानी नही पाणी' बोला करो?
मैं जिस शहर में रहता हूं वहां सारे देश के लोग आकर बसे है। हर राज्य का आदमी मेरे शहर में बसता है। हाल तो यह है कि अब तो कभी कभार मैं अपने घर पर हिंदी के कुछ शब्द बोल जाता हूँ। लेकिन इसका अर्थ यह तो नही की मैं अपनी भाषा से प्यार नही करता या अपनी भाषा अन्य राज्यो से आये लोगो पर थोप दूँ। इस भाषाकीय मामले में मैं राजस्थानियों को बखानता हूँ। मैं जितने राजस्थानियों से मिलता हूँ, वे लोग बात की शुरुआत तो गुजराती में जरूर से करते है। 'केम छो बापु, शुं हाल चाल?' वगेरह वगेरह। इससे आगे की बातचीत का दौर बंध जाता है और थोड़ी सहजता आ जाती है। लेकिन वहीं अगर वह हिंदी में बोलता है तो एक निश्चित दूरी सी बनी रहती है। भाषा हमेशा जोड़ने का काम करती है। लेकिन अपने यहां लोग भाषा के द्वारा तोड़ने पर उतारू हो चले है।
जातिवाद की राजनीति बनाम राजघरानों की गरिमा
फिर एक और सोचने लायक मुद्दा रील तथा यूट्यूब दोनो ने दिया.. गोंडल के जयराजसिंह बहुत लाइमलाइट में रहते है। हुआ कुछ यूं है कि राजस्थान का एक लड़का 'राजकुमार जाट' नाम का था, उसकी गोंडल में मृत्यु हो जाती है। उसकी मृत्यु का आरोप गोंडल के पूर्व MLA, तथा वर्तमान MLA गिताबा के पति जयराजसिंह पर। राजस्थान की विधानसभा में हनुमान बेनीवाल अपनी बारी आने पर, अपने क्षेत्र की उन्नति के मुद्दे छोड़कर, जातिवाद को घसीटता हुआ जयराजसिंह का मुद्दा वहां उठाया उसने। उसके अनुसार जयराजसिंह ने अपनी पावर का इस्तेमाल करके राजकुमार जाट की मृत्यु का केस रफादफा कर दिया।
गुजरात पुलिस यह केस देख ही रही है। जयराजसिंह ने अपने आरोप के प्रति अपने घर का CCTV फुटेज तक पब्लिक कर दिया है। आझादी के इतने वर्षों पश्चात भी कुछ राजनेता कभी भी जातिवाद से नही उभर पाएंगे.. उनके पास मुद्दा ही शायद यह है। एक वो UP से राणा सांगा पर बोलता है, एक यह जाट जाट करता राजस्थान से उठ आया.. अबे वैज्ञानिक तरक्की की और बढ़ो, राजाओं से राज ले लिया है, इज्जत तो रखो कम से कम। यह लोग पूर्वाग्रह से पीड़ित है। सत्तर वर्षों से यह लोकतंत्र उन्ही पैलेस या दरबारगढ़ से राजतंत्र चला रहा है जिन्हें राजाओं ने ही सरकारश्री को सौंपा था। एक कोई वीडियो आया था, दिल्ली या राजस्थान बैठा-बैठा जयराजसिंह को चैलेंज दे रहा है, बस जाट होने के कारण। ऐसे मुद्दों में कुछ लोग प्रसिद्धि प्राप्त करने को कूद ही पड़ते है। वरना स्थिर बुद्धि तो यही कहती है कि सत्ता के आगे शाणा नही बनना चाहिए। गुजरात मे जातिवाद है, लेकिन उतने स्तर पर नही जितना अन्य राज्यो में है।
मैदान की रात, चंद्रमा की चुप्पी और ट्रक्स का संगीत
खेर, घर आकर दुकान पर गया, लेकिन वहां आज बैठने का जुगाड़ नही था। जहां बैठा करता हूँ वहां आज पानी गिरा हुआ था तो आज भी मैदान में ही आ गया। आज हवाएं मुक्तमन से बह रही है। वह भी ठंडा पवन है। दिनभर चिलचिलाती धूप, लू, और अभी यह ठंडा पवन.. प्रकृति को वैसे भी कौन समझ पाया है। एक बार लाइट जा चूकी, फिर लौट आयी, अभी फिर से चारोओर तमराज किलविष का अंधेरा कायम हुआ पडा है। लेकिन मजे की बात यह है कि यह मैदान बड़ा शांत है, और ऊपर इस चंद्रमा की रोशनी.. ठंडा पवन.. बिना लाइट के कारण छाए इस सुनकार को भंग करते हाइवे पर लगातार गुजरते ट्रक्स.. और ट्रक्स की तरह तरह की धुन वाले होर्न्स.. लाइट तो पता नही कब आएगी प्रियंवदा.. अब साढ़े ग्यारह होने को आये।
शुभरात्रि..
(१०/०४/२०२५, २३:१६)
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