अक्षत गुप्ता की द हिडन हिन्दू 2 की कहानी कैसी है?
प्रियम्वदा !
अब मैं इस बात से पूर्णतः सहमत हूँ, कि लेखक अक्षत गुप्ता की द हिडन हिन्दू पढ़नी ही चाहिए। अभी अभी द्वितीय भाग पढ़कर पूरा किया है। दोपहर का एक बज रहा है। २-३ दिन लगे मुझे। करीब करीब ढाईसौ पन्ने है। पिछले भाग से ज्यादा रोमांच एवं रहस्य इसमें हैं। और इस भाग का अंत उस शिखर पर जाकर रुका है, जहाँ से तृतीय भाग का आरोहण करना अनिवार्य हो जाता है। श्रृंखला के इस शिखर से लौटने का मार्ग, शायद लेखक अक्षत गुप्ता की कलम ही अवरोधित करती है।
चिरंजीवियों और सनातन रहस्यों का संसार
अक्षत गुप्ता के इस भाग में हिन्दू या सनातन परंपरा से जुडी और भी कुछ बातों को बड़ी ही चतुराई से समाहित किया है। बेशक वह माहितियाँ हमें और महितगार करती है, इस विस्तृत धर्म से, सनातन से। आयुर्वेद हो, खगोलविज्ञान हो, या फिर अंक गणित, वैदिक सनातन परंपरा के समस्त आवरणों को इस भाग में कहीं न कहीं उपयोग में लिया गया है। सनातन परंपरा के वे प्रमुख सात चिरंजीवी भी इस कथा में सम्मिलित है। और असुरगुरु भी।
क्या द हिडन हिन्दू 2 पढ़नी चाहिए?
लेखनी पाठक को बांधे रखने में सक्षम है। इस दूसरे भाग के बाद भी कुछ भयंकर प्रश्नों को अनुत्तरित रखा गया है। पिछले यानि की द हिडन हिन्दू के प्रथम भाग के प्रश्नों का इस भाग में जरूर से समाधान किया है, फिर भी शुरुआत से जन्मे कुछ प्रश्नों का निराकरण, और इस दूसरे भाग के अंत में उठे प्रश्नों की खोज तीसरे भाग में ही जाकर पूरी होगी। आज भी यह समीक्षा लिखने से पूर्व तृतीय भाग पढ़ लेने का मन कर रहा है।
ओम शास्त्री और नागेंद्र का रहस्य
द हिडन हिन्दू श्रृंखला के इस दूसरे भाग में एक दौड़ मची हुई है। अवेंजर्स फिल्म देखि होगी जिसने, उसे यह द्वितीय भाग कुछ वैसा ही लगेगा। उस फिल्म में थनोस पांच मणियों की प्राप्ति के लिए उत्पात मचाता है, ठीक उसी तरह इस किताब में कहानी के खलनायक का एक शिष्य नागेंद्र, तबाहियाँ मचाता है। कहानी का नायक 'ओम शास्त्री' इस पूरी किताब में एक उलझन में रहा, अपने भूतकाल को खोजने की उलझन। उसकी इस उलझन में तीन चिरंजीवी उसकी सहाय करते है।
कैलाश पर्वत और मिलारेपा का रहस्य
और साथ ही नागेंद्र द्वारा होते मानवता के विनाश को रोकने के लिए भी वे लड़ते है। इस किताब में चार चिरंजीवी आते है। सनातन परंपरा में सात चिरंजीवी है - राजा बलि, वेद-व्यास, परशुराम, विभीषण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, और हनुमान। इस कहानी में कृपाचार्य, अश्वत्थामा, परशुराम, और वेदव्यास है, जो समय समय पर नागेंद्र को रोकने के प्रयत्न करते है। कैलाश पर्वत की अद्भुत सृष्टि का वर्णन है। मिलारेपा, जिन्हे एक मात्र कैलाश पर चढ़ने वाला मानव माना जाता है, वह भी इस कहानी में शामिल है, उनकी अपनी कहानी भी इस कहानी सम्मिलित की गयी है।
रूपकुंड, कुलधरा और तेजो महालय
आस्था का मानसरोवर, कंकालों के रहस्य से भरा रूपकुंड, अग्रवन का तेजो महालय (ताजमहल), और शापित कुलधरा जैसे रहस्यपूर्ण स्थानों को एक रोमांचक कहानी में समाहित कर, एक स्थान से दूसरे स्थान तक पाठक मन को दौड़ाने में लेखक सफल रहे है। इस भाग में भी उत्कंठा, और आगे कुआ हुआ की बेचैनी सतत बनी रहती है।
सबसे मजेदार बात वह है, कि कईं बार एक साथ तीन-तीन कहानी एक साथ समांतर चल रही होती है। जैसे जैसे परतें खुलती जाती है, और एक कहानी के खत्म होतें ही पिछले अनुसन्धान शुरू हो जाता है। मैं अगर अपनी बात करूँ, तो मुझे इस तरह के पुस्तक जिसमे अगोचर विश्व हो, अमाप शक्तियां हो, और सतत रहस्य हो - वे हमेशा से प्रभावित करते हैं, अति प्रभावित भी। हो सकता है, मुझे यह बहुत ज्यादा पसंद आ रहा हो, और जिन्हे अलग श्रेणी पसंद हो उन्हें न भी आए।
कहानी के नायक, नायक के सहायक, खलनायक, खलनायक के सहायक, सबकी अपनी कहानी है, सबके अपने रहस्य। पिछले भाग में एक प्रश्न था, ओम शास्त्री कौन है, उसकी पूर्वकहानी क्या है? इस कहानी में प्रश्न निकलकर आया नागेंद्र कौन है, देवध्वज कौन है? उत्कंठा को चरम पर लाकर अगले भाग की प्रतीक्षा करवाना, यही तो होती है एक सफल लेखक की पहचान।
मेरी व्यक्तिगत राय
रही बात संवादों की, तो लेखक ने संवादों में सहजता से सारे भाव भरें है। भावनाओं की लहरे भी बड़ी शीघ्र आती-जाती है। जैसे वृषकपि का घायल होना। मिलारेपा की मृत्यु। नागेंद्र की वेदव्यास को खुली चुनौती। और उस पनडुब्बी वाले प्रतिबंधित कक्ष का व्यक्ति। एल.एस.डी. का अपना रहस्य भी कितना ज्यादा आश्चर्यजनक था। नागेंद्र का पात्र अभी तक सही से समझ नहीं आ रहा है। और एक बात भी, कि यह लोग इतनी गति से एक स्थान से दूसरे स्थान तक कैसे पहुँच जा रहें हैं।
कहानी की सबसे रोचक बातें
मुझे एक और बात ने आकर्षित किया। चिरंजीवी होने से, या वह अपार शक्तियों वाले लोग भी इस कहानी में बहुतायत मानवीय व्यवहार ही करते है। हाँ ! वह प्रसंग भी रोचक था, जब परशुराम, मिलारेपा और वृषकपि - तीनों अलग अलग स्थान के रक्षण हेतु प्रस्थान करते है, और वृषकपि को सिर्फ इस लिए पैसे चाहिए थे, क्योंकि उसे पता ही नहीं था, कि इस रंगीन कागज़ के टुकड़े का उपयोग क्या है? उसे वह सिर्फ इसी लिए चाहिए था, क्योंकि मिलारेपा को भी पैसा दिया गया था। जबकि उन सब में अलौकिक शक्तियां थी।
चलो अब तीसरे शिखर तक पहुँचने हेतु विदा दो।
शुभरात्रि।
२२/०५/२०२६
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक !
और यदि आपने यह पुस्तक पढ़ ली है, तो बताइए — आपके अनुसार नागेंद्र कौन है?
#TheHiddenHindu #AkshatGupta #BookReview #HindiBookReview #IndianBooks #MysteryBooks #Sanatan #Chiranjeevi #OmShastri #BookBlogger #HindiLiterature #FantasyBooks
