शरतचंद्र चट्टोपाध्याय का 'चरित्रहीन' : प्रेम, पीड़ा और गलतफहमियों का अमर उपन्यास | समीक्षा

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चरित्रहीन : प्रेम, विरह और मानवीय कमजोरियों की एक अद्भुत कथा

    प्रियम्वदा !

    मुझे यह भाव-विभोर कर देने वाले उपन्यास भी अति प्रिय है। लगभग दो सप्ताह बीता दिए मैंने यह उपन्यास पढ़ने में। पर मैं अपने मत से कह सकता हूँ, इस कहानी में सब कुछ है। अतृप्त प्रेम है, स्वीकारभाव है, स्नेह है, अपार पीड़ा है, विश्वासघात है, अस्वीकृत प्रेम का बदला भी है, और है बहुत सारी गलतफहमियां। लोग खुलकर व्यक्त नहीं होतें हैं, और बहुत सारे असुविधाएं स्वीकार लेते हैं। 


'चरित्रहीन' उपन्यास पढ़ता हुआ एक कार्टून पाठक – शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की प्रेम, विरह और पीड़ा से भरी कहानी।

चरित्रहीन उपन्यास की कहानी क्या है?

    जैसा कि उपन्यास का शीर्षक चरित्रहीन है, तो इस कहानी में भी चरित्र के संबंध में ही बातें है। मुख्यतः चार स्त्रियां है। सावित्री, सुरबाला, सरोजिनी, और किरणमयी। और चारों के चरित्र अलग है। कहानी में काफी सारे पात्र है। पर सतीश तथा सावित्री, और किरणमयी की कथा, यह दो कहानियां एक साथ चलती है। और इन दोनों कहानियों को जोड़ता है उपेंद्र। उपेंद्र नामक पात्र से शुरू हुई कहानी उपेंद्र पर ही अंत होती है। उपेंद्र एक वकील है, उसकी पत्नी है सुरबाला। उपेंद्र का मित्र सतीश है, जिसे वह छोटा भाई मानता है। इसके अलावा दिवाकर उसका ममेरा भाई है। एक और मित्र है हारान, जिसकी पत्नी है किरणमयी। तथा एक और मित्र है ज्योतिष वह भी बेरिस्टर है। बांग्ला कहानी है, और वर्ष 1917 में प्रकाशित हुई थी। तो इस कारण से उस समय की सामाजिक व्यवस्था, तथा कोलकाता शहर का वर्णन भी इसमें आता है।


सतीश और सावित्री : अनकहे प्रेम की पीड़ा

    कहानी कुछ यूं है, कि सतीश कोलकाता पढ़ने के लिए गया था। वहां मेस में काम करती सावित्री को वह दिल दे बैठता है। सावित्री एक कुलीन ब्राह्मण कन्या है, लेकिन विधवाधर्म का पालन कर रही है। वह भी सतीश को प्रेम करती है, पर सामाजिक बंधनों से मुक्त नहीं हो सकती। इन्ही सामाजिक बंधनों के कारण सतीश और सावित्री अपने प्रेम को अभिव्यक्त नहीं कर पातें है, और परिणाम स्वरूप सतीश सावित्री को एक चरित्रहीन स्त्री समझने लगता है। वहीं एक और उपेंद्र के मित्र हारान मृत्युशैय्या पर है, और उसकी पत्नी किरणमयी वाकई चरित्रहीन थी। किरणमयी का पात्र मुझे समझ ही नही आया पूरा उपन्यास पढ़ लेने के उपरांत। वह एक विदुषी की तरह बातें करती है, लेकिन फिर भी उसका वर्तन एक चरित्रहीन स्त्री का ही रहा। वह अपने पति से प्रेम न पा सकी। उसने सतीश में ढूंढना चाहा। सतीश ठीक उसी समय सावित्री से घृणा कर रहा था। 


शरतचंद्र के वाद-विवाद और दार्शनिक प्रसंग

    सतीश के बाद उसने उपेंद्र में अपना प्रेम खोजना चाहा। उपेंद्र अपनी पत्नी सुरबाला के प्रति अनन्य थे। किरणमयी ने सुरबाला के आदर्श पत्नीत्व के पथ पर चलते हुए अपनी पति की सेवा में मन पिरोया, पर उसके पति हारान मृत्यु को प्राप्त हुए। कहीं भी उसने अपने मोहक देह के उपरांत भी प्रेम प्राप्त न किया, तब तरुण दिवाकर को वह लेकर भाग निकली। इन सब घटनाओं के बीच बहुत सारी भाव-विभोर कर देने वाली घटनाए, पीड़ा का ऐसा अद्भुत वर्णन की पाठक खुद भी उस दर्द को महसूस करे, तथा प्रेम के पर्याय विरह की श्लाघा..! ईश्वर का अस्तित्व, वेद पुराणों की सत्यता पर प्रश्नार्थ चिन्ह, और भीष्म की तृषा के लिए अर्जुन द्वारा बाण मारकर गंगा को प्रवाहित करने जैसे प्रसंगों पर अद्भुत वाद-विवाद और तर्क प्रस्तुत किये गए है। वैसे सच कहूं, तो मुझे बहुत सारे यह वाद-विवाद बोझिल करने वाले लगें। मैं अपनी किसी समीक्षा में कह भी चुका हूँ, मैं उन सब बातों में नीरस हूँ। मेरे लिए तो कहानी का एक फ्लो बहता रहना चाहिए। पर वे वाद-विवाद इस उपन्यास में अप्रासंगिक नहीं लगते है। और ऐसे वाद-विवाद करने वाली किरणमयी चरित्रहीन क्यों हुई, यह प्रश्न बार बार उठकर खड़ा होता है।


अंग्रेजकालीन समाज और सामाजिक बंधनों का चित्रण

    प्रेम करना, और प्रेम की अभिव्यक्ति करना.. यह हमेशा से मुश्किल रहा है। पूरी कहानी में सतीश और सावित्री बस अपने भीतर एकदूसरे के प्रति प्रेम को पालकर जीते रहे। उन्होंने कभी व्यक्त न किया, सिवा जब सतीश खुद बीमार होकर मृत्यु के करीब था। उस समय के सामाजिक बंधन, उस समय की मेडिकल व्यवस्था, उस समय की देवी और दासत्व के बोध, वह सब इस उपन्यास में इस तरह आलेखित है, कि हमें लगता है कि हम भी उसी व्यवस्था में मौजूद है। वह अंग्रेजकालीन भारत था, तो विलायत जाकर पढ़ना भी ज्योतिष की माँ के मन मे अधर्म था। क्योंकि विलायत से पढक़र आने वाले देशी अंग्रेज बन जाते थे। कहानी में कईं जगह सतीश को भी चरित्रहीन दिखाया गया है, क्योंकि उसके और सावित्री के संबंध को हीनभावना से देखा गया था।


मेरी दृष्टि में चरित्रहीन उपन्यास

    यह उपन्यास ठीकठाक लंबी कहानी रहा मेरे हिसाब से। लगभग तीनसौ पन्ने की एक बहुपात्री कहानी। जनवरी 2006 में परिकल्पना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह उपन्यास मेरे हाथ लगा था। वही इंस्टागांव ही प्रचारक था। और इंटरनेट की सहायता से पीडीएफ ही प्राप्त की थी। मेरे कार्यालय में मुझे मिले खाली समय का सदुपयोग, मैं उपन्यास पढ़ने में ही व्यतीत कर रहा हूँ। अब प्रतिदिन दैनंदिनी नहीं लिखता हूँ, तो काफी समय बच जाता है। जब नहीं पढता हूँ, तो रील स्क्रॉल करता रहता हूँ। इसी चक्कर मे इंस्टागांव भी अब मुझे पुस्तकों से जुड़ी रील्स और डील्स ज्यादा दिखाने लगा है। खैर, इस पूरे उपन्यास में सभी पात्रों का एक अपना अलग चरित्र है। और अब मैं मेरे हिसाब से उन चरित्रों का बखान करता हूँ। ध्यान रहें, यह मेरा अपना अभिप्राय है।


उपेंद्र, सरोजिनी और दिवाकर के चरित्र

    सबसे पहला उपेंद्र। यह मुझे उतावला लगा। ज्यादा गहराई में उतरे बिना, जो दिखा, जो सुना, उसी पर भरोसा कर लेने वाला पात्र। लेकिन बाद में वही व्यक्ति सबसे ज्यादा निर्णायक भी रहा। उसका सब आदर करते थे। और सबके लिए वह एक आदर्श भी था। उसका अच्छा गुण यह था, कि वह अपनी पत्नी को विशेष मानता था। शुरुआत में जब स्वसुर की संपत्ति की बात आई थी, तब उसका चरित्र बिल्कुल ही अलग था। 


    दूसरा सतीश। इस पात्र के पास शारीरिक सौष्ठव है, अथाह संपत्ति है, और मानवता का प्रेमी है। पर बुद्धिहीन की भांति व्यवहार करता है। सावित्री से प्रेम करता था, तो उसका दासत्व स्वीकार रहा था। सावित्री से घृणा करने लगा, तो अपने आप को एकांतवास में धकेल दिया। किरणमयी के व्यक्तित्व को उसने प्रथम परिचय में ही जान लिया। किरणमयी को वह अपने पति के प्रेमपथ पर वापिस ले जा पाया था। और उसका छोटा भाई बनकर भ्राताधर्म का भी पालन किया। सरोजिनी के प्रति उसने नया आकर्षण अनुभव किया। लेकिन वहां भी उसने अभिव्यक्त नहीं किया। इंशोर्ट बल है, पर बुद्धि नहीं है। खुद की फिक्र है, और नहीं भी।


    तीसरा पात्र सरोजिनी। यह अंग्रेजी चालचलन में पढ़ी लिखी है। लेकिन यह पात्र भी कभी इधर कभी उधर झूलता मालूम होता है। कभी लगता है वह सतीश से प्रेम करती है, तो कभी लगता है वह शशांक से विवाह करेगी। यह पात्र शायद तय नही कर पा रहा था कि उसे क्या चाहिए? या फिर एक पाठक कर तौर पर मैं नही समझ पा रहा था। लेकिन जब शशांक से विवाह की बात चली, और सतीश की बीमारी का समाचार आया, तब जाकर सरोजिनी का सतीश के प्रति झुकाव स्पष्ट हो जाता है।


    दिवाकर। यह तो है ही बालकबुद्धि.. जिसे पता ही नहीं है, उसे चाहिए क्या? कभी वह शिक्षा के पीछे पागल था, कभी वह कहानियां लिखकर प्रसिद्धि प्राप्त कर रहा था। कभी वह भाभी के प्रेम पड जाता है। मतलब एक तरह से वह अनिर्णायक चरित्र है। जिसे कुछ स्पष्ट पता ही नहीं है, कि उसे करना क्या है?


किरणमयी : क्या वह सचमुच चरित्रहीन थी?

    किरणमयी, इसे मैं चरित्रहीन मान सकता हूँ। क्योंकि उसे काफी सारी गलतियां की है। लेकिन जब उसे अपराधबोध हुआ तब वह मानसिक रूप से अस्थिर हो गयी। होना ही था, यही दुर्भाग्य था उसका। उसका पति उसे पत्नी से ज्यादा विद्यार्थिनी के रूप में रखता था। सास गृहस्थी सीखाने के मामले में क्रूरता करती थी। घर की दशा भी ठीक न थी। पति असमय चला गया। वह प्रेम को खोजती रही, अलग अलग व्यक्तियों में उसने प्रेम खोजना चाहा। लेकिन किसी ने बहन बनाया, किसी ने भाभी, तो किसी ने सिर्फ आकर्षक शरीर। 


बिहारी : स्वामिभक्ति का अप्रतिम उदाहरण

    खैर, उपन्यास अनन्य है। स्त्री का सामाजिक कद्द क्या है, उसकी निति क्या हो सकती है, और अनीति से क्या हो सकता है, इन सब विषयों पर यह उपन्यास प्रकाश डालता है। बाकी तो अपना नजरिया है। कभी सतीश गलत लगता है, कभी सावित्री, कभी किरणमयी, तो कभी उपेंद्र भी। इतने सारे पात्रों में एक पात्र को छोड़ दू, तो अन्याय होगा। बिहारी जो सतीश का एक बूढ़ा नौकर है। वह इस पुरे उपन्यास में स्वामिभक्ति का शिखर स्थापित करता है। जब उसे सतीश ने निकाल दिया, तब भी वह अपने स्वामी के प्रति कर्तव्यनिष्ठ रहा था। लगभग सारा ही उपन्यास श्रेष्ठ चरित्रों की अवधारणा को सफल बनाते है। 


    शुभरात्रि,

    १०/०६/२०२६

|| अस्तु ||


प्रिय पाठक,

यदि आपने भी चरित्रहीन पढ़ा है, तो मुझे अवश्य बताइए कि आपके अनुसार सबसे जटिल पात्र कौन था? क्या किरणमयी सचमुच चरित्रहीन थी, या वह परिस्थितियों की शिकार थी?

अपनी राय टिप्पणी में लिखिए। और यदि आपको पुस्तकें पढ़ना प्रिय है, तो ब्लॉग पर प्रकाशित अन्य पुस्तक समीक्षाएँ भी अवश्य पढ़िए।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

चरित्रहीन उपन्यास किसने लिखा है?

‘चरित्रहीन’ प्रसिद्ध बंगाली साहित्यकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखा गया उपन्यास है।

चरित्रहीन उपन्यास पहली बार कब प्रकाशित हुआ?

इस उपन्यास का मूल बंगाली प्रकाशन वर्ष 1917 में हुआ था।

चरित्रहीन उपन्यास के मुख्य पात्र कौन हैं?

सतीश, सावित्री, किरणमयी, उपेंद्र, सुरबाला, सरोजिनी और दिवाकर इसके प्रमुख पात्र हैं।

क्या किरणमयी वास्तव में चरित्रहीन थी?

यह उपन्यास का सबसे बड़ा प्रश्न है। अलग-अलग पाठकों की दृष्टि से इसके उत्तर भिन्न हो सकते हैं।

चरित्रहीन उपन्यास का मुख्य विषय क्या है?

यह उपन्यास प्रेम, विरह, सामाजिक बंधनों, स्त्री की स्थिति, नैतिकता और मानवीय चरित्र की जटिलताओं पर केंद्रित है।

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