विरोध प्रदर्शन, सोशल मीडिया ट्रायल और हमारी चयनात्मक नैतिकता | प्रियम्वदा

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विरोध प्रदर्शन : लोकतंत्र का पुराना लेकिन ज़रूरी हिस्सा

    प्रियम्वदा !

    विरोध प्रदर्शन करना पड़ता है। बगैर विरोध जताए, शायद लोकतंत्र की व्याख्या ही अधूरी है। वैसे विरोध प्रदर्शन तो पहले से होते आ रहे है। लेकिन तब शायद शाप देना, या फिर उपरवाले पर छोड़ दिया जाता था। आज थोड़ा अलग है, लोग सड़कों पर उतर आतें है, हो हल्ला करते है। आश्वासन पाते है। और लौट जाते है। बस दो शब्द आश्वासन के चाहिए होतें है लोगों को। 


सोशल मीडिया ट्रायल, विरोध प्रदर्शन और चयनात्मक नैतिकता पर आधारित व्यंग्यात्मक कार्टून चित्र।

जब विरोध प्रदर्शन भी तमाशा बन जाता है

    किसी कार कंपनी की असुविधापूर्ण सर्विस के कारण लोग अपनी महंगी कार को गधे से खिंचवाते है। और कार शोरूम तक गाजे-बाजे संग ले जाते है। कोई कोई थोड़े आक्रामक हो जाते है, और शोरूम के बाहर ही कार पर पेट्रोल छिड़क कर फूंक देते है। एक और अंतिम विकल्प भी लोग अपनाते है, आत्मविलोपन का। यह अंतिम चरण है, हालाँकि इस के बाद भी न्याय हुआ या नहीं? किसे पता? खबर बस आत्मविलोपन तक चलती है। परिणाम की परवाह हर किसी को कहाँ? 


    वो कितना मजेदार था, जब किसी ने स्पेस सूट पहनकर रस्ते के बड़े-बड़े गड्ढों में मूनवॉक किया था। RTO से परेशान होकर एक आदमी कार भी हेलमेट पहनकर चला रहा था। और वो इलेक्ट्रिसिटी डिपार्टमेंट के एक कर्मचारी को ट्रैफिक का चालान मिला, तो उसने पुलिस स्टेशन की बिजली काट दी थी। अंडे फेंकना, टमाटर फेंकना तो आम बात है। अपने देश में तो काली स्याही मुँह पर उड़ेल दी जाती है। मुझे तो वह बड़ा मजेदार लगता है, जब कोई आदमी किसी नेता को माला पहनकर फिर चांटा मारता है। 


सोशल मीडिया का महायज्ञ और सामूहिक आक्रोश

    खैर, एक विरोध प्रदर्शन होता है सोशल मीडिया पर। यह वाला सबसे बेस्ट है। यहाँ विरोध के साथ-साथ थोड़ा कला प्रदर्शन भी होता है। लोग स्टोरियां चढ़ाते है। साथ में कुछ कुछ ऐटिटूडभरा सन्देश सुनाते है। एकसुर में सारा समाज टूट पड़ता है किसी एक पर। लोग खुश होतें है, इस महायज्ञ में अपने विरोधपूर्ण शब्दों की आहुति देकर। तो बात ऐसी हुई, कि एक कॉमेडियन है। आजकल एक कॉमेडियनों ने हास्य से ज्यादा तो समाज को दुखी कर रखा है। एक वो कॉमेडियन राष्ट्रपति बनकर रूस से लड़ रहा है। अपने यहाँ वो कश्मीरी ने सारा देश हिला दिया था। अब यह वाला काण्ड। 


अश्लील शो, हास्य और वीभत्सता के बीच की रेखा

    यूट्यूब पर प्रणीत मोरे नामका एक कॉमेडियन है। उसका एक शो है, अश्लील शो। शो का नाम ही है, अश्लील शो। वो अपने शो में लोगों की फनी स्टोरी सुनता है, और उन्हें पैसे देता है। लोग भी पांचसौ रूपये की लालच में वाहियात से वाहियात बात कॉमेडी के नाम पर सुना देतें है। हास्य, व्यंग्य के बाद आता है, वीभत्स व्यंग्य। यह शो वही है। विभत्स्ता। लोग अजीब से अजीब बात बिना फ़िल्टर किये कह देतें है। बस समस्या यह हो गयी कि यह बातें यूट्यूब पर जाती है। 


370 रुपये की बिरयानी और नैतिकता का मैदान

    हुआ ऐसा की एक लड़के ने इस शो में बोल दिया कि उसने अपनी गर्लफ्रेंड को बिरयानी खिलाई। और फिर लड़के ने सोचा कि यह तो इन्वेस्टमेंट हुआ, मुनाफे की भी तो सोचनी पड़ेगी। बस उसकी यह सोच उसने एक पब्लिक शो में कह दी। और देशभर को नारीवाद का मैदान मिल गया। मुद्दा मिल गया। उस मैदान में कोई स्टोरी लिख रहा था, "कंसेंट किधर है?" तो कोई कह रहा था, "370 रूपये से ज्यादा की तो लिपस्टिक रही होगी लड़की की।" और कोई तो बस उस मैदान में हाय-हाय करता हुआ समस्त पुरुष समाज को कोसे जा रहा था। और कुछ नारीवादी नर समस्त पुरुष प्रजाति की ओर से खुद ही माफ़ी मांगे जा रहे थे। और कुछ औरतों के आँचल से बंधे एडवोकेट बने हुए पुरुष स्त्रियों की ओर से दलीलें पेश किए जा रहे थे। 


    बस एक छोटी सी क्लिप के खिलाफ लोग इतने आहात हुए कि अब क्या बताऊँ। अरे नहीं, मैं उस शो की वकालत नहीं कर रहा। लेकिन मैंने उस शो के कईं एपिसोड देखे हैं, मतलब सुने है। दरअसल ऑफिस से घर आते-जाते हुए कईं बार यूट्यूब पर यह शो कानों में बजता रहता, और मैं भी कहीं पर बाइक रोककर बदलने की आलस में सुनता रहता था। 3-4 एपिसोड्स देखने के बाद लगा, कि लगभग लोग इन्ही लोगों से भरी हुई है। पर फिर मैं सोचता हूँ, अपने यहाँ इस मुद्दे को शर्म का बना रखा है, इस लिए लोग ज्यादा मचलते हैं इस पर बात करने के लिए। 


    मैं खुद भी कहाँ स्पष्ट लिख रहा हूँ। मैं भी शर्म का कम्बल ओढ़कर ही यह लिख रहा हूँ। वरना इसी विषय पर अपने देश ने कामसूत्र भी दिया है, और खजुराहों के शिल्प भी। पर फिर भी उस विषय की बात करते हुए उत्तेजित होना, और मन का संयमित न रहना भी सामान्य नहीं माना जाता है, और पापकर्म जैसी हीनभावना के साथ जोड़कर देखा जाता है।


मृतदेह वाली टिप्पणी पर अचानक छा गया सन्नाटा

    छोडो, लोगों ने उस लड़के पर इतनी ज्यादा फटकार बरसाई, तब किसी ने उसी कॉमेडियन के शो से एक और क्लिप निकाली। अबकी बार उस क्लिप में एक लड़की किस्सा बता रही थी। यह वाला तो वाकई क्रूर था। नहीं, मैं लड़की वाला किस्सा ज्यादा क्रूर इस लिए नहीं कह रहा, कि मैं भी एक पुरुष हूँ। यह वाकई वाहियात था भी। वह शायद मेडिकल की पढाई कर रही होगी। और वहां मानव अंगों का विषय भी होगा। तो किसी पुरुष के प्राणहीन शव का जननांग देखकर टिपण्णी करना किसी श्रेणी में आता होगा? 


क्या हमारा मन सचमुच इतना सभ्य है?

    लेकिन फिर मुझे यह विचार भी आता है, कि हमारा मन जो है, वह क्रूर से क्रूरतम, और बेकार से वाहियात तक, सब सोचता है। सबके ही मन में कोई न कोई ऐसा विचार उपजता ही है, जो किसी अन्य के लिए घृणापूर्ण होगा। मैं जब हॉस्टल में था, तो मेरे पास वाले कमरे में एक डॉक्टर की पढाई करते भाईसाहब थे। मेरी उनसे अच्छी मैत्री हो गयी थी, एक दिन उन्होंने अपने क्लास का एक किस्सा बताया था।


    "कि एक बार यही मानव अंगों का विषय था, और एक डमी रखी हुई थी। और प्रोफेसर सब समझा रहे थे। वही यौनांगो पर बात आयी, तो एक लड़का और लड़की हँस पड़े। सारे क्लास में खुसरपुसर होने लगी। सर ने सजा सुनाई, उस लड़के और लड़की को बारी बारी से उस डमी के सारे अंगों के नाम, उनके लक्षणों सहित सारे क्लास के सामने बोलने है। मुद्दा शर्म का ही तो था। शर्म के मारे ही हँसी छूट जाती है इस विषय में। फिर क्या था, सारे क्लास के सामने बेशरम होकर बोलना पड़ा।"


    तो कहने का मतलब, हमारी ऐसे मुद्दों पर सोच पिछड़ी नहीं है, न ही शिक्षा का आभाव है। बस हमें इस बात पर व्यावहारिक होना समझ नहीं आता। या फिर हड़बड़ाहट हो जाती है। जैसे दसवीं कक्षा के विज्ञान विषय में स्त्री पुरुष के अंगों की आरंभिक जानकारी सीखाते हुए स्वयं शिक्षक/शिक्षिका भी असहज हो जाते थे। क्यों? शायद सामाजिक बंधारण जिम्मेदार है? 


निजी बातचीत और सार्वजनिक मंच में अंतर

    हम दोस्तों की टोलियां बैठती है, तो आपस में उस 370 वाले से भी ज्यादा बेहूदा बातें कर जाते है। पर हमें पता है, ऐसी बातें कहाँ की जाती है, और कहाँ नहीं। कोई और अगर हमारी इन बातों को सुन लेता है, तो वह पक्का ही हमें गैरजिम्मेदाराना करार देगा, या फिर हमें समाज के कीड़े होने का लेबल देगा। लेकिन वे बातें करने से वैसी सोच ही बन जाए ऐसा भी तो जरुरी नहीं। घृणा, आपत्ति, असहजता, यह सब भीड़ का हिस्सा है। पर बात वही है न, जब सरे आम यूटुब जैसे माध्यम पर ऐसी बातें कह दी जाती है, तो फिर गलत है। यह मैं भी कहता हूँ। 


    अरेरे.. मैं अपनी सफाई क्यों दे रहा हूँ.. मैं तो यह कहना चाहता हूँ, कि जिन्होंने उस 370 की बिरयानी पर टिपण्णी की थी, वे बाद में उस लड़की के प्रति उदासीन क्यों हो गए? उस लड़की की बात को नज़रअंदाज़ क्यों किया गया? मेरे खुद के इंस्टाग्राम सर्किल में बहुत सारी स्टोरियां मैंने देखि थी, उस 370 की बिरयानी को लेकर। लेकिन मृतदेह पर हुई अश्लीलता पर मौन साधनारत लोग भी मेरी ही इंस्टाग्राम स्टोरियों में मिले। 


हाँ तो हाँ, ना तो ना : बीच का ग्रे क्षेत्र

    सीधी बात है प्रियम्वदा ! हाँ तो हाँ, ना तो ना.. वहां 'यदि और अगर' की संभावनाएं रखी जाती है तो वह ग्रे है। न काला, न सफ़ेद। ग्रे हे वह। अपनी सहूलियत के अनुसार किसी को जज करना। वो हिजाब वाले मुद्दे पर नारीवादी लोग करते हैं न, नजरअंदाज़ी। वैसी ही बात है यह भी। यह भी तो विकट समस्या है, कि कईं बार कुछ मुद्दे स्पष्ट होने में समय लेते है। तभी तो जजसाहब तारीख पर तारीख देते है। ताकि अवधि मिले किस्से को ज्यादा प्रकाशित होने की। प्रकाश में आने से बहुत कुछ साफ़-स्पष्ट होने लगता है। पर नहीं, आधे-अधूरे स्पष्टीकरण पर कोई फेंसला सुना दिया जाए, तो वह अपूर्ण न्याय है। 


    चलो फिर, इतनी बकैती बहुत है। मैं कोई बवध बोझा नहीं हूँ।

    शुभरात्रि,

    १३/०६/२०२६

|| अस्तु ||


प्रिय पाठक,

यदि आपको प्रियम्वदा की यह बकैती पसंद आई हो, तो इसे अपने मित्रों के साथ साझा करें। शायद असहमति और सहमति के बीच के उस 'ग्रे' रंग पर थोड़ी और बातचीत हो सके।


Q1. चयनात्मक नैतिकता (Selective Morality) क्या होती है?
किसी समान परिस्थिति में अलग-अलग व्यक्तियों या समूहों के लिए अलग मानदंड अपनाने को चयनात्मक नैतिकता कहा जाता है।

Q2. सोशल मीडिया ट्रायल क्या होता है?
जब किसी व्यक्ति या घटना पर बिना पूर्ण तथ्यों के सोशल मीडिया पर सामूहिक निर्णय और आलोचना होने लगती है, उसे सोशल मीडिया ट्रायल कहा जाता है।

Q3. विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र में क्यों महत्वपूर्ण हैं?
विरोध प्रदर्शन नागरिकों को अपनी असहमति व्यक्त करने और शासन का ध्यान समस्याओं की ओर आकर्षित करने का अवसर देते हैं।

Q4. भीड़ की मानसिकता क्या है?
जब व्यक्ति अपने स्वतंत्र विचार छोड़कर समूह की भावनाओं के प्रभाव में निर्णय लेने लगता है, तो उसे भीड़ की मानसिकता कहा जाता है।


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✉️ थोड़ी देर और ठहरो प्रिय पाठक,
अगर यह लेख आपको पसंद आया हो, तो मेरे इस छोटे-से साहित्यिक संसार की और भी गलियों में घूम आइए।
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