सड़क पर ऊंट और अचानक हुई ब्रेकिंग
प्रियम्वदा !
कल दोपहर को मोरबी जा रहा था, सामख्याळी के बाद देखा तो आगे चल रहे एक ट्रक ने अचानक ही ब्रेक मारी, और ट्रक सिक्स लेन के हाईवे में दो लेन के बिच तिरछा खड़ा हो गया। अब मेरी बारी थी ब्रेक करने की। मैं ब्रेक करते हुए अपनी कार किसी भी दिशा में मोड़ लू, मेरा कहीं न कहीं टकराना तय था। बाहिने मोड़ता हूँ, तो रोड के डिवाइडर और ट्रक के ट्रेलर के साथ टकराता, और दाहिने मोड़ता तो ट्रक के ड्राइवर केबिन से। सौभाग्य से दोनों टकरावों से बच गया, और दाहिने ओर ट्रक और डिवाइडर के बिच थोड़ी सी जगह में कार रूक गयी।
इस अचानक हुई ब्रेकिंग का कारण क्या था पता है प्रियम्वदा? हमें अपने रोड पर आमतौर पर कुत्ते, रोज़ और गाय तथा सांड देखने की आदत है। आज ऊंट उतर आया था रोड पर। मैं यह सोच रहा था, कि उस ट्रक वाले को क्या इतना बड़ा ऊंट नहीं दिखाई दिया होगा? जो उसे अचानक से ब्रेक मारनी पड़ गयी होगी। जो भी हो.. अपने देश में रोड पर वाकई कुछ भी हो सकता है.. एक सप्ताह पहले ही, फोर लेन सड़क पर कुछ लोग सेवा कर रहे थे, सरबत की सेवा। चलते वाहन रुकवा कर सेवा की जा रही थी, और उस वजह से जाम लग रहा था।
सेवा, सरबत और ट्रैफिक जाम
मैं सोचता हूँ, अगर आपको इस कड़ी धूप में लोगों की सेवा के लिए जलपान करवाना ही है, तो कोई ऐसी जगह पर की जाए, जहाँ यह ट्रैफिक जैम की समस्या न उत्पन्न हो। यह तो वही बात हो गयी, पहले जैम में लोगो को तपाओ, और फिर उन्हें ठंडाई पिलाकर सेवा करो। अच्छा एक बात यह भी तो होती है, कि वे कागज़ के गिलास में ठंडाई पिलाते है, और आम तौर पर ट्रक ड्राइवर या कोई भी वाहन चालक वह ठंडाई का गिलास यहाँ-वहां फेंक देता है। पर किसी की भी स्वच्छता की भावना आहत नहीं होती।
दिलबाग का मोह और ओवरवाटरिंग की समस्या
बड़े दिनों बाद आज दिलबाग के बारे में भी कुछ लिख दू। सच बताऊँ तो मेरा यह दिलबाग वाला शौक उतर ही चूका है। वो कहते हैं न, नई चीज नौ दिन आकर्षित करती है। बस, छत पर गार्डनिंग का मेरा शौक अब उतर ही रहा है। कारण है समझ की कमी। और समय का आभाव। मैं डेली हर पौधों में पानी दे देता हूँ, और ओवरवाटरिंग कर देता हूँ। कईं पौधे अब मुरझाने की कतार में बैठे है। मैंने गूगल से जाना था कि अडेनियम को कम पानी देना है, लेकिन मैं हर दिन एक टब पानी दे ही देता हूँ।
सैनसेवियरिया और कम देखभाल वाले पौधों की तलाश
आज सवेरे फिर एक नया प्लांट लगाया है, सैनसेवियरिया। यह भी ऐसा पौधा है, जिसे हफ्ते में एक बार पानी देना है। लेकिन मुझे यह बात याद रखनी होगी। पर नहीं रहती। अब तो नए पौधें नहीं लगाने वाला मैं। मेरा हो गया। और खून-खराबा करने से बेहतर है, अशोक की तरह शांति का पथ चुनूं। जब अपनी मन चाही नहीं होती है न, तो इंसान समझौता करता है। मैं भी कर रहा हूँ। शायद। पर फिर यह ख्याल भी तो उठता है, कि ऐसे पौधे लगाए जाए, जिन्हे ज्यादा देखभाल की जरुरत न हो।
दिल्ली के तिलचट्टे और प्रदर्शन की राजनीति
अरे प्रियम्वदा ! दिल्ली में जंतरमंतर पर तिलचट्टे इकठ्ठा हुए है। बताओ, भरे-पुरे दिन में तिलचट्टे बाहर घूमने लगे। कोई लाज-शर्म तो होगी ही नहीं? क्यों होगी भला.. इक्कसवी सदी में सबको आज़ादी है। आलसी के अलावा भला कौन क़ैद में रहना चाहेगा? एक समय होता था, जब दिल्ली में तैमूल जैसे आक्रांता उतरते थे, अपनी कालमुखी सेना लेकर.. फिर एक समय होता था, दिल्ली-चलो का नारा आया था। फिर एक समय आया, जब स्वतंत्र भारत में स्वदेशी सरकार के खिलाफ दिल्ली चलने लगे लोग। लोग वेल्ले है, तुरंत दिल्ली चले जाते है। और दिल्ली भी बड़ी सहिष्णु है इस मामले में।
INDIA IS NOT FOR BEGINNERS
अरे भाई, भारत जैसे देश में, जहाँ हर दस किलोमीटर पर अलग सी संस्कृति, अलग से रिवाज़, अलग सी जाति का अधिकार है, वहां कोई समूचा एकाधिकार कैसे स्थापित करे? एक कानून को अलग अलग दस तरीके से तोड़ने के अभ्यस्त नागरिक है हमारे पास। परीक्षाएं होती है, तो परिणाम से पहले रद्द कर देनी पड़ती है। क्यों? क्योंकि एक जने ने अपने लाभ के लिए पेपर लीक किया। और जिम्मेदार कौन? तो शिक्षामंत्री। पैर की छोटी अंगुली किसी कोने से जा टकराई, और मरहम पट्टी करनी पड़ेगी हाथ की छोटी अंगुली की। अरे भाई, INDIA IS NOT FOR BEGINNERS..
समस्याएँ सबके पास हैं, समाधान किसके पास है?
प्रियम्वदा ! यहाँ अगर समस्या पूछने जाओ, तो प्रत्येक नागरिक के पास कोई न कोई समस्या है.. लेकिन उन समस्याओं के समाधान के लिए उसके पास न सुझाव है, न ही सुझाव के लिए समय। उसे नौकरी करनी है, अपना परिवार पालना है। उसने किसी को यह दायित्व सौंप रखा है, कि मैं तुझे अधिकार देता हूँ, तू इन सब समस्याओं का समय रहते समाधान कर दिया कर.. लेकिन वह यह भूल गया था, कि उसने जिसे अधिकार दिया है, उसे भी तो अपना परिवार पालना है। वह भी तो अपने बेटे को विदेश पढ़ाना चाहता है। क्योंकि उसने भी दूसरे अधिकार वालों को यही करते देखा है। गलती किस की है?
तिलचट्टे, दीमक और व्यवस्था का चक्र
मुझे लगता है तिलचट्टों की गलती है। उन्हें अपने अँधेरे से बाहर आना ही नहीं चाहिए। अँधेरे की औलाद यूँ खुलेआम दिनदहाड़े कैसे घूम सकती है? सरकारें आएंगी, जाएंगी, व्यवस्था इसी तरह चलनी है, चलती रहेगी। तुम्हे अपना देखना है, तुम अपनी जिम्मेदारियों की सुरक्षा कैसे करते हो, वह तुम्हे देखना होगा। तुम तिलचट्टे हो, तुम्हारे पास फ़ालतू समय है, तुम मांगो रेसिग्नेशन शिक्षा मंत्री का। चाहो तो प्रधान मंत्री का मांग लो। तुम दीमकों से गठबंधन करो। इस व्यवस्था का हिस्सा बनो। और फिर तुम भी यह व्यवस्था को इसी तरह चलाओ, जैसे चलती आ रही है।
०६/०६/२०२६
|| अस्तु ||
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