अपने ही किचन में बनाई चाय और जीवन का संतुलन
समय के साथ कम होता आकर्षण
प्रियम्वदा !
तुम्हे सम्बोधित करते हुए फिर से एक बार इस कोरे पन्ने के समक्ष प्रस्तुत हुआ हूँ, तो कुछ तो कहूंगा ही। समय के साथ साथ हर विषय, हर वस्तु से मेरा आकर्षण कम होता जा रहा है। अब मैंने यहाँ आकर्षण का उल्लेख किया है, तो मुझे लगता है, एक जन है, जो कहेंगे कि आकर्षण था, इस लिए उतर गया, प्रेम होता तो बढ़ता। और फिर मैं प्रेम की पंचायत लेकर बैठ जाऊंगा, जो किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचेगी। तो बात ऐसी है, अब मैं पुस्तकें भी नहीं पढ़ रहा। और कम से कम अपने दिनभर की दिनचर्या ही पहले लिख लिया करता था, वह भी नहीं लिखता अब तो। सोचा तो यही था, कि प्रतिदिन अपने दिवस को यहीं शब्दों में ढाल दूंगा, लेकिन नहीं, आलस और समय का आभाव।
आजकल बहुत सारे मानसिक तनावों को झेलता हुआ, फिर से कुछ नया करने की फ़िराक में रहने लगा हूँ। और यह ख्याल हमेशा तब ही आता है जब हम लगातार एक जैसी प्रक्रिया से गुज़र रहे होते है। जैसे ऑफिस से घर आने जाने का रास्ता। वह हमेशा एक जैसा ही रहता है। वैसे ही कुछ दिन भी हो जाते है। सारे एक जैसे दिन। फिर कुछ बदलने की तलाश में रहता है मन। और कुछ बदलें न बदले, फोन में वॉलपेपर तो बदल ही सकता है। ज्यादा से ज्यादा सोशल मीडिया की तस्वीरें बदल सकता है। मैं तो यह भी नहीं बदल पाता।
जब अपने ही किचन की जिम्मेदारी मिली
काफी दिनों/महीनों बाद मुझे अपने ही घर का फ्रिज खोलने की नौबत आन पड़ी। जिनका यह रणक्षेत्र है, किचन कहते है आजकल उसे, वे सब दो दिनों के लिए विराम पर थे। और मेरे हवाले किया हुआ समय बेकार पड़ा रह जाता है, यह तो फिर भी किचन है। सवेरे उठकर एक लोटाभर पानी पिने के बाद एक कप चाय मांगती है मेरी अंतड़िया। इस रणक्षेत्र के योद्धा तो बाहर गए हुए थे, तो पहला विचार यही आया कि आदत किसी भी चीज की होनी ही नहीं चाहिए। न मुझे, न मेरी अंतड़ियों को। पर फिर थोड़ी ही देर में अपने पहले विचार को मात देकर दूसरा विचार प्रबल हुआ। तो क्या हुआ, अब एक चाय की तलब का भी मैं अधिकारी नहीं?
एक पतीला ढूंढा, एक लोटा पानी गर्म करने इंडक्शन पर चढ़ाया। मेरी अनुभवहीनता के चलते पानी भी मुझे कोसते हुए मानों खौलने लगा। पेट्रोल में एथनॉल मिलाया जाता है, कुछ उसी तरह ठंडा पानी मिलाकर पिने योग्य गुनगुना पानी पिया। बचा हुआ खौलता पानी शायद अब भी जलन के मारे मुझसे कह रहा था, कि "ठंडा पानी मिलाना पड़ा, उतना गर्म किया ही क्यों था फिर?" मैंने उसे अनसुना कर अब चाय बनाने की विधि में संलिप्त होना चाहा। तो पाया, कि पहले तो दूध है कि नहीं यह पता किया जाए। मैं फालतू में ही अपने आप को आलसी कहता हूँ, पूरी दुनिया आलसी है, रेफ्रिजरेटर को फ्रिज कहते है सब।
फ्रिज में जमा समय की परतें
प्रियम्वदा ! मेरे मन से ज्यादा तो मेरे घर का फ्रिज भरा पड़ा मिला मुझे। फ्रिज का दरवाजा खोलते ही, कईं सारे बर्तन अपने भीतर तरह तरह का सामान लिए हुए न जाने कौन सी सहनशीलता के सहारे, कितनी सारी चीजों को समय के पहिए तले रोंदे जाने से बचाते बैठे थे। वे तमाम वस्तुएं जिन्हे समय रहते सड़ना होता था, वे फ्रिज की इस कृत्रिम ठण्ड के सहारे मानों वेंटिलेटर पर ही जीवित थे। आश्चर्य की तमाम सीमा को तब भूकंप से धराशायी होती किसी बहुमंजिला ईमारत की तरह टूटना पड़ा, जब एक अधकटे निम्बू के सूखकर फॉसिल बने अवशेष फ्रिज के दरवाज़े वाले दराज़ में मिले। न जाने कितनी सदियों से वह अधकटा निम्बू अपने उपयोग में आने की आशा में सूखकर रसहीन हो गया होगा।
नींबू की ठीक पड़ोस में एक गर्म मसाले का पैकेट देखकर मेरी धराशायी हुई आश्चर्य की सिमा पुनः उठ खड़ी हुई। लेकिन उस सीमा का विस्तारण तो तब हुआ जब ठीक उसके बगल में एक अंगूठे से थोड़ी बड़ी कटोरी में आचार पड़ा हुआ था। आम का आचार, उसे कुछ नहीं होता अगर वह फ्रिज के बाहर हो तब भी। उसका अस्तित्व तेल की मात्रा पर निर्भर है। उसे किसी तरह की ठंड की सुरक्षा का घेरा नहीं चाहिए होता है। यह ज्ञान मैं तब भी दे सकता हूँ, जब मुझे अपने लिए एक अच्छी चाय बनाना तक नहीं आता है। दिवाली पर मंगवाए गए पिज़्ज़ा निगल लिए जाने के बाद, ऑरिगेनो और चिली फलैक्स की बची हुई पुड़िया आज भी अपनी एक्सपायरी डेट की आशा में जिवंत, उसी निम्बू वाले खंड में दूबकी मिली।
अन्य वस्तुओं के विवरण में उतरना ही था मुझे, लेकिन जलन की बू ने मेरी घ्राणेन्द्रियाँ आकर्षित कर ली। इंडक्शन पर चायपत्ती और चीनी की आशा लिए पानी उबलकर अब जलने ही लगा था। कम से कम उसके आकर्षण का तो परिसीमन अब अनिवार्य ही था, तो चायपत्ती और चीनी तो उसे सौंप ही दी। और मैं फिर से फ्रिज का अवलोकन करते खड़ा रहा। किन्तु अब दुर्घटना से देर भली वाला मामला नहीं चलने वाला था, न ही दुर्घटना पाल सकता था मैं, न ही देरी। एक बड़ा सा पतीला तुरंत मेरी नज़रों में आया। ऐसे प्रसंगो में उस पतीले में दूध न हो ऐसा हो भी नहीं सकता। बगैर नापतोल के सीधे पतीले से ही इंडक्शन पर उबलती चाय में दूध उड़ेल दिया। और इस कर्म का फल यह हुआ कि थोड़ी ही देर में चाय तैयार हो गयी।
गुजरात की चाय का अलग स्वाद
हमारे यहाँ चाय कप में नहीं पि जाती। कप सेट के साथ प्लेट भी आती है, रकाबी कहते है उसे। अडारी भी कहते है। अडारी में चाय छानकर जैसे ही मुंह के पास ले गया, चाय की गंध ने नाक को पहले ही सूचित कर दिया। बड़ी ही बेस्वाद चाय बनी थी। चाय के मामले में मुझे गुजरात से बढ़िया कोई स्थान नहीं लगता। मैंने राजस्थान की चाय पि है, हरयाणा-पंजाब के ड्राइवरों द्वारा बनी चाय पि है। महाराष्ट्र में चाय पि है, और मध्य प्रदेश में भी। हमें वही चाय सबसे अच्छी लगती है, जहाँ से हम होतें है। मैं किसी अन्य राज्यों की तुलना नहीं कर रहा हूँ, पर गुजरात की चाय का स्वाद ही मुझे पसंद आता है। अन्य राज्यों में चायपत्ती कम चीनी ज्यादा होती है, जिससे गर्म शरबत पि रहें हो वैसा लगता है।
गुजरात में भी कुछ चुनिंदा जगहों पर चाय का ज्यादा आनंद है। जैसे कच्छ से अहमदाबाद जाते हुए हळवद से पहले तिराहे पर 'कनैया टी', उसी रोड पर ध्रांगध्रा के बाद 'मौजे मस्तराम'.. कच्छ से उत्तर गुजरात की ओर जाते हुए सांतलपुर सिटी में ब्रिज के निचे ही एक चाय वाला है। जामनगर की तरफ जाते हुए ध्रोल में एक चाय वाला है। सीधी बात है, अगर मालधारी है, तो उसकी चाय में अलग ही आनंद होता है। कड़क, दमदार।
एक बेस्वाद चाय का अनुभव
तो.. अपने ही किचन में, अपने ही हाथों से निर्मित इस चाय की गंध ने मेरे दिमाग को पहले ही चेतनवंत कर दिया, जिससे मेरी सहनशीलता जागृत हो गयी। चायपत्ती, चीनी और दूध की मात्रा का बिलकुल ही बेकार संयोग बना था, और चाय में न तो भरपूर दूध का स्वाद था, न ही पानी का। चीनी और चायपत्ती ने तो बस जैसे अपने आप को बलि ही चढ़ा लिया था। जैसे तैसे एक अडारी बस अपनी तलब को पोषने के चक्कर में ख़त्म की, और बाकी की सिंक को सौंप दी।
स्त्री और पुरुष का संतुलन
अरे प्रियम्वदा ! इसके बाद तो यह कथित चाय के बर्तन जब धोने पड़े, तब समझ आया, कि खाया पिया कुछ नहीं, गिलास तोडा बारह आना किसे कहते है। इसी कारण वश मैं सोचता हूँ, स्त्रियां जीवन को सरल तो कर देती है। क्योंकि मैं आलसी हूँ, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि बगैर स्त्री के रहा नहीं जा सकता। पुरुषों के चाय के ठेले है, पुरुष नास्ता भी बनाते है, होटल चलाते हैं। पुरुष कपडे भी धोते है। पुरुष स्त्री की तुलना में ज्यादा कठोर परिश्रम कर सकता है। पर फिर पुरुषों के संसार में बस एक समस्या होगी, सब कुछ एकतरफा होगा, संतुलन न बनेगा। सामाजिक व्यवस्था को स्त्री की आवश्यकता केवल संतुलन बनाने के लिए होती हैं।
दूसरे दिन आत्मा ने चाय बनाने से रोक दिया
अरे नहीं, मैं स्त्री द्वेषी नहीं हूँ, बस एक तर्क प्रस्तुत कर रहा हूँ। मुझे तो बस तब ज्वाळ लगती है, जब कोई नारीवाद की बातें करता है। छोडो यह सब प्रियम्वदा ! दूसरे दिन की बात करता हूँ, दूसरे दिन भी जब वतन(किचन) मेरे हवाले था, और बीते कल की चाय को याद करके मेरी आत्मा ने ही मुझे टोकते हुए कहा, "रहने दे, अपन बाहर कहीं चाय नाश्ता कर लेंगे।" और मेरे इस आत्मकथन को मेरी आलस ने बल दिया। और इस तरह केवल एक केवल एक मत से मेरा चाय बनाने का परिश्रम चुनाव हार गया।
शुभरात्रि,
३०/०६/२०२६
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक,
अगर आपने भी कभी अपने ही किचन में चाय बनाने की कोशिश की है, या फ्रिज खोलते ही कोई ऐसी चीज़ मिली हो जिसे देखकर हँसी भी आई हो और हैरानी भी हुई हो, तो अपना अनुभव टिप्पणी में अवश्य लिखिए। आपकी छोटी-सी कहानी पढ़कर मुझे भी आनंद आएगा। यदि यह संस्मरण आपको अपने घर, अपनी रसोई या अपने जीवन के किसी पल की याद दिला गया हो, तो इसे अपने मित्रों के साथ भी साझा कीजिए।
#प्रियम्वदा #चाय #घरेलूजीवन #संस्मरण #हिंदीब्लॉग #जीवन #किचन #गुजरात #आत्मकथा #DailyLife #TeaStory #HindiWriting
