प्रियम्वदा! मन के ड्राफ्ट्स कभी पूरे नहीं होते
रोना भी एक दुर्लभ कला है
प्रियम्वदा ! बहुत ज्यादा कटु मन है आज.. मन करता है रोऊँ.. इतना ज्यादा रोऊँ, जब तक आंसू का कूप खाली न हो जाए.. पर नहीं, कैसे रोऊँ? आँखे तो डबडबाती है, लेकिन उसके आगे आंसुओं में इतनी ताकत नहीं की वे आँखों की सीमा को पार करे। मैंने ही माना था, पुरुष रोते नहीं, लेकिन आज मैं ही अपनी बात से मुकरता हूँ। यूटर्न अच्छे होतें है। रोना आवश्यक है, क्योंकि यह भार कम कर देता है भीतर का। पर हमें बचपन से न रोने की सीख दी गयी है, हम बस आँखों को भिगो सकते है। उसमे भी प्रयत्न लगता है। छोडो, रोना भी एक कला है। और बड़ी दुर्लभ कला है। खैर छोडो, यह सब मन के उफान पर निर्भर करता है। रोना, हँसना, कुपित होना..
अधूरे ड्राफ्ट्स और अधूरी भावनाएँ
छोडो यह सब रोना-धोना.. न जाने किस दिन का ड्राफ्ट पड़ा हुआ था। प्रियम्वदा ! कईं बार कुछ बातें ड्राफ्ट्स में इस कदर पड़ी रहती है, मानों उन्हें विकसित होना ही न हो। जैसे कि इसी ड्राफ्ट की बात करूँ, तो सबसे पहला अनुच्छेद शायद उस दिन लिखा होगा, जब मैं बहुत ज्यादा त्रस्त हुआ होऊंगा। लेकिन आज अगर मैं उसी भाव को पुनः चाहकर भी नहीं ला पा रहा हूँ। उसी दिन शायद इसे पूरा कर लेता तो वह बातें विकसित हो जाती। आज शायद अंकुरण से आगे न बढ़ पायी।
जो बातें कभी कही ही नहीं जातीं
इस ड्राफ्ट की ही तरह हम अपने व्यावहारिक जीवन में न जाने कितनी ही बातों को अनकहा छोड़ देते है। क्योंकि हमें शायद परवाह होती है, कि कहीं वह बात बोल देने से अनर्थ न हो जाए। हम कईं बार बहुत से लोगों को उनकी गलती नहीं गिनाते। इस लिए नहीं कि गलती बता देने से वे नाराज़ हो जाएंगे। बल्कि इस लिए भी, कि मैं बहस में नहीं उतरना चाहता हूँ। यह क्षण ऐसी होती है, जब आप भीरु दिखने लगते हो, लेकिन तुम्हे उस बात की ज्यादा परवाह होती है, कि किसी और की गलती को मैं संभाल लूंगा। मुझमे इतना सामर्थ्य है, कि मैं अतिरिक्त बोझा उठा लूंगा।
बदले की आग और प्रतीक्षा की जलन
बदला भी बड़ी बेचैन कर देने वाली चीज है प्रियम्वदा। कभी कभी मौके पर किसी विवाद में मौन साधकर सही समय का इंतजार करते है, और जब वह पल आता है, तो चोट कर भी देते है। लेकिन इस मौके के इंतजार में जिस जलन को आत्मसात किया था, उस समय का क्या? प्रत्येक पल लगता है कि आज तो इस पर उस पार वाली कर ही देते है...
ड्राफ्ट, खिचड़ी और मन की उलझन
लो.. फिर से कुछ दिनों का अंतराल आ गया ऊपर वाले अनुच्छेदों में। लगभग दो सप्ताह बाद फिर से इस ड्राफ्ट में लौटा हूँ। वह भी इस कारण, कि शायद पिछले तीन दिनों से कोई पोस्ट पब्लिश नहीं की है, तो इसे कुछ मठारकर पब्लिश कर दू। पर तुम्हे पता है प्रियम्वदा, कुछ मठारना हो अगर, तो कुछ तैयार भी तो होना चाहिए। टोप्पिंग्स ऐड करने हो तो उसके लिए बेस(BASE) तो चाहिए। यहाँ इस ड्राफ्ट में तो खिचड़ा है। खिचड़ी में तो या कढ़ी मिलाई जा सकती है, या फिर घी.. और आजकल के स्वास्थ्य के अनुसार घी तो हजम होतें नहीं। तो कढ़ी की तयारी कर सकता हूँ।
व्यसन की ओर लौटता हुआ मन
बात ऐसी है प्रियम्वदा ! मैं फिर से कुछ दिनों के अंतराल पर ही सिगरेट और मावा का सेवन करना पुनः आरम्भ कर चूका हूँ। ऐसा नहीं है कि मैं छोड़ नहीं सकता हूँ। पर मुझे कोई न कोई ऐसा ठोस कारन मिल ही जाता है, और मैं फिर से व्यसनों का दास बन जाता हूँ। पिछले कईं दिनों से मैंने सिगरेट और मावा छुआ नहीं था। हालाँकि हालात तो चाहकर भी छू न पाऊं वैसे थे, फिर भी मैं तो अपने संयम की ही शेखी बघारना पसंद करूँगा। तो कुछ दिनों का अंतर पड जाने से आदत छूट गयी। और अब तो मुझे इच्छा भी नहीं होती।
जब जीवन का अर्थ धुंधला पड़ने लगे
पर कहीं न कहीं से एक ऐसी प्रताड़ना आ जाती है, जहाँ जीवन का कोई मायने न होने के अनुभव घेर लेते है। कईं बार ऐसा भी लगता है, कि हम जिन्हे अपना मानते है, वे तो अपना होने का कोई प्रमाण दे नहीं रहे। या कईं बार ऐसा भी लगता है, कि इतनी खींचतान क्यों करनी है? या फिर कभी भी बहुत ज्यादा भार अनुभव होता है, इसी का नाम तो जीना है, कभी ढलान आसान होती है, कभी चढ़ाई विकट लगती है। तो इन्ही कुछ झंझावाती तूफ़ान के केंद्र में बैठकर आज फिर सवेरे सवेरे एक सिगरेट और एक मावा चढ़ा लिया।
डर, मृत्यु और जीने का विरोधाभास
प्रियम्वदा ! पर मैं फिर यह भी सोचता हूँ, कि कभी एक झटके सब कुछ समेट लेने का मन क्यों नहीं करता? शायद उसका कारण डर है। डर सिमट जाने का नहीं, सिमट जाने के तरिके को लेकर है। उस तरीके में उतना दम कहाँ? खैर, मैं शायद फिर से अपनी उन आदतों के हवाले हो जाऊंगा, जिन्हे लोग बुरी मानते है, और धीरे ज़हर कहते हैं। मैं नहीं कहता, क्योंकि यही तो मुझे चाहिए। एक दिन सबका ही वही हाल होना है, तो क्यों न न्यौता मैं ही दे दू? हम यूँही दिनभर में कितनी ही जांबाजी कर जाते है। आजकल रोड पर वाहन चलाना भी कोई जांबाजी से कम थोड़े हैं?
एक अधूरी रात और अधूरा निष्कर्ष
देखा, मुझे बातों को मोड़ना तो आता है। छोडो, प्रियम्वदा, तुम्हे क्या पड़ी है? तुम्हे भी तो यही पता है, कि जिसके पास जो है, उसकी वह अवहेलना करता है, और जो नहीं है, उसकी आकांक्षा। मैं भी तुम्हे सम्बोधित करते हुए शायद यही करता हूँ। कल रात की ही बात है, एकदम से पसीने से लथपथ हो गया, खाना भी न खाया गया था। और लगा था, कि हाश.. शायद यह कहानी यहीं ख़त्म। लेकिन नहीं। शायद कहानीकार ने गर्मी की असर को हार्ट अटैक के चोले में भेजा था, जो मेरा कुछ बिगाड़ न पाया।
शुभरात्रि कहने का भी मन नहीं
आज कईं दिनों के बाद पीकर सारे होश गँवा देने का भी मन कर रहा है। मन करता है, ऐसा बन जाऊं, जिसे किसी की परवाह न हो, जिसकी परवाह न कोई करे। मन करता है निकल पडूँ, किसी उस रस्ते पर, जहाँ मुझे कोई खोज न पाए। न वे जिनकी मुझे अहमियत है, न वे जो मुझे अहमियत देते होंगे। शायद। पर फिर लगता है, कि यह भी एक आसान रास्ता है। कठिनाईओं से भागने वाले भीरु का पथ लगता है। नशा करके अपने आप को सहनशील बना लेना तो कुछ वैसा ही हुआ, जो लोहा बगैर लोहार के हथोड़े के किसी रूप में ढल गया। मेरी बातें आज शायद तुम्हे अजीब लगेगी, हाँ क्योंकि शायद फिर से एक बार मेरा मन रोने को है.. पर मुझे लगता है, यह भी काम आसान है। और अब मुझे यह भी लग रहा है, कि मैं थोड़ा तो जानबूझकर भी उलझनें चाहने लगा हूँ।
आज शुभरात्रि भी कहने का मन नहीं है।
तारीख तो पब्लिश करने वाली डाल देता हूँ, २७/०६/२०२६
|| अस्तु ||
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