हथियार रखना और हथियार चलाना, दोनों में अंतर कौन समझाएगा?
रील्स और गहरे अर्थ खोजने की आदत
प्रियम्वदा !
रील्स देखना भी एक कला ही है। जैसे कोई दर्शक एक पेंटिंग में आड़ी-तिरछी खींची हुई लकीरों में व्यर्थ ही कोई डीप मीनिंग खोजने का प्रयत्न करता है, या फिर जैसे बड़े बड़े नेशनल न्यूज़ मिडिया G7 में मोदी का सहारा लेते ट्रम्प के एक चित्र में कूटनीतिक सन्देश खोजते है, या फिर जैसे कोई अधशीकी रोटी को पिज़्ज़ा कहकर रसास्वाद लेने का यत्न करे, इसी प्रकार रील में भी कईं बार तड़कते-भड़कते मुद्दे मिल जाते है।
भारत तिवारी और एनकाउंटर पर उठते प्रश्न
बिहार में कोई युवक था, भारत तिवारी नामका। बिहार पुलिस ने उसे एनकाउंटर में ढेर कर दिया। अभीतक प्राप्त रीलिये ज्ञान के अनुसार वह युवक बाढ़ग्रस्त लोगों के स्थानांतर को लेकर विरोध में उतरा था। और जब उसकी बातों को गंभीरता से न लिया गया, तो उसे हथियार उठाना पड़ा। पुलिस की नज़रों में आ जाने से उसे पुलिसबल ने घेरा, और उसका एनकाउंटर कर दिया। लेकिन मैंने जो रील देखि थी, उसमे वह युवक अपना हथियार डाल चूका था। उसने आत्मसमर्पण करते हुए फेसबुक लाइव कर दिया था।
क्या पुलिस को न्याय करने का अधिकार है?
फिर उस पर गोलियां क्यों चलायी गयी? और एक बात यह भी तो है, कि अब उसके प्रति लोगों की करुणा जाग्रत हो गयी है। एनकाउंटर करना योगी मॉडल है। योगी मॉडल की लोग तारीफ करते नहीं थकते हैं। पर कभी यह सोचा है, कि इससे न्यायालयों का क्या होगा? हाँ ! मानता हूँ, न्यायलय में देरी से फैंसले होते है, लेकिन फेंसला करना न्यायलय का काम है। पुलिसबल को बस अपराधी को न्यायलय तक पहुँचाना है। लेकिन आजकल पुलिस ही न्याय करने लगी है। लोकतंत्र इसकी अनुमति नहीं देता है। और इसकी तो कतई नहीं, कि आत्मसमर्पण कर चुके व्यक्ति का एनकाउंटर कर दो। ऐसा तो राजशाही में भी नहीं होता था, कि कोई सिपाही अपराधी को राजा तक पहुँचाने के पूर्व ही अपनी और से फेंसला कर दे।
निजी संपत्ति और धार्मिक अधिकारों का टकराव
इसके अलावा आजकल मेरी रील फीड में निहंग सीख बड़े चर्चा का मुद्दा बने हुए है। भारत में सभी धर्मों को अपनी परंपरा का पालन करने की अनुमति है। इन्ही परम्पराओं के पालन में सीखों को किरपान धारण करने की अनुमति है। लेकिन क्या होगा अगर कोई आपत्ति जताता है? नार्थ-ईस्ट में किसी शॉपिंग मॉल में दो निहंग सीखों ने शॉपिंग मॉल के मैनेजर से बात करते हुए विडिओ बनाया। और बार बार यह कहा, कि सीखों को किरपान रखने का अधिकार सरकार ने दिया है। पर मैं यह सोचता हूँ, कि अगर मेरी प्राइवेट प्रॉपर्टी है, और मैं नहीं चाहता हूँ, कि वहां कोई किसी भी प्रकार का हथियार टांगकर आए.. तो? जैसे गुरुद्वारों में सबको ही अपना सर ढंकना पड़ता है, क्योंकि गुरुद्वारो का यही नियम है। इसी तरह मेरा अपना शॉपिंग मॉल है, वहां मेरी मर्जी चलेगी, कोई हथियार रखेगा या नहीं।
फर्रुखनगर की घटना और भीड़ के सामने एक सिख
सीखों का हथियार रखना, एक प्रतीकात्मक होता है। और जहाँ तक मेरा मानना है, केवल आत्मरक्षा और अत्याचार के विरुद्ध ही हथियार चलाने की अनुमति होगी। लेकिन हथियार उठाने के साथ यह भी ख्याल तो उन्हें आना चाहिए, कि सामने वाला निहत्था है। फिर वहां हाथापाई तक बात ठीक होगी, निहत्थे पर तलवार चला दोगे? इसी महीने गुरुग्राम के फर्रुखनगर में एक सीख ने किरपान लहरा दी थी। सिटी में ट्रक ड्राइवर और सामने से आती बस में हल्का सा टकराव हुआ, बस वाले ट्रक ड्राइवर पर चढ़ दौड़े। भारी भीड़ ने ट्रक ड्राइवर जो कि सीख था, उस पर हमला बोल दिया। फिर क्या था, सीख सरदार ने 'जो बोले सो निहाल' कर दिया। अपने ट्रक में से एक हाथ में किरपान और एक हाथ में तलवार लेकर कूद पड़ा। हथियारों को हवा में लहराते ही भीड़ तीतर-भीतर हो गयी। यह आत्मरक्षा का मामला था। अगर वह सीख हथियार नहीं उठाता, तो भीड़ शायद उसे मार देती। सीख भी हथियार निकालने के बाद चाहता तो लोगों को मार सकता था। पर उसने सिर्फ घायल किया, और डराया।
उत्तराखंड में निहंगों की हिंसा और उसके प्रश्न
वहीँ उत्तराखंड के कर्णप्रयाग में निहंग सीखों ने किसी बहस में स्थानिकों पर हथियार चला दिए। जिसमे एक यात्री भी गंभीर घायल हुआ। वह वीडियोस काफी डरावने थे। कर्णप्रयाग वाले प्रसंग में जब निहत्थे लोगों पर एक निहंग सीख खुली तलवार के दौड़ पड़ा और वार करने लगा, तब देखकर यह अनुभव होता है, निहत्थे पर तलवार चला देने की हिम्मत ही कैसे होती है इन्हे? जबकि यह तो साधक होते है सीख पंथ के। जानलेवा हमला करने के उपरांत जब पुलिस ने बीचबचाव करते हुए चार निहंग सीखों को धर लिया तो, रुद्रप्रयाग के नगरासू गुरुद्वारा में इस घटना के विरोध में, और पकडे गए सीखों को छुड़ाने की मांग के साथ कुछ और सशस्त्र निहंग सीखों ने छत पर अपने आप को घेर लिया। किलेबंदी जैसा माहौल कर लिया। यह घटना ऑपरेशन ब्लू स्टार की याद दिला देने वाली है।
अगर तुम्हे हथियार रखने है, तो पहले यह सीखों की तुम निहत्थों पर नहीं चलाओगे। सरदार सम्मानीय कौम है इस देश की। लेकिन जब से कुछ नशेड़ी अलगाववादी हुए है, तब से सारे ही सीख शंका के दायरे में आने लगे है। वही बात है, एक की की हुई का फल सबको मिले। आज ३६ घंटे बाद भी उन निहंगों का स्टैंडफ जारी है।
तीन घटनाएँ, तीन कारण और एक निष्कर्ष
तीन प्रसंगों से तीन कारण निकलकर आए। सरकार से असंतुष्ट होकर हथियार उठा लेना, अपनी बात मनवाने के लिए। दूसरा अपनी आत्मरक्षा में हथियार दिखाना/लहराना। और तीसरा निहत्थों पर घातक हमला कर देना। तीनों ही प्रसंग में अपराध है। पर आत्मरक्षा वाला अपराध गंभीर नहीं है। बिहार के भारत तिवारी का उदेश्य अच्छा था, लेकिन तरीका फिर भी अपराधपूर्ण था। यह तरीका अंग्रेजो के काल में क्रांतिकारियों ने अपनाया था। और उनकी गति क्या हुई आज हम स्कूलों में पढ़तें हैं।
हथियार रखने से अधिक जरूरी है विवेक
फर्रुखनगर वाले सीख को लोगों ने सराहा, उसका सम्मान भी किया। क्योंकि छोटी सी गाडी भिड़ने जैसी बात पर अगर भीड़ हमला कर देती है, तो अपनी आत्मरक्षा में हथियार उठा लेना योग्य है। बस किसी को चोटिल न किया जाए, जबतक पुलिस या कोई सुरक्षाबल का व्यक्ति जिम्मेदारी नहीं लेता तब तक। बाकी वह उत्तराखंड में निहंग कर रहे है वह लेशमात्र योग्य नहीं है, और सामान्य नागरिक वाला व्यवहार भी नहीं है। कल को इस देश में राजपूत भी हथियार लेकर निकलने लगेंगे। किसान भी हल लेकर घूमने लगेंगे, और मजदूर भी फावड़ा लेकर घूमेंगे तो क्या होगा, अव्यवस्था, अनियंत्रण, और अपराध। हथियार रखना, और हथियार चलाना दोनों में ही समझ की आपूर्ति कौन करेगा?
शुभरात्रि,
२२/०६/२०२६
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक,
क्या आत्मरक्षा में हथियार उठाना उचित है? और क्या किसी भी परिस्थिति में कानून अपने हाथ में लेना स्वीकार किया जा सकता है? इन तीनों घटनाओं में आपको सबसे बड़ा प्रश्न कौन-सा दिखाई देता है? अपने विचार टिप्पणियों में अवश्य साझा करें।
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