तीस साल पुराने प्लॉट की खोज, महादेव का कब्जा और कला का स्वार्थ

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क्या अब मुझे महादेव से लड़ना होगा?


Cartoon illustration of an Indian man standing beside his motorcycle with an old plot map, looking at a barren land with a small Shiva temple and a saffron-clad sadhu in the background on a plain white background.

तीस वर्षों बाद याद आया भूला हुआ प्लॉट

    रविवार था, दोपहर बाद मिले अवकाश में पास वाले शहर चल दिया था। हुकुम ने उनके संघर्षकाल में जब खुद का आशरा चाहा था, तब उस जमाने में विविध स्कीम्स चलती थी। थोड़ा थोड़ा पैसा भरते हुए खुद का प्लाट पाओ। इस स्किम में कईं बार लोग पैसा लेकर भाग भी जाते थे। ऐसी ही एक स्किम में हुकुम ने कुछ रकम भरी थी। जिसने स्किम निकाली थी, उसके ही भाई ने केस कर दिया कि उसकी अनुमति के बिना उसकी जमीन की प्लॉटिंग कर दी गयी। मामला कोर्ट में गया, और पता चला की एक ही जमीन के दो मालिक थे। विक्रेता ने घोटाला कर, भाग जाने के बजाए, दूसरे भूभाग पर प्लॉट्स अलॉट किए। 


सर्वे नंबर से वीरान भूमि तक की यात्रा

    लगभग तीस वर्षों के उपरांत हुकुम को याद आया, कि एक प्लाट तो अपने को भी अलॉट हुआ था। पुराने दस्तावेज खोजे, एक फाइल मिली, जिसमे प्लाट की अलोटिंग मिली। बस फिर क्या था, बाइक लेकर निकल पड़ा। सिर्फ सर्वे नंबर पर तो जगह ढूँढना काफी मुश्किल काम साबित हुआ। लगभग दो-एक घंटा इधर-उधर की सोसाइटी में पूछताछ करने पर एक बीहड़ जैसा वीरान भूभाग दिखा। बीचोबीच एक मंदिर देखकर याद आया, सर्वे नंबर के नक्शे में एक मंदिर का भी मार्किंग था। 


मंदिर, साधु और महादेव का कब्जा

    मंदिर का गेट खटखटाया। श्यामवर्णी शरीर के कमर से निचे भगवा कपडा लपेटे हुए, और सर पर एक भगवा खेस बंधा साधु, प्रांगण सफाई का काम छोड़कर गेट पर आया। "नमो नारायण" कहते हुए मैंने अभिवादन किया, और बदले में उन्होंने में अपना सर हिलाया। साधु से पूछताछ करने पर पता चला, मैं वही पहुंचा था, जो मैं ढूंढ रहा था। और पता चला इतने वर्षों से उस बीहड़ में वह साधु अकेला रहता है। आसपास कईं नई सोसायटी बन चुकी है, लेकिन वह मंदिर, और वह साधु वहां अकेले ही है। जिसने यह प्लाट अलॉट किए थे, उसका तो कोई अतापता नहीं है, और जिनके यह प्लाट है, वे लोग भी शायद भूल चुके होंगे। 


    मैंने अपने फ़ोन में प्लॉटिंग का नक्शा देखा। थोड़ी देर लगी दिशा समझने में, लेकिन आखिरकार दिशा समझ आ गयी। पहले मुझे लगा था, मंदिर के पूर्व द्वार की और अपनी जगह है, लेकिन बाद में समझ आया, मंदिर के उत्तर भाग में अपनी जगह है। साधु अभी भी गेट पर ही खड़ा था। बातचीत को पुनः आरम्भ करने के लिए मैंने एक धुम्रदण्डिका दी उसे। उसने गला खखारकर चेतना पर चढ़ी तन्द्रा खींचता हो, उस तरह धूम्र को भीतर खिंचा। साधु ने अपनी ओर से बताया, कि यह मंदिर की जगह पहले जितनी थी, आज भी उतनी ही है। पर मेरे पास जो नक्शा था, वह कुछ और ही इशारा कर रहा था। 


अधिकार, आस्था और मन के प्रश्न

    साधु का अपमान न हो, इस लिए मैंने वह बात उकेरी नहीं, लेकिन इतना तो समझ आ गया, कि अगर यह जगह अपनी है, तो स्वयं महादेव ने कब्ज़ा किया है उस पर। कालो के काल, समस्त विश्व के नाथ के आगे अपनी क्या बिसात? पर इस देश में अगर अयोध्यापति राम को अपना जन्मभूमिस्थान का अधिकार प्राप्त करने में इतने वर्ष लगे थे, तो मैं तो एक रक्तमांस का मानव हूँ। मैंने बाइक चालू की, घर लौटते हुए, रोड के बदलते किनारों की तरह विचार भी तेज गति से गुजरते दिखे। 


    क्या अब मुझे महादेव से लड़ना होगा? या फिर 'सब भूमि गोपाल की' वाले सिद्धांत के अनुसार 'कंकर कंकर में शंकर' मानकर वह जगह भूल जानी चाहिए? या फिर महादेव की ही प्रेरणा से मैं वहां गया था? तो क्या महादेव ने मुझे वहां अपने द्वारा किए कब्जे का भूभाग दिखाने बुलाया था? क्या मुझे तहसीलदार के वहां धक्के खाने होंगे? क्या मुझे बकाया कर भरकर अपने अधिकार को संरक्षित करना होगा? बहुत सारे विचार, इसी तरह आये और गए, और मैं अपने घर पहुँच गया। नौ बजे कुँवरुभा को क्लिनिक ले गया। वही बातूनी डॉक्टर ने टांके खिंच लिए। और कुँवरुभा थोड़ी देर रोने के बाद शांत हो गए। 


इंकसंघ की ईसभा में कला और कलाकार पर हुई चर्चा

    रात्रिभोजन के पश्चात ग्राउंड में थोड़ी देर चलने के इरादे से गया, तब इंकसंघ की ईसभा शुरू हो चुकी थी। और मैं कानों में ब्लूटूथ लगाए चलता रहा, और सबकी सुनता रहा। मैं थोड़ा ठीकठाक श्रोता हूँ। तो मैं अपनी बात रखने के बजाए सिर्फ सुनता हूँ, जरुरत लगे तो अपने फ़ोन में नॉट में कुछेक बातें उतार लेता हूँ। ताकि यहाँ मैं अपना मत रख सकूँ। पर मेरे साथ एक गंभीर समस्या यह भी है, कि मैं भूल जाता हूँ.. मैंने कुछ मुद्दे लिखे थे, लेकिन अब समझ नहीं आ रहा वह क्या बात थी, जिसपर मैंने यह लिखा था। 


  • कला अलग है, कलाकार अलग है। 

    अब यह पॉइंट मैंने किस चर्चा पर लिखा है, वह मैं भूल चूका हूँ। पर जो लिखा है, उसका ही विवरण करूँ, तो शायद कला तो बहुत सारी है। मैंने अपनी पिछली एक दिलायरी में बताया था, कला बहुत सारी होती है, हम उनमे से किसी एक में पारंगत होने का प्रयत्न करते है। सफल हुए, लोकचाहना प्राप्त हुई, और हमारी भी इच्छा रही, तो हम कलाकार बनते है, अन्यथा उस कला के उपासक। 


क्या कलाकार का सृजन केवल अपने लिए हो सकता है?

  • कलाकार अगर लोगो के बिच अपनी कला रखने के बजाए खुद के लिए सर्जन करता है, तो क्या वह स्वार्थी है?

    नहीं यार, कला अगर साधना है, तो कलाकार साधक है। कला उपासना है, तो कलाकार उपासक है। कला अगर प्रेम है, तो कलाकार प्रेमी है। वहां स्वार्थ कहाँ आया? स्वार्थ तो वह हुआ, जब मैं अपने हितों को ऊपर रखकर किसी का नुकसान होने दू। कलाकार अगर अपनी कला को सबके सामने प्रस्तुत करने के बजाए अपने पास रखना चाहता है, तो वह उसकी मर्जी है। वह शायद नहीं चाहता कि लोग उसकी कृति का मूल्याङ्कन करें। वह अच्छा-बुरा जो भी हो, किसी और से कोई भी अपेक्षा नहीं रख रहा है। स्वार्थवृत्ति यह नहीं है। स्वार्थी कलाकार वह है, जब एक ही कला के दो कलाकार हो, और उनमे से एक दूसरे की अपेक्षा अपनी कला का ज्यादा मूल्य चाहता है, तब वह स्वार्थ हुआ। 


मैं क्यों लिखता हूँ?

  • नहीं, मैं लिखता हूँ, क्योंकि मुझे इसमें आनंद आता है। अगर तुम्हे पढ़ते हो, तुम्हे भी आनंद हुआ तो...

    अब यह भी मुझे याद नहीं है मैंने क्यों लिखा। शायद ऊपर वाली बात का ही अनुसन्धान रहा होगा। पर जैसे मैं यह दिलायरी लिखता हूँ, तो वह अधिकांश मेरे लिए ही होती है। मैं चाहता हूँ, कि भविष्य में कोई ऐसा खाली समय मिले, जब मैं यह सब पढूंगा, और नास्टैल्जिया की अनुभूति करूँगा। हाँ ! एकाध बार मैंने इससे अर्थोपार्जन का ख्याल किया था। लेकिन मैं अपनी कृति, अपनी क्षमता जानता हूँ। तो उस लक्ष्य पर फिर कभी पुनरावर्तन नहीं किया। 


स्वार्थ कहाँ शुरू होता है?

    खैर, इसके आगे मैंने कोई पॉइंट लिखा नहीं है, क्योंकि फिर बात चल पड़ी थी 'स्वार्थ' पर। स्वार्थ विषय पर लोग अलग अलग तरह से व्याख्या करते थे। एक ही स्वार्थ की व्याख्या को अलग अलग तरीके से कहते थे। एक बार को मेरा मन कर गया था, कि अपना माइक ओपन करूँ, और इन लोगो से कहूं, कि जिस किसी को भी स्वार्थ क्या है, स्वार्थ की सीमा क्या है, जानना है तो गूगल कर लो मित्र। पर मैंने अपनी मौनसाधना भंग नहीं होने दी। 


    शुभरात्रि,

    २१/०६/२०२६ 

|| अस्तु ||


प्रिय पाठक, 

मैं तो अपनी बात लिखकर हल्का हो जाता हूँ। अब आपकी बारी है।
कला, स्वार्थ, अधिकार और आस्था—इनमें से किस विषय ने आपको सबसे अधिक सोचने पर विवश किया? अपनी बात टिप्पणियों में लिखिए। शायद आपकी दृष्टि से मुझे भी कुछ नया देखने को मिले।


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✉️ थोड़ी देर और ठहरो प्रिय पाठक,
अगर यह लेख आपको पसंद आया हो, तो मेरे इस छोटे-से साहित्यिक संसार की और भी गलियों में घूम आइए।
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