क्या कला के लिए दर्शकों की ज़रूरत होती है? | प्रियम्वदा से संवाद

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क्या कला के लिए दर्शकों की ज़रूरत होती है?


क्या कला के लिए दर्शकों की ज़रूरत होती है – प्रियम्वदा से संवाद

परिवार की चिंताएँ और मन की निराशा

    प्रियम्वदा..

    सप्ताह पूरा ही भारी तनावपूर्ण रहा था। सोमवार को हुकुम को कुछ मेडिकल रिपोर्ट्स करवाने पड़े, और पता चला, वे शुगर लेवल के रिकार्ड्स तोड़ रहे है। और तत्काल प्रभाव से उन्हें खाने-पिने की कुछ पाबंदियों का पालन करवाना पड़ा। लेकिन बात उनके शुगर के आगे थी, मेरा मन मुझे बहुत-बहुत दूर तक लेता गया। हुकुम की बढ़ती उम्र, और उम्र के अनुसार होती स्वास्थ्य सम्बंधित परेशानिया। मन बिलकुल ही निराश हो चला था। निराशा की गर्त में दो दिन रहा। अकेला बैठा नहीं जा रहा था मुझसे। 


कुँवरुभा की चोट और एक पिता का भय

    ऑफिस में अपनी केबिन से बार-बार उठकर बाहर दूसरे सहकर्मियों से किसी भी मुद्दे पर बातें करता था, ताकि मन किसी अन्य दिशा में प्रवृत हो। बड़ी मुश्किल से मन को निराशा से बाहर लाया था, और शनिवार आते आते कुँवरुभा ने कमाल कर लिया। छोटी सी उम्र से जो सारे बच्चे करते हैं, वही.. सर में चोट..! भाईसाहब खेलते समय शरीर का जरा भी ख्याल नहीं रखते, भागते हुए लोहे के गेट से भीड़ गए। कपाल में भंवर के ऊपर बड़ा का कट लेकर रोते रोते घर आए। रक्त से सना चेहरा, और हथेलियां। 


    प्रारंभिक उपचार तो आज भी घरों में हल्दी ही रहती है। मैं ऑफिस से घर पहुंचा तब यह घरेलु उपचार जारी था। लेकिन थोड़ी देर बाद भी रक्तस्त्राव बंद न हुआ तो अस्पताल जाने की जरुरत लगी। डॉक्टर ने घाव साफ़ किया, और मुझे कट की गहराई दिखाई। मतलब हड्डी दिखाई दे इतना गहरा घाव। मेरा जब एक्सीडेंट हुआ था, और मुझे पैर में चोट लगी थी, वह मैं बड़ी आसानी से सह गया था। लेकिन यह घाव देखकर मेरे पेट का पानी हिल गया था। शायद यही प्रेम होता होगा, जहाँ अपनों की चोट देखकर पीड़ा का अनुभव होता है। 


    आसान नहीं था, कुँवरुभा को यह समझाना, कि डॉक्टर इलाज कर रहे हैं। उनका मुख्य उद्देश्य यही था, कि मैं इंजेक्शन नहीं लगवाउँगा। मैंने कुँवरुभा के दोनों हाथ पकड़े। डॉक्टर ने कपाल की चमड़ी खींचकर मेडिकल-स्टेप्लर पिन लगा दी। पहली पिन लगते ही कुँवरुभा चिल्ला दिए.. "मैं किधु'तु, सुई नो लगावता.." (मैंने कहा था, इंजेक्शन मत लगाना।) काफी सारी इधर उधर की बातें करते हुए उन्हें शांत किया, और अब दूसरा टांका लगना था। मैंने फिर से उनके हाथ पकड़ लिए। अब की बार उन्हें भी समझ आ गया था, कि फिर से हाथ क्यों कसकर पकड़े गए हैं। वे भी मन से थोड़े तैयार हुए। उतने में डॉक्टर ने दूसरा टांका भी लगा दिया। कुंवरूभा उठने लगे, "बस, हालो घरे.. घरे जावु।" (बस, चलो घर.. घर जाना है मुझे।).. एक मैंगोडॉली के वायदे पर बड़ी मुश्किल से उनका रोना बंद हुआ। 


गोवर्धन की शाम और मन को शांत करने की कोशिश

    फिर से एक बार मन निराश हो गया था। काफी तनावपूर्ण और निराशाजनक ख्यालों ने मन को फिर से अपने कब्जे में ले लिया। रविवार की सुबह आम तौर पर खुशनुमा होती है। लेकिन मेरी निराश ही थी। शाम होते होते सपरिवार सबको आसपास के घुमनेलायक स्थलों पर ले गया। ताकि मेरा मन शांत हो जाए। निराशा से बाहर आ जाए। पास में ही एक गोवर्धन नामक स्थल है। वहां एक कृत्रिम टीला बनाया गया है। बढ़िया वृक्षारोपण किया गया है। और श्री कृष्ण की गोवर्धन से जुडी कथाओं पर आधारित विषयवस्तु है। 


    रात को घर लौटकर खाने-पिने से निवृत होकर ग्राउंड में जा बैठा। हवाएं इतनी तेज़ चलती है, कि ग्राउंड में रात्रिभोजन के पश्चात तोंद पर हाथ फिराते हुए टहलने वाले लोगों को, हवा से उडी धूल से आँखों की रक्षा करने के लिए, तोंद से हटाकर अपने हाथ आँखे मलने में लगाने पड़ते है। दो-तीन कुत्ते है, वे इस तेज हवा को आंधी मानकर दुबकने लगते है। और उनकी इस दुबकने की प्रक्रिया के दौरान हुई भागदौड़ की क्रिया को, चार-पांच टिटहरियाँ कोसते हुए टें-टें-टें करने लगती है। 


इंकसंघ की ई-सभा और कला पर उठा प्रश्न

    खैर, मैंने टहलना छोड़कर, दो सीमेंट के ब्लॉक को एक के ऊपर एक रखकर अपना उच्च श्रेणी का सिंहासन तैयार किया। और कानों में ब्लूटूथ लगाकर इंकसंघ की ई-सभा में सम्मिलित हो गया। इस ई-सभा का उद्देश्य था, एक विस्तृत चर्चा, और विषय था, "क्या कला के अस्तित्व के लिए दर्शकों की ज़रूरत होती है? अगर कोई कविता कभी पढ़ी न जाए या कोई पेंटिंग कभी देखी न जाए, तो क्या उसे पूरी तरह से कला माना जा सकता है?" थोड़ा अटपटा मुद्दा है, और काफी लोगों ने अपनी राय रखी। और मैं ठहरा घमंडी, तो मैं हमेशा की तरह पूरी सभा के दौरान मौन को साधे रहा। प्रियम्वदा ! लोगों की नज़रों में अपने आपको घमंडी दिखाना भी एक कला है। मेरी कोई बात काट नहीं सकता, यह घमंड पालना आसान नहीं है। 


    चलो फिर आज की दिलायरी का यही मुद्दा है। और मैं अपने लिए लिख रहा हूँ, तो मेरे मत का खंडन करके कोई मेरे घमंड को चकनाचूर करे, तो भी मुझे समस्या नहीं होगी, क्योंकि मैं तो घमंडी हूँ, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता, कोई क्या कहता है।


क्या बिना दर्शकों के भी कला का अस्तित्व है?

    देखो प्रियम्वदा ! वह सभा का मुद्दा पढ़कर मुझे सबसे पहला वाक्य सुझा, "कला की ऑडियंस या ऑडियंस का कलाकार?" लेकिन इस बात पर बाद में आऊंगा। अभी तो शुरू से शुरू करता हूँ। पहला प्रश्न था, कला के अस्तित्व के लिए ऑडियंस की जरुरत होती है? तो मेरा जवाब रहेगा 'नहीं'। दूसरा प्रश्न है, अगर कोई कविता कभी पढ़ी न जाए या कोई पेंटिंग कभी देखी न जाए, तो क्या उसे पूरी तरह से कला माना जा सकता है? तो मेरा जवाब है, 'हाँ'।


कलाकार पहले अपने लिए सृजन करता है

    अरे प्रियम्वदा, कला क्या है? रचनात्मक और कल्पनाशील गतिविधि का कौशल। जैसे रसोई, जैसे गाना, जैसे नाचना, जैसे बजाना, जैसे चित्रकारी, जैसे लिखना, और भी ढेरों है। यह सब आरंभिक अवस्था में अपने भीतर होता ही है। बस हम उसे विकसित करतें है। किसके लिए? आरम्भ में तो वह अपने लिए ही था। तो फिर इसका अर्थ है, कलाकार भी मैं ही हूँ, और दर्शक भी मैं? नहीं। मैंने अपनी प्रसन्नता के लिए कुछ सृजन किया। जब मैं प्रसन्न हुआ, तो मैंने अपने उस सृजन को निहारा, मन किया तो रख लिया, अन्यथा मिटा दिया। 


कला, प्रदर्शन और आनंद का संबंध

    इसका अर्थ है कला मैंने अपने आपके लिए विकसित की। मुझे इस रचनात्मक सृजन में आनंद आने लगा, और मैं इसमें सिद्धहस्त होने लगा। जब मैंने इसमें सिद्धहस्तता पा ली, तो फिर मैंने इस कला का प्रदर्शन रखा। अन्य लोगों ने इस सृजन की वाहवाही की। मेरा मनोबल बढ़ा। किसी ने इस सृजन से प्रेरणा ली, तो किसी ने आश्चर्य से देखा। लोगों का प्रतिभाव देखा, तो मुझे अपनी इस कला से संभावित अर्थोपार्जन का ख्याल आया। मैंने क्लासेज खोल लिए, और लोगों को इस सृजन का तरीका सिखाया। कोई-कोई महत्वाकांक्षी विद्यार्थी मेरे इस सृजन से बेहतर साबित हुआ, तो मुझे ख्याल आया, कि यहाँ तो अब स्पर्धा होने लगेगी। मेरा अर्थोपार्जन घट सकता है। 


    फिर मैंने अपनी इस कला को अपने वंश तक सीमित कर दिया। मैं अपने परिवार में ही यह कला सिखाऊंगा। और इस तरह मैं मानव समाज में एक अलग जाति बना। जो इसी कला से अर्थोपार्जन करता है। कला का एक सीमा तक विकास हुआ, साथ ही साथ मानव समाज का भी विकास हुआ। तो धीरे धीरे मेरी कला से लोग विमुख होते गए, और दूसरे विषयों में आसक्त लोगों ने मुझे दरकिनार कर दिया। अब यहाँ से मेरे पास दो विकल्प थे। मैं अपने भरण-पोषण के लिए कोई अन्य कार्य में प्रवृत हो जाऊं, या फिर अपनी इस कला को और विकसित करते हुए इस आधुनिक समाज में पुनः प्रस्तुत करूँ। 


नाटक, नृत्य और दर्शकों की भूमिका

    प्रियम्वदा ! ज्यादातर कलाएं अपने आनंद को समर्पित होतीं है। पर कुछ कलाएं लोगों के लिए भी होती है। जैसे की नाटक। मैंने पहले लिखा था न, कला की ऑडियंस या ऑडियंस का कलाकार। नाटक कला है वह दर्शकों पर आधारित है। पर तब भी इस कला का पहला उद्देश्य यही था कि मैंने नाटक किया है, और मुझे इस नाट्य से आनंद मिला। लोगों का प्रतिभाव अब भी गौण विषय है। तात्पर्य कोई दर्शक अगर नाटक नहीं देख रहा है, तब भी नाटक करने में मुझे आनंद हो रहा है, तो वह कला है ही। भले ही उसे लोगों ने न देखा हो। 


    नृत्यकला.. जब महादेव नृत्य करतें है, तो वह अपने आनंद के लिए करते है। उस नृत्य का उद्देश्य स्वयं में तप साधना से उत्पन्न ऊर्जा को संतुलित करना होता है। यह अलग दृष्टिकोण है कि नृत्य क्यों किया। लेकिन जब स्वर्ग में अप्सराएं नृत्य प्रदर्शन करती है, तो वह कला का उद्देश्य प्रदर्शन था, नृत्य से होती भावभंगिमा को प्रदर्शित करना। दोनों ही प्रसंगों में नृत्य का प्रभाव अलग है, कारण अलग है, पर है नृत्य ही, एक कला। वैसे देवता एलिट है? है, है, तभी नृत्य समारंभ में प्रेक्षक बनकर वाहवाही करते हैं। 


बारोट, गड़रिया लोहार और जीवित परंपराएँ

    एक जाति है, हमारे यहाँ (गुजरात में) बारोट कहतें है। राजस्थान में रावजी कहतें है। इस जाति के लोगों का मुख्य कार्य था वंश की बही लिखना। इनमे कुछ वंश बंटे रहते थे। उदहारण के लिए मेरे पूर्वजों से लेकर मेरे वंशजो तक के नाम, उनके विवाह, और मृत्यु की माहिती वे लोग अपनी बही में दर्ज करते थे। आज भी उनका पेशा यही है, लेकिन अब समय संजोग इतने बदल गए है। पहले तो बारोटों को अपने यजमानों से अच्छी शीख (दक्षिणा) मिल जाती थी। लेकिन अब नहीं, तो अब उन्हें भी अपने भरणपोषण के लिए अन्य आय के स्त्रोत खोजने पड़े। वे लोग अपनी बही में अलग ही भाषा, और संकेतों का प्रयोग करते थे। 


    समय के साथ बारोट बदले, उनकी कला मृतप्राय हुई। लेकिन वहीँ कुछ जाति आज पर्यन्त नहीं बदली। जैसे की राजस्थान के गड़रिया लोहार। कहा जाता है, कि लोहारों में यह गड़रिया लोहारों के पूर्वजो ने महाराणा प्रताप के साथ प्रतिज्ञा ली थी, कि वे कभी एक ही जगह पर नहीं रुकेंगे। महाराणा प्रताप को अपने युद्ध के लिए बारबार जगहें  बदलनी पड़ती थी, और तब हथियारों के लिए लोहारों को भी उनके साथ साथ घूमना पड़ा था। तब से आज भी यह गड़रिया लोहार थोड़े थोड़े समय में अपनी जगह बदलते रहते है। लोहे से औजार बनाना भी एक कला ही तो है। 


हर व्यक्ति हर कला के लिए नहीं बना

    फिर एक ख्याल आता है, हर कोई हर कला के लिए नहीं बना है। अतः वह अपनी पसंद की कला का ही सम्मान करता है। मुझे वो तीव्र सुर में चीखती हुई गायनकला जिसे ओपेरा कहते है, वह कतई पसंद नहीं। सबकी अपनी पसंद की कला है। तात्पर्य मुझे ओपेरा पसंद नहीं है, इससे कला के तौर पर ओपेरा का कद्द बड़ा या छोटा नहीं हो जाता। अगर मुझे बैगन-करेला नहीं पसंद है, तो इससे वे साग नहीं रहेंगे ऐसा तो नहीं होगा। वे रहेंगे। 


कलाकार पैदा होते हैं या बनाए जाते हैं?

    आर्टिस्ट प्रोडूस नहीं होतें? कैसे प्रियम्वदा कैसे? कलाकार भी बनाए जाते है। अरे चित्रकारी सीखायी जाती है। रसोई के व्यंजन बनाना सिखाया जाता है। संगीत के क्लास होतें है। लिखने के लिए विषय दिए जाते है। स्पर्धा होती है। कला की स्पर्धा। तो यह बात भी है, कलाकार का निर्माण होता है। उसे ऐसा वातावरण दिया जाता है, जहाँ उसकी कला चरम पर पहुँच सके। प्रियम्वदा ! किसी भी चर्चा में, वाद-विवाद में, तर्क में, लोग अपनी लघुताग्रंथि को साथ लेकर बैठते है। देखना तुम, कोई भी विषय हो, लोग जातिवाद को लाएंगे, इकॉनमी, स्तर, यह सब आएगा ही आएगा। जो श्रोता होतें है, उन्हें दीखता है, इसने इस शब्द को बार बार प्रयोग किया है, जरूर यहाँ कोई लघुताग्रंथि होगी। 


क्या अनपढ़ी कविता भी पूर्ण कला है?

    फिर किसी ने पूछ लिया, कला दर्शन का विषय है या प्रदर्शन का। यह वही प्रश्न है, जिसे दूसरे शब्दों में ढाला गया है। और ऊपर लिखा वह सारा कुछ फिर से इसी प्रश्न का उत्तर रहेगा। अगर कोई कविता पढ़ी न जाए, या कोई चित्र प्रदर्शनी में शामिल न होकर किसी पुराने लोहे के बक्शे में पड़ा रहे, तब भी वह कला ही है। अपूर्ण नहीं, पूर्ण ही है। दुनिया में ऐसे बहुत से गुमनाम कवि हुए है, जिन्होंने अपनी कविताओं को अपनी डायरी से बाहर नहीं निकलने दिया। पर इससे उस कवि के कवित्व को कोई हानि थोड़े हो जाएगी? उसकी अपनी कवित्वकला तो थी ही। यह तो वह बात हुई कि मैं तमगा दूंगा तो ही वह कला है अन्यथा नहीं। 


मेरी लेखनी, मेरा घमंड और मेरा आनंद

    छोडो, मैं अपने अबोधिता से यही समझता हूँ, कि मेरी कला द्वारा बस किसी की हानि न हो। लोग कविताएं लिखकर प्रधानमंत्री बन जाते है, मुझे कोई ऐसी इच्छा नहीं है। मैं भला, मेरी यह लेखनी भली, मुझे मुद्दे देती वह ई-सभा भली, मेरा यह ब्लॉग भला, और मेरा यथावत घमंड भला। 


    शुभरात्रि,

    १५/०६/२०२६

|| अस्तु ||

प्रिय पाठक,

    प्रियम्वदा से संवाद की यह दिलायरी आपको कैसी लगी? क्या आपके अनुसार कला का अस्तित्व दर्शकों पर निर्भर करता है, या कलाकार के भीतर जन्म लेने भर से वह पूर्ण हो जाती है? अपनी राय टिप्पणी में अवश्य साझा करें।


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