विरोध प्रदर्शन, विकास और लोकशाही : आखिर किसके हिस्से आता है बलिदान?
विरोध प्रदर्शन क्यों सफल नहीं हो पाते?
प्रियम्वदा,
तुम्हे पता है, आजकल अपने भारत में कोई विरोध प्रदर्शन सफल नहीं होते। लोग किसी एक मुद्दे पर आहत होतें है, और विरोध प्रदर्शन करने रोड पर उतरते तो है, लेकिन वह भीड़ कुछ भी स्पष्ट कह नहीं सकती। पंजाबी किसान आंदोलन थोड़ा बहुत सफल मान सकते है। जिस तरह से यह सत्ता पक्ष अपनी धौंस जमा रहा है, वह कुछ ज्यादा ही नहीं होता लगता? एक बात यह भी तो है, हम भारतीय ज्यादा दिन किसी को स्थिर रहने भी कहाँ देते है। हमे कुछ नया चाहिए होता है, और अब मोबाइल युग में जनता को नया देकर सत्ता को स्थिर रखना कितना आसान हो गया है।
विकास की कीमत कौन चुकाता है?
तुम देखना, कभी भी किसी भी आंदोलन में एक तो वो आज़ादी वाली गैंग आ ही जाती है। दूसरे वो इंद्रधनुष के सप्तरंगी घुस जाते है। और तीसरा कोई न कोई विपक्ष का व्यक्ति इस भीड़ को अपना राजनैतिक लाभ अर्जित करने के लिए आकर्षित करने का प्रयास करेगा। हाल में ही गुजरात में एक प्रोजेक्ट पास हुआ, जिसमे 765 kv की बिजली लाइन और बड़े बड़े पोल्स लगाने थे। यह लाइन कच्छ से अमदावाद जाती है, जिसमे मोरबी और हळवद के कुछ गाँवों की खेती की जमीन में यह खम्बे लगने थे।
क्या अपनी जमीन वास्तव में हमारी होती है?
वैसे यह बात सत्य है, कि हम इस देश में रहते हुए भी अपनी प्रॉपर्टी को अपना नहीं मान सकते। जब तक सरकार इन्वॉल्व नहीं होती, तब तक ही अपनी प्रॉपर्टी अपनी है। अयोध्या तथा काशी में मंदिर विकसित करने के लिए कितने ही लोगों के घरों को तोडा गया था, उन्हें अन्य जगह पर स्थानांतरित किया गया था। यही होता है, विकास भोग लेता है। बिजली की इस बड़ी लाइन से विद्युत सप्लाय में थोड़ी सरलता होगी, यह विकास है, लेकिन इसके लिए बलिदान किसानो को देना है।
किसान आंदोलन और राजनीतिक दलों की भूमिका
पर क्या यह बात भी ठीक है कि किसानों को अपने ही खेत में जाने के लिए प्रूफ दिखाना पड़े? और वह भी तब जब मौसम खेती के लिए बना हुआ है.. कोई भी प्रोजेक्ट्स पास हो जाते है, फिर उन्हें पूरा होना ही होता है। लेकिन यह तो थोड़ी ज्यादती दिखती है। सीधी बात है, हम शहरों में रहते हुए अगर अपने घर के बाहर की पार्किंग किसी और को नहीं देतें है, तो यह तो खेत में एक पूरा टुकड़ा देने की बात है। वह भी जबरदस्ती। कम्पनी खरीदती नहीं है यह टुकड़ा। मुआवजा देती है। वह भी इस भरेपूरे वर्षा के मौसम में।
दो जिले के किसान इकठ्ठा हुए, और गांधीनगर के लिए ट्रेक्टर यात्रा की। लेकिन विडंबना है, कि अमदावाद पहुंचकर किसानों को कांग्रेस वाले अपनी सभा में बिठाने लगे। अरे भाई, किसानों को राजकीय पक्षों से कोई लेना देना नहीं है, उन्हें अपनी समस्या है, वे अपना समाधान चाहते है। राजकीय पक्षों के अपने मुद्दे होतें है। खैर, जो होना था सो हुआ, बड़े किसानों ने अमदावाद तक ट्रेक्टर यात्रा की, छोटे किसानों की मजबूरी थी यह बारिश को आतुर खेत सँभालने की। और विरोध प्रदर्शन असफल रहा।
लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन की नौबत क्यों आती है?
पर मैं यह सोचता हूँ, कि देश में कोई भी आंदोलन होना ही नहीं चाहिए। लोकतंत्र है न, लोगों का चुना हुआ प्रतिनिधि वहां जाकर बैठा है न.. राजशाही होती तो समझ सकते है, कि राजा लोग लोक की नजरों में बुरे हुआ करते थे, दारू पीते थे, अय्याशियां करते थे, बड़े बड़े महलों में रहते थे। आजके राजनेता वैसे थोड़े है, वे घास की बनी कुटीरों में रहते है, और प्रजा के हितों के लिए योजनाएं लाते है। राजाओंने ने प्रजा पर तरह तरह के कर लादकर चूस लिया था। आज के राजनेता वैसे नहीं है, आज के नेता तो अपना विकास साधते है, पहला चुनाव जीतकर स्कॉर्पियो लातें है, दूसरा चुनाव जीतकर फॉरचूनर। अरे भाई, जो नेता खुद का विकास नहीं कर पाया, वह जनता का क्या ख़ाक भला करेगा?
विकास और बलिदान के बीच संतुलन की आवश्यकता
लोकशाही का मतलब क्या है? लोगों के बिच से कोई एक व्यक्ति उठेगा, और सत्ता की बागडोर संभालेगा। पर वह जो आदमी सत्ताधीश बना है, उसका भी तो अपना परिवार है भाई। उसका अपना समाज है। उसकी अपनी रिश्तेदारियां है। और सामाजिक प्राणी को तो विकास की राह पर कोई रोड़ा चलता कहाँ है? मुद्दा यह है, कि विरोध प्रदर्शन का मौका ही नहीं आना चाहिए। तुम्हे लोगों ने चुना है, लोगों के हितरक्षण के लिए। लेकिन तुम दूर के उस विकास को साधने के चक्कर में नजदीक के हितों को कैसे नजरअंदाज कर सकते हो? माना की बलिदान देना है, लेकिन बलिदान की पृष्टभूमि बदली जा सकती है।
सबका विकास, लेकिन किसकी कीमत पर?
अगर वह राजशाही को कोसकर तुमने इस लोकशाही की कामना की थी, तो धन्य है, अच्छा है फिर तो, यही प्रकृति का नियम है। किसी की हानि होती है, तभी किसी का लाभ होता है। कभी भी सबका लाभ सबका विकास एक साथ हो ही नहीं सकता। दिया जलता है, तो उजियारा होता है। हमारे उजियारे के लिए किसी दिए को तो जलना होगा। पानी के विशाल स्त्रोत वाष्प के रूप में अपनी हानि करवाते है, तब जाकर हमारे लिए मनभावन वर्षा का लाभ होता है।
शुभरात्रि।
१८/०६/२०२६
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक,
आपकी दृष्टि में विकास और जनहित के बीच संतुलन कैसे बनाया जाना चाहिए? क्या विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र की आवश्यकता हैं, या उनकी नौबत ही नहीं आनी चाहिए? अपनी राय टिप्पणियों में अवश्य साझा करें।
