क़ातिल कौन की कहानी क्या है?
देश के सबसे अमीर व्यक्ति की रहस्यमयी हत्या, एक विश्वप्रसिद्ध शेफ पर आरोप और परत-दर-परत खुलता रहस्य। पढ़िए आनंद रंगनाथन के उपन्यास 'क़ातिल कौन' की विस्तृत हिंदी समीक्षा।
प्रियम्वदा !
इस सप्ताह एक और उपन्यास पढ़ लिया। और अभी अभी मैंने लेखक के बारे में गूगल किया तो पता चला कि यह तो मशहूर टीवी डिबेट वाले भाईसाहब है। आनंद रंगनाथन नाम गूगल करते ही जिस आदमी की तस्वीर सामने आयी, तो उनका एक अति-वाइरल विडिओ याद आ गया। सबरीमाला में स्त्रिओं के प्रवेश के मुद्दे पर एक नारीवादी महिला ने स्त्रिओं के समानता के अधिकार पर अपनी टिपण्णी की, तब आनंद रंगनाथन ने सीधे ही पूछ लिया, कि "आप क्या सोचती है, क़ुरान गलत है? जब स्त्रियों को कैसे ड्रेस में रहना है वह कहता है तब.." तो वह नारीवादी महिला ने क़ुरान को सही ठहराया। तुरंत आनंद रंगनाथन ने कहा, "फिर यह क्या बात हुई, वहां स्त्रियों का अधिकार कहाँ गया?"
खैर, उनकी एक बेस्ट सेलर नावेल है "Souffle" नाम से। उस उपन्यास का हिंदी अनुवाद है, "क़ातिल कौन"। प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है, और यह उपन्यास एक मर्डर मिस्ट्री है। छोटी सी कहानी है, लेकिन काफी परतें है। थोड़ी सी अमीरों वाली भी। कहानी ही जब देश के सबसे अमीर पात्र की हो, तो फिर अमीरों वाले चोंचले भी तो आएँगे ही।
राजीव मेहरा और मिहिर कोठारी के पात्र
कहानी कुछ यूँ है, कि देश के सबसे अमीर आदमी मिहिर कोठारी की ज़हर देकर हत्या की गयी। और अपराधी है एक विश्वप्रसिद्ध शेफ। अपनी शैली में कहूं तो एक रसोइये की कहानी है, आजकल शेफ कहा जाता है, पहले महाराज या रसोइया कहा जाता था। जब जब रसोइयों की बात आती है, मुझे वल्लभ रसोइयां याद आता है। वल्लभ - अज्ञातवास का पाण्डुपुत्र भीम। इस उपन्यास में उस रसोइये पर आरोप है, कि उसने अपनी सुप्रसिद्ध डिश सूफले में ज़हर मिलाया, और खून किया। लेकिन कहानी में रसोइया खुद वध का शिकार होते होते बचा था।
उपन्यास की भाषा और शैली
उपन्यास की भाषा तो सरल है, लेकिन रसोइये के व्यंजनों के नाम बड़े कठिन लगे। फिर असली खूनी को बार बार 'वह' कहकर सम्बोधित करने से कहानी कईं बार समझ नहीं आती है, कि किसकी बात हो रही है। शेफ यानि की राजीव मेहरा कईं बार अपने भूतकाल में चला जाता है, और अचानक से वर्तमान में लौट आता है, वहां थोड़ी कहानी समझने में दिमाग लड़ाना पड़ता है। लेकिन पात्र दमदार है, वह सहनशील है, और सर्वस्वीकारी है। उसे निर्दोष होते हुए भी मिली सजा को स्वीकारता है। लेकिन भाग्य फिर उसे एक मौका देता है। अपनी निर्दोषता साबित करने के लिए उसने बहुत प्रयत्न किए।
उपन्यास का अंत और मेरी राय
लेकिन कहानी का अंत कुछ समझ नहीं आया। मतलब लगता तो है कि यहाँ से कहानी और आगे बढ़ेगी, लेकिन फिर पता नहीं यहीं अंत भी हो सकता है। एक तरह से पाठक पर छोड़ दिया गया है, जिसे जो कल्पना गढ़नी है, वह गढ़े। लेकिन मैं सोचता हूँ कि थोड़ी बहुत स्थिरता तो होनी चाहिए एक उपन्यास के अंतभाग में। जैसे राजीव फिर से वाराणसी चला गया। या फिर उसे दोबारा निर्दोष होते हुए भी सजा हो गयी। आप्टे के लिए सहानुभूति होती है, वह तो बेफालतू में चल बसा। आप्टे के लिए कहा जा सकता है, गड़े मुर्दे नहीं उखाड़ने चाहिए।
क्या आपको क़ातिल कौन पढ़नी चाहिए?
खैर, कहानी ओवरआल अच्छी है, रसप्रद है, पढ़ने लायक है। प्याज़ की तरह खुलती परतें बड़ी मजेदार और रोमांचकारी लगती है। भाषा भी ठीक है, अपशब्दों का इस्तेमाल नहीं किया गया है, वे भी पाठक पर छोड़ दिए गए है। मुझे लगता है, लेखनी इसी तरह शुद्ध होनी चाहिए। अपशब्दों का उपयोग करके लेखनी का स्तर गिराना कोई अचीवमेंट तो नहीं ही हो सकता है। अरे हाँ ! इस कहानी में लेखक ने सफलता पूर्वक मुख्य अपराधी की पहचान अंत तक नहीं होने दी थी। वरना शुगर डैडी में तो पांचवे अध्याय से शंका की सुई किसी पर स्थिर होने लगी थी।
मुझे लगता है, यह उपन्यास हिंदी अनुवाद 'क़ातिल कौन' के बजाए मूल प्रति 'Souffle' ही पढ़ना चाहिए। और क्योंकि जब पाककला की बात आती है, तब यह अनुवादित उपन्यास अंग्रेजी मूल शब्दों को ही प्रस्तुत करता है। एग्गप्लांट शब्द को गूगल किया तो पता चला बैंगन है वो। मैंने तो क्या क्या कल्पना की थी एग्गप्लांट की।
चलो फिर, अब इस पत्र को यही समापन करते है, अब नया कोई उपन्यास ध्यान में है नहीं पढ़नेलायक। और एक यह समस्या भी हो चली है, कि अब इस ब्लॉग पर शिड्यूल्ड पोस्ट्स बची नहीं है। तो कुछ पोस्ट्स भी लिखनी होगी, और शिड्यूल करनी होगी, ताकि ढंग से उपन्यास पढ़ने लायक समय निकाल पाऊं। चलो फिर, विदा दो।
शुभरात्रि।
३०/०५/२०२६
|| अस्तु ||
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