बारिश और अधूरे ड्राफ्ट
प्रियम्वदा,
बीती रात से बारिश हो रही है। फिर भी मन नहीं भर रहा। अभी शाम के पांच बजने को और मैं फिर शायद एक अधूरा ड्राफ्ट लिखने बैठा हूँ। पूर्णता के पास पहुंचकर मैं लौट आता हूँ। अतृप्तता के आलिंगन की बात ही कुछ और है। वैसे एक बात यह भी तो है, मन भर जाता है जिस चीज से उसे हम छोड़ देते है।
आंबालाल काका और वर्षा की भविष्यवाणी
सुपर अलनीनो का क्या है, उसे तो हमारे आंबालाल काका कुछ मानते ही नहीं। आंबालाल काका गुजरात में एक जानामाना नाम है। उम्रदराज व्यक्ति है, और रूढ़िगत परम्पराओं से वे वर्षा की भविष्यवाणी करते है। भविष्यवाणी से यहाँ मेरा अर्थ है, एक तार्किक आंकलन। आगाही। और अक्सर उनके द्वारा दिया गया वर्षा अनुमान सही भी ठहरता है। वर्षा ज्यादा हो जाए तब भी लोग आंबालाल काका की मजाक करते है, ना हो तब भी। बिच में विज्ञानजाथा वालों ने एक विवाद खड़ा किया था, कि लोगों को पर्यावरण विभाग की आगाही माननी चाहिए, न कि किसी एक व्यक्ति की मनघडंत आगाही। पर लोगों ने आंबालाल काका को फिर भी सपोर्ट किया। खैर, परसों वे टीवी में प्रस्तुत हुए, और बोले, कच्छ और द्वारका में अब वर्षा होगी। और बस, बीती रात से रिमझिम चालु है।
आरक्षण पर मेरी राय
सवेरे भीगते हुए ऑफिस आया, तब से लेकर अभी तक न बराबर कुछ काम था। पूरा दिन रील्स को समर्पित किया है आज। छात्र आंदोलन वालों ने एक तो मेरी फीड किडनैप कर रखी है। मैं जितना उस सुलगते मुद्दे से दूर रहना चाहता हूँ, उतनी ज्यादा रील्स मेरी फीड में आती है। और अब तो मेरा मनपसंद मुद्दा भी आने लगा है। आरक्षण। यह मुद्दा भी छात्रों को उठाना चाहिए। रिजर्वेशन ख़त्म कर दो। सारे ही लोग अपने एक एजेंडा के साथ इस आंदोलन से जुड़े हुए है। तो मैं उस एजेंडा को सपोर्ट करूँगा, जो कहता है आरक्षण ख़त्म करो। जातिवाद मिटाना चाहते है, वे आरक्षण को नहीं हटने देना चाहते।
सोशल मीडिया और छात्र आंदोलन
यह वाली पीढ़ी वाकई अलग तो है। ज्योर्जिया मेलोनी की पोस्ट में जा-जाकर कमेंट कर रही है, कि 'मोदी को छोड़ दो..', 'अपने बॉयफ्रेंड को समझा लो..', 'गलत आदमी के चक्कर में फंस गयी।'.. मतलब कुछ भी अनापशनाप। सोशल मीडिया किस तरह चलाना है, यह कौन सिखाएगा? परधानजी को इस्तीफा दे देना चाहिए। एक रील देखी, एक औरत अपने दो साल के बेटे के साथ अंदोलन में शामिल हुई, और उसका कहना था, कि 'बेटा अन्याय के खिलाफ खड़े होना अभी से सीख लेगा।' अरे उसे छी-छी करने की समझ नहीं है, अन्याय क्या होता है वो समझ जाएगा? उस औरत की भी शिक्षा गलत हुई है, परधानजी त्यागपत्र सौंप देना चाहिए।
आंदोलन, हिंसा और जिम्मेदारी
कुछ आंदोलनकारी लोगों ने मिलकर पिज़्ज़ा डिलीवरीबॉय को लूट लिया। उससे सारे पिज़्ज़ा छीन लिए। सीधी बात यही है, कि इस देश में हर आंदोलन शांतिपूर्ण तरीके से शुरू होता है, और जब तक तबाही न मचा दे, तब तक आंदोलन अधूरा ही लगता है। विपक्ष भी मौका देखकर कूद पड़ा था मैदान में, और माननीय साहब ने एक रील बना दी। पिछली सरकारों का तो मुझे याद नहीं। पर यह वर्तमान सरकार सब देखती-सुनती जरूर है, बस रिएक्शन टाइम ज्यादा लेती है।
सरकार की प्रतिक्रिया पर सवाल
कितना अच्छा होता अगर जब छात्रों ने शुरुआत में शांति से आंदोलन शुरू किया था, तभी सरकार किसी अधिकारी को भेजकर मामला शांतिपूर्ण तरिके से निपटा लेती। अपने परिवार में कोई रूठ जाता है, तो हम साथ बैठकर मनाते है न उसे.. उसी तरह सरकार भी चाहती तो शांति पूर्ण तरिके से कुछ कदम उठाकर और कुछ आश्वासन देकर मामले को सुलझा लेती। पर नहीं, इन्हे लगता है सब कुछ कण्ट्रोल में है। क्या ख़ाक कण्ट्रोल में था? छात्रों का तो पता नहीं, पर शांति बनाए रखने के लिए कितने पुलिस वालों ने अपना लहू बहाया, इस बात की जिम्मेदारी कौन लेगा? भूखे गिद्धों की तरह छात्र एक अकेले पुलिस कर्मचारी को पिट रहे थे।
मीडिया के साथ व्यवहार
इस आंदोलन में कुछ लोग तो प्रधानमंत्री को इस तरह बुला रहे थे, जैसे उसके एक वोट से वह व्यक्ति प्रधानमंत्री बना हो। यह अधिकार भाव गलत है। इन्हे लगता है, लोकतंत्र है तो प्रधानमंत्री इनका दास है, वे बुलाएंगे, और उन्हें आना पड़ेगा। शिक्षा-व्यवस्था ही गलत है। परधानजी इस्तीफा देदो आप। आंदोलनकारियों ने कईं सारे मैन स्ट्रीम मीडिया कर्मचारियों को भला बुरा कहा। टीवी चैनलों के रिपोर्टरों से बद्सलूकियाँ की। क्यों? क्योंकि टीवी चेनल्स वर्तमान सरकार की सराहना करते रहते है।
अरे वो रिपोर्टर बेचारा अपना काम कर रहा है। उसे उस बात की तनख्वाह मिलती है। वह अगर कुछ बढ़ा-चढ़ाकर भी बोल रहा है, तो उसका काम है वह। आंदोलनकारियों को उस रिपोर्टर का विडिओ बनाना चाहिए। और फिर उसे रील पर डालो, असली हकीकत जो है वह तुम बताओ। पर नहीं, वह भीड़ उस रिपोर्टर पर पानी डालेगी, उससे गली-गलौज करेगी, हाथ-मस्ती भी करेगी। क्यों? क्योंकि शिक्षा मंत्री ने शिक्षा व्यवस्था ठीक नहीं की। दे दो परधानजी जल्दी से इस्तीफा दे दो।
अनुशासन और शिक्षा
संस्कार और अनुशासन। यह कौन सिखाएगा? शिक्षा मंत्री ने इसे सिलेबस में शामिल ही नहीं किया होगा। क्योंकि उन्हें तो पेपर फोड़ना था न.. इसी लिए तो कहता हूँ, परधानजी इस्तीफा दे दो।
(२४/७/२६, मैं अधूरे ड्राफ्ट्स क्यों छोड़ने लगा हूँ..)
आज के आंदोलन बनाम स्वतंत्रता आंदोलन
अंग्रेजकालीन भारत में आंदोलन होते थे, पोलिसबल लाठियां चलाता था। और आंदोलनकारी लोग चुपचाप लाठियां खा लेते थे। इससे क्या होता था, कि दूसरे लोगों को अंग्रेजो के प्रति घृणा जन्मती थी, और आंदोलनकारियों के प्रति दयाभाव। उन्हें अंग्रेज आततायी लगते थे। यह जो भाव उत्पन्न होता था, उससे ही अंग्रेजो के खिलाफ और ज्यादा जनसैलाब खड़ा करते थे मो.क. गाँधी।
लो.. परधानजी ने इस्तीफा दे ही दिया। अब? आगे क्या होगा?
ठीक ही हुआ। यह सरकार कभी झुकती नहीं थी। एक बार किसान आंदोलन के समय पीछे हटी थी, और अब इस बार हुई है।
शुभरात्रि,
२५/०७/२०२६
|| अस्तु ||
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