क्या आरक्षण हमेशा रहेगा? एक निजी डायरी
जब मन परेशान होता है
प्रियम्वदा !
मैं जब भी परेशान होता हूँ, तो उलट-सुलट फैसले ले लेता हूँ। आज सवेरे मैंने व्हाट्सप्प के तमाम ग्रुप्स हटा दिए, तमाम चैट्स डिलीट कर दी। कुछ वे ही चैट्स संभालकर रखी है, जिन्हे मैं जरुरी मानता हूँ, या जिन्हे मैं कुछ महत्त्व देता हूँ। आज वाकई लग रहा है, ज़िन्दगी मेरे साथ स्टेचू-स्टेचू खेल रही है। कोई धून चल रही होती है, अचानक से शांति हो जाती है, और इस शांति के दौरान स्थिर हो जाना होता है। जरा भी इधर उधर हिले तो लगता है जान ही ले लेगी। खैर, कईं सारी चैट्स और ग्रुप्स को हटाते ही कईं लोगों के मेसेजेस आने लगे। और सबने ही सबसे पहले हालचाल पूछा।
(२७/०७/२०२६)
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कड़वी बातें और बीता हुआ समय
प्रियम्वदा ! कुछ लोग मुँह खोलते ही इतनी कड़वी बात करते है, कि मन करता है कि मैं नासमझ हो जाऊं। काश मुझमे सत्य के कड़वे-मीठे होने की समझ ही न होती। जीवन शायद किसी का भी मनचाहा नहीं होता है। न ही कभी मन की चाहते पूरी होती है। कभी कभी लगता है, एक रबर ऐसा भी होना चाहिए, जिससे भूतकाल के कुछ कदम मिटाएं जा सकें।
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जंतर मंतर से सीखा धैर्य
जंतर मंतर जितना धैर्य चाहिए मुझे प्रियम्वदा। दिल्ली का जंतर मंतर कईं सालों से अपूर्ण आकांक्षाओं को कहीं न कहीं पहुंचाता रहा है। वह मूक साक्षी बनकर निष्पक्ष अपनी जगह पर बना रहा। उसने अतृप्ति को आश्रय दिया। उसने न जाने कितने पक्षों को निष्पक्षता से अपने पास रखा है। उसने लाठियां चलती देखि होगी, आंसूगैस के गोले से भी वह न रोया होगा। उसने भी पत्थरों की बारिश झेली होगी। पर फिर भी वह पुनः नवीन अतृप्त आकांक्षा को शरण देने से नहीं चुकता।
छात्रों ने आंदोलन किया, शिक्षण मंत्री का त्यागपत्र पाया। अब देखना यह है, कि नए शिक्षा मंत्री जी क्या नया करते हैं। हालाँकि मुझे तो अब भी यही समझ नहीं आ रहा है, कि शिक्षा मंत्री के बदल जाने से क्या होगा? शिक्षा व्यवस्था में क्या बदलाव हुए कुछ? अगर बात जवाबदेही की ही थी, तो वो तो परधानजी ने जवाब दिया ही था। पेपर लीक होने के बाद पुनः परीक्षा सफलता पूर्वक आयोजित कर दी थी।
आंदोलन और जवाबदेही
हाँ ! यह बात सही भी है, कि ऐसे आंदोलन से कईं बार सरकारों को यह अहसास जरूर होता है, कि वे वहां सत्ता पर इसी लिए हैं, कि उन्हें जनता के हितों को सुरक्षित रखना है। मनमानी नहीं करनी है। और यह वर्तमान सरकार मशहूर है, विपक्षी दलों को नियंत्रित करने के लिए। देश में एक मजबूत विपक्ष होना जरुरी है। लेकिन अपने यहाँ मजबूत या कमजोर, जो भी विपक्ष है, वह जनमत के खिलाफ काम करता दीखता है।
परधानजी के इस्तीफे के बाद वो तिलचट्टों की सभा तो बर्खास्त हो गयी। लेकिन अब धीरे धीरे फिर से सवर्णों की अधूरी मनसा जाग रही है। आरक्षण हटाने की मांग के साथ फिर से सवर्ण एकत्रित तो हो रहे है, लेकिन सवर्णों की यह आकांक्षा कभी पूरी नहीं हो पाएगी। इस मांग में न तो देश का विपक्ष सवर्णों के साथ होगा, न ही सरकार। आरक्षण के मुद्दे पर प्रत्येक राजनैतिक दलों ने अपनी वोटबैंक बना रखी है। कोई भी दल अपने मतदाताओं को गंवाना नहीं चाहेगा।
कल एक ई-सभा में तिलचट्टों को बढ़चढ़कर सपोर्ट करने वाले भी बोल उठे, ' आरक्षण हटवाने का यह तरीका ठीक नहीं है।' मैं हैरान था, जब तिलचट्टों ने किया तो ठीक था, और अब यह नहीं? यह तो दोगलापन हुआ। प्रियम्वदा ! दुनिया बड़ी दोरंगी है। मेरे भी दो रंग है। श्वेत और श्याम। लेकिन मैं ग्रे दिखने की कोशिश ज्यादा करता हूँ। क्योंकि मुझे वह ज्यादा आकर्षित करता है, जो ज्यादातर लोगों को पसंद नहीं होता। लोगों को लाठीचार्ज में मार खाते बच्चे दिखे थे, और उनकी करुणा सारे बांध तोड़कर बह निकली थी।
भीड़ और कानून व्यवस्था
पर मुझे, मुझे दिखी थी एक सम्भावना, जिसे पुलिसबल ने काबू कर लिया। सम्भावना नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, और श्रीलंका की तरह देश के सर्वोच्च स्थापत्य को तबाह करती अनियंत्रित भीड़ की। भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता, पर एक भीड़ अच्छी भली व्यवस्था को विकृत करने में देर भी नहीं करती। अगर यह अनियंत्रित भीड़ संसदभवन परिसर तक पहुँच जाती, तो क्या गेरंटी है, कि वे लोग वहां उत्पात न मचाते? और लोग कहते है पुलिस ने गलत तरीके से बल प्रयोग किया।
पुलिसबल इस भीड़ को नियंत्रित कैसे करती? क्या उनके आगे हाथ जोड़ती? क्या उनके पैर पकड़कर उन्हें समझाती कि 'बस यहाँ रुक जाइये।' क्या अपने देश के लोग एक बार कहने से कभी रुक जाते है? मैंने काफी सारे वीडियोस देखे, पुलिस वाले कईं बार लोगों से अनुरोध कर रहे थे, पीछे हट जाओ.. लेकिन बहरी भीड़ को क्या नरम स्वर सुनाई पड़ता है?
गड़रिया अपनी भेड़ों को एक लाठी से ही दिशा दिखाता है। हजारों-लाखों लोगों की भीड़ को भी गड़रिया प्रवाह कहा जाता है। यह भीड़ बस एक दूसरे का अनुकरण करती है। एक जने को लाठी पड़ी, वह भागा, उसके पीछे-पीछे और भी लोग भागे। संसद की ओर जाती यह भीड़ पीछेहठ तो करने लगी थी, लेकिन फिर पुलिस को भी शायद पीटने में आनंद आने लगा था। होता तो है ऐसा, अक्सर लोगों को एक बार मारने के बाद दूसरी झापड़ और खिंच लेने की तमन्ना उठती है। और यह तो पुलिस है, इसे तो भारतीय न्याय व्यवस्था ने लाठी दे रखी है। फिर वे क्यों पीछे हठ करेंगे?
आरक्षण पर मेरा दृष्टिकोण
खैर, सोशल मीडिया पर उठे आरक्षण हटाओं आंदोलन के पेज की बढ़ती पब्लिसिटी भी लोगों का ध्यान तो खिंच ही रही है। पर यहाँ भी मेरा दृष्टिदोष आड़े आ रहा है। कईं लोगों को मैंने कहते सुना, जातियां हटा दो, जातिवाद अपने आप हट जाएगा। यहाँ मुझे आपत्ति है। मेरे पास अपने वंश का गौरव है, मैं उसे क्यों छोड़ू? लोकतंत्र की स्थापना के लिए हमारे पूर्वजों ने अपने राज्य सौंपे है। जिनके पास जागीरें थी, उन्होंने वह छोड़ दी। फिर भी इस लोकतंत्र का पेट नहीं भरा था, तो इन्होने जमीनें मांग ली। गुजरात में उच्छंगराय ढेबर ने सामाजिक और आर्थिक समानता लाने के नाम पर 'जोते उसकी जमीन' का कानून लाकर गिरासदारों की जमीनें किसानी करते मजदूरों को सौंपने को कहा गया।
आज भी लोग तुरंत कह देते है, उस दौर में आप लोगों ने जलसे भी तो खूब किये थे। मैं तो कह देता हूँ, कि 'हाँ ! किए थे, तभी तो आज आरक्षण के नाम की सजा काट रहे हैं। अब तुम्हारे जलसे है, तुम मौज काटो, मुफ्त का राशन दाबकर, सरकारी आरक्षण की चादर तानकर मस्त सोए रहो।'
लोकतंत्र, समानता और भविष्य
या तो हर जगह आरक्षण लगाओ, या हर जगह से हटा लो। विपक्ष तो कह ही रहा है न, वे तो निजी संस्थानों में भी आरक्षण लाएंगे। फिल्म इंडस्ट्री में भी आरक्षण होना चाहिए। फ्लॉप अभिनेताओं को साल में चार फ़िल्में बनाकर लोगों को दिखानी होगी। खिलाड़ी कुमार को दो साल में एक ही फिल्म बनानी होगी। न्यायालयों में क्यों नहीं है आरक्षण? पांच में से चार जज आरक्षण वर्ग से होने चाहिए। क्या हो जाएगा अगर कोई आरक्षण वर्ग से आया जज किसी पॉकेटमार को फांसी सुना देगा तो? देश में बढ़ रहे स्टार्टअप्स में आरक्षण होना चाहिए। दस में से पांच स्टार्टअप्स का आईडिया आरक्षित वर्ग ही देगा।
अरे, देश की सुरक्षा से क्यों आरक्षित वर्ग वंचित रह जाए भला? युद्ध जैसे प्रसंगो में प्रथम पंक्ति में खड़े रहने का हक़ सिर्फ आरक्षित वर्गों का होगा। क्रिकेट.. दस खिलाडियों की टीम है न.. पांच सामान्य, तीन ओबीसी, एक एससी, और एक एसटी। 20-20 में पंद्रह ओवर सिर्फ आरक्षित वर्ग ही बोलिंग करेगा।
सवर्णों को इस देश में भारत सरकार द्वारा रहने दिया जाता है बस। हालाँकि भाड़ा पूरा वसूलते हैं। तरह तरह के टैक्स। प्रत्येक संस्थानों में महंगी फीस। और तमाम सरकारी भर्तियों में आरक्षण की बेड़ियाँ। और तो और सरकारी भर्तियों में हिस्सा लेने के लिए भी सबसे ऊँची फीस।
लोकशाही निभाने की पहल मैंने की है। और इस लोकशाही के सत्तर वर्षों के उपरांत भी यदि आरक्षित वर्गों को यह लोकशाही अपने पैरों पर खड़ा नहीं कर पायी है, तो यह लोकशाही क्षतिपूर्ण है। शायद इसके निर्माताओं को सत्ता की चिंता ज्यादा होगी।
मेरा समर्थन रहेगा, आरक्षण हटाने को, लेकिन कुलगौरव त्यागने को कदापि नहीं। योद्धा घायल होने के उपरांत भी लड़ते थे। यह तो फिर भी आरक्षण है।
शुभरात्रि।
२८/०७/२०२६
|| अस्तु ||
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क्या यह लेख आरक्षण पर तथ्यात्मक विश्लेषण है?
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क्या लेखक आरक्षण पर अपना निजी मत व्यक्त कर रहा है?
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