गुरुपूर्णिमा, राजराजेश्वर धाम और मेरी अधूरी आस्था
जन्मदिन अब उत्सव क्यों नहीं लगता
प्रियम्वदा !
परसो जन्मदिन था। और अब तो जन्मदिन का भी उत्साह शेष नहीं रहा मुझ में। मुझे इन शुभेच्छा संदेशों में इतना रस नहीं होता। पर लोग भेजते है, तो हमें प्रत्युत्तर देना होता है। क्योंकि आपको घमंडी होते हुए भी यह दिखावा तो करना ही पड़ता है, कि 'हाँ ! मैं जरा भी घमंडी नहीं हूँ।' बस इसी कारण से सवेरे से शाम तक सबको ही 'थैंक यू' का रिप्लाई तो जरूर से दिया। एक मित्र है, उनका अचूक फोन आता ही आता है। उन सारे मित्रों को मेरा जन्मदिन फेसबुक याद दिलाता है। एक और बहुत पुराने मित्र का फोन आया। फेसबुक वाले दौर में हम कुछ लोग किसी न किसी कला के माध्यम से ही एक दूसरे की पहचान में आए थे।
खैर, शाम को सबकी व्हाट्सप्प स्टोरियां भी इसी चक्कर में चेक करनी पड़ी थी, कि किसी की शुभकामना अनदेखी न मान ली जाए। आलसी जिव हूँ मैं प्रियम्वदा, थोड़ा घमंडी भी। शाम को केवल कुँवरुभा को राजी रखने के लिए अलग अलग फ्लेवर्स की पेस्ट्रीज़ ले जानी पड़ी।
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गुरुपूर्णिमा की सुबह और हुकुम का आदेश
कल गुरुपूर्णिमा थी। हुकुम का आदेश था, गुरुपूर्णिमा पर जाखण चलेंगे। हुकुम का आदेश हो, फिर मेरी अपनी कोई भी इच्छा को आकार लेने का अधिकार ही नहीं है। मेरी आस्था बड़ी कमजोर है। मैं किसी परंपरा में मानूं, या न मानूं, वह परिस्थिति पर निर्भर करता है। पर हुकुम की आस्था बहुत मजबूत है। और मैं उनकी आस्था में श्रद्धा रखता हूँ। उनका कोई भी आदेश मैं सिरोधार्य ही रखता हूँ। उन्होंने कहा, 'सवेरे तीन बजे उठ जाना, और चार बजे निकल पड़ेंगे।'
तीन बजे निंद्रा तो टूटी, पर पलकों पर जैसे पहाड़ पड़ा था। बड़ी महेनत लगी उस पहाड़ को तोड़ने में। जल्दी-जल्दी करते हुए भी साढ़े पांच बजे ही घर से निकल पाए। दो सौ साठ किलोमीटर का सफर था। और वह भी सपरिवार। मुझे बड़ी कठिनाई होती है सपरिवार कहीं घूमने में। एक चिंता लगी रहती है, और दूसरा व्यसन की अनापूर्ति। अकेला होता हूँ, तो सिगरेट-मावा के चलते सफर बड़ा आसान लगता है, और मनपसंद भी।
सूरजबारी पुल पर बारिश, नमक और समुद्र
उजियारा हुआ तब तक सूरजबारी के पुल पर था मैं। बड़ी राहत हुई, पुल के दोनों तरफ समंदर का लहराता पानी देखकर। घर से निकले तब से अभी तक कार का साउंड सिस्टम बस एक ही प्रार्थना-धून गा रहा था। क्योंकि हुकुम का आदेश था। कार की ब्लूटूथ सिस्टम से मैंने उन्हें फोन कनेक्ट कर दिया यही मेरी भूल, जिसे मैंने साठ किलोमीटर तक भुगता। असुर नहीं हूँ मैं, जो मुझे धून से चिढ होती, पर एक ही धून बार बार सुननी पड़ी थी।
बनास और रूपेण का ही बरसाती पानी होगा यह, वरना सूरजबारी पुल के ऊपर से तो बस नमक के अगर दीखते है केवल, और नमक की बड़ी बड़ी टेकड़ियाँ। जहाँ तक नजरें जाए, केवल हवाओं के साथ झूमता पानी। लेकिन एक ना-पसंद आने वाली गंध भी हवाओं में तैरती रहती है। वर्षा ऋतु में यह गंध स्वाभाविक भी है। मटमैले लहराते पानी में तो सूर्य का बिम्ब नहीं दिखाई पड़ता, लेकिन पुल की दूसरी तरफ पक्के अगरो में नमक की एक परत के ऊपर ठहरे पानी में जरूर से सुबह की एक चमक क़ैद दिखती है।
राजराजेश्वर धाम : श्रद्धा का विशाल परिसर
अच्छी बारिश की चुगली करते रोड पर जन्मे नए गड्ढों में एक दो बार गाडी कुदाने के बाद, अधिक चेतना के साथ ड्राइविंग करते हुए आखिरकार दस बजे मैं अपने गंतव्य स्थान पर पहुँच गया था। पिले पत्थरों से बना एक भव्य और विशाल द्वार, जिसपर लिखा है, 'त्रिमूर्ति द्वार।' कईं लोगों की श्रद्धा का केंद्र। कईं सालों पुरानी एक परंपरा। और जो सीखाता है योग, अष्टांग योग। योग यूनिवर्सिटी भी है यहाँ। हुकुम की अडिग श्रद्धा है यहाँ।
लकुलीश परंपरा और पाशुपत मत की झलक
अमदावाद-राजकोट हाईवे पर, लींबडी से नजदीक यह स्थान 'राजराजेश्वर धाम' नाम से विख्यात है। शैव पंथ में पाशुपत मत के स्थापक या प्रचारक, और शिवावतार 'लकुलीश' की परंपरा का यह स्थान है। मूलतः वड़ोदरा के पास कायावरोहण में इस परंपरा का केंद्र माना जाता है। कायावरोहण के बारे में बहुत सारी कथाएं जुडी है। ऋषि विश्वामित्र का आश्रम था। कायावरोहण शब्द भी काया + अवरोहण से बना है।
दस बजे मैं इस सुंदर प्रांगण में था। विशाल मंदिर, भव्य और मोहक विष्णु तथा ब्रह्मा की मूर्तियां, और पंचमुखी शिवलिंग। यह परंपरा प्रचार में नहीं मानती। फिर भी राजस्थान एवं गुजरात के बड़े राजनेता भी यहाँ सामान्य शिष्य की तरह आते रहते हैं। मुझे एक हुकुम का कहा किस्सा याद आता है। माननीय प्रधानमंत्री जी, तब गुजरात के मुख्य मंत्री थे। किसी अवसर पर इस परम्परा के शिष्यों की विशाल संख्या उपस्थित थी। तो जो भी कोई मुख्यमंत्री जी को सन्मान के रूप में पुष्पमाला पहनाता, मुख्यमंत्री जी तुरंत गले से माला उतार कर गुरूजी के चरणों में रख देते। इससे लोगों में यह सन्देश जाता, कि मुख्य मंत्री जी की गुरूजी में अपार श्रद्धा है। यही काम वे अन्य धर्मगुरुओं के कार्यक्रम में भी किया करते।
हुकुम की श्रद्धा और मेरी भूख
हुकुम की ऊर्जा इस स्थान में आते ही अलग स्तर पर पहुँच जाती है। उनका मन प्रसन्न रहता है, और हाथ जेब में। पुजारी से लेकर संस्था के ट्रस्ट तक, उन्होंने हर जगह कुछ न कुछ दिया। मैं उनकी इस प्रसन्नता तो देखकर राजी था। पर थोड़ा सा परेशां भी। मैंने पहले ही कहा था न, मेरी श्रद्धा हुकुम जितनी मजबूत नहीं। भूख के मारे परेशां था मैं। सवेरे तीन बजे का उठा हुआ, सिर्फ एक कप चाय के आधार पर अभी ग्यारह बजे तक यहाँ से वहां, इस विशाल प्रांगण में टहल रहा था। भूख के कारण ही चिढ भी चरम पर थी मेरी। पहले पेट पूजा, फिर देव।
बिंदु सरोवर की हवा और मन का शोर
इस क्षेत्र में ही एक कृत्रिम जलाशय है, 'बिंदु सरोवर'.. मैं वहां चल दिया। वर्षा को व्याकुल धरती मानो भांप छोड़ रही थी। पसीने से लथपथ मैं रुमाल को कंधे पर रख बिंदु सरोवर पहुंचा, वहां जलाशय की खुली जगह होने से हवा बहती थी। बाकी जगह विशाल वृक्षों के कारण हवा कम बहती है, और एक उमस अनुभव होती है। आसमान में बादल भरपूर थे, पर वे भी बरसने को इच्छुक नहीं लगते थे।
कुँवरुभा ने सरोवर के किनारे एक पीपल के निचे रखे गणपति उठा लिए। अब उन्हें कैसे समझाया जाए, कि यह गणपति महाराज किसी से घर से ही यहाँ बिराजे होंगे। पर बालहठ के आगे किसी की नहीं चलती। तो बस, गणपति हमारे साथ हो गए। दोपहर को मध्यान्ह आरती के बाद कुछ देर बस शांति के वातावरण में उमस से हाँफते बैठे रहे। दोपहर का एक बज रहा था। और पुनः एक सोशल मीडिया के मित्र की वहां भेंट हुई।
शून्य से शुरुआत करने वालों की आस्था अलग होती है
मुनि जी के परलोक प्रस्थान के बाद यहाँ उनकी एक प्रतिमा स्थापित की गयी है। मैं देख रहा था, कितने सारे लोग पूरी आस्था और श्रद्धा के साथ यहाँ उनका पूजन अर्चन कर रहे थे। मैं नास्तिक नहीं हूँ, पर मेरा दृष्टिकोण बदल गया है। मैं शायद पथभ्रष्ट शिष्य हूँ उनका। न तो मैं उनके द्वारा चिन्हित मार्ग पर कभी चल पाया हूँ। न ही कभी मैंने गुरुमंत्र को गंभीरता से रटा है। हुकुम काफी देर तक वहां बैठे रहे थे। मेरी विचारमाला पर से मेरा नियंत्रण जाता दिख रहा था मुझे।
शायद हुकुम ने शून्य में से सर्जन किया है, इस लिए उनकी आस्था बलवान है ऐसा मुझे लगता है। उनका समय अलग था, उनकी युवावस्था में किसानी एक मजदूरी काम था, जो बहुत मुश्किल माना जाता था। जमींदार खुद खेती करेगा यह ख्याल ही थोड़ा अटपटा था। हुकुम ने गाँव से साढ़े तीनसौ किलोमीटर दूर एक अनजान शहर में अपना नया निर्माण करना चाहा। उनके इस शून्य से नवसर्जन करने के संघर्ष में उनकी यह आस्था उन्हें मजबूत बना पायी होगी। 1994 का कांडला का तूफ़ान तथा 2001 के भूकंप ने उन्हें और श्रद्धालु बनाया होगा।
मैं उतना आस्तिक क्यों नहीं बन पाया
मैं, मैं शायद उनके जितना आस्तिक न बन पाया, उसका एक कारण यह भी हो सकता है, कि मुझे शून्य से शुरुआत नहीं करनी पड़ी है। मैं एक से आगे बढ़ा हूँ। मेरे पास पर्याप्त संसाधन थे। भले ही सम्पूर्ण समृद्धि नहीं थी, पर मेरे पास तब अपनी सायकल थी, जब आसपास के किसी भी बच्चे के पास नहीं थी। जब संसाधन और सुविधा, दोनों ही बगैर प्रयासों के मिले, तो आस्था और श्रद्धा जैसे विषयों के प्रति अभिगम थोड़ा पेचीदा हो ही जाता है।
चोटिला, चामुंडा माता और सुविधा बनाम श्रद्धा
लगभग दो बजे घर के लिए निकल पड़े। साढ़े चार घंटे का सफर। चोटिला वाले रस्ते से गए थे, और उसी रस्ते से लौटे भी। चोटिला में चामुंडा माता का प्रसिद्द स्थान है। पर्वत है, थोड़ी सी सीढियाँ है। लेकिन फिर भी चढ़नी मुश्किल लगती है। एक पार्किंग में कार रोकी, और भारी श्रद्धालुओं की भीड़ में से होते हुए पर्वत की सीढ़ियों तक पहुंचे। माताजी की तो इच्छा थी सीढियाँ चढ़कर ऊपर दर्शन करने की। पर मैं पिछली चैत्री नवरात्री में यहाँ आया था, और सीढियाँ चढ़ा था। मेरा वह अनुभव बड़ा ही कठोर रहा था। (यहाँ पढ़ सकतें है।)
तो मैंने सीढियाँ न चढ़ने के लिए माताजी को सबसे पहले अनुरोध किया। मेरे जैसे आलसी और मौकापरस्त श्रद्धालुओं के लिए ही, प्रत्येक पहाड़ी तीर्थों की तलहटी में वही देव-देवी बिराजते है, जो ऊपर चोटी पर होतें है। कोई न कोई श्रद्धालु उन्हें ऊपर से निचे ले आया होता है, अपनी सहूलियत के लिए। और बड़ा सही काम किया है। वरना यह कलयुगी श्रद्धालु में इतनी समझ भी नहीं है, कि अपनी सनातन परंपरा में तो प्रत्येक कंकर में शंकर माना गया है।
क्या श्रद्धा का माप यात्रा की कठिनाई से होता है?
मुझे वह लोग भी बड़े फालतू लगते है, जो किसी धार्मिक स्थल पर उन लोगों की विडिओ बनाते है, जिसमे कोई श्रद्धालु अपनी अक्षमताओं के चलते घोड़े पर, या मानवों द्वारा उठायी जाती पालखी में बैठकर तीर्थ के दर्शन करते है। मुझे कोई आपत्ति नहीं, कि कोई मोटापे का शिकार व्यक्ति घोड़े पर बैठा हो, या उस कावड़ में बैठा हो जिसे दो या चार आदमी उठाकर पहाड़ी के ऊपर पहुंचाते है। उन लोगों का तर्क यह है कि जो व्यक्ति खुद अपने पैरों पर यात्रा नहीं कर सकता उन्हें घर रहना चाहिए। इस हिसाब से तो श्रवण ने गलती की थी, जो अपने अंधे माँ-बाप को कावड़ में लेकर घुमा था। इन लोगों को एस्केलेटर या लिफ्ट का भी उपयोग नहीं करना चाहिए। अपने पैरों से सीढियाँ चढ़ो सातवे माले तक। अरे भाई, अक्षमता के चलते ही तो वह किसी संसाधन का उपभोग कर रहा है.. और उस उपभोग का मूल्य भी तो चूका रहा है। कुछ जातियों का तो परंपरागत काम रहा है, पालखी उठाना।
खैर, चोटिला तलहटी में चामुंडा माता के दर्शन करके, अब तो घर के सिवा कहीं रुकना न था। वांकानेर से माळीया तक हाईवे पर अच्छी होटलों की तंगी लगती है मुझे। जितने ढाबे है, वे सारे राजस्थानियों ने बनाए है, और ट्रक ड्राइवर्स रुके रहते है। सपरिवार ऐसे ढाबों पर थोड़ी झिझक अनुभव होती है। हर बार की तरह, माळीया की 'ऑनेस्ट' ही सहारा बनती है।
शुभरात्रि,
३०/०७/२०२६
|| अस्तु ||
प्रिय पाठक,
अगर यह यात्रा-वृत्तांत आपको अपने किसी अनुभव की याद दिला गया हो, तो उसे टिप्पणी में साझा कीजिए। ऐसी ही आत्मचिंतन से भरी डायरी प्रविष्टियाँ पढ़ने के लिए ब्लॉग से जुड़े रहें।
1. राजराजेश्वर धाम कहाँ स्थित है?
राजराजेश्वर धाम गुजरात में अहमदाबाद–राजकोट हाईवे पर लिम्बडी के निकट स्थित एक प्रसिद्ध शैव तीर्थ है। यह लकुलीश परंपरा और पाशुपत मत का महत्वपूर्ण आध्यात्मिक केंद्र माना जाता है।
2. गुरु पूर्णिमा का महत्व क्या है?
गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति में गुरु के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करने का पर्व है। इस दिन श्रद्धालु अपने गुरु या आध्यात्मिक केंद्रों में जाकर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
3. लकुलीश परंपरा क्या है?
लकुलीश को शैव धर्म के पाशुपत मत का प्रमुख प्रवर्तक माना जाता है। गुजरात का कायावरोहण इस परंपरा का मुख्य केंद्र माना जाता है।
4. क्या श्रद्धा का संबंध केवल कठिन यात्रा से है?
नहीं। श्रद्धा व्यक्ति के मन की भावना है। यदि कोई स्वास्थ्य, आयु या अन्य कारणों से किसी साधन का उपयोग करके तीर्थ तक पहुँचता है, तो इससे उसकी आस्था कम नहीं हो जाती।
5. चोटिला किस कारण प्रसिद्ध है?
चोटिला गुजरात का प्रसिद्ध शक्तिपीठ है, जहाँ माँ चामुंडा का मंदिर स्थित है। यहाँ वर्षभर बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुँचते हैं।
6. इस लेख का मुख्य संदेश क्या है?
यह एक व्यक्तिगत यात्रा-वृत्तांत है, जिसमें लेखक ने जन्मदिन, गुरु पूर्णिमा, राजराजेश्वर धाम की यात्रा, पारिवारिक आस्था और अपनी आध्यात्मिक दुविधाओं के माध्यम से श्रद्धा और जीवन के संबंध पर विचार साझा किए हैं।
📖 थोड़ी देर और ठहरो प्रिय पाठक,
- 📚 किताबों की दुनिया – इन किताबों ने मुझे बदला, शायद आपको भी पसंद आएं।
- 📖 मेरी ई-बुक्स – मेरी कुछ चुनी हुई किताबें और संचयन, जो आप पढ़ सकते हैं।
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