दीवान जरमनी दास की किताब 'महाराजा' से : अल्वर के राजा सवाई जय सिंह और ऐतिहासिक किस्सा

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"जो अपना कल नहीं जानता, वो मेरा क्या बताएगा!" 

– अल्वर रियासत और ज्योतिषी अलास्टर की अजीब दास्तान


An illustration of Maharaja Jai Singh of Alwar seated on his royal throne in Vijay Mandir Palace court listening to Astrologer Alastor.

मुंबई से अल्वर आए नामी ज्योतिषी अलास्टर

    अल्वर के महाराजा सवाई जय सिंह का एक किस्सा उनके अनोखे मिजाज का मशहूर है। उस वक्त मुंबई के जाने-माने ज्योतिषी अलास्टर का बड़ा नाम था। लोग कहते थे कि उनकी बताई बातें पत्थर की लकीर होती हैं। महाराजा उस समय 'चेंबर ऑफ प्रिंसेस' के चांसलर पद के चुनाव में खड़े होने की सोच रहे थे और अपनी जीत-हार को लेकर ज्योतिषी से सलाह लेना चाहते थे। अलास्टर ने अल्वर आने के लिए अपनी भारी-भरकम फीस रखी—मुंबई से बाहर रहने का रोजाना एक हजार रुपये का खर्च, साथ ही उनके और उनके साथियों के आने-जाने और खाने-पीने का पूरा खर्चा। महाराजा ने बिना किसी हिचकिचाहट के उनकी सारी शर्तें मंजूर कर लीं।


स्टेशन पर बेकद्री और फाइनेंस मिनिस्टर का सहारा

    तय तारीख पर अलास्टर अल्वर स्टेशन पहुंचे। उन्होंने आने का समय महाराजा के प्राइवेट सेक्रेटरी को तार (टेलीग्राम) के जरिए पहले ही बता दिया था, लेकिन स्टेशन पर उनका स्वागत करने कोई नहीं आया। अलास्टर बड़े रईस इंसान थे, मुंबई में उनके बंगले और गाड़ियां थीं, लेकिन अल्वर स्टेशन पर उतरकर उन्हें आधा रास्ता पैदल ही नापना पड़ा। जैसे-तैसे उन्हें एक फटी-पुराणी जीन और दुबले-पतले घोड़े वाली एक-घोड़ा गाड़ी मिली। वे स्टेट के गेस्ट हाउस पहुंचे तो वहां का नजारा देखकर दंग रह गए—उनके रुकने का कोई इंतजाम ही नहीं था। वे रात में रुकने के लिए इधर-उधर भटकते रहे, पर किसी ने उन्हें पनाह नहीं दी।

    इत्तेफाक से रियासत के फाइनेंस मिनिस्टर आर. सी. खन्ना की नजर मुख्य बाजार में भटकते हुए अलास्टर पर पड़ी। वे अलास्टर को निजी तौर पर तो नहीं जानते थे, लेकिन एक अच्छे-भले इंसान को इस तरह बदहवास हालत में देखकर उनसे रहा नहीं गया। पूछताछ करने पर अलास्टर ने अपनी पूरी आपबीती सुनाई और महाराजा का भेजा हुआ तार भी दिखाया। खन्ना साहब महाराजा के रवैये से अच्छी तरह वाकिफ थे। उस वक्त एडीसी या प्राइवेट सेक्रेटरी को फोन करने का जोखिम वे नहीं उठा सकते थे। इंसानियत और भगवान के डर के नाते वे अलास्टर को अपने घर ले आए और उन्हें खाने व रहने की जगह दी।


जासूसी, जेल की सलाखें और महीनों का इंतज़ार

    अगले दिन जब ज्योतिषी ने प्राइवेट सेक्रेटरी से संपर्क किया, तो किसी ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया। उल्टे टका सा जवाब मिला कि जहां ठहरे हो वहीं रहो, जब महाराजा याद करेंगे तो बुला लिया जाएगा। अब खन्ना साहब धर्मसंकट में फंस गए। वे ज्योतिषी की खातिरदारी तो कर रहे थे, लेकिन मन ही मन खौफजदा थे कि अगर महाराजा को यह बात पता चली और वे नाराज हो गए, तो उनकी नौकरी पर आंच आ सकती थी। फिर भी उन्होंने उस बेसहारा मेहमान को घर से बाहर नहीं निकाला।

    दिन बीतते गए। अलास्टर रोज महल और सेक्रेटरी के चक्कर काटते। वे क्लर्कों, चपरासियों और खिदमतगारों तक के आगे हाथ जोड़ते कि महाराजा तक खबर पहुंचा दी जाए—या तो उन्हें मिलने का मौका दिया जाए या फिर मुंबई लौटने की इजाजत। उधर, रियासत की सीआईडी चुपचाप ज्योतिषी की हर हरकत पर नजर रखे हुए थी।

    तंग आकर एक दिन अलास्टर ने चुपके से निकलने की कोशिश की। वे जैसे-तैसे रेलवे स्टेशन पहुंचे, लेकिन ट्रेन पकड़ते, उससे पहले ही पुलिस अधीक्षक ने उन्हें धर दबोचा। उन्हें वापस खन्ना साहब के घर भेजने के बजाय सीधे जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया। अचानक हुए इस घटनाक्रम से ज्योतिषी पूरी तरह टूट गए। अनिश्चितता और खौफ के मारे उनका वजन घटने लगा। उन्होंने अपने परिवार को टेलीग्राम भेजकर अपनी हालत बताई, लेकिन रियासत के हुक्म के आगे किसी रिश्तेदार को राज्य की सीमा में घुसने तक नहीं दिया गया। बेचारे ज्योतिषी के दिन जेल की एक तंग कोठरी में बीतने लगे।


विजय मंदिर में दरबार और महाराजा का रुखा जवाब

    इस तरह तीन-चार महीने गुजर गए। इतने दिनों का ज्योतिषी का बिल एक लाख रुपये से ऊपर निकल चुका था, और सफर का खर्चा तो अलग था। फिर एक सुबह पुलिस महानिदेशक (आईजी) राय बहादुर गोपाल दास जेल पहुंचे और उन्होंने अलास्टर को खबर दी कि महाराजा उनसे मिलना चाहते हैं। ज्योतिषी ने झटपट अपने बेहतरीन कपड़े पहने। उन्हें लगा कि आखिरकार बुरे दिन खत्म हुए। उन्हें 'विजय मंदिर' (महाराजा के महल) लाया गया। एडीसी के कमरे में कुछ देर बिठाने के बाद उन्हें महाराजा के मुख्य दरबार में ले जाया गया।

    महाराजा सोने की मखमली कुर्सी पर विराजे थे और आसपास दरबारी मौजूद थे। (महाराजा चमड़े के बने फर्नीचर से सख्त नफरत करते थे और उसे अपवित्र मानते थे)। अलास्टर ने महाराजा को झुककर प्रणाम किया और उन्हें सम्मान की जगह दी गई।

    लगभग एक घंटे तक दरबार में गहरा सन्नाटा छाया रहा। आखिर हिम्मत जुटाकर ज्योतिषी बोले, "अन्नदाता, मैं आपका भविष्य बताने के लिए तैयार हूं, लेकिन मुझे नहीं पता था कि आपकी रियासत में मुझे ऐसी तकलीफें झेलनी पड़ेंगी।"

    महाराजा ने मुस्कुराते हुए रुखा सा जवाब दिया, "मैं तुमसे अपना भविष्य क्या पूछूं? जिसे खुद अपने कल का पता नहीं था कि अल्वर आने पर उसके साथ क्या होने वाला है, वह भला मेरा भविष्य क्या बताएगा!"

    इसके बाद ज्योतिषी को बिना एक पैसा या किराया दिए फौरन वहां से जाने का हुक्म दे दिया गया। अलास्टर ने भी अपने नसीब का शुक्रिया अदा किया कि चलो, जान तो बची और सिर धड़ से अलग हुए बिना वे सही-सलामत मुंबई लौट सके।


जब महाराजा के 'मैकेनिकल दस्तानों' ने बकिंघम पैलेस में मचाया तहलका


Illustration of Maharaja Jai Singh of Alwar using mechanical gloves at Buckingham Palace while shaking hands with King George V and Queen Mary.

गोलमेज सम्मेलन और बकिंघम पैलेस का शाही न्योता

    अल्वर के महाराजा सवाई जय सिंह जब लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलन (Round Table Conference) में हिस्सा लेने इंग्लैंड गए, तो उन्हें ब्रिटिश सम्राट किंग जॉर्ज पंचम और महारानी मैरी की तरफ से बकिंघम पैलेस में एक शाही रिसेप्शन (भोज) का न्योता मिला।


"गैर-हिंदू से हाथ नहीं मिलाऊंगा!" — महाराजा की शर्त और महारानी का गुस्सा

    निमंत्रण मिलते ही महाराजा ने राजभवन के अधिकारी (लॉर्ड चेम्बरलेन) को एक खत लिख भेजा। उसमें उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि वे एक कट्टर orthodox हिंदू हैं और भगवान श्री रामचंद्र के प्रत्यक्ष वंशज हैं। अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण वे किसी भी गैर-हिंदू (विधर्मी) से नंगे हाथों से हाथ नहीं मिला सकते। इसलिए वे केवल दस्ताने (Gloves) पहनकर ही सम्राट और महारानी से हाथ मिलाएंगे।

    यह बात जब महारानी मैरी तक पहुँची तो वे सख्त नाराज हो गईं। उन्होंने फौरन लॉर्ड चेम्बरलेन को हुक्म दिया कि किसी भी कीमत पर राजा और रानी उनके दस्ताने पहने हाथों से हाथ नहीं मिलाएंगे। किंग जॉर्ज पंचम भी इस हरकत से इतने खफा हुए कि उन्होंने महाराजा का नाम मेहमानों की सूची से हटाने तक का मन बना लिया। वहीं भारत के राज्य सचिव (Secretary of State) ने महाराजा को सख्त चेतावनी दी कि अगर उन्होंने ऐसा अभद्र व्यवहार किया, तो उन्हें तुरंत लंदन से वापस भारत भेज दिया जाएगा।


लंदन के दर्जी की अनोखी कारस्तानी : बना 'मैकेनिकल दस्ताना'

    महाराजा जय सिंह को अब अपनी गलती और इसके गंभीर परिणामों का अहसास हुआ। वे अपनी आन-बान-शान भी बचाना चाहते थे और सम्राट को नाराज भी नहीं करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने एक अनोखी तरकीब निकाली। वे लंदन के सबसे बेहतरीन दर्जी (Tailor) के पास पहुंचे और उनसे पूछा कि क्या कोई ऐसा दस्ताना बन सकता है जिसे एक ही सेकंड में बहुत तेजी से पहना और उतारा जा सके?

    एक कुशल इंजीनियर और दर्जी की मदद से एक 'मैकेनिकल दस्ताना' तैयार किया गया। यह दस्ताना एक बटन/स्विच के जरिए मैकेनिज्म से काम करता था। महाराजा इस करामात से बेहद संतुष्ट हुए। उन्होंने लॉर्ड चेम्बरलेन को संदेश भिजवा दिया कि वे बिना दस्तानों के ही सम्राट और महारानी से हाथ मिलाएंगे।


रिसेप्शन का वो एक सेकंड : स्विच दबा और हाथों से उतर गए दस्ताने!

    शाही रिसेप्शन के दिन बकिंघम पैलेस में लगभग 500 नामचीन मेहमान मौजूद थे। महाराजा बेज (Beige) रंग की रेशमी शेरवानी, गहरे हरे रंग की मखमली पगड़ी और उस पर चमकते हुए हीरों की कलगी पहने दरबार में पहुंचे। उनके हाथों में हल्के रंग के दस्ताने थे जो उनकी पोशाक और रंगत से पूरी तरह मेल खा रहे थे।

    जैसे ही महाराजा सम्राट और महारानी के पास पहुंचे और हाथ मिलाने वाले थे, उन्होंने गुप्त रूप से लगे स्विच को दबाया। एक झटके में मैकेनिकल डिवाइस के जरिए दस्ताने उनके हाथों से उतर गए। राजा और रानी से हाथ मिलाने के ठीक एक सेकंड बाद, स्विच दबते ही दस्ताने वापस उनके हाथों में चढ़ गए!

    वहाँ मौजूद 500 मेहमानों को दूर से यही लगा कि महाराजा ने दस्ताने पहनकर ही हाथ मिलाया है और अपनी पुरानी जिद व परंपरा को नहीं तोड़ा। दूसरी तरफ, बिना दस्तानों के हाथ मिलाकर किंग जॉर्ज और महारानी मैरी भी बेहद खुश नजर आए। इस तरह महाराजा ने अपनी जिद और ब्रिटिश हुकूमत के कड़े नियमों—दोनों के बीच का रास्ता निकाल लिया।


(साभार: दीवान जरमनी दास की किताब 'महाराजा', एलाइड पब्लिशर्स)


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