रेत की मछली समीक्षा (Hindi) | क्या सच में यह नारीवाद की किताब है? || Kanta Bharti’s Ret Ki Machhli Book Review in Hindi

0

रेत की मछली बुक रिव्यू | कान्ता भारती का उपन्यास


"रेत की मछली बुक रिव्यू को दर्शाता कार्टून चित्र, बस स्टैंड पर बैठा एक व्यक्ति और उसके विचार"

भूमिका : एक सफर, एक किताब और कई अनुभव

    आह, आखिरकार 'रेत की मछली' पढ़ ही ली। कान्ता भारती लिखित यह उपन्यास पढ़ने के दौरान काफी कुछ उतार-चढ़ाव अनुभव हुए.. पुस्तक के भीतर भी, और पुस्तक के बाहर वास्तविक जीवन मे भी..! रेत की मछली पुस्तक मेरे ख्याल से नारीवादियों को तो जरूर से पढ़ना चाहिए। उनके लिए यह धर्मग्रंथ समान है.. अरे मजाक, यह पुस्तक समाज का एक कुरूप आईना भी है..! सबको ही पढ़ना चाहिए, खासकर उनको, जिन्हें भावनाओं में बहना अति रुचिकर मालूम पड़ता हो। अरे हाँ, अगर सिर्फ बुक रिव्यू पढ़ना है, बिलकुल निचे तक स्क्रॉल दीजिए, जहाँ से 'पुस्तक परिचय' शुरू होता है। 


    तो बात ऐसी है प्रियम्वदा, कि कहां से शुरू करूँ यही नही तय कर पा रहा हूँ। समय हो रहा है रात्रि के साढ़े दस। ठंडी हवाओं को फेंकते एयर कंडीशनर को कुछ देर इस कारणवश बंद करना पड़ा है, कि कहीं हाई-वोल्टेज के मारे खुद ही न मर जाए। कमरा काफी हद तक ठंडा हो चुका है, और मंद गति से चलता पंखा, कमरे में जमा हुई ठंडी हवाओं को चक्रवाती बन्ध में घूमकर गर्मी से राहत दे रहा है। गर्मी का पारा दोपहर में 40 से 41 डिग्री ऊंचे चढ़ जाता है। सवेरे ऑफिस पर आए बिहारी व्यापारी ने अपने क्षेत्र के गौरव - सत्तू पिलाने का आग्रह किया। मेरा सत्तू से एक बार ही सामना हुआ था, जब कोई अन्य बिहारी व्यापारी मुझे एक छोटा रेडी टू ड्रिंक का सत्तू का पैकेट दे गया था। और मैंने उस पर लिखी विगतों के अनुसार खुद से पानी मे घोलकर पिया था। पानी कम और सत्तू का आटा ज्यादा.. चम्मच से निगलते हुए एक बार विचार कौंधा था, कि लोग तो पीते है, फिर मुझे यह खाना क्यों पड़ रहा है..? लेकिन आज उन व्यापारी ने अपने बिहारी अंदाज़ में, निम्बू, जीरा आदि मिलाकर पीने योग्य घोल बनाया, तो स्वादिष्ट लगा।


    प्रियम्वदा ! पूरे देश मे चुनाव के चर्चे है, जहाँ चुनाव की बात नहीं, वहां ईरान युद्ध की बात है। गुजरात मे स्थानिक स्वराज का चुनाव है, नगर पंचायत, और महानगर पालिका के। इस बार सबसे बड़ी दुविधा स्त्रियों के लिए उत्पन्न हुई है। न जाने कितने वर्षो से परंपरा सी बन गयी है, गर्मियों के वेकेशन में बच्चो को अपने मामा के घर जाने की, और स्त्रियों को अपने मायके जाने की। और यह चुनाव, इसी गर्मियों में आ खड़ा हुआ। बहुत सी स्त्रियां प्रतिष्ठित नेताओं को इसी बात पर कोसे जाती पाई जाती है, कि उनके एक वोट के लिए उन्हें कुछ दिन कम मायके में रहने मिलेगा। खैर, इसी आवन-जावन की प्रक्रिया में पुरुष बेचारे करते है यात्रा, अनचाही यात्रा। पिछले रविवार मुझे पीडीएफ संस्करण में 'रेत की मछली' नामक पुस्तक मिल गयी थी। इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया पर बहु विख्यात यह पुस्तक पढ़ लेने की मेरी भी इच्छा थी। लेकिन मंगल की रात्रि, और बुध का दिवस मेरा भी यात्रा करने में बीता।


    रात्रि की बस से दोसौ दस किलोमीटर का सफर किया, और सुबह साढ़े चार बजे जामनगर पहुंचा। वहां के उत्तरदायित्वों को निभाकर, दूसरे उत्तदायित्व की ओर अब दौड़ना था। रातभर हिलती बस में नींद का आना, कुछ वैसा ही है, जैसा फिसलन भरी सड़क पर बिना गिरे दौड़ जाना। जामनगर में एक कप चाय पीकर वापिस बस डिपो में लौटा तो राजकोट के लिए एक इलेक्ट्रिक बस तैयार खड़ी थी। सौ किलोमीटर का सफर, और आधुनिक इलेक्ट्रिक बस की छोटी सी सीटें, मेरे जैसे अच्छी तबियत के लोगों के लिए संकरी पड़ती है। सुबह तो सबकी ही होती है, रोड पर हर कोई कहीं न कहीं जा ही रहा होता है। हमारे बस ड्राइवर साहब, सुबह सुबह लगातार हॉर्न बजाकर, सबको सचेत करते हुए बस दौड़ा रहे थे, क्योंकि उन्हें तो यह बस समय पर पहुंचानी ही पड़ती है। साढ़े नौ बजे राजकोट बस पोर्ट पर मैं उतरा। काफी दिनों बाद यहां आया था, दिशाभ्रम होना तय था। अत्याधुनिक इस बस पोर्ट के दोनों तरफ रास्ते है। जहां से बसें प्रवेशती है, वह रोड व्यावसायिक दुकानों से भरा हुआ है। बस पोर्ट के दूसरी तरफ वाला रोड खाने-पीने तथा रहने ठहरने वाले व्यवसायों से भरा हुआ है। 


    दिशाभ्रम के चलते, बस पोर्ट के उस द्वार से मैं बाहर निकला जहां खाने-पीने की कोई वस्तु न मिली। सुबह का समय, भूख भी खूब थी। बस पोर्ट के दाहिने और बाहिने ओर पांचसौ-पांचसौ मीटर पैदल चलने पर भी कुछ नाश्ते के इंतेजाम न देखकर मन खिन्न हुआ। वापिस बस-पोर्ट में लौटकर जब पिछली तरफ निकला, तो वहां जगह जगह पर नाश्तों की भरमार दिखी.. भूखे को तो दो रोटियां चाहिये होती है, लेकिन अब मेरे पास विकल्पों की भरमार थी। गुजरात के अति-प्रसिद्ध गांठिया-जलेबी-खमण इत्यादि, साउथ इंडियन में डोसा और इडली, चाइनीज मुझे कम पसंद है, तो मेनू भी न देखा, और सीधे पाउभाजी की ओर लपका। असल मे तो मोबाइल चार्ज करना था मुझे। सो सबसे ज्यादा समय पाउभाजी के आने में लगना था। क्षुधा की तृप्ति के पश्चात अब मेरे पास करने को कुछ भी न था। मोबाइल भी ज्यादा देर न चला सकता, क्योंकि इस अत्याधुनिक बस-पोर्ट में किसी कारणवश संचालकों ने जगह जगह पर रखे इलेक्ट्रिसिटी पॉइंट्स हटा लिए थे। पूछताछ केंद्र पर बस पूछने के बहाने चार्जिंग पॉइंट की भी खैर-खबर ली। उन्होंने ने कारण नहीं बताया। 


    मेरी अगली बस, जिससे मुझे घर लौटना था, अन्य उत्तरदायित्वों को लेकर, वह डेढ़ बजे पालीताणा से आ रही थी। तब तक मेरे पास करने को कुछ नहीं.. इस सजीव बसपोर्ट को घूरने के सिवा। नए चेहरे आते-जाते थे, किसी पर उत्सुकता थी, किसी पर गंभीरता, किसी पर डर, किसी पर हास्य और विनोद, किसी पर आशंका। बार-बार अपनी जेब के प्रति सावध रहने की सूचना प्रसारित होती। बार बार किसी चाय की ब्रांड की एडवर्टाइज होती। बार बार किसी बस के आने पर, फ़टे हुए साउंड सिस्टम से सूचना दी जाती, जिसमे किस शहर को बस जा रही है, वह भी ठीक से समझ न आता। अपने जीवन के सबसे बड़े पंखे भी मैंने यहीं देखे है। पंखे का एक पट्टा लगभग पन्द्र फुट से अधिक लंबा होगा। 


    मैं एक बेंच पर बैठ गया। आगे की बेंच पर दो कन्याएं बैठी थी, कॉलेज जाती होंगी शायद। उसकी बाजू की बेंच पर दो नवयुवक बैठे थे। लड़के बार बार तिरछी नजरों से लड़कियों को देखते। बार-बार देखते। लड़के.. लड़के ही थे। बात करने से अचकचा रहे होंगे, तभी तो बार बार नजरें मिलाने की कोशिश करते थे। कुछ देर हुई, लड़कियां मेरे आगे बैठी होने के कारण उनके चेहरे पर क्या हावभाव है वह नही दिखाई पड़ता था। एक बार को विचार हुआ, कि इन लड़कों को यहां से भगा दु, या फिर पोर्ट प्रशाशन को सूचित करूँ.. लेकिन तभी समझ आया, लड़कियां भी उन लड़कों के प्रति एक नन्ही मुस्कान तो फेंक ही रही थी..। तो अब स्पष्ट था, सहमति तो दोनों तरफ है। खैर, ऐसी स्थिति में मुझे बेंच बदलना ही ठीक लगा। अभी तो एक घंटा ही बीता था, मुझे दो घण्टे ओर निकालने थे। मुझे लगा, मुझे बेंच नहीं बदलनी चाहिए थी। वे लड़के-लड़कियों का व्यवहार कहाँ तक पहुंचा यह जानने की जिज्ञासा हुई, लेकिन फिर दूसरे के फट्टे में अपनी टांग क्यों फँसाउं वाला विचार भी उपजा।


    गर्मी का पारा चढ़ता जा रहा, दोपहर अपनी असली पहचान उजागर करती जा रही थी। बसपोर्ट के निकट ही सवेरे भटकते हुए एक बोर्ड पर नज़र पड़ी थी, 'प्रवीण प्रकाशन'। 40 वर्षों में 4000 से ज्यादा पुस्तकें इस प्रकाशन संस्था ने प्रकाशित किए है। मन मे इच्छा तो जागृत हुई, कि एक बार कम से कम चक्कर तो लगाऊं इनके पुस्तक भंडार पर। लेकिन यह इच्छाशक्ति बेहद कमजोर साबित हुई, दोपहर की धूप के सामने। धूप का प्रभाव देखकर बसपोर्ट के बड़े बड़े पंखों के नीचे से हटने को मन ही नहीं करता था। सरकारी बस के एप्लिकेशन पर बस की लोकेशन देखता, रिफ्रेश करने पर वह मैप में एक बिंदु के रूप में थोड़ी आगे सरकी हुई दिखाई देती, और मन को दिलासा मिलता, कि अब तो बस आने ही वाली है। आखिरकार दो बजे बस आयी, जिसने हमें दोसौ किलोमीटर का सफर करवाकर, शाम सात बजे अपने शहर उतारा। घर पहुंचकर नाहा धोकर, थोड़ा सा ही खाना खाकर जो सोया हूँ, सीधे अगले दिन सवेरे सात बजे आंख खुली। 


    गर्मियों में मुझे अनिंद्रा की समस्या होती है, गद्दे पर तो सोया ही नहीं जाता है, गद्दा गर्मी करता है। सीधे फर्श पर ही लेट जाता हूँ। लेकिन थकान ऐसी थी, कि बगैर ac के, और पंखा धीमा होने के बावजूद गद्दे पर खर्राटे मारकर सोया हूँ। गुजराती में मुहावरा है, "ऊंघ न मांगे ओटलो, भूख न मांगे रोटलो".. मैंने सार्थक कर दिखाया। खैर, मैंने सोचा था, कि इतना लंबा सफर है, और 'रेत की मछली' तो केवल देढ़सौ पन्ने की पुस्तक है। पढ़ लूंगा। लेकिन मोबाइल चार्जिंग की असुविधा, और यात्रा में कोई बाधा न आन पड़े, इसके चलते पुस्तक न पढ़ पाया। बीते कल शुरू से पढ़ना शुरू किया, क्योंकी शुरुआत में जो पढा था, वह इन यात्राओं की बस में बदलते चेहरे की तरह विस्मृत हो गया था। 


पुस्तक परिचय

  •     पुस्तक : रेत की मछली
  •     लेखिका : कान्ता भारती
  •     प्रकाशक : लोकभारती पेपरबैक्स


रेत की मछली की कहानी क्या है?

    रेत की मछली एक नायिका की कहानी है, जो काफी हद तक एक स्त्री के जीवन के आसपास घूमती है। कहानी की नायिका कुंतल है, शोभन से विवाह करती है। और उसका वैवाहिक जीवन किस तरह खत्म हो जाता है, यही मुख्य सूत्र है इस कहानी का। बहुत करुण कहानी अनुभव होती है। अनायास ही कुंतल के प्रति एक सौहार्द का भाव उपजता है। और मन ही मन शोभन के प्रति घृणा भी। एक बात और अभी अभी जानी है मैंने। कान्ता भारती के बारे में जब गूगल किया तो पता चला, उनका विवाह धर्मवीर भारती से हुआ था। गुनाहों के देवता वाले धर्मवीर भारती। और उन धर्मवीर भारती से इनका तलाक भी हुआ था। उपन्यास की कहानी भी कुछ कुछ वैसी ही है। कुंतल का पति शोभन एक साहित्यकार एवं लेखक है। शोभन और कुंतल की एक पुत्री भी हुई। कान्ता भारती की भी एक पुत्री है। कुंतल भी तलाकशुदा स्त्री हुई। उपन्यास की कहानी में एक वाक्य में 'गुनाहों का देवता' पढ़कर, और धर्मवीर भारती तथा कान्ता भारती में एक समान भारती पढ़कर उत्सुकता जागी थी, कि इनके बारे में और जानना चाहिए। लेकिन उपन्यास पूरा पढ़ लेने के चक्कर मे और कुछ तलाश नही की।


मुख्य पात्रों का विश्लेषण

    सच बताऊं तो कहानी उबाऊ नहीं है, टाइम-लाइन कुछ-कुछ देर में बदलती रहती है तो थोड़ा ध्यान रखना पड़ता है। कभी वर्तमान में, कभी भूतकाल में, तो कभी भूतकाल के वर्तमान में भी भूतकाल का वर्णन आता है। हां! एक वो 'भाईजी' कौन था, वह समझ न आया। बीचमे दो-तीन नाम और आए थे, लेकिन मुझे समझ न आया, वे पात्र कौन थे? कहानी जहाँ ख़त्म हुई, वहां से एक प्रतिशोध की श्रृंखला शुरू होने की सम्भावना थी। लेकिन वैसा भी कुछ न हुआ। कहानी बस भूतकाल को भूलकर नई शुरुआत करने के नाम पर समाप्त हो गयी, वहां मुझे थोड़ी सी आपत्ति अनुभव हुई। 


शोभन : एक जटिल और विरोधाभासी चरित्र

    सबसे पहले बात करूँ शोभन की। शोभन एक अजीब पशु ही है.. मुझे तो इसका पात्र ही समझ नहीं आया। मतलब था क्या वह। पहले वह एक लड़की को पसंद करता है, प्रेम करता है। लड़की के पिता द्वारा किये गये अपमान को सहकर भी वह कुंतल से विवाह करता है। और फिर अचानक से बदल जाता है। कुंतल गर्भवती थी, और शोभन मीनल के साथ लगा हुआ है.. नहीं मतलब कोई कारण तो होता होगा? ऐसे ही सीधे मीनल के साथ शुरू हो जाता है, वह भी कुंतल यानि की अपनी पत्नी की मौजूदगी में ही। यह थोड़ा गले से न उतरने वाली बात लगी।  शोभन मेरे हिसाब से रेत का मगरमच्छ है। 


कुंतल: सहनशीलता या अव्यवहारिकता?

    दूसरी कुंतल, मेरे हिसाब से यह स्त्री पागल ही है। जो समय पर अपना विरोध नहीं जताता, वह सहन करने के अलावा कुछ नहीं कर सकता। मुझे तो यह समझ नहीं आता है, कि जब शोभन द्वारा उसकी कुटाई हो रही थी, तब कुंतल को उसका पिता घर ले जाने को आया था, लेकिन वह नहीं गयी। एक तो यह कुंतल की तबियत बड़ी बिगड़ी रही उस पुरे कथानक के दौरान। कभी बेहोश हो जाती है, कभी बुखार आ जाता है, कभी तन्द्रा में रहती है। लेकिन फिर भी कुंतल वह सब जरूर से देखती रहती है समय समय पर, जब शोभन और मीनल कहीं प्रेमालाप में रहे हो। इसे रेत की मछली ही कहा जाना चाहिए। 


मीनल : रहस्यमयी और विवादित पात्र

    तीसरा मुख्य पात्र मीनल.. यह पात्र भी मेरी समझ से तो बाहर ही है..  इसे जानलेवा रोग था, लेकिन रोग ठीक होने के तुरंत बाद वह शोभन के साथ प्रेम करने लगी.. प्रेम से तात्पर्य है शारीरिक। अरे मतलब, रोग की ही शर्म भर लेते। एक प्रसंग में तो मीनल कुंतल की गोद में सर रखकर प्रेम का आनंद उठाती है। यह कुछ ज्यादा नहीं हो गया? मीनल पता नहीं कौनसा प्राणी है, जो बात बात में बस शोभन के समक्ष सुख प्रदान करने की प्रकटता है। जहाँ देखो वहां यह दोनों बस मेल-मिलाप में ही लगे पड़े है। शोभन की पत्नी कुंतल है, लेकिन पत्नी का पद मीनल के पास है। मीनल रेत की शार्क है। 


क्या आपको यह किताब 'रेत की मछली' पढ़नी चाहिए?

    छोडो, कहानी का विवरण बहुत अच्छा है। लेकिन कहानी के पात्र पता नहीं कौनसी व्यवस्था की उपज है.. समाज में हर तरह के उदहारण मौजूद है। यह कहानी भी उन्ही किसी उदहारण से प्रेरित रही होगी। समाज में मानवीय मूल्यों का कईं बार खंडन होता रहा है, यह कहानी उन खंडनों का ही एक उदहारण बनी है। पढ़ने की दृष्टि से, भावना की दृष्टि से, और आगे क्या हुआ की उत्सुकता की दृष्टि से तो यह कहानी सबको ही पढ़नी चाहिए, लेकिन मुझे कहानी के सारे पात्रों में कुंतल से बड़ी अव्यवहारिक, और मुर्ख कोई न लगी। 


    ठीक है, उपन्यास कैसा भी हो, पढ़ना अवश्य चाहिए। 

    शुभरात्रि। 

    २५/०४/२०२६

|| अस्तु ||


🔹 रेत की मछली किस प्रकार की किताब है?

रेत की मछली एक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक उपन्यास है, जो स्त्री जीवन, वैवाहिक संबंधों और भावनात्मक संघर्षों को दर्शाता है।


🔹 रेत की मछली की लेखिका कौन हैं?

रेत की मछली की लेखिका कान्ता भारती हैं, जो अपने यथार्थवादी लेखन के लिए जानी जाती हैं।


🔹 रेत की मछली की कहानी किस बारे में है?

यह कहानी कुंतल नाम की एक स्त्री के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसमें उसका विवाह, संघर्ष और टूटते रिश्तों का चित्रण किया गया है।


🔹 क्या रेत की मछली एक नारीवादी उपन्यास है?

कई लोग इसे नारीवादी दृष्टिकोण से देखते हैं, लेकिन यह पूरी तरह से नारीवाद पर आधारित नहीं है। यह समाज के कड़वे सच और रिश्तों की जटिलताओं को सामने लाती है।


🔹 क्या यह किताब पढ़ने लायक है?

हाँ, अगर आपको भावनात्मक और यथार्थवादी कहानियाँ पसंद हैं, तो यह किताब जरूर पढ़नी चाहिए।


🔹 रेत की मछली में मुख्य पात्र कौन-कौन हैं?

मुख्य पात्रों में कुंतल, शोभन और मीनल शामिल हैं, जिनके माध्यम से कहानी आगे बढ़ती है।


🔹 क्या यह किताब शुरुआती पाठकों के लिए सही है?

हाँ, लेकिन कहानी की टाइमलाइन बदलती रहती है, इसलिए थोड़ा ध्यान देकर पढ़ना होगा।


🔹 रेत की मछली का अंत कैसा है?

कहानी का अंत थोड़ा खुला (open-ended) है, जहाँ नई शुरुआत का संकेत मिलता है, लेकिन पूरी तरह संतोषजनक निष्कर्ष नहीं मिलता।


प्रिय पाठक !

    अगर आपने 'रेत की मछली' पढ़ी है, तो कमेंट में जरूर बताएं—आपको कौन सा पात्र सबसे ज्यादा अजीब लगा? 

Dilayari पढ़ते रहिए, नए पत्र सीधे आपके Inbox में आएंगे:

मेरे लिखे भावनात्मक ई-बुक्स पढ़ना चाहें तो यहाँ देखिए:
और Instagram पर जुड़िए उन पलों से जो पोस्ट में नहीं आते:

आपसे साझा करने को बहुत कुछ है…!!!

और भी पढ़ें:


#RetKiMachhli #BookReviewHindi #KantaBharti #HindiBookReview #IndianLiterature #BookBlogging #ReadingCommunity #HindiBooks #BookLoversIndia #LiteraryReview #NariVimarsh #BookSummary

Post a Comment

0Comments
Post a Comment (0)