चश्मा, गरबा और मन का दृष्टिकोण || दिलायरी : 24/09/2025

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दिन की शुरुआत और चश्मे की टूटी डंडी

    प्रियम्वदा ! कल वाली पोस्ट पर पता नहीं क्यों, ब्लॉगर ने एक फ़िल्टर लगा दिया..! पता नहीं उनकी कौनसी गाइडलाइन लांघ दी मैंने। पूरी पोस्ट २-३ बार पढ़ी मैंने। कुछ भी गलत न मिला मुझे। कारण ही समझ न आए, तो उस समस्या का हल भी क्या ही मिलेगा? AI से भी पता करवाया, लेकिन कोई भी ठोस कारण नहीं मिला। जाने दो, वैसे भी अपन इस तकनीकी झमेले में उलझना नहीं चाहते। पड़ी रहेगी वह पोस्ट..! क्या फर्क पड जाएगा?


“Tooti hui chashme ki kahani aur garba anubhav – Dilayari diary entry.”


    
कल शाम को दिलायरी लिखते हुए, नाक तक आ चुके चश्मा को अपनी जगह जाने के लिए धक्का मारा, तो बायीं और की उसकी डंडी टूट गयी। मैं उसे समझाता रहा, 'पगले, मना कर देता, लेकिन यूँ अँधेरी रात में अकेले क्यों छोड़ गया?' लेकिन वह नहीं माना। वैसे भी वह चश्मा कुछ अकड़ू था। सस्ता था न, शायद इस लिए। उसकी दोनों डंडियां मुड़ती नहीं थी। सिर्फ एक कान के सहारे वह चश्मा टिका रहा, और मैं घर तक पहुँच गया। रास्ते से अपना डिनर का पार्सल भी ले गया था।


    घर पहुंचकर हर वह जगह मैंने छान ली, जहाँ मेरे स्पेर चश्मा होने की संभावना थी। लेकिन उस चश्मा की जिद्द जित गयी। पुरे घर में कहीं भी नहीं मिले। भारी पंगा हो गया, बगैर चश्मा के गरबा में कैसे जाऊं? अंधे का एक मात्र सहारा - चश्मा - भी छीन लिया गया था। हालाँकि सद्भाग्य से, एक तीसरा चश्मा भी था मेरे पास। लेकिन वह बिलकुल ही पतली फ्रेम है। तो चश्मा के ऊपर - निचे से सारे दृश्य धुंधले दीखते है, और बिच में दो पेरेलल लाइंस में साफ़ नज़र आता है। 


    रात ढाई बजे करीब माताजी की बस आने वाली थी। और मैं ठहरा अपना पूरा अस्तबल बेचकर सोने वाला इंसान। गंभीर मुद्दा था कि करें तो करें क्या? रात साढ़े बारह तो मैंने चौक में ही बजा दिए। सारा सामान समेट कर घर आया, और मोबाइल देखते देखते आँख लग गयी। दो बजे आँख खुली तो, मेरे कहे अनुसार बस कंडक्टर ने एक कॉल की हुई थी मुझे। मैं फटाफट बस डिपो पहुंचा, बस अभी पहुंची नहीं थी। लगभग तीन बजे घर लौटा, और सो गया। तो सीधे साढ़े सात को आँखे खुली। 


घर, माँ और कबाड़ की कहानियाँ

    सवेरे उठा ही था, कि गजे का फोन आया। प्रतिदिन सवेरे यज्ञ होता है गरबी चौक में। लेकिन मैं उठा ही था, इस कारण मैंने मना कर दिया। सवेरे उठकर पहला काम चश्मा ही ढूँढना था। अब तो माताजी और वे भी आ गए थे। मैंने अपना अँधा हाल - अंधाधुंध सुनाया। उसपर उन्होंने इतना ही कहा, 'एक चश्मा तो मैंने कबाड़ी वाले को दे दिया था, लेकिन याद नहीं है, कौनसा वाला था।'


    पता नहीं मेरे माताजी को कबाड़ से क्या समस्या है। बिनजरूरी तो इकट्ठा कर लेते है। और मेरा जरुरी सामान दूसरी बार कोई कबाड़ी वाला ले गया है। पहले एक बार माताजी ने, मेरे द्वारा इकट्ठे किए हुए विदेशी सिक्के, यह सोचकर कबाड़ी वाले को दिए थे, कि नकली सिक्के है, क्योंकि अपने सिक्कों पर तो तीन मुंह वाला शेर होता है। यह हताहत भरी खबर भी मुझे छह महीने बाद पता चली थी। जब मैंने अपने पांच के सिक्कों का कलेक्शन, उस विदेशी मुद्रा के कलेक्शन के साथ रखने की सोची थी। 


धुंधले दृश्य और नया चश्मा

    आखिरकार जो चश्मा मिला वही सही सोचकर ऑफिस आ पहुंचा। सवेरे से इस लंबचोरस चश्मा से धुंधला-स्पष्ट-धुंधला दृश्य देखकर परेशां हो चूका हूँ। तो दोपहर को मार्किट चल पड़ा। ४-५ जगह घूमने पर एक जगह एविएटर मिल ही गया। और आर्डर दे दिया। तुम्हे पता है प्रियम्वदा, अब तो शीशों (लेंस) में भी कितनी वेरायटी आती है..! चश्मा के लेंस भी कईं तरह के आने लगे है। ब्लू रेज़ को रोकने वाले, UV प्रोटेक्शन वाले, मेरे वाला डे-नाईट तो है ही, कोटिंग वाले, सादे, फाइबर के या कांच के.. इतनी सारी वेरायटी सिर्फ इसी लिए, कि हम ताड़ सकें। 


ट्रैफिक और झुंझलाहट का अनुभव

    खेर, दो हजार के ऊपर बीस रूपये का बिल बनवाकर, कल तक तैयार हो जाएंगे चश्मा, ऐसा वायदा लेकर वापिस ऑफिस लौटा। ट्रैफिक सवेरे ऑफिस आते हुए जैम था, दोपहर को मार्किट जाते हुए जैम था, और अब मार्किट से लौटते हुए भी जैम था। आज मैं आपा खो चूका था। ट्रक वालों को रुकवा रुकवा कर अपनी बाइक निकाली थी मैंने। और उन्हें भर भर कर गालियां भी दी। क्योंकि ट्रक वाले भी अड़ियल है थोड़े, रोड के किनारे बाइक निकालने जितनी भी जगह नहीं छोड़ते। 


मन का दृष्टिकोण और अंतरद्वंद्व

    कितना अजीब है न यह दृष्टिदोष भी। आँखों पर तो चश्मा चढ़ाकर देख भी लू.. लेकिन कुछ मामले ऐसे भी हो जाते है, जो बगैर चश्मे के भी बड़े स्पष्ट दीखते है। और उन मामलों पर तो आँखे भी नहीं मूंदी जाती। क्योंकि वे चलते है भीतर के दृष्टिकोण से। किसी के प्रति बंधी हुई ग्रंथि कहाँ छूट पाती है फिर कभी..! प्रियम्वदा, अब तो मेरा एक नित्यपाठी भी अनियमित हो चला है। उनकी अपनी दौड़ है, मेरी अपनी.. कईं बार यह मन बड़ा लालची हो जाता है। उसे चाहने लगता है, जहाँ तक दृष्टि पहुँच रही होती है। लेकिन उस दृष्टि पर बाधा डालने आ धमकता है, दृष्टिकोण। 


    दृष्टिकोण बहुत कुछ स्पष्टताएँ देता है। लेकिन मन उसे नजरअंदाज करते हुए, अपनी चाह के पीछे ही दौड़ाता रहता है। मन अन्नपूर्णा के अक्षयपात्र सा है.. कभी भी कहीं भी तृप्त नहीं होता। शायद इसी कारण से हमारे पूर्वजों ने मन को शत्रु मानकर उस पर अपना अधिकार स्थापित करने के आदेश दिए होंगे। लेकिन विद्रोही मन, मेरे वश में तो कतई नहीं। मैं उसे दूसरे क्षेत्रों में विचरण करने का दिशानिर्देश करता रहता हूँ। लेकिन वह घूम-फिरकर अपनी ही चाहत के पास सारे विचारों को ले जाता है।


    यह कपटी मन, वे ख्वाब भी दिखाता है, जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं हो सकता। इस निरंकुश के साथ किसी ने कोई मीठी बात क्या कर ली.. वह और संभावनाएं खोजने में लग जाता है। वहां एक रिश्ता सोचने लगता है। फिर वह मैत्री हो, प्रेम हो, या कुछ भी..! लेकिन उसे एक स्थायी भाव चाहिए। उसे शत्रुता भी चलती है। क्योंकि उसे सतत किसी के बारे में सोचना होता है। प्रेमी जोड़े कईं बार एक-दूसरे के ख्यालों खो जाते है। या फिर कोई शत्रु अपने प्रतिशत्रु का अहित सोचता रहता है। या जैसे कईं बार मैं अपने खाली-पन में पत्ते से बकैतियाँ कर लेता हूँ..  क्यों? क्योंकि मन को कुछ चाहिए व्यस्त रहने के लिए। 


गरबा का उत्सव और चौक की रौनक

    घर लौटा, और भोजनादि से निवृत होकर गरबी चौक पहुँचने से पूर्व दूकान से एकाध मुखवास जैसा मावा भी ले लिया। मैं पहुंचा तब तक आरती चालु हो चुकी थी। वहां जितने लोग मौजूद होते है, उन्हें आरती उतारने का मौका मिलता है। कुछ वर्षों पूर्व हमारे यहाँ ऐसा सिस्टम था, कि आरती के लिए बोली लगती थी। लोगोनों ने इक्कीससौ चुकाकर आरती उतारी है। क्योंकि उस समय फण्ड इकठ्ठा करना था। अब काफी फण्ड है, तो अब सीधी आरती हो जाती है। आरती के बाद विश्वम्भरी की स्तुति। और फिर गरबा चालू..!


     पिछले कुछ वर्षों में लोगो का उत्साह और संख्या, दोनों कम हो गयी थी। तो पिछले साल मैंने, गजे और पत्ते ने मिलकर सब लोगो के लिए आइस-क्रीम का बंदोबस्त किया था। और फिर तो यह प्रति-रात्रि का हो गया। हर रात कोई न कोई कुछ न कुछ मंगवा लेता है। इस बार पहली रात को कुल्फी थी, दूसरी रात को आइसक्रीम-कप, और कल रात को सेब थे। मुझे लगता है, फल बांटना ज्यादा बेहतर है। इससे कचरा नहीं फैलता। आइसक्रीम वगैरह में रेपर और कप जैसा प्लास्टिक को लोग इधर उधर फेंक देते है। 



    रात को लगभग डेढ़ बजे तक हम बैठे रहे थे। गरबा तो एक बजे से पूर्व ही समाप्त हो चूका था। यह तो मुझे नींद नहीं आ रही थी, तो मैंने गजे को भी बिठा रखा। और फिर हम लोग बातों में बहने लगे, हमारे यहाँ की genz से लेकर उनके काम करने के तरीके तक। हमारे चौक में रात में आखिर मैं, गजा और एक और दोस्त बचते है। हम तीन चार जन ही सारा चौक समेटते है। स्पीकर्स, mic, एम्प्लीफायर, लाइटिंग, सब कुछ हम ही पैक करके रखते है। छोटे थे तब तो यह सब पहले सेट करो, और फिर समेटो की झंझट से बचने के लिए रात को वहीं सो जाया करते। 


     चलो फिर, यही सब था आज का दिन। 

    शुभरात्रि। 

    २४/०९/२०२५

|| अस्तु ||


प्रिय पाठक !

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