“जिम्मेदारियों और सपनों के बीच : एक भावनात्मक पत्र || दिलायरी 26/09/2025”

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मासूमियत से जिम्मेदारियों तक की यात्रा


    २६-०९-२०२५,

    प्रिय पुराने वक़्त !

    आज तुम्हे यह खत लिखते हुए मेरे हाथ कांपते नहीं, कठोर हो चूका हूँ मैं। कईं ज्यादा कठोर। वो तुम्हारे पास जो मासूमियत थी, वह खो गयी है कहीं इस सफर में। तुम्हारे पास कितना कुछ था। कितने सारे सपने थे, कितने सारे हसीं पल थे। और एक वह भी, जिसे बस तुमने ही रख लिया। 



    तुम्हारे पास एक दबी-कुचली डायरी थी। अब तो वह पन्नों से बाहर बह निकली है। लेकिन वह कूप भी सूख गया है। जहाँ से क्रमबद्ध शब्दों की कतार निकला करती थी। हाँ ! आज बहुत कुछ बदल गया है। तुम्हारे सपनों से शायद सर्वदा विपरीत। तुम्हारीं हँसी की मासूमियत को अपनी जेब में रखना चाहता हूँ, लेकिन अब जेब जिम्मेदारियों से भरी रहती है। 


    रात के इस तीसरे प्रहर में चौथ का चन्द्रमा कितना जाना-पहचाना लग रहा है। अभी.. कुछ देर पहले ही, इस चौक में होते पद संचलन से, रज उठती थी। चंद्र तक पहुँचने का निरर्थक प्रयास करती। लेकिन अभी, हवा स्वच्छ हो गयी है। सारी ही रज बैठ गयी। कुछ देर पहले बजते माइक, अब चुप होकर सो गए है..!


    तुम्हारे पास बहुत सी यादें है। लगभग इकत्तीस नवरात्रियों की यादें। आज जब पूरा एक घण्टा बिना रुके गरबा खेला, तो तुम्हारे कईं सारे अंश याद आ गए। तुम्हे तो पता ही होगा, तुम तो मेरे ही हो, आज एक घण्टा खेलने पर नाज होता है, लेकिन पहले तो हम नौ रात चलती पर डेढ़ घण्टा खेल लेते थे। शायद तुमसे मिला वह अनुभव भी, अब बूढ़ा हो रहा है। अब थकान जल्द अनुभव होती है। अब शर्म भी पहले से ज्यादा होती है। किनकी? वही चार लोग.. जो बातें करते है.. बातें बनाते है.. बातें बहाते है..! तुमसे क्या छिपा है, अभी यह लिखते हुए भी तुम तो पुराने होते ही जा रहे हो।


    आज तुम्हे यह पत्र लिखते हुए याद आता है। गरबा में जब चलती खेलते थे, तो कायदे से पूरा मैदान नाप लेते थे, दौड़ लगा देते थे। तब थकान नही होती थी। तब सांस फूलती थी, लेकिन बैठ नही जाना पड़ता था, या घुटने नही पकड़ लेने पड़ते थे। तब जिम्मेदारियों का भार भी तो नही था। आज चलती के चार चक्कर लगाते ही, जिम्मेदारियां नजर के आड़े आकर, मैदान का दृश्य धुंधला कर देती है। ह्रदय इतना भर जाता है, कि लगता है फुल गया, और अभी स्तब्ध हो जाएगा। तुम्हारे पास था उसे यह सब फिक्र न हुआ करती थी। वह तो झूमता था, बस अपनी मौज में। उसे उन चार लोगों की पड़ी न थी। फिर आज वह खुद भी उन चार लोगों में क्यों शामिल हो गया? क्या वह चार लोग बदलते रहते है?


नए दिन, नई आशा का उषाकाल

    तुम्हे तो पता ही है। मैं जिम्मेदारियों के प्रति कितना सभान हूँ। अपनी स्वयं की इच्छाएं - जो अब भी तुमने संभाल रखी है - कितनी पीछे छूट गयी है। तुमने वे घाव भी अपने पास रख लिए है, जिनसे मुझे आज भी, अपने शरीर मे ज्वाला अनुभव होती है। जिन्हें हमें हर रोज देखना होता है, उनकी भूलें भी हमें हररोज दिखती है, याद आती है। जला-भुना जाती है। लेकिन निरुपाय होकर सह जाना भी पड़ता है। तुम तो आज़ाद थे, लेकिन मैं अब नही रहा। मैने बेड़ियां स्वीकार ली है। तुम्हारे पास तब भी बोलने के लिए शब्द नही थे, मेरे पास आज भी सहने की क्षमता है.. पता नही, मेरे हिस्से यह सहनशीलता ही क्यों आयी... तस्वीरों के पास जिह्वा नही होती, फिर भी बहुत कुछ बोलतीं है। 


    कुछ ही देर में उषा का आरंभ होगा। एक और नए दिन के आगमन का काल। जड़वत हुई पृथ्वी में चेतना का संचार होगा। मेरी डायरी में एक और दिन उतरेगा। आज मैंने अपने ऑफिस पर इत्तला कर तो दी है, कि दीपावली पर मैं अपनी मनमर्जियां करने जा रहा हूँ.. लेकिन, क्या कभी भी मेरी मनमर्जियां चली है? कोलू के बैलों को थकने का अधिकार नही होता। वे यदि थकते भी है, तो उन्हें बदल दिया जाता है। दिनभर ऑफिस में काम के बाद मार्किट भी चला गया था। लेकिन ऐसा कुछ भी नजर न आया, जो यहां विस्तृतिकरण में काम आता। 


    तुम्हारे पास जो है, वह सारा मेरा है, उनपर मेरा अधिकार है, और उनसे हुए परिणामों को भी मैं ही स्वीकारता हूँ.. लेकिन कुछ परिणाम बदले जाने चाहिए थे। बदलना अपने आप मे कितना नएपन से भरा हुआ है। मैंने किताबों से अर्जित किया, आज मेरा वैरी हो चुका है। मैंने कईं कल्पनाएं की थी, किताबों के सहारे सीढ़ी बनाई थी। लेकिन वह सीढ़ी मुझे ऊपर की ओर ले जाने के बजाए, कहाँ ले जा रही है, समझ नही पा रहा हूँ। समझते समझते ही शायद इस सीढ़ी का सिरा आ जाएगा।


    शुभरात्रि


    तुम्हारा वही,

    जो आज तुमसे विपरीत है।

|| अस्तु ||


प्रिय पाठक !

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