प्रियम्वदा को लिखी 365वीं दिलायरी: एक वर्ष, शब्दों का संकल्प और प्रेम की स्वीकारोक्ति || दिलायरी : 24/12/2025

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प्रियम्वदा को लिखी 365वीं दिलायरी

    प्रियम्वदा !

    आज दिलायरी को एक वर्ष पूर्ण हुआ। पिछली पचीस दिसंबर से मैंने प्रतिदिन एक डायरी लिखी है। आज #Day365 है। आज की इस दिलायरी का आरम्भ कर रहा हूँ, तो मुझे कुछ इसी तरह बातें याद आ रही है, जैसे कल की ही बात हो। उस समय पर मेरे एक सोशल मीडिया के मित्र से खूब बातें हो रही थी। मेरे और उनके विचार कईं मामलों में एक से है। इसी कारण बातें कईं अलग अलग मुद्दों पर हो पायी। सलाहों का भी काफी आदानप्रदान हुआ। 


365वीं दिलायरी लिखता लेखक, प्रियम्वदा रूपी प्रेरणा और एक वर्ष की डायरी यात्रा का प्रतीकात्मक चित्र

प्रतिदिन लिखने का एक वर्ष : दिलायरी की शुरुआत और यात्रा

    विचार तो था, कि दिलायरी में केवल मैं अपनी दिनचर्या ही समाहित करूँगा। पुरे दिन भर में कुछ तो ऐसा होगा, जिसपर मैं अपने शब्दों का विस्तार कर पाउँगा। यह विचार उन मित्र की डायरी पढ़कर ही मुझे आया था। आज वे दिन बड़े याद आते है। मैंने पहले कभी किसी की भी डायरी पढ़ी नहीं थी। तो यह पहला अनुभव मुझे आकर्षित कर गया, और मुझे प्रेरणा हुई कि यह मुझे भी ट्राय करना चाहिए। मैंने शुरुआत तो की, लेकिन शुरुआती दिलायरी में सिर्फ दिनभर में क्या किया यही सीधा सिंपल विवरण था। तो एक दिन में दो पोस्ट्स हो जाती, एक में सिर्फ दिनचर्या, और दूसरी पोस्ट में अन्य बातें मैं लिखा करता था। 


जब दिनचर्या पत्र बन गई : प्रियम्वदा का आगमन

    समय के साथ दो अलग अलग पोस्ट में टाइम ज्यादा लगता था, और ब्लॉग भी कुछ अलग दिशा में जाता दीखता था। तो एक दिन मैंने दिलायरी में ही प्रियम्वदा को बुला लिया। और दिलायरी एक दिन की दिनचर्या के साथ प्रियंवदा को पत्र भी बन गयी। अब प्रतिदिन एक डायरी लिखना है तो आसान, लेकिन कुछ दिन ऐसे भी तो आते है, जहाँ समय ही न मिले शब्दों के साथ बैठने का। तो वे दूसरे दिन मुझे एक साथ दो-दो दिलायरी लिखने की अनिवार्यता आन पड़ती। जब मैं प्रवास पर निकला था, और लौटकर आया, तब तो एक दिन में कितनी ही दिलायरी लिखने की नौबत आ पड़ी थी। 


365 दिन, शब्दों की जिद और भावनाओं की परीक्षा

    मैंने यह वर्ष 2025 पूरा ही अपने शब्दों में बाँध लिया है। मैंने इस एक वर्ष में कितनी बार अनुभव किया है, कि प्रतिदिन लिखना कितना मुश्किल है। जब भावनाएं उछलती है, तब लिखने का समय नहीं होता है, जब लिखने का समय होता है, तब शब्द विमुख हो जातें है। मैंने कितनी ही दिलायरी में अपनी समस्याएं लिखी है, अपने अनुभव लिखे है, जहाँ मैंने दुःख अनुभव किया है, वहां भी मैंने अपनी पहचान को उजागर होते रोका है। लेकिन प्रियम्वदा ! अगर इन 365 दिलायरी में कोई शाश्वत रह पाया है, तो वह तुम हो। मैंने अपनी तमाम तकलीफों से लेकर सारी खुशियों में तुम्हे जरूर पुकारा है। 


प्रेम की मेरी परिभाषा और लेखनी का परिवर्तन

    प्रियम्वदा ! यह प्रतिदिन एक डायरी ने मुझे शब्दों की सौबत सिखाई है। शुरूआती डायरी, मतलब जनवरी से लेकर अप्रैल तक की तमाम दिलायरी बहुत ही कम शब्दों में लिखी थी, कुछ दिलायरी तो बस दो लाइन में ही सिमटकर रह गयी है। और कुछ दिलायरियाँ बहुत ज्यादा लंबी भी लिखी गयी है। प्रतिदिन लिखने का नियम पालन कर मैंने शब्दों को एक हजार शब्दों की मर्यादा में बांधना तो कम से कम सीख ही लिया। इसी दिलायरी के कारण ही मेरा ब्लॉग एक वेबसाइट में कन्वर्ट हो पाया। 


असल पात्र, रूपक प्रियम्वदा और लेखकीय सच

    इन्ही दिलायरी में मेरे आसपास के लोग समाहित होते गए। सरदार मेरा बॉस है। पत्ता और गजा मेरे बचपन के असल मित्र है। पुष्पा मेरे ऑफिस में सहकर्मी है। बुधा भी एक सहकर्मी है। हुकुम मेरे पिताजी है। कुँवरुभा मेरे पुत्र है। बचा एक पात्र.. जिसे मैंने अपनी तमाम दिलायरी में ध्रुव पात्र दिया, प्रियम्वदा। यूँ तो मैंने किसी को पढ़-पढ़कर यह डायरीनुमा लेखन शुरू किया था, उससे पहले मैं जो लिखता था, वह हमेशा कल्पनाओं से उतरे हुए भाव होते थे। लेकिन मैं चाहता था, कि उन भावो के केंद्र में कोई हो.. जिसे संबोधित मैं कर सकूँ। 


    जब मेरी दिलायरी के सारे ही पात्र असल में मौजूद है ही, तो प्रियम्वदा कैसे न हो? लेकिन यहाँ एक छिपी शर्त है। प्रियम्वदा है तो सही, लेकिन नहीं भी। सबसे पहले मैंने प्रियम्वदा शब्द का उपयोग अपनी एक गुजराती कहानी में पुतिन के लिए किया था। लेकिन जब मैं हिंदी में लिखने लगा, और मुझे एक केंद्र पात्र की जरुरत पड़ी, तो मेरे लिए मेरी प्रियम्वदा भी वही बनी जिनकी मैंने डायरी खूब पढ़ी थी। प्रियम्वदा है, असल में, लेकिन उन्हें पता नहीं था। आज पता चल जाएगा। मैं यह कबूलनामा लिख तो रहा हूँ, पर साथ में एक भय भी उपज रहा है। 


    मेरी लेखनी प्रेम की तृष्णा से पीड़ित थी। मैं प्रेम को नहीं पहचानता हूँ। आज भी पूरी तरह नहीं समझ पाया हूँ। मेरे उन मित्र की मेरी तमाम चर्चाओं में जहाँ से हमारे रस्ते अलग होते, वह मोड़ होता प्रेम का। प्रेम की परिभाषा मेरी बहुत ज्यादा भिन्न रही है। मैं पीड़ा यानी ही प्रेम मानता आया हूँ। उन्होंने मुझे प्रेम की व्याख्या कभी नहीं दी, लेकिन उनके विश्वास का मैंने खंडन करने का प्रयास किया, अपमान नहीं किया। धीरे धीरे उनकी सौबत में, प्रेम शब्द की परिभाषा मेरी वही रही, लेकिन लेखनी में प्रेम को यथार्थ करने के नजदीक जरूर पहुँच पाया। 


एक वर्ष में लिखे गए जीवन के प्रसंग

    बस यही कारण रहा, मैंने उन्हें ही प्रियम्वदा के पद पर स्थापित कर दिया। उन्हें नहीं बताया, हाँ एक दो बार मजाक में प्रियम्वदा कहकर पुकारने के सिवा। मुझे मेरी कल्पना को एक रूप देना था, तो भला यह रूप ही क्यों न हो? आखिरकार प्रियम्वदा की प्रेरणा भी तो यही है..! यह नाम प्रियम्वदा भी तो उसी किसी रस्ते से मैंने चयनित किया था। जब भी प्रियम्वदा को संबोधित करते हुए, किसी विवरण पर पहुंचना होता, तो वही तस्वीर को मन मे उपजाता, और फिर शब्दों को मुक्त प्रवाहित कर देता। आकर्षण की खासियत यही है..! तो आजपर्यंत मैंने प्रियम्वदा के प्रति प्रेम तक पहुँचने वाले पथ पर खड़े रहकर पत्र, या जो भी लेखनी से रस निर्झर हुआ, वह मैंने उन्हें ही केंद्र में रखकर लिखा था। और एक समय पर आकर मैंने स्वयं ने अनुभव किया, मेरी भले अपनी प्रेम की व्याख्या भिन्न है, लेकिन उनका दृढ विश्वास मेरे शब्दों को ज्यादा मजबूती दे रहा था। 


    तो यही है प्रियम्वदा ! जिन्होंने मेरे शब्दों के लिए प्रेरणा और पथदृष्टा का कार्य किया। मैं कोई बड़ा लेखक नहीं बनने जा रहा, न ही मैं इसे अपना कार्यक्षेत्र बनाने जा रहा हूँ। मेरा लेखन मेरा शौक मात्र है। कल्पना और ज़िद्द का संगम जहाँ हुआ, वहां प्रियम्वदा ने अपना केन्द्रस्थान लिया। मेरी हताशा में मेरी यह प्रियम्वदा ही सहारा बनी है। जब शब्दों को दिशाहीनता अनुभव होती थी, तब प्रियम्वदा को किया गया संबोधन एक पथ बन जाता है। 


यात्राएँ, रिश्ते, कार्यालय और आत्मसंघर्ष

    यह एक वर्ष में मैंने जितनी भी बार शब्दों की कमी अनुभव की है, तब तब प्रियम्वदा ने मेरे लिए विषयों का भंडार सौंपा है। मैंने जहाँ जहाँ गलतियां की है, वहां वहां प्रियम्वदा ने सुधारा है। मेरे निजी जीवन में कभी तूफ़ान उठा है, उसे दिलायरी में प्रियम्वदा ने पहचान कर, मुझे अंधेरों से निकलने के लिए प्रेरित भी किया है। ऐसी ही प्रियम्वदा की मैंने कल्पना की थी, जो मेरी प्रेरणा और पथद्रष्टा बनें। इस एक वर्ष में, मैंने खुशी, हर्षोल्लास, हताशा, पीड़ा, आनंद का अतिरेक, और अंधेरे की गहनता को समीप से अनुभव किया है। आज जब पिछले एक वर्ष की दिलायरियों के हैडिंग्स पढ़ता हूँ, तो मैंने कितना कुछ लिख दिया है, कितने सारे विषयों को समाहित किए है, कितने सारे भावों को सहज किया है। जयपुर से लेकर भीमाशंकर तक की यात्राएं, पगार से लेकर खर्चों तक, देश से लेकर दुनिया तक, कुँवरुभा के ऑपरेशन से लेकर, ऑपरेशन सिंदूर तक, और ऑफिस के आनंद से लेकर एक्सीडेंट तक.. मैं इस एक वर्ष में उन सभी प्रसंगों को अपने शब्दों में बांध सका हूँ। 


दिलायरी से ब्लॉग और ई-बुक तक की राह

    यह दिलायरी ही कारणभूत है, कि किसी दिन मुझे एक ई-बुक पब्लिश करने की इच्छा हुई। मई, जून, जुलाई तथा महाराष्ट्र के महादेव नामक चार ई-बुक मैं किंडल पर प्रकाशित कर चुका हूँ। वैसे हाँ ! मुझे आज भी इन सब कार्यों से अर्थ-उपार्जन की आशा नहीं है। बस अपने ब्लॉग को और बढ़ते देखने के लिए उन सब क्षेत्रों में भी मैंने विचरण किया है। यह सब इंटरलिंक करने से ब्लॉग की मजबूती बढ़ती है। यही उद्देश्य था। उद्देश्य से याद आया, मेरी इस दैनिक दिलायरी लिखने के पीछे एक उद्देश्य यह भी था, कि कभी किसी दिन मैं आराम से बैठकर, अपनी ही लेखनी में उतर आए, वर्ष 2025 के दिनों को पढ़ पाऊं..! आज यह दिलायरी लिखने से पूर्व भी मैंने अपनी पिछली कुछ दिलायरियाँ पढ़ी थी।


आगे का रास्ता : आदत, विकल्प और निरंतरता

    आज का दिन रहा तो अलग ही है। सवेरे जगन्नाथ के मंदिर गया था। वहां से ऑफिस। आज पूरे दिन में एक ही कमी रह गयी.. असमय लंच की। दोपहर में कुछ अन्य कामों के कारणवश दोपहर तीन बजे लंच करने का समय मिल पाया। बाकी पूरा दिन इसी खुशी में बीता है, कि मैंने सफलतापूर्वक एक वर्ष पूर्ण किया है, दैनिक डायरी लिखकर, बेरोक शब्दप्रवाह बहाया है। अब यहां से शायद दिलायरी दैनिक नहीं रहेगी। शक्य हो तब तक तो मैं दैनिक ही लिखूंगा, लेकिन जब कभी किसी दिन समय न मिला, तो उस दिन की दैनंदिनी अगले दिन के साथ मिला दूंगा। यह एक विकल्प है, हकीकत तो यही है, कि कोशिश तो प्रतिदिन की ही रहेगी। क्योंकि यह बन चुकी आदत को बिखेरना भी नही चाहता हूँ मैं। स्वार्थी हूँ मैं, मुझे सब कुछ ही चाहिए। 


    वर्ष की यह अंतिम दिलायरी भी तुम्हे ही सौंप रहा हूँ प्रियम्वदा। और उन्हें भी, जो मेरी इस रूपक प्रियम्वदा का बाह्य रूप है।


    शुभरात्रि 

    २४/१२/२०२५

|| अस्तु ||


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