ज़रूरतें, दोस्ती और दिल का हिसाब | पत्ता, नौकरी और अरावली || दिलायरी : 22/12/2025

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एक साल की दिलायरी और समय की दहलीज़

    प्रियम्वदा,

    अभी अभी एक दिलायरी लिखकर खत्म की है, और अब दूसरी लिखने का समय भी आ गया। इन दिलायरियों को एक वर्ष पूरा होने में अब केवल दो दिन बचे है.. 25 दिसंबर से शुरू हुई थी। आज 22 दिसंबर है। कुछ दिन ऐसे होते है, कि आप सवेरे से शाम तक बस एक मौका तलाशते है, फ्री होने का। वह मौका मिलता भी है, तब शाम ढलने को होती है। अभी कुछ देर पहले शाम को ही बखान रहा था मैं पिछले दिन की दिलायरी में। आज कुछ ऐसा ही दिवस था। व्यस्तता से भरा हुआ। ऑफिस पहुंचते ही शुरू हुए कामों ने, टेंशन की भी लड़ी लगाए रखी थी। जिम्मेदारियों के बोझ का टेंशन। अब जाकर कुछ कामों को मैं टाल पाया हूँ। 


मुख्य किरदार और उसका दोस्त पत्ता शोले की दोस्ती वाले बाइक सीन में, सादा सफेद पृष्ठभूमि पर बनी कार्टून इमेज

ऑफिस, जिम्मेदारियाँ और बैंक का कन्फ्यूज़न

    सवेरे आज काफी लेट उठा। पांच मिनिट.. पांच मिनिट.. करते-करते सवा आठ बज गए। फटाफट तैयार हुआ, कुँवरुभा को उनके स्कूल छोड़ा। और मैं अपने स्कूल.. मतलब ऑफिस के लिए निकला। आजकल जगन्नाथ को ध्वज-प्रणाम ही करता हूँ। दूर से सलाम वाला मामला चल रहा है। दूकान पर बढ़िया अपना कोटा पूरा करके निकलता हूँ, और साढ़े नौ बजे तक ऑफिस। ऑफिस पहुंचा ही था, कि कामों के बौछार सी हो गयी। मैं सोच ही रहा था, कि कौनसे काम को प्रथमांक दू, उतने में एक व्यापारी आ गया। बातें करने लगा, मेरे पास कामों की सारणी में कहीं भी बातें करने का खाली समय था नहीं। लेकिन अगला अड़ा रहा, और मैं भी बस हम्म्म.. हम्म्म.. करते उसकी बातों को एक कान से दूसरे कान का खाली रास्ता देता रहा। 


    मन में एक विषाद यह भी था, कि बीते कल की दिलायरी अभी लिखी ही नहीं है, तो पब्लिश क्या करूँ? ऊपर से नौकरी पेशा काम.. खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। ऊपर से यह बैंक वाले भी बड़े अजीब है। थोड़े थोड़े समय पर सिस्टम बदलते रहते है। अगर नया अपडेट करते है, तो कम से कम अपने स्टाफ को तो बताना चाहिए। दरअसल बैंकिंग वेबसाइट पर काम करते हुए मैंने पाया, कि आज जो डाटा फिलअप करना था, वह पहले तो कभी माँगा ही नहीं जाता था। यह जो डाटा अभी देना पड़ रहा था मुझे, वह तो असल में बाद में, बहुत बाद में देना होता है। भारी कन्फ्यूज़न था। बैंक के कर्मचारी को फोन किया, वह उल्टा मुझे ही कहने लगा, आपने कुछ गलत सिस्टम खोल दिया है। आखिरकार घंटेभर बाद उसे मेरे जैसे और लोगों के कॉल्स आए होंगे, और वह भी मुद्दा समझ पाया। 


तारीफ़, वैल्यू और पगार का अनकहा गणित

    दोपहर का डेढ़ बज रहा था, काम है कि ख़त्म ही नहीं हो रहे थे। लेकिन एक बात तो है प्रियम्वदा, अपनी जो भी लायकात हो, उसकी कदर तो होती है। भले अपने सामने न हो रही हो.. लेकिन पीठ पीछे हुए तारीफ़ की खबर सुनने को मिले तो अच्छा तो लगता है। कुछ खबरे मेरी तारीफों की मैंने सुनी.. नौकरी में अगर तारीफ़ सुनने मिले उससे एक बात तो सिद्ध हो जाती है, अपनी वैल्यू बढ़ रही है। वैल्यू बढ़ने का मतलब पगार से भी आंक सकते है। वैसे एक बात यह भी है, भले ही मेरी नौकरी में मेरी कोई बताने लायक पोस्ट नहीं है, लेकिन वैल्यू अच्छी खासी है। पढ़ा-लिखा कम हूँ, लेकिन अनुभव का तो मालिक हूँ। और कदर हमेशा अनुभव की ज्यादा होती है। मैंने आज तक कभी भी नटुकाका की तरह पगार बढ़ाने की पेशकश नहीं की है। इस मामले में पता नहीं मैं मूर्ख हूँ या आलसी.. मैं मानता हूँ, कि मेरी जो जरूरतें है, उसका निभाव कुदरत अपने आप कर देगी। 


    जिस महीने मेरे खर्च ज्यादा होते है, तो अगले महीने एडजस्ट हो ही जाता है। जब मेरी जरूरते बढ़ती है, पगार भी अपने आप एडजस्ट हो जाती है। आज के समय पर एक अच्छी अमाउंट मैं ले रहा हूँ। लेकिन बुरा तब भी लगता है, जब कोई यार दोस्त उसी अमाउंट में नयी नौकरी पा लेता है। बुरा मतलब एकचोट विचार उठता है, कि अपन इतने वर्षो में यहाँ तक पहुंचे है, और यह है कि एक ही बार में यहाँ पहुँच गया। लेकिन वहां भी मेरा मन मुझे समझा देता है, कि शायद मेरी उतनी जरूरतें नहीं है। 


लंच टाइम, यादें और दालबाटी की खुशबू

    दोपहर को लंच करके मैं और पुष्पा, दोनों मार्किट चल पड़े। उसे अपनी बाइक वॉश करवानी थी, और मुझे ATM जाना था। क्या करे प्रियम्वदा, हुकुम के दम पर आज भी मेरा गुज़ारा हो रहा है। वैसे भी बाप छत होता है। खेर, लंच टाइम में मार्किट में था, और एक जरुरी काम उसी समय आ टपका। जैसे-तैसे मैंने वह काम पूरा किया। लेकिन जिस काम के लिए मैंने इतने जुगाड़ लड़ा दिए, वह असल में पूरा हो नहीं पाया। बैंक वाले भी पुरे स्वार्थी है। अपनी जरूरतें पहले पूरी करते है। खेर, तीन बजे तक मैं वापिस ऑफिस पहुँच गया था। रस्ते में, मैं और पुष्पा यही डिसकस करते जा रहे थे, कि वे दिन तो जैसे हम भूल ही गए हैं, कि पहले हम लोग लंच टाइम में क्या खाएंगे वह डिसकस किया करते थे। फिर एक खाद्य आइटम पर अपनी पसंदगी का कलश उतारते। और दबाकर पेटपूजा करते। यह मुद्दा हम इस कारण से डिसकस कर रहे थे, क्योंकि ठीक उसी समय हम लोग हमारे यहाँ के प्रसिद्द दालबाटी वाले ढाबे के पास से गुजर रहे थे। 


मौसम, अरावली और विकास की तुगलगी रेखाएँ

    शाम ढल चुकी है। और हवाएं अपने यहाँसे ठण्ड का माहौल ही उड़ा ले गयी है। दिन की धूप तो जैसे जला देती है। अजीब सा मौसम है। धूप में गर्मी लगती है, लेकिन पंखा भी धीरा रखना पड़ता है। दिसंबर चल रहा है, लेकिन मार्च जैसा अनुभव हो रहा है। सर्दियाँ भी जैसे अरावली की सौ मीटर से छोटी पहाड़ी हो रखी है। रातो रात मानों उनसे पहाड़ होने की पहचान ही छीन ली गयी। लेकिन कैसी अजीब बात है न.. आजतक सिर्फ भर्ती में होता था, एक मिली-सेकंड की देरी से पूरी की गयी दौड़ अयोग्य मान ली जाती है, और सारी मेहनत व्यर्थ हो जाती है। कुछ उसी तरह अगर सौ मीटर से ऊँचा है, तो पहाड़ यथावत रहेगा, बाकी को जमीदोश किया जाएगा। जातिवाद नहीं पनपेगा पहाड़ों की बिरादरी में? 


    सौ मीटर से छोटी चोटियां है, क्या वहां पर कुदरत ने अपना डेरा नहीं बनाया है? क्या वन्यजीव नहीं होंगे? क्या वहां मंदिर नहीं है? क्या वहां जल, जंगल, जमीं नहीं है? वह पहाड़ियां प्रकृति में कितना योगदान देती है, उसका आंकलन कौन करेगा? कल को अपनी जरूरतें बढ़ेगी, तो वह दायरा भी बढ़ेगा, भविष्य में दो सौ मीटर से छोटी पहाड़ियां खनन के हेतु नष्ट कर दी जाएगी.. यह कहीं रुकने वाला है क्या? छोडो, सरकार की अपनी जरूरतें है, प्रकृति की अपनी। समय समय पर सृष्टि में कितने सारे बदलाव हुए है। हम जमीन भी तो कभी किसी की हुई नहीं है, और न होगी.. आज मेरी है, कल मेरे वारिसदार की होगी, भविष्य में किसी और की.. क्या पता, आज मेरी ज़मीन है, कल वहां से नदी बह रही हो। आज अरावली की पहाड़ियां, धरा के समतल कर दी जाएगी, और कल वहां से कोई नदी अपना रास्ता बना ले। उस नदी के किनारे फिर कोई सभ्यता आकर बसे। यही तो होता आया है। सभ्यताओं से लेकर प्रकृति तक.. हर कोई अपनी जरुरत पर निर्भर है। 


ज़रूरतें, लेखन और भीतर का तूफ़ान

    प्रियम्वदा ! जरूरतें कहाँ ख़त्म होती है? अभी कुछ देर पहले मैंने एक दिलायरी पूरी की थी। अभी दूसरी पूरी करने में लगा हूँ। यह मेरी जरुरत है। मेरे भीतर के तूफ़ान को शांत करने की जरुरत। या मेरे पागलपन का पोषण है यह दिलायरी। आज का दिन भी यूँ तो काफी ठीक रहा है। दोपहर तक अत्यंत काम था, और दोपहर बाद काफी कामों को अगले दिन पर टालने की आज़ादी। अरे हाँ.. एक बात और.. पत्ता पढ़ेगा तो काफी चिढ़ेगा.. लेकिन मजे तो मुझे भी लेने पड़ेंगे उसके.. क्योंकि आज दिन में तीन-चार बार उसने मेरे मजे लिए है। मैं उसका बदला वहां दिलायरी में लूंगा..!


    सबसे पहले डिस्क्रिप्शन = कोई भी यह पढ़कर जज नहीं बनेगा, और तुगलगी फरमान नहीं निकालेगा, या फिर पत्ते के बारे में कोई भी दृष्टिकोण नहीं बनाएगा। आज मैं पत्ते का कच्चा-चिटठा लिखूंगा, लेकिन कईं बाते बस बदला लेने के उद्देश्य से लिखूंगा.. इस लिए मनघडंत भी हो सकती है, और नहीं भी..! पढ़कर भूल जाने में सबकी भलाई है। 


पत्ता – दोस्ती नहीं, पूरे कांड

    तो बात को शुरू से शुरू करता हूँ। मैं और पत्ता तब से दोस्त है, जब हमारी जवानी फूटी भी नहीं थी। या इसे इस तरह भी कह सकता हूँ, कि हम दोनों ही महामूर्ख थे। लड़कपन था, और शायद आज भी मौजूद है। दो दोस्त इस लिए भी ज्यादा लम्बी दोस्ती निभा पाते है, क्योंकि दोनों ही एक दूसरे को भूतिया(भू का स्थान चु को दे सकते हैं) समझते है। हमने क्या ही नादानियाँ की है। कच्चा चिटठा ही खोलना है, तो एक बार क्या हुआ.. मैं शायद बड़ौदा से लौटा था, कुछ दिन की छुट्टियों पर। पत्ते के घर पर कोई था नहीं। तो हमें पार्टी की। रात के बारह बज रहे होंगे, पांच छह लड़के थे हम। हर कोई भरपूर सुरूर में था। दो जने बाइक लेकर सिर्फ सिगरेट पिने शहर तक गए। 


बचपन की मूर्खताएँ और एयरगन वाला क़िस्सा

    इधर बचे हममें से पत्ता की विकेट गिर पड़ी थी। वह सोफे पर उल्टा पड़ा हुआ था। कमरे में दिवार पर एयरगन टंगी हुई थी। पत्ते के पीछे (पीछे मतलब वही जगह) एयरगन की नली लगाई, और फोड़ दी। ऐसे तीन चार राउंड फायर किये थे। हालाँकि यह मजाक मात्र था। दो जने सिगरेट पीकर लौटे, उन्होंने बताया कि वे लोग रात के अँधेरे में रोड पर खड़े रहते रात के शौकीनों से बच-बचाकर लौटे थे। उनका तो तमाम सुरूर वहीँ उत्तर गया था। (पगला पत्ता)


    पत्ता उतना ज्यादा कमीना है, कि एक बार बड़ी मुश्किल से मेरी किसी से बात शुरू हुई। वह उसे नागवार गुजरी। उसने मुझे मूर्ख बनाया, मुझे चने के झाड़ पर चढ़ाया, और बोला, दम है तो उसे बात करने से मना कर दे। मैंने भी आव देखा न ताव मना कर दिया। बाद में मैं पत्ते पर बहुत चिढ़ा था। (जलता हुआ पत्ता)


बदले, धोखे और उत्तरायण की रात

    एक बार पत्ते ने भारी बदला लिया, शायद उस एयरगन शॉट्स की बातें उसे याद थी। एक बार मैं पीकर गिरपडे वाली हालत में पहुँच गया था। उत्तरायण थी। कॉकटेल हो गया था उस दिन पेट में। और सर पूरा चकरा गया था। मैं तो होश में नहीं था, और कह रहा था, मुझे घर पहुंचा दे। पत्ता सच में मुझे उस हालत में घर पहुंचा आया था। ऐसी हालत में घर पहुंचना, मतलब घर वालों की असंख्य डांट-फटकार की तीर-बौछार में बिना ढाल-बख्तर के खड़ा रहना। उस दिन मैं अपने ही घरवालों की आंख में आँख नहीं डाल पाया था। (धोखेबाज़ पत्ता)


    पत्ता आज भी मतलबी है पूरा। खुद का टाइमपास न हो रहा हो तो मुझे बुला लेता है। और मैं मुर्ख पहुँच भी जाता हूँ। लेकिन जब मेरा टाइमपास न हो रहा होता हो, तब अगला फोन ही नहीं उठाता। पत्ता कहीं और पार्टी-शार्टी कर रहा होता है, और घर पर मेरे साथ होने का बहाना मारता है। क्योंकि मैं तो बहरूपिया हूँ। मेरी छवि उसके घर पर कुछ और है, और पत्ते की छवि मेरे घर पर कुछ और..! मेरे घर पर वह बहुत सीधा और शरीफ है। उसके घर पर मैं। लेकिन आज हम जब साथ होते है, तो दोनों के ही घर वाले परेशां होते है। क्योंकि हम दोनों एक साथ एक्सीडेंट का अनुभव कर चुके है। (बहरूपिया पत्ता)


कंजूसी, ढोंग और बेवड़ापन

    पत्ता कंजूस मारवाड़ी है। दो सिगरेट का हिसाब अच्छे से वसूलता है। एक दिन उसने पिलाई हो, तो दूसरे दिन मेरी जेब में हाथ डालकर पैसे निकाल लेता है। एक तो उसे पता नहीं मेरे फ़ोन से क्या समस्या है, मेरे हाथ से फोन छिनता है, सेटिंग्स बदल डालता है। एक दिन मेरे यूट्यूब में पता नहीं कौनसी सेटिंग बदली है उसने, आजतक मेरे फ़ोन की सर्च हिस्ट्री नील ही रहती है। ऊपर से बड़ा जानकार बनने एक ढोंग भी करता है। हमारे साथ जितनी भी उसने शर्त लगायी है, सारी ही हारा है। ( ढोंगी पत्ता)


    पत्ते की सबसे बड़ी कमी है, पीने के बाद सुपरफास्ट बन जाता है, जिद्दी हो जाता है, और इमोशनल ब्लैकमेल करता है। "भाई नहीं है..?" यह बोल बोलकर उसने मुझे कितनी ही बार घर लेट जाने दिया है। और सुरूर हो जाने के बाद तो इसकी जिह्वा - जिह्वा नहीं, आरी बन जाती है। बड़ी तेज चलती है। इतनी तेज़, कि वह बोलता क्या है, यही समझ नहीं आता। (बेवड़ा पत्ता)


दोस्ती की बेइज्जती से पहले विराम

    और भी बहुत सारी बातें है। खुद तो यहाँ-वहां, इधर-उधर पिघलता रहता है। संतोष से ज्यादा शोऑफ करने में मानता है, और फिर रोता हुआ सलाहें मांगने आ पहुँचता है। अभी कुछ दिन पहले कह रहा था, नौकरी करनी है। और अभी अपनी मशीनें बेचने व्यस्त है। पांच मिनिट में आ रहा हूँ बोलकर शाम तक अतापता नहीं होता उसका, और दूसरों को पांच मिनिट के ऊपर एक सेकंड भी लेट होने पर चिढ जाता है। खुदने तो न जाने कितनी ही नई दोस्तियां की थी। लेकिन मेरी एक हुई तो जलभुन गया.. उसदिन तो वेलकम का उदय मैं था, और जलता है मजनू वह पत्ता.. (आपमतलबी पत्ता।)


    यूँ तो हम दोनों भाई के किस्से नहीं, काण्ड है। लेकिन यहाँ उसके साथ साथ मेरी खुद की बेइज्जती हो जाए, उससे पहले मैं इस दिलायरी को समेट लेना पसंद करूँगा। 


    शुभरात्रि। 

   २२/१२/२०२५

|| अस्तु ||


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