समय था, फिर भी नहीं था | सांता क्लॉस, थोथे और थकान || दिलायरी : 25/12/2025

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एक अजीब छुट्टी: काम बंद, मगर दिमाग चालू

    प्रियम्वदा !

    आज तो पूरा दिन समय ही समय था, फिर भी तुम्हे लिखने के लिए नहीं बैठ पाया, पता है क्यों? क्योंकि आज एक तरिके से समय तो था, और एक तरिके से नहीं भी। आज वो ईसाई धर्म के प्रसिद्द संत सांता क्लॉस का दिवस था न.. तो मिल तो चालु थी, लेकिन मेरा काम बंद। अरे काम बंद मतलब पूरा दिन फ्री नहीं बैठा हूँ.. हमारी गैंग का सरदार वो अपने पुराने हथियार घर से उठा लाया था। वही हथियार जिन्हे मैं धृष्टतापूर्वक "थोथे" कहता हूँ। कंप्यूटर वाले ज़माने भी किताबों में जब एक एक कलम उतारते हुए एकाउंटिंग करनी पड़े, तो वह काम प्यारा कैसे हो सकता है?


दिलायरी की सालगिरह पर समय, आलस और आत्मचिंतन को दर्शाता कार्टून चित्र

सांता क्लॉस का दिन और थोथों से युद्ध

    खेर, सवेरे छुट्टी के बहाने, आराम से आठ बजे उठा था। जगन्नाथ के दर्शन कर, ऑफिस पहुंचा तब, पौने दस बज रहे थे। पता था, कि आज सरकारी छुट्टी के कारण बिलिंग वगैरह भी बंद ही रहेगा। तो थोथों में सर फोड़ना तय ही था। सबसे पहले तो दिलायरी की प्रथम वर्षगांठ वाली पोस्ट अपडेट की। और पब्लिश की। परममित्र को भेज दी। कुछ देर उनसे बातें हुई, और फिर मैं उलझ गया थोथों में। सहर्ष, या सखेद, थोथों से मेरा युद्ध अभी पांच मिनिट पूर्व तक चलता रहा था। 


एक ही पाठक, और उसी से बँधी लेखनी

    सच कहूं तो आज तुम्हे कुछ भी लिखने का मन नहीं हो रहा है। आलस हो रहा है। क्योंकि मुझे अब लग रहा है, जैसे मैं कर्ममुक्त हुआ हूँ। थोथों से भी, और दिलायरी से भी। मैंने एक वर्ष पूर्ण करना चाहा था, वह तो हो गया। आजकल मैं इंस्टाग्राम वगैरह कम चला रहा हूँ, तो वहां तो शेयरिंग वगैरह करता ही नहीं। मेरा एक ही पाठक है, वहीँ तक दिलायरी पहुंचाना, मेरा लंबे समय से दिनचर्या का भाग रहा है। अब आगे की दिलायरी कैसे निभेगी, मैं नहीं जानता। वैसे एक बात अभी अभी यह भी दिमाग में आयी। मैं उस मित्र से सिर्फ और सिर्फ इस दिलायरी से जुड़ा हुआ हूँ।


मॉल बनाम छोटी दुकान: अप्रूवल की तलाश

    लंच समय में एक तो लाइट नहीं, मोबाइल की बैटरी भी डाउन थी, तो खाली बैठकर कैसे समय व्यतीत हो.. मार्किट चल पड़ा। टहलने नहीं गया था, दरअसल काम भी था। एक नाईट पैंट लेना था। मैं किसी एक चीज की खरीदारी के लिए दो-तीन धक्के न खाऊ, तब तक मेरा काम पूरा नहीं होता। परसो भी नाईट पैंट लेने ही लंच टाइम में मार्किट गया था। अपने शहर के तीन प्रसिद्द मॉल घूम लिया। मुझे नहीं पसंद आए। लेकिन आज जब यह एक छोटी सी दूकान से लाया, तो मुझे पसंद भी आ गया, और मैं खरीद भी पाया। उसका कारण मुझे पुष्पा ने बताया। बोला,


    "आपको हमेशा अप्रूवल चाहिए होता है। दरअसल मॉल में कोई आपको एक दुकानदार की तरह कहता नहीं है, कि हीरो लग रहे हो हीरो। इसी कारन से मॉल में आप खरीद नहीं पाए, और दूकान में तो क्या होता है, कि उस दुकानदार को अपना माल बेचना ही होता है, तो वह अपने माल-सामान के साथ साथ आप की भी बढ़चढ़कर तारीफें करता है। तो बस, यही कारण है, आपने दुकान से तो एक ही बार में खरीदी कर ली। लेकिन मॉल में आपने तीन अलग अलग पैंट ट्राय करने के बावजूद खरीद नहीं पाए थे।"


पत्ता, सिगरेट और दोस्ती की बकैती

    मैंने अपने आप सोचा, बात तो काफी सही है। और हकीकत भी.. क्योंकि मैं खुद से तो निर्णय ले नहीं पाता। मैंने अपनी मोटरसाइकिल भी ट्रेंड से बाहर की ली। अपनी कार भी। जो चीजें रोड पर काम चलती हो, या जो चीज ट्रेंड से बहार हो, वह मुझे आकर्षित करती है। अरे प्रियम्वदा ! दिलायरी को एक वर्ष क्या पूर्ण हुआ, मैं तो लिखने में ही आलस करने लगा। बीते कल की यह दिलायरी आज चार बजे लिख रहा हूँ। क्या करूँ.. कल शाम को सोचा था, गरबी चौक में बैठकर लिख लूंगा। लेकिन नहीं.. वहां पत्ता आ धमका.. झूठा पत्ता..!


    फोन करके बोलता है, दो सिगरेट्स ले आना। मैंने साफ़ मना किया। असल में घर से गरबीचौक मैं पैदल ही जाता हूँ, और दूकान के लिए दो-तीनसौ मीटर और घूमकर जाना पड़ता है। मैं ठहरा आलसी। घर के पीछे वाली दूकान के पास हुकुम शाम को बैठते है। तो वहां जा नहीं सकता। तो मैंने पत्ते को साफ़ मना कर दिया। तो अगला रूठी रानी जैसा, बोलता है, मेरा नंबर डिलीट कर दे। आगे से मुझे कॉल मत करना। दो सिगरेट की किम्मत है बताओ.. यह भी कोई बात हुई। मैं भी आलसी हूँ, तो मैंने भी ठीक है, कहकर फोन काट दिया। 


    कुछ देर बाद पत्ते ने फिर फोन किया। "लाया क्या?".. मेरा जवाब अब भी वही था, "नहीं।"  उसने फोन काट दिया। थोड़ी देर बाद वह गरबीचौक में आया। मैंने उसे जलाने के इरादे से पूछा.. "माचिस है क्या?" उसके हावभाव बदल गए। "नहीं.. यहीं कहीं पड़ी होगी देख।" मैंने कहा, "अबे आग जलानी है, ठण्ड सी लग रही है।" उसका फिर चेहरा बदल गया। थोड़ी देर बैठे, हम लोग अपने अपने फोन में मस्त थे। कुछ देर बाद उसने अपनी जेब से एक मावा और दो सिगरेट निकाली। 


शादी, पछतावा और उड़ते तीर

    उसे खुद ही लानी होती है, फिर भी मजे लेने के इरादे से वह गधा कुछ भी बकैती करता है। कल बोल रहा था, "शादी क्यों की मैंने।" अभी साल पूरा नहीं हुआ उसकी शादी को। मैंने मजे लेने के लिए कहा, "बड़ी जल्दी अक्ल आ गयी तुझे। वहां ग्राउंड में जब बैठा करते थे, तब तुझे कितनी बार मना किया था, कि मत ले भाई.. शादी एक उड़ता तीर है। मैं और गजा तो घायल हो चुके है। तू मस्त रहा कर। लेकिन नहीं.. तुझे ही पोपटलाल की तरह शादी शादी की रट उठी थी। अब ले मजे शादी के।"


गरबी चौक, ठंड और दिसंबर का आसमान

    आजकल वॉलीबॉल के प्लेयर पुरे नहीं हो पा रहे है। तो खेल बंद रहता है। बस गरबि चौक में बैठकर कुछ देर यूँही बकैती करते बैठते है। दिसंबर में आसमान बडा स्वच्छ दिखाई देता है। आसमान में बहुत ज्यादा तो नहीं, लेकिन फिर भी काफी सितारे दिखाई देते है। हालाँकि नजर तो तब भी गुरु पर ही जाकर ठहर जाती है। वह अकेला ही पुरे आसमान में सबसे ज्यादा चमकता सितारा दीखता है। 


    ठीक है, वैसे आज की यह दिलायरी इतनी कुछ खास नहीं लिख पाया हूँ, तो इसे कहीं भी शेयर नहीं करूँगा। इसे यहीं कहीं गुमनाम पड़ी रहने देंगे।

    शुभरात्रि। 

    २५/१२/२०२५

|| अस्तु ||


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