“भागवत चैप्टर 1 - दिनचर्या के बीच शब्दों की तलाश | दिलायरी : 19/12/2025”

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भागवत चैप्टर 1, स्पेशल ऑप्स, जॉली LLB 3 और दिनचर्या के बीच शब्दों की तलाश


“Diary लिखते हुए एक सोच में डूबा कार्टून चरित्र, फिल्मी दृश्यों से घिरा — plain white background.”

दिन की शुरुआत और रात की देरी तक जगाए रखने वाली फिल्में

    प्रियम्वदा !

    आज तो कोई बात है नहीं मेरे पास.. काम ज्यादा था शायद। या फिर ऐसी कोई भावना आयी नहीं, जहाँ मेरे शब्दों को कोई राह मिल जाती। खेर, हमेशा की तरह दिनचर्या से शुरू करता हूँ, कुछ न कुछ अपने आप लिखा जाएगा। तो बात ऐसी है, कल रात को साढ़े बारह बजे तक एक और मूवी देखने में लग गया था। नहीं.. नहीं..  उससे पहले मैं वॉलीबॉल भी खेलने गया था। रात को ग्यारह बजे घर लौटा, और बिस्तर में निंद्रा देवी का आह्वाहन करने के लिए मूवी देखने लगा। सोचा था कि आधे घंटे में नींद आ जानी चाहिए... लेकिन फिल्म मजेदार लगी, तो उल्टा नींद उड़ गयी। 


भागवत चैप्टर 1 – पंचायत के सचिव से राक्षस तक का सफर

    कल के एक ही दिन में स्पेशल ऑप्स की सीजन 2 का अंतिम भाग, जॉली LLB 3 देखकर दिलायरी लिख दी थी। लेकिन यह दिन पूरा नहीं हुआ था। रात को भागवत चैप्टर 1 देखि। अरे बड़ी मजेदार मूवी लगी मुझे। अपने पंचायत वाले सचिव जी यहाँ एक अलग ही बाज़ बने हुए है। राक्षस का रोल निभाया है, पूरा राक्षस। अरशद वारसी ठीक-ठाक है। ज्यादा बढ़िया एक्टिंग जीतेन्द्र यानी की जीतू यानी की पंचायत वाले सचिव जी ने की है। सटीक साइकोपैथ का रोल किया है। क्रूर राक्षस। थोड़ा और.. थोड़ा और.. देखने के चक्कर में साढ़े बारह बज गए थे। और यही कारण था, जब सवेरे सात बजे मुझे जगाया गया, तो मैंने फिर से कम्बल ओढ़कर और पांच मिनिट सोने देने की मांग की। 


दिनचर्या, ऑफिस, पुलिस और एक अनोखा दृश्य

    घर से निकलने से पूर्व दिलबाग में एक चक्कर लगा आया। ऑफिस पहुँचते ही कामों में लग गया। हररोज खाली दिन थोड़े मिलते है। आज पर्याप्त काम था। दोपहर को मार्किट चल पड़ा, कुँवरुभा की सायकल अपने वाछटीये पर लाद कर ले आया। घर पहुँचने से पूर्व समाचार मिला था, कि पड़ोस में पुलिस आयी है। पता नहीं, होगा कुछ कारण, मैं घर पहुंचा था तब तक सोसायटी की गली में सुनकार व्याप्त था। एक स्त्री साडी पहनकर, भरी दोपहर में सुनसान हो चुकी इस गली में, सायकल चलाने की कोशिश कर रही थी। मुझे बड़ी हँसी आयी, लेकिन उन्हें देखकर हँस नहीं सकता था। 


सनी देओल की ‘जाट’ पर मन की समीक्षा

    वापिस ऑफिस लौट आया। थोड़ा खाली समय मिला सोचकर सनी देओल की फिल्म "जाट" देखने लगा। ठीक ठाक लगी.. एक तो अब यह सारे अभिनेता वयोवृद्ध हो चुके है, लेकिन फ़िल्में इन्हे आज भी एक्शन वाली करनी होती है। सनी देओल जब भी एक्टिंग करते है, तो साफ़ अनुभव होता है, कि यह एक्टिंग ही कर रहे है। कहीं भी एक कनेक्शन अनुभव नहीं होता है फिल्म के साथ। रणतुंगा नामधारी खलनायक के रूप में रणदीप हुड्डा फिर भी ठीक है। काफी  जगह सनी देओल अपनी पुरानी ब्लॉकबस्टर का चार्म इसमें घसीटते लगते है। जैसे कि ढाई किलो का हाथ, या फिर एक सिन में वह गद्दर फिल्म जैसे ट्रक में से स्लो मोशन में उतरना।


शब्द, भाव और अर्थ की सीमाएं – भीतर का द्वंद्व

    कईं बार प्रियम्वदा ! हम कुछ चीजे छोड़ नहीं पाते। जरुरी होता है, आगे बढ़ जाना। नया कुछ करना। लेकिन नहीं.. छोड़ न पाने के कारण हम बहुत ज्यादा सिमित हो जाते है। अपने आप पर बंदिशे बाँध लेते है, या वे बंदिशें हमे बाँध लेती है, यह पता ही नहीं चल पाता है। मुझमे जब कविताओं का शुरुआती उफान आया था, तब मैंने बहुत सारी कविताएं लिख दी। मैंने उन्हें कभी अपने नाम से शेयर नहीं किया। क्योंकि मैं नहीं चाहता था, कोई उन कविताओं को बखाने या निंदा करे। धीरे धीरे नौकरी की व्यस्तता और सांसारिक जीवन में व्यस्त होने लगा। मुझे एक मित्र ने कहा था, लिखते रहने की जो कला है इसे मत रोकना। बाद में शब्द चले जाएंगे। 


    मैं इस वहम में रह गया था, कि एक बार तैरना सीख जाता है, फिर वह कभी तैरना थोड़े ही भूल जाता है? या फिर एक बार ड्राइविंग आ जाए, तो वह कभी दोबारा कहाँ सीखनी पड़ती है? लेकिन मैं गलत था। शब्द या शब्द साधना थोड़ी अलग है, यहाँ सच में शब्द चले जाते है। शब्दों का चले जाने से मतलब है, शब्दों की विस्मृति। कविताएं रचते समय कई बार हम शब्दों के पर्यायवाची शब्दों का उपयोग करते है, ताकि तुकबंदी सटीक बैठ जाए। पर जब कविताओं से विराम ले लेते है, और अन्य विषय में प्रवृत होते है, तो धीरे धीरे कर पर्यायवाची शब्द भूलने लगते है। शब्दों को भूल जाने के कारण तुकबंदी, या आरंभिक चरण ही नहीं सूझता..!


    खेर, मैं अब तो कोशिश करूँ तब भी, स्नेह, ममत्व, करुणा, या प्रेम जैसे भावों में अर्थ ढूंढने लग जाता हूँ। जब कि यह भावनाएं तो एक प्रवाह है। इस प्रवाह में बहना होता है। मैं इनके आड़े बांध खड़ा कर बैठता हूँ। अर्थ का बांध। अर्थ के बंधन में बंधा हुआ कुछ भी हो, वह एक सिमित हो चूका है। जिस भी चीज का अर्थ होता है, उनकी एक सीमा होती है। जैसे कि माता, तो वह एक स्त्री है, जो संतान के लिए छाँव है। यहाँ माता की सीमाएं है। लेकिन ममत्व.. इसकी सीमा नहीं है। पर जब इसे कर्म के रूप में, कर्ता के अर्थ में बाँध दिया जाता है, तो वह सिमित है। माता का ममत्व, संबंध बंध चुके इस भाव की एक सीमा तय हो जाती है। 


निर्णय, भूल और पश्चाताप का अंतहीन स्पर्श

    मैं हमेशा प्रत्येक भावों को अर्थ में बांध देता हूँ, और फिर मुझे कटुता दीखती है। मोह और प्रेम, पीड़ा और क्रोध, माया और करुणा.. एकाकार होते दीखते है। जैसे कोई छलावा हो। क्रूर छलावा। मेरी भी अपनी सीमाएं है। अपनी लघुता ग्रंथि है। वही मेरी छलनी है, जो कभी भी छलावे को नहीं छान सकती। जब किसी भाव का आरंभ ही छलावे के रूप में होता है, तो वह ज्यादा मजबूती से स्थिर नहीं हो पाता। जब नींव ही मजबूत न हो, फिर ईमारत कैसी? बस, अगर भाव ही छलावे में कोई और हो, तो कविता का उद्घोष ही कैसे होगा?


दिन का समापन, आत्मस्वीकृति और शुभरात्रि

    आज कुछ ज्ञानी टाइप बातें कर दी मैंने है न प्रियम्वदा ? लेकिन क्या करूँ.. मेरा वह सारथी स्वयं अपने युद्धों में उतर चूका है। कुछ दिनों तक उसने मेरे रथ को दिशा और गति दी थी। लेकिन मैंने निर्भरता के छलावे को सच्चा मान लिया, और उस गति को आत्मसात न किया। 


    होता है,  कुछ भूलो से सिख लेकर भी उन्हें सुधारा नहीं जा सकता। क्योंकि कुछ प्रसंग जीवन में एक ही बार होते है। उन्ही में अगर गलती रह गयी, फिर वे दोबारा मौका नहीं देते। वह एक भूल जीवनभर की शूल बन जाती है। सतत पश्चाताप के बंधनों में बंधा रहकर, उन्नति के तमाम द्वारों से मुँह मोड़ लेना ही, एक मात्र कार्य बच जाता है। वह अपने भाग्य को कोसने के अलावा करेगा क्या? भाग्य ने मौका दिया था, लेकिन उस समय क्रोध में कोई निर्णय ले लिया होगा.. घमंड, अभिमान.. अच्छे है, लेकिन जब वे पलटवार करते है, तो घमंडी को स्वयं को भी घायल करते है, अभिमान का मद भी मर्दन करते है। आजीवन चोट का निशाँ दे जाते है। 


    शुभरात्रि। 

    १९/१२/२०२५

|| अस्तु ||


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