प्रियम्वदा को न कहे गए शब्द | एकपक्षीय प्रेम, बंधन और आत्मसंघर्ष || दिलायरी : 23/12/2025

0

प्रियम्वदा से न कह पाने की पीड़ा

    प्रियम्वदा,

    बड़ा ही अफ़सोस होता है, मैं कितना कुछ कह नहीं सकता तुमसे। यह समझदारी किस काम की, जो खुद के दिल को ही दफा करें। मैं तुम्हारा साथ चाहता हूँ, लेकिन तुम्हे कह नहीं सकता। मैं तुम्हे पसंद करूँ, तब भी क्या ही फर्क पड़ जाएगा? न मेरा वर्तमान बदल सकता, न ही भविष्य। अंतर में आंदोलन उठते है, विद्रोह पनपते है। तुम्हारा हाथ क्यों नहीं दिया इस भाग्यरेखा ने मेरे हाथ में? अपने हाथ की इन रेखाओं को, अब मैं कुरेद भी दूँ, तो क्या तुम मेरी कल्पनाओं से वास्तविकता में आ पाओगी?


एकपक्षीय प्रेम और न कहे गए शब्दों का प्रतीकात्मक कार्टून चित्र, जिसमें पर्दे के उस पार स्त्री की छवि और बंधनों में खड़ा पुरुष दिखाई देता है

समझदारी बनाम हृदय की चंचलता

    तय नहीं कर पा रहा हूँ, इस बार तो दिसंबर भी विरही हृदय को पीड़ा नहीं पहुंचा रहा.. या फिर सर्दी का दामन उसने भी छोड़ दिया है? सूखी हवाएं बहती नहीं.. या फिर महसूस नहीं होती। प्रियम्वदा ! इस मन की चंचलता का कोई तोड़ है कहीं? यह मरता भी है, तो कहीं और प्रवृत्त होकर पुनः जीवित हो उठता है।  मैं कईं बार किसी को देखकर अपने विह्वल हो उठते मन का पुनः सीमांकन करने पर मजबूर हो जाता हूँ। जानता हूँ, मैं अनंत होते हुए भी असीम नहीं हो सकता। मन को बार बार मारकर खुद को बांधे रखना ही मेरा प्रथम कर्तव्य बन चूका है। 


एकपक्षीय प्रेम और भीतर का विद्रोह

    कैसी विडंबना है, पसंदगी को हकीकत में नहीं उतार सकता। न ही पसंदगी को व्यक्त कर सकता हूँ। व्यक्त करने भर से शायद कांच की परत टूट कर बिखर जाएगी, और तूफ़ान को प्रवेशने का मार्ग निर्माण हो जाएगा। काश मैं तुमसे कह पाता, लेकिन मैं कहने के बजाए तुलना करता हूँ.. मैं पीड़ा में प्रेम की तलाश करता हूँ, अपनी अक्षमता पर काम करने के बजाए फरियाद करता हूँ। मैं तुम्हे चाहने लगा हूँ, यह कभी नहीं कह सकता। क्योंकि यह वाक्य कह देने से कुछ भी कहाँ बदलने वाला है? मुझे पक्ष-विपक्ष के भीतरी द्वंद्व से निजाद पाना आता ही नहीं है। 


शब्दों पर बंधन और भावनाओं का पहरा

    तुमसे न कह पाने का मुख्य कारन तो यही है, मेरे पक्ष से ज्यादा मेरे भीतर के तुम्हारे वकील की दलीलों को मैं परास्त नहीं कर पाता हूँ। तुम्हारी तस्वीर देखकर कईं बार सोचता हूँ, मैं कितना अभागा हूँ.. बस ख्वाब बुन सकता हूँ, कल्पनाएं रच सकता हूँ, और अपनी लेखनी से यह शब्दों में ढाल सकता हूँ। लेकिन रूबरू होकर तुमसे अपनी वास्तविकता बयां नहीं कर सकता। अपने आप से मैं कितना ही भागने की कोशिश करूँ.. मैं जो हूँ, और मैं जो हो सकता था, इसी बिच कहीं तुम्हारा ख्वाब बादल बनकर मुझे भटकाता रहता है। 


    मैं अगर आज तुमसे कुछ भी कह दूँ, तब भी तुम्हारी मंजूरी अलग पाता हूँ अपने आप में। मैंने जितनी मनाही झेली है, उस पर एक और मनाही का बोझ मेरा मेरुदंड तोड़ देगा। मैं अपना सर भी नहीं उठा पाउँगा.. यह डर सदैव मुझ पर हावी रहता है। मैंने अपने मन से तुम्हारे लिए बाँधी अवधारणाओं से, स्वयं ही यह निर्धारण पर पहुँचता हूँ, कि मैं इस एकपक्षी भावनाओं को लेकर संतोषी रहूं.. अपने बहाव में तुम्हे यूँही शब्दों की लहरों से छूता रहूं।


स्वप्न, कल्पनाएं और वास्तविकता की दूरी

    प्रियम्वदा ! आज इस फरियाद में तुम ही हो, लेकिन शब्दों का पर्दा तुम तक इन फरियादों को पहुँचने नहीं देगा। मेरी स्वप्न सृष्टि में तुम्हे देखा है मैंने। लेकिन वहां भी मैंने एक पर्दा देखा था, उस परदे के उस पार तुम थी। तुम्हारी झलक ने मेरी नींद उड़ा दी थी। गलत बात है, सवेरे के स्वप्न कभी सच नहीं होते.. या मेरा तो हुआ नहीं। सैंकड़ों बंधनों को अनदेखा कर अगर मैं तुम्हे पाना चाहूँ तब भी यह असंभव ही लगता है। मेरे शब्दों पर पर्दा है, और पहरा भी.. मेरे सेंकडो बंधनों का पहरा। मेरे शब्द भी स्वतंत्रता से विमुख है। वे तुम तक पहुँचते है, लेकिन भावविहीन होकर। 


    प्रकृति की तमाम रौशनी भी, मेरा अँधेरा नहीं मिटा सकती। मेरे भाग्य ने मुझे अंधकार सौंपा है, मुझे उसे संभालना ही होगा। अपने शब्दों से भी मैं उस अंधकार का पहरा नहीं हटा सकता। यह समझदारी भी.. बड़ी बेकार है। जिसे हृदय चाहता है, उसे तो समझदारी वहां रखती है, जहाँ तक मेरी पहुँच नहीं। और जिसे मेरी परवाह नहीं, वहां यह समझदारी ह्रदय को मार डालने को मजबूर करती है। तुम मेरे लिए वह क्षण हो, जहाँ मैं अपनी तमाम पीड़ाओं को भूल जाता हूँ। तुम्हारी आँखों की चंचलता से मेरे मन की चंचलता जैसे स्पर्धा में उतर आती है। 


    अपना कबूलनामा भी नहीं लिख सकता हूँ मैं। बंधनों का पहरेदार मुझे निंदात्मक आँखों से देखता है। प्रियम्वदा ! किसी समय हुए कुछ अल्प संवादों ने, मेरे भीतर के आकर्षण को कोई अदृश्य बल दिया। मैं खींचा चला गया, तुम्हारे पीछे..! या आज भी, कोई आकर्षण की आशा मेरे भीतर चेतनवंत है, वह बल शायद सशक्त है। होना भी चाहिए, कोई भावना यदि पनपती ही नहीं, तो वह विष से भी बदतर हो जाती है। कुछ संवाद मेरे भीतर भावनाएं जगा गए, और मेरी दिशाहीन हो चुकी, और आत्महीनता के बोझ तले मरती जा रही भावनाएं एक कोंपल के रूप में फुट पड़ी। 


मरूभूमि में खिला गुलाब : आशा का रूपक

    मैं जानता हूँ, उस कोंपल को बड़ी होने देने से मुझे ही गिचता महसूस होगी, मेरे भीतर का रिक्तस्थान वह कोंपल से खिलने वाला पौधा भर देगा। लेकिन उस पौधे को मैं यूँही अपने बंधनो की बेड़ियों के बहाने से मरने नहीं दे सकता। यही मेरी वास्तविकता है। मरूभूमि में यदि एक गुलाब खिलता है, तो वह मुझे आशावान ही रखेगा। भले ही वह गुलाब के चारोओर काँटों की बाड़ हो, मैं उस गुलाब के नजदीक जा नहीं सकता, लेकिन उसे देखकर भी मैं अपनापन महसूस कर सकता हूँ। जब चारोओर से घिरे हुए बादलों के बिच बिजली की चमक भी होती हो, तो वह भी नयापन अनुभव करवाती है। 


जिम्मेदारियाँ, भय और मौन स्वीकार

    मैं उस नएपन को, अपने उस आकर्षण को, तुम्हारे प्रति मेरे मन के खिंचाव को, यूँही बरक़रार रखना चाहता हूँ। मैं तुम्हे स्पष्टता से कुछ भी नहीं कह पाउँगा.. मेरा बन्धनकर्ता मुझे कभी स्वतंत्र नहीं होने देगा, न ही मैं अपनी जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ सकता हूँ। लेकिन मैं अपने अँधेरे के भीतर विद्युत की उस चमक के सहारे ही, अपने आकर्षण के आधार पर ही, कुछ सहारा पाकर आगे की गति को निभा सकता हूँ। यह लेखनी तब तक अपने शब्दों पर अस्पष्ट आवरण चढ़ती ही रहेगी, जबतक मुझे तुमसे विमुख होने की बाध्यता न आन पड़े। 


दिलायरी – शब्दों में जिया गया आकर्षण

    आज का दिवस तुम्हारे प्रति मेरी भावनाओं को यह शब्दों पर एक मर्यादित आवरण चढाने में ही व्यतीत हुआ है। सवेरे जब अपने दिलबाग में मर चुकी मधुमालती को देख, कटुता छायी थी, ठीक उसी समय मुझे तुम्हारा इस बात पर ही स्मरण हो आया था, कि कहीं मेरे बंधनों के चलते तुम्हारे प्रति मेरा आकर्षण भी कहीं खो न जाए.. लेकिन कैसे खो पाएगा वह.. कहीं न कहीं मुझे तुम्हारा स्मरण अपने आप हो आता है। ऑफिस की जिम्मेदारियों के बिच कुछ समय चुराकर अपनी दिलायरी, और ब्लॉग पर हुए नवीन अपडेट्स को देखकर कुछ आशाएं जरूर से लौट आयी। 


    दोपहर को आज जब मार्किट में दो मॉल घूमने के बावजूद मुझे मेरी मनचाही चीज न मिल पायी, तब एक बार पुनः तुम्हारा स्मरण हुआ, तुम भी तो मेरे हाथ से दूर ही हो। तुम्हारे गालों पर मुस्कान की लकीरें उठ आनी चाहिए, क्योंकि तुम्हे यह केवल शब्द दिखेंगे, अनुभव करने के लिए भावना चाहिए.. वह तुम तक पहुँचाने जितनी मेरे शब्दों की योग्यता कहाँ? या फिर स्वयं मेरी योग्यता पर कोई अनदेखा प्रश्नार्थ चिन्ह समरशंख फूंक रहा है?


    शुभरात्रि। 

    २३/१२/२०२५ 

|| अस्तु ||


प्रिय पाठक !

यदि यह लेख आपके भीतर किसी अनकहे भाव को छू गया हो, तो इसे साझा करें—शायद किसी और का मौन भी शब्द पा जाए। टिप्पणी में लिखिए, क्या कभी आप भी कुछ कह नहीं पाए?

Dilayari पढ़ते रहिए, नए पत्र सीधे आपके Inbox में आएंगे:
मेरे लिखे भावनात्मक ई-बुक्स पढ़ना चाहें तो यहाँ देखिए:
और Instagram पर जुड़िए उन पलों से जो पोस्ट में नहीं आते:

आपसे साझा करने को बहुत कुछ है…!!!

📌 और भी पढ़ें | दिलायरी


#दिलायरी  #एकपक्षीय_प्रेम   #अनकहे_शब्द   #प्रियम्वदा   #भावनात्मक_लेखन   #हिंदी_ब्लॉग  #प्रेम_और_बंधन  #मन_की_चंचलता  #हृदय_संघर्ष  #PoeticHindi  


Post a Comment

0Comments
Post a Comment (0)