“सत्ता, नियंत्रण और निर्णय | स्पेशल ऑप्स 2 व जॉली एलएलबी 3 समीक्षा के साथ जीवन पर चिंतन || दिलायरी : 18/12/2025”

0

सत्ता, नियंत्रण और जीवन की अग्नि | दिलायरी : 18/12/2025


“एक ही कार्टून कैरेक्टर सामने दो टीवी स्क्रीन पर स्पेशल ऑप्स 2 और जॉली एलएलबी 3 देखता हुआ, सफेद पृष्ठभूमि के साथ।”

सत्ता का आकर्षण और भीतर की जलन

    प्रियम्वदा !

    सत्ता बड़ी शानदार चीज है। सत्ताधीश होना अपने आप में कितना आकर्षक लगता है? है न? लेकिन सच बात तो यह है, कि सत्ता एक अग्नि में लिप्त धगधगता लोहस्तंभ है। अगर इस स्तंभ को गले लगा सकते है, तो सत्ता प्राप्त कर सकते है। इस स्तंभ को गले लगाए रख सकते है, तो सत्ता के अधिकार का उपयोग कर सकते है। जैसे ही वह लौहस्तंभ छूटा, इधर सत्ता छूट जाती है। सत्ता का बाह्य रूप बड़ा ही सुन्दर दीखता है। लेकिन भीतर तो वह भी सड़े हुए देह सी ही है। सत्ता के अधिकार को सब चाहते है, लेकिन सत्ता का उपयोग करने की बारी आती है, तो निर्णय शक्ति सबसे पहले डगमगाने लगती है।


महाभारत, लौहस्तंभ और द्युत — सत्ता की परीक्षा

    बॉस अपने नौकर पर सत्ता चाहता है। राजनेता प्रजा पर। बॉलपेन कागज़ पर, और ढक्कन बॉलपेन पर। कुछ उसी तरह पुरुष स्त्री पर सत्ता चाहता है, और स्त्री पुरुष के मन पर। सत्ता का यह खेल कहीं भी समाप्त नहीं होता.. सिवा उस लौहस्तंभ की आंच में जलने के। सत्ता के अधिकारों का उपयोग करते समय मर्यादा के बंधन अगर कमजोर हुए, तो सत्ता अनियंत्रित होकर एक दावानल बन जाती है। एक लौहस्तंभ के कारण भभक उठी अग्नि, फिर सर्वनाश तक रूकती कहाँ है? महाभारत का उदाहरण सबसे उपयुक्त रहेगा, उस इतिहास में सत्ता को प्राप्त करने का लौहस्तंभ था हस्तिनापुर का राजसिंहासन।


    आज भी वही चलन है, कठिनतम परीक्षा देकर सत्ता प्राप्ति हो सकती है। या फिर द्युत खेलकर, जैसे महाभारत में खेला गया था। आज हम जीवन में कितने ही प्रश्नों पर द्युत खेल जाते है। यही सोचकर, कि जो होगा वह देखा जाएगा। द्युत से प्राप्त हुई सत्ता महाभारत में भी ज्यादा चली नहीं थी, आज भी नहीं चलती। लेकिन आज सत्ता के नियम भी बदल गए है। एक बार सत्ता के हाथ आने पर स्वकल्याण के सिवा और कोई पथ दीखता कहाँ है? सत्ता के साथ जिम्मेदारियां आती है, लेकिन शायद एक घोड़े को सीधी चाल में रखने के लिए पट्टा पहनाते है, वैसा ही सत्ताधीश खुद से पहन लेता है। वह निर्णय लेता है, अपने स्वार्थों की आपूर्ति के निर्णय।


दिलबाग की सुबह और मन की उलझनें

    आज सवेरे दिलबाग से गुजरता हुआ, जगन्नाथ की लहलहाती ध्वजा को देखता हुआ, धूम्र की लहरों को हवाओ में घुलते देखता हुआ, रोड पर हुए ट्रैफिक को चीरते हुए ऑफिस पहुंचा। काम मेरा ही इंतजार कर रहा था। कल ही उसे इंतजार करता छोड़, मैं घर चला गया था। दिलायरी तो शिड्यूल थी, इस कारण बस शेयर करना था। आजकल फिर से एक बार मेरी दिलायरियाँ सिर्फ एक ही पते तक जाती है। कुछ दिनों पहले हुए मानसिक तनावों के चलते, दिमाग में एक ही पता दर्ज हो गया है। 


स्पेशल ऑप्स 2 — अभिनय दमदार, एक्शन कमज़ोर

    आज के दिन में, मैं काफी निकम्मा रहा हूँ। कुछ भी काम नहीं था मेरे पास। तो स्पेशल ऑप्स का सीजन 2 देख लिया। और उसके पुरे होने के तुरंत बाद जॉली LLB 3 भी देख ली। दोनों ही बढ़िया है। कमी के बारे में बात करूँ अगर, तो स्पेशल ऑप्स में फाइटिंग सीन्स बड़े ही बेकार लगते है। के के मेनोन की एक्टिंग का तो मैं आज भी लोहा मानता हूँ। के के मेनोन को मैंने पहचाना है, गुलाल मूवी से। बहुत सालों पहले एक फिल्म आयी थी गुलाल। अच्छी फिल्म थी। मुझे एक वाकिया याद आता है, जब भी गुलाल मूवी का जिक्र होता है। 


के के मेनोन का प्रभाव

    एक बार रात को मैं घर पहुंचा तब हुकुम टीवी के सामने बैठे चैनल्स बदल रहे थे। सब सो गए थे, और एक लोकल डिश चैनल पर मूवी आ रही थी गुलाल। मैंने यह देख रखी तो मुझे मालुम था, इस में थोड़ी गालीगलौज भी है। हुकुम ने नहीं देखि थी। मैं मर्यादा बनाए रखने के चलते बहाने मारने लगा था, कि बेकार फिल्म है, चैनल बदलो, लेकिन हुकुम को मजेदार लग रही थी। तो वे बदल नहीं रहे थे। मैं उठकर जाने लगा, तो उन्होंने मुझे कुछ बातों में वापिस बिठा दिया। मैं वापिस सोफे पर बैठा ही था, कि के के मेनोन चिल्लाकर एक डायलॉग में बड़ी गाली बोल देता है। हुकुम फट से रिमोट से चैनल बदलते हुए, मेरी और देखकर बोले, "यह क्या था?" मैंने निचे देखते हुए कहा था, तभी तो मैं जा रहा था। काफी शर्मजनक माहौल हो गया था। 


    खेर, के के मेनोन स्पेशल ऑप्स में भी काफी दमदार अभिनेता रहा है। बाकी सारे सह-अभिनेता इतने मशरूफ नहीं दीखते है अभिनय के मामले में। खासकर फाइटिंग सीन्स देखकर तो माथा पिट लेने का मन करता है। कहानी भी इस बार उतनी मजेदार नहीं थी, सिवा रियल इंसीडेंट्स के। दोपहर से पूर्व ही वह सीरीज़ पूरी हो चुकी थी। दोपहर बाद जॉली LLB 3 देख ली।


जॉली एलएलबी 3 — कहानी, मुद्दा और अदालत का संघर्ष

    यूँ तो जॉली LLB 3 अच्छी है। मुद्दा सही था। बड़ी बड़ी कंपनियां विकास के नाम पर किसानों की जमीने कब्ज़ा लेती है। बड़ी सही दलीलें दी गयी है, न्याय याचना में। मूवी काफी ज्यादा रिलेटेबल लगती है। लेकिन इस फिल्म में भी अगर कमीं की बात करूँ, तो यह फिल्म का मजा दुगना होने के बजाए, आधा हो जाता है। न तो पूरी अक्षय कुमार वाली फिल्म का मजा आता है, और न ही अरशद वारसी वाली मूवी जैसी मजेदार लगती है। लेकिन कोर्ट रूम ड्रामा के साथ तो यह फिल्म पूरा न्याय करती है। खासकर इस फिल्म में दोनों ही जॉली जोरदार दलीलें देते है। 


प्रकृति, नियंत्रण और सत्ता का भ्रम

    शाम ढल रही है अभी। कुछ ही देर में अँधेरा पूरा शहर अपने भीतर समा लेगा। ठण्ड का जोर दो दिनों से घटा है। हालाँकि अभी भी कड़ाके वाली सर्दियाँ आयी कहाँ है? पर्यावरणविद तो बता रहे है, कि कड़ाके की ठण्ड इस बार जनवरी में होगी। दिसंबर इस तरह सुना जाएगा? उसकी तो फितरत है, अंग्रेजी कैलेंडर के अंत में, दांतों को कपकपाना। कुदरत करवट ले रही है। कुदरत के पास भी तो सत्ता है। नियंत्रण की सत्ता। अनंत शक्तियों की सत्ता। हम लाख चाहे, लेकिन उन शक्तियों से जीतना नामुमकिन ही रहेगा। प्रकृति को हमने अपने अनुसार चलने को मजबूर किया है। पोलीहॉउस फार्मिंग, यही तो है, प्रकृति को अपने वश में करने की चेष्टा। 


    प्रियम्वदा ! हमें तब ज्यादा बुरा लगता है, जब कोई हमारी बात का अनुसरण न करे। हमने जो चाहा था, उससे विपरीत करे। या फिर हमारे नियंत्रण में न रहे। हमारे हाथों में भी कईं तरह की छोटी छोटी सत्ताएं होती है। हम उसका उपयोग सही तरीके से करते भी है। जैसे कोई एक परिवार में घर का पुरुष सत्ताधीश होता है। लेकिन उस सत्ताधीश को तब ज्यादा बुरा लगता है, जब उसका परिवार उसकी बात न माने। जैसे कि कोई पिता का बिगड़ैल बेटा। पिता के पास सत्ता है, अपनी संतान को नियंत्रित करने की। उस संतान की दिशा तय करने की। वह अपनी सत्ता का सही इस्तेमाल करता भी है। लेकिन कभी कभी ऐसा भी होता है, कि सत्ताधीश के हुक्मों का अनादर होता है। 


    एक और उदहारण है। कोई पति-पत्नी है। दोनों का एक दूसरे पर अधिकार है। दोनों के ही पास एक दूसरे को नियंत्रित करने की सत्ता है। लेकिन इस सत्ता तब विकराल रूप लेती है, जब दोनों सत्ताओं की भिड़ंत होती है। किसी बात पर सत्ता का मद टकराता है। और बिखरने लगता है विश्वास। या फिर सत्ता के उस टकराव में सदा ही चिंगारियां गिरती रहती है। 


    प्रियम्वदा ! कईं बार ऐसा भी होता है। कि कभी किसी क्रोध या अहम् के वश होकर कोई निर्णय लिया हो, और फिर वह गले की फांस बना बैठ जाए। बाद में बड़ा पछतावा होता है, कि उस दिन यदि किसी और के निर्णय को प्राधान्य दिया होता, तो आज की परिस्थिति जरूर से अलग होती, अच्छी होती, या फिर इससे भी बदतर होती। हालाँकि परिस्थिति की कल्पना तो हर कोई अच्छी और भली ही चाहेगा। क्रोध में लिए गए निर्णय कभी भी सही नहीं होते.. सारे समीकरण उलटे लगते है, और खुद की हानि करने का कारन बनते है। 


    शुभरात्रि। 

    १८/१२/२०२५

|| अस्तु ||


प्रिय पाठक !

पूरी दिलायरी पढ़ें और सोचें — सत्ता जीवन को कितना बदल देती है।

Dilayari पढ़ते रहिए, नए पत्र सीधे आपके Inbox में आएंगे:
मेरे लिखे भावनात्मक ई-बुक्स पढ़ना चाहें तो यहाँ देखिए:
और Instagram पर जुड़िए उन पलों से जो पोस्ट में नहीं आते:

आपसे साझा करने को बहुत कुछ है…!!!

🔗 और भी पढ़ें:

खाली समय, यादों का शोर और मन का बहकावा | दिलायरी : 17/12/2025

सितारे, काम का बोझ और अधूरी कविता | दिलायरी : 16/12/2025

कुर्सियों का समाज, जोखिम का रामसेतु और असमय न्याय | दिलायरी : 15/12/2025

जेठालाल जैसी सुबह से सिडनी हमले तक | धुरंधर मूवी रिव्यू, एक दिन और कई सवाल | दिलायरी : 14/12/2025

तीन ख्वाहिशें, एक जिन और अधूरी चाहतें | दिलायरी : 13/12/2025


#Dilayari #Satta #Niyantran #Zindagi #Mahabharat #SpecialOps2 #JollyLLB3 #DailyDiary #LifeThoughts #HindiBlog

Post a Comment

0Comments
Post a Comment (0)