नीरस होते शौक, बोतल से दूरी और मन का बदलता बहाव || दिलायरी : 26/12/2025

0

सुबह की दिनचर्या और काम से भरा एक साधारण दिन

    प्रियम्वदा !

    आज तो कुछ लिखना चाहिए..  हररोज इस दैनिक डायरी की जिम्मेदारी ख़त्म होने के नाम पर थोड़े टाल सकता हूँ? चलो फिर कुछ मुद्दा दिलायरी लिखते लिखते मिल ही जाएगा। तो आज तो सवेरे सवा सात बजे उठ ही गया था। अरे हररोज थोड़े ही लेट उठा जा सकता है? बॉडी क्लॉक का भी तो बैलेंस्ड रहना जरुरी है भाई..! तो सवेरे अपना मस्त तैयार-वैयार होकर पहले जगन्नाथ, फिर दूकान, और फिर ऑफिस चल पड़ा। 


नीरस होते शौक और बदले हुए मन को दर्शाती एक कार्टून छवि, जिसमें व्यक्ति डायरी और बोतल के बीच मौन में बैठा है

रील्स, गरबा और गुजराती आत्मा का शाश्वत उत्सव

    यूँ तो आज दिनभर काफी ज्यादा काम था भी, और नहीं भी। सवेरे से दोपहर तक तो मैंने क्या किया है, मैं नहीं जानता। हाँ लंच टाइम में बीते कल की दिलायरी जरूर लिखी। दोपहर बाद बस रील्स और इंस्टाग्राम देखते बैठा था। रील्स में आजकल काफी नयापन आया हे मेरे। एक रील थी, क्रिस्टमस की सेलेब्रेशन में गरबा कर रहे थे। यह तो शाश्वत चीज है वैसे। गुजराती आदमी कोई भी धर्म का हो, गुजरात में है, मतलब गरबा तो करेगा ही। मुस्लिम भी खेलते है। गरबा हालाँकि सबका मन मोह लेता है, क्योंकि यहाँ बस झूमना होता है। 


लिखने का समय और साहित्यिक मन का सूना हो जाना

    अरे हाँ ! इंस्टाग्राम पर एक पेज है, वे लोग कुछ तो इवेंट कर रहे है। सवेरे-सवेरे उस बारे में कुछ महितियाँ जुटाई। ऑनलाइन मुशायरा टाइप कुछ तो है। ज्यादा डिटेलिंग में मैं भी नहीं जा पाया था, क्योंकि ठीक उसी समय कोई तो काम आ खड़ा हुआ था। तो सोचा कुछ तो भावभरा आज लिखूंगा ही मैं। लेकिन अभी जब लिखने बैठा हूँ, तो बस व्यापारी दिमाग कुछ भी साहित्यिक मोड एक्टिवट नहीं कर पा रहा है। यह मैंने कईं बार नोटिस किया है। मैं जब भी व्यस्त होता हूँ, तो दिमाग कुछ अच्छा आईडिया देता है लिखने लायक। लेकिन जब लिखने के लिए बैठता हूँ, खाली समय खोजकर, बिलकुल फ्रेश होकर.. तो पता नहीं क्या हो जाता है। 


प्रियम्वदा से एकतरफ़ा संवाद और प्रत्युत्तर का अभाव

    याद आया, तुमसे एक शिकायत है मुझे। मैंने 365 डायरी लिखी, प्रतिदिन एक भाव लिखा, हर डायरी में कुछ अलग बात लिखनी चाही, लेकिन मुझे कभी भी प्रत्युत्तर न मिला। असल बात तो यही है, कि यह बातें तुम तक पहुँच नहीं सकती, क्योंकि तुम्हे पता कहाँ है, इस दिलायरी की वजह के बारे में। लेकिन कभी किसी दिन मेरी बातें अगर तुम्हारे हृदय तक पहुंचेगी, तब समझ आएगा.. बातों का अर्थ क्या था। 


शौक, इच्छाएँ और भीतर फैलती नीरसता

    प्रियम्वदा, मैं नीरस होता जा रहा हूँ। मेरी पसंद, मेरे शौक आज पता नहीं कहाँ चले गए है। अभी.. ठीक इसी समय, मुझे याद करना पड़ रहा है, मेरा कुछ शौक था भी? या मेरी कोई एक पसंद थी भी? अरे सच में कुछ याद क्यों नहीं आ रहा.. ऐसा भी कुछ याद नहीं आ रहा है, जिसके प्रति मैं कभी कटिबद्ध हुआ हूँ। दृढ निर्णय मैंने कभी लिया ही नहीं है। बस एक बहाव मुझे जहाँ, जिस दिशा में खींचता गया, मैं वहां वहां जाता रहा हूँ। असल में इस बात का कारण है, कि 2-4 दिन पहले पुष्पा ने मुझसे पूछा था, कि 31st का क्या प्लान है?


“नो मीन्स नो” — जब मन खुद को रोक ले

    प्लान का सीधा सिंपल एक ही अर्थ है, पीना। सुरापान, मद्यपान, दारु.. ड्रिंकिंग अल्कोहल..! मैंने साफ़ मना किया। नो मीन्स नो..! अचानक से पिंक मूवी आ गयी.. नो मीन्स नो। अब मेरी बहुत सी इच्छाएं जैसे मर ही गयी है। कभी शौक या स्वप्न जैसा स्थान दिया था जिन कार्यों को, अब उन सब में कोई उत्साह नहीं होता मुझे। पिछले रविवार को ही पत्ते ने भी खूब मनाया, पर मैं पिंक के डायलॉग पर अड़ा रहा। अरे.. यहाँ द्विअर्थी हो जाएगा.. स्पष्टीकरण.. पत्ता बियर पीने के लिए बुला रहा था। 


शराब, बोतल और कभी रही एक गहरी मुहब्बत

    पहले मन में तरंगे उठती थी, कब बोतल हाथ में आएगी.. एक पूरा भाव होता था। हर पुरुष में होता है। पहले बोतल को हाथ में उठाकर उसे प्यार भरी नजरों से देखना.. फिर धीरे से उसका ढक्कन खोलना। कतरा कतरा गिलास में खाली होती बोतल, हवा के पास होने से बनते बुलबुले..! और फिर गिलास में मिलाया गया ठंडा पानी। जैसे गिलास भी शरमा गया हो, और उसके पसीने छूट गए हो, यूँ गिलास की बाहरी सतह पर ठन्डे पानी की जैसे औंस जम गयी हो। 


    अनामिका को गिलास में डूबोकर तीन बार जमीन पर गिराए गयी बूंदे, बैठकी की शान रही है सदैव से। धीरे धीरे वह गिलास अपनी मंजिल - होंठों तक पहुँचता है। और पहला घूँट गले से उतरता है, तो छाती तक महसूस होता है। अल्कोहल की गर्मी से एक बार के लिए तो छाती में, अस्तित्वहीन बेवफा प्रेमिका के विरह जैसी जलन हो उठती है। एक गिलास घूंट-घूंट भर, ख़त्म होते ही। फिर से एक बार महबूबा सी बोतल हाथ में उठायी जाती है। 


नशा, नियंत्रण और मुखौटों की सच्चाई

    कहते है, कभी भी सिर्फ एक ही पेग नहीं पीना चाहिए। एक अकेला होता है, इसे इस मामले में तो कम से कम अच्छा नहीं माना गया है। दूसरा पेग भरते हुए, धीरे धीरे शरीर में एक हल्कापन, और ऊर्जा का अनुभव होने लगता है। जैसे थकान मिट गयी हो। दूसरा पेग पहले वाले से थोड़ा ज्यादा होता है। अगर पीया, लेकिन पीते हुए शराब को महसूस नहीं की, तो क्या ख़ाक पीया?


बदलता मन और धीरे-धीरे छूटती आदतें

    लेकिन आज.. आज कईं बार बोत्तल को छूने का भी मन नहीं करता है। वह जो फिलिंग, या वाइब होती थी, वह आज नहीं पनपती। वही बात है, मन धीरे धीरे कर बहुत सारी बातों से बदलने लगता है। यह कभी भी किसी को एक झटके नहीं भूलता। याद भी रखता है, तो धीरे धीरे..! मन में कोई बस गया हो, तब तो उसे हर पर उसी ओर आकर्षित करते रहना इस मन का परम कर्तव्य बन जाता है। अच्छा एक बात और.. सुरापान करने के पश्चात यह नशा अलग ही होता है सबके साथ.. कोई भावनाओं में बहने लगता है, तो कोई पागलपन करने लगता है। मैंने जब जब होश गंवाया है, (सिर्फ दो बार) मैंने अपने आपको ही नियंत्रण में रखने की कोशिश की है। 


    मैंने कभी कोई आशिक़ी याद नहीं की, मैंने कभी कोई हो-हल्ला नहीं किया। चुपचाप, अपने ऊपर से खोता जाता नियन्त्र को पुनः प्राप्त करने में ही मेरा मन प्रवृत्त हो जाता है। लेकिन दोनों ही बार विफल रहा हूँ। यहाँ भी एक मुखौटा होता है। मेरे जैसे कईं लोग इस बात को छिपाते है, कि शौक तो है, लेकिन आबरू के संगत शौक नहीं है यह। तो हम इससे दूर है। एक तो यह मुखौटा हुआ, कि अपन इस बला से दूर है। लेकिन हकीकत में ऊपर वर्णिंत बोतल के साथ होती मुहब्बत, कुछ कुछ एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर से मुकाबला कर सकती है। 


    खेर, यह तो अपने आप को रुसवा न होने देने की पेशकश है प्रियंवदा.. बाकी हर कोई अपना आचरण जानता है। अच्छे से जानता है। जैसे मैं ही, आज भी प्रेम की तलाश में हूँ। 

    शुभरात्रि।

    २६/१२/२०२५

|| अस्तु ||


प्रिय पाठक !

अगर आपने भी कभी अपने शौक, आदतें या खुद को बदलते महसूस किया है—
तो इस दिलायरी को पढ़िए, साझा कीजिए, और अपनी चुप्पी को शब्द दीजिए।
टिप्पणी में लिखिए—आप किससे धीरे-धीरे दूर हो गए?

Dilayari पढ़ते रहिए, नए पत्र सीधे आपके Inbox में आएंगे:
मेरे लिखे भावनात्मक ई-बुक्स पढ़ना चाहें तो यहाँ देखिए:
और Instagram पर जुड़िए उन पलों से जो पोस्ट में नहीं आते:

आपसे साझा करने को बहुत कुछ है…!!!

और भी पढ़ें :

समय था, फिर भी नहीं था | सांता क्लॉस, थोथे और थकान || दिलायरी : 26/12/2025

प्रियम्वदा को लिखी 365वीं दिलायरी: एक वर्ष, शब्दों का संकल्प और प्रेम की स्वीकारोक्ति || दिलायरी : 24/12/2025

प्रियम्वदा को न कहे गए शब्द | एकपक्षीय प्रेम, बंधन और आत्मसंघर्ष || दिलायरी : 23/12/2025

ज़रूरतें, दोस्ती और दिल का हिसाब | पत्ता, नौकरी और अरावली || दिलायरी : 22/12/2025

रविवार की मछलियाँ, मेला और शाम का जादू || दिलायरी : 21/12/2025


#दिलायरी #नीरसता #एकतरफ़ाप्रेम #बदलतामन #आदतें #शौक #भावनात्मकलेखन #हिंदीब्लॉग #डायरीलेखन #Dilayari 


Post a Comment

0Comments
Post a Comment (0)